सोमवार, 31 जनवरी 2011

मतलब नहीं रहा..

हम तुमसे मिलने आयें हैं सब काम छोड़कर ,
तुम पर ही हमसे मिलने को वक़्त  न हुआ.
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सुनना तो चाहते थे तुमसे बहुत कुछ मगर ,
तुमने ही हमसे अपने दिल का हाल न कहा.
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गायब तो तुम ही हो गए थे बीच राह में,
मिलने को तुमसे हमने कितनी बातों को सहा.
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सब कुछ गवां के हमने रखी दोस्ती कायम,
तुम कहते हो हमसे कभी मतलब नहीं रहा.
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गुरुवार, 27 जनवरी 2011

आदमी क्या है....

आदमी क्या है एक खिलौना है,
जीवन में हँसना कम अधिक रोना है.
    खुशियाँ मिलती हैं कभी कभी ,
संग दुःख लाती हैं तभी तभी.
   खुशियाँ आयें या ना आयें,
दुःख के पड़ जाते हैं साये.
   दुःख अपना प्यारा साथी है,
निरंतर साथ निभाता है,
   खुशियाँ बुलाने पर भी ना आयें.
दुःख आ जाता बिन बुलाये.
   दुःख में विधि को हम याद करें,
सुख में इसका ना ध्यान करें.
   जो सुख में इसका ध्यान करें,
तो दुःख हम सब पर कैसे पड़े.
   गलती हम करते जाते हैं,
पर स्वीकार ना करते कभी.
  इस कारण ही तो ऐसा है,
पड़ जाते जल्दी दुःख सभी.
  दुखों की परम परंपरा है,
सुख तो एक व्यर्थ अप्सरा है.
  दुखों की ही हर पल सोचें,
सुखों का कभी ना ध्यान करें.

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

क्या आज का सच यही है?

एक शेर जो हम बहुत जोर-शोर से गाते हैं-
"खुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं."
क्या जानते हैं कि यूं तो ये मात्र एक शेर है किन्तु चंद शब्दों में ये शेर उन शहीदों के मन की भावना को हमारे  सामने खोल का रख देता है .वे जो हमें आजादी की जिंदगी देने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर गए यदि आज हमारे सामने अपने उसी स्वरुप में उपस्थित हो जाएँ तो शायद हम उन्हें एक ओर कर या यूं कहें की ठोकर मार कर आगे निकल  जायेंगे,कम  से कम मुझे आज की भारतीय  जनता को देख ऐसा ही लगता है.आप सोच रहे होंगे कि  ऐसा क्या हो गया जो मुझे इतना कड़वा सच आपके सामने लाना पड़ गया.कल का हिंदी का हिंदुस्तान इसके लिए जिम्मेदार है जिसने अपने अख़बार की बिक्री बढ़ाने के लिए एक ऐसे शीर्षक युक्त समाचार को प्रकाशित किया कि मन विक्षोभ से भर गया.समाचार था "ब्रांड सचिन तेंदुलकर ने महात्मा गाँधी को भी पीछे छोड़ा"ट्रस्ट रिसर्च एड्वयिजरी   [टी.आर.ऐ.]द्वारा किये गए सर्वे में भरोसे के मामले में सचिन को ५९ वें स्थान पर रखा गया है और महात्मा गाँधी जी को २३२ वें स्थान पर रखा गया है .सचिन हमारे देश का गौरव हैं.रत्न हैं किन्तु महात्मा गाँधी को पछाड़ना उनके क्या किसी भी भूत,वर्तमान,भविष्य के व्यक्ति के वश में नहीं है.क्या पिता से ऊपर भी कोई हो सकता है?और ये सोचने कि बात है कि क्या महात्मा गाँधी को पिता का दर्जा हमारे भारत देश ने ऐसे ही दे दिया जहाँ सुभाष चंद बोसे जैसे नेता भारत रत्न के लिए आजादी के बहुत वर्षो बाद चुने जाते हैं और जहाँ जनता को देश के लिए कार्य करने वालो के लिए जनता को खुद भारत रत्ना कि सिफारिश करनी पड़ती हो वहाँ महात्मा गाँधी के योगदान कुछ तो होगा जो उन्हें पिता का दर्जा मिला,फिर सचिन से उनका क्या मुकाबला?वे सचिन के समय के नहीं,वे कोई क्रिकेटर नहीं.और जहाँ तक बात है भरोसे की तो ये पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं=
"जब-जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े,
मजदूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े,
हिन्दू व मुसलमान सिख पठान चल पड़े,
कदमो पे तेरे कोटि-कोटि प्राण चल पड़े,"
महात्मा गाँधी से उनकी तुलना का यहाँ कोई मतलब भी नहीं.और इस तरह के सर्वेक्षण की खबर को प्रमुखता देना एक उच्च कोटि के समाचार पत्र के लिए सही नहीं इस लिए उस को इस सम्बन्ध में ध्यान देना चाहिए  .जैसे चाहे शुक्ल पक्ष हो या कृष्ण पक्ष सूर्य के प्रकाश पर कोई असर नहीं होता ऐसे ही महात्मा गाँधी के नाम के आगे कोई और नाम हो ही नहीं सकता .इस तरह के सर्वेक्षण बंद होने चाहिए जो जनता के समक्ष गलत बाते रखते हैं .अमिताभ जी से तुलना सही है किन्तु आज जब गाँधी जी हमारे बीच में नहीं हैं तब इस तरह के सर्वेक्षण क्या वास्तव में सही हैं?और क्या सही हैं हम जो भरोसे के विषय में सचिन को महात्मा गाँधी जी से ऊपर रखते हैं .महात्मा गाँधी जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान कर दिया और खुद कोई फायदा कभी नहीं लिया .हम में से   बहुत से लोग उनके सिद्धांतों से मतभेद रख सकते हैं किन्तु जहाँ तक बात है उनके खुद के लिए कुछ करने कि तो शायद एक राय ही होंगे.इसलिए जैसा मैं सोच रही हूँ क्या आप भी इन सर्वेक्षणों के बारे में वही सोच रहे हैं?
मैं तो उनके सम्बन्ध में एक कवि महोदय के शेर को प्रस्तुत कर अपनी लेखनी को विराम दे रही हूँ.किन्तु आप सोचियेगा ज़रूर-
'कैंची से चिरागों की लौ काटने वालो.
सूरज की तपिश को रोक नहीं सकते.
तुम फूल को चुटकी से मसल सकते हो,
पर फूल की खुशबू समेत नहीं सकते."

बुधवार, 19 जनवरी 2011

jo bhi ray ho avashay den..

पहले आप ये मेरे ब्लॉग व मेरी कविता का अवलोकन करें-

इस पर एक टिप्पणी पोस्ट करें: कौशल

"उचित निर्णय युक्त बनाना"

12 टिप्पणियाँ - मूल पोस्ट छिपाएँ

जो बनते हैं सबके अपने,
  निशदिन दिखाते हैं नए सपने,
      ऊपर-ऊपर प्रेम दिखाते,
          भीतर सबका चैन चुराते,
ये लोगों को हरदम लूटते रहते हैं,
तब भी उनके प्रिय बने रहते हैं.
  ये करते हैं झूठे वादे,
    भले नहीं इनके इरादे,
       ये जीवन में जो भी पाते,
          किसी को ठग के या फिर सताके,
ये देश को बिलकुल खोखला कर देते हैं  ,
इस पर भी लोग इन पर जान छिड़कते हैं.
   जब तक ऐसी जनता है,
  तब तक ऐसे नेता हैं,
  जिस दिन लोग जाग जायेंगे,
ऐसे नेता भाग जायेंगे,
      अब यदि चाहो इन्हें हटाना,
      चाहो उन्नत देश बनाना,
       सबसे पहले अपने मन को,
       उचित निर्णय युक्त बनाना.

ब्लॉगर shikha kaushik ने कहा…
bahut shandar prastuti.
१० जनवरी २०११ ८:२७ पूर्वाह्न
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ब्लॉगर RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…
I wish you Happy New 2011! सुन्दर शब्दों की बेहतरीन शैली । भावाव्यक्ति का अनूठा अन्दाज । बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति । हिन्दी को ऐसे ही सृजन की उम्मीद । धन्यवाद.... satguru-satykikhoj.blogspot.com
११ जनवरी २०११ १२:४२ पूर्वाह्न
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ब्लॉगर RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…
I wish you Happy New 2011! सुन्दर शब्दों की बेहतरीन शैली । भावाव्यक्ति का अनूठा अन्दाज । बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति । हिन्दी को ऐसे ही सृजन की उम्मीद । धन्यवाद.... satguru-satykikhoj.blogspot.com
११ जनवरी २०११ १२:४२ पूर्वाह्न
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ब्लॉगर ali ने कहा…
नेताओं से बहुत नाराज़ हैं आप :) ख्याल रहे ये लोग भी हमारे जैसों के बीच से आगे आये हैं ! इनकी बुराइयों के जिम्मेदार हम भी है इसलिए आपकी कविता का आखिरी पैरा निर्णायक लगा / अच्छा लगा !
१२ जनवरी २०११ ५:४० पूर्वाह्न
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ब्लॉगर ali ने कहा…
आपने लिंक जोड़ने और गैजेट पेस्ट करने के बारे में पूछा था ,मुझे स्मरण है कि श्री संजीव तिवारी जी ने इस विषय पर पोस्ट लिखी थी मैंने उन्हें फोन करके आपके ब्लॉग कौशल का लिंक दे दिया है ,वे आज ही आपके ब्लॉग पर कमेन्ट करने आयेंगे और उन पोस्ट की लिंक आपको दे देंगे ! उम्मीद है कि उन्हें पढते हुए आपके दोनों काम बन जायेंगे !
१२ जनवरी २०११ ५:५६ पूर्वाह्न
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ब्लॉगर संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…
लिंक कैसे जोड़ें 1. एचटीएमएल कोड का प्रयोग करके यहां देखें लिंक कोड एचटीएमएल 2. ब्‍लॉगर पोस्‍ट बाक्‍स में जिस शव्‍द में लिंक लगाना है उसे सलेक्‍ट करें व उपर पोस्‍ट बाक्‍स में लिंक को क्लिक करें वहां वही यूआरएल डालें जिसका लिंक आप लगाना चाहती हैं। गैजेट जोड़ना इस पोस्‍ट से सहायता लेवें
१२ जनवरी २०११ ६:४७ पूर्वाह्न
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ब्लॉगर क्रिएटिव मंच-Creative Manch ने कहा…
सुन्दर रचना राजनीति में भ्रष्ट नेताओं के लिए हम भी कम दोषी नहीं हैं. अच्छी लगी कविता आभार
१२ जनवरी २०११ ११:१२ पूर्वाह्न
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ब्लॉगर रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…
बहुत अच्छी है. # निष्पक्ष, निडर, अपराध विरोधी व आजाद विचारधारा वाला प्रकाशक, मुद्रक, संपादक, स्वतंत्र पत्रकार, कवि व लेखक रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" फ़ोन:9868262751, 9910350461 email: sirfiraa@gmail.com, हिंदी में काम करके,राष्ट्र का सम्मान करें. श्रीमान जी, आपने अगर मुझे कभी ईमेल भेजी हो और उसका जवाब नहीं मिला हो तो नोट करें आप जब मुझसे किसी प्रकार का कोई जवाब चाहते हैं तो अपनी ईमेल में अपने विचार हिंदी में लिखकर ही भेजें अथवा मैं अंग्रेजी में भेजे गए विचारों और बातों का जवाब देने में असमर्थ हूँ. इन्टरनेट या अन्य सोफ्टवेयर में हिंदी की टाइपिंग कैसे करें और हिंदी में ईमेल कैसे भेजें जाने. नियमित रूप से मेरा ब्लॉग http://rksirfiraa.blogspot.com, http://sirfiraa.blogspot.com, http://mubarakbad.blogspot.com, http://aapkomubarakho.blogspot.com, http://aap-ki-shayari.blogspot.com & http://sachchadost.blogspot.com देखें और अपने बहूमूल्य सुझाव व शिकायतें अवश्य भेजकर मेरा मार्गदर्शन करें. अच्छी या बुरी टिप्पणियाँ आप भी करें और अपने दोस्तों को भी करने के लिए कहे.
१३ जनवरी २०११ १:०३ पूर्वाह्न
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ब्लॉगर Patali-The-Village ने कहा…
बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति । धन्यवाद|
१३ जनवरी २०११ ५:४४ पूर्वाह्न
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ब्लॉगर Kunwar Kusumesh ने कहा…
अच्छी, पठनीय पोस्ट.
१३ जनवरी २०११ ८:२६ पूर्वाह्न
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ब्लॉगर जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…
sundar kavita badhai
१३ जनवरी २०११ ८:५७ अपराह्न
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ब्लॉगर Dr. shyam gupta ने कहा…
ye tippanee karane vale kya soch kar tippanee karate hain--- ---prastut kavitaa -kavitaa hee naheen hai vaktavy hai aur lage hain prashansaa karane----is tarah sudhar ke bazay galat-salat paripatee ko hee chalane ko vaadhy karaye hain...
१४ जनवरी २०११ ७:२२ पूर्वाह्न
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मेरी इस कविता पर हर तरह की टिपण्णी आई जिसमे तारीफ भी हुई और आलोचना भी किन्तु सबसे अधिक मुझे व्यथित किया डॉ.श्याम गुप्त जी की टिपण्णी ने जिसमे इसे कविता नहीं माना गया चलिए मैं मान लूंगी की ये कविता नहीं है किन्तु वे इसमें कविता का क्या नहीं है बताते और मेरा मार्ग दर्शन करते जैसा डॉ.रूपचंद्र जी करते हैं,अली जी करते हैं और तमाम बड़े अपने बच्चों का करते हैं.यदि आपको भी ये कविता नहीं लगी तो आप भी बताएं की ऐसा क्या लिखूं जो कविता हो.साथ ही क्या गलत परिपाटी इससे बढ़ेगी वो भी अवश्य बताएं.और बताएं की क्या ऐसी टिप्पणियां ब्लॉग परिवार में होनी चाहियें?कृपया टिपण्णी अवश्य दें.

शनिवार, 15 जनवरी 2011

तभी नाम ये रह जायेगा.....

जीवन था मेरा बहुत ही सुन्दर,
भरा था सारी खुशियों से घर,
पर ना जाने क्या हो गया
कहाँ से बस गया आकर ये डर.
पहले जीवन जीने का डर,
उस पर खाने-पीने का डर,
पर सबसे बढ़कर जो देखूं मैं
लगा है पीछे   मरने का डर.
सब कहते हैं यहाँ पर आकर,
भले ही भटको जाकर दर-दर,
इक दिन सबको जाना ही है
यहाँ पर सर्वस्व छोड़कर.
                   ये सब कुछतो मैं भी जानूं,
                     पर मन चाहे मैं ना मानूं,
                       होता होगा सबके संग ये
                          मैं तो मौत को और पर टालूँ.
                         हर कोई है यही सोचता,
                        मैं हूँ इस जग में अनोखा,
                      कोई नहीं कर पाया है ये
                   पर मैं दूंगा मौत को धोखा.
फिर भी देखो प्रिये   इस जग में जो भी आया है जायेगा,
इसलिए भले काम तुम कर लो तभी नाम ये रह जायेगा.

सोमवार, 10 जनवरी 2011

उचित निर्णय युक्त बनाना

जो बनते हैं सबके अपने,
  निशदिन दिखाते हैं नए सपने,
      ऊपर-ऊपर प्रेम दिखाते,
          भीतर सबका चैन चुराते,
ये लोगों को हरदम लूटते रहते हैं,
तब भी उनके प्रिय बने रहते हैं.
  ये करते हैं झूठे वादे,
    भले नहीं इनके इरादे,
       ये जीवन में जो भी पाते,
          किसी को ठग के या फिर सताके,
ये देश को बिलकुल खोखला कर देते हैं  ,
इस पर भी लोग इन पर जान छिड़कते हैं.
   जब तक ऐसी जनता है,
  तब तक ऐसे नेता हैं,
  जिस दिन लोग जाग जायेंगे,
ऐसे नेता भाग जायेंगे,
      अब यदि चाहो इन्हें हटाना,
      चाहो उन्नत देश बनाना,
       सबसे पहले अपने मन को,
       उचित निर्णय युक्त बनाना.

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

khil jayega ye jeevan

मस्त बहारें छाने लगती हैं अनचाहे जीवन में,
खुशियाँ हजारों बस जाती हैं चुपके से मेरे मन में .
इच्छा होती है मिलकर सबसे कह दूं मन की सारी बात,
कि क्या चाहा था हो गया क्या देखो अब मेरे साथ .
मेरी चाह थी इस जीवन में कुछ ऊंचाईयों  को  छू  लूं,
उठ सकती नहीं सबसे ऊपर इस स्तर से तो उठ लूं.
पाकर थोड़ी सी सफलता प्रफुल्लित हो उठता है मन,
पा लूं मैं यदि पूर्ण सफलता खिल जायेगा ये जीवन.
,

''बेटी को इंसाफ -मरने से पहले या मरने के बाद ?

   '' वकील साहब '' कुछ करो ,हम तो लुट  गए ,पैसे-पैसे को मोहताज़ हो गए ,हमारी बेटी को मारकर वो तो बरी हो गए और हम .....तारी...