शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

ये नौकरी तो कोई भी न करे...

समुंदर के किसी भी पार रहना,
मगर तूफ़ान से होशियार रहना.
लगाओ तुम मेरी कीमत लगाओ
मगर बिकने को भी तैयार रहना.
      "नवाज़ देवबंदी"का यह शेर आज के जिलाधिकारियों पर पूरी तरह से सही बैठता  प्रतीत होता है जिन्हें हर काम करते वक़्त अपनी नौकरी को दांव पर लगाने को तैयार रहना पड़ता है कल   के समाचार पत्रों की मुख्य खबर के रूप में "मुज़फ्फरनगर के नए  डी.एम्.पंकज कुमार "छाये हुए हैं और मुज़फ्फरनगर के डी.एम्. संतोष यादव को वेटिंग सूची में डाल दिया गया है.इस सर्विस को लेकर आज के युवा बहुत से सपने पाले रहते हैं .सोचते हैं कि इसमें आकर देश सेवा का अद्भुत अवसर मिलेगा किन्तु सच्चाई जो है वह सबके सामने है.मुज़फ्फरनगर जैसे अपराध के लिए प्रसिद्द जिले में श्री संतोष यादव जितनी ईमानदारी व् मुस्तैदी से प्रशासन कार्य कर रहे थे उससे कोई भी अन्जान नहीं है.अभी १ जनवरी को ही उन्हें तोहफा देने के नाम पर ५० हजार रूपये की रिश्वत देने पहुंचे परियोजना निदेशक एस.के.भरद्वाज को  उन्होंने गिरफ्तार करा दिया था.मेरी व्यक्तिगत जानकारी में ही एक महिला का मकान एक फ्रॉड नेता ने कब्ज़ा लिया था वह भी श्री  संतोष जी के आदेश से ही उसे वापस मिल सका है.ऐसे ही पता नहीं कितने उदाहरण हैं जो उनकी कार्यप्रणाली की तारीफ में दिए जा सकते हैं किन्तु इस सबका कोई फायदा नहीं है ये अधिकारी सरकारीतंत्र के हाथों की कठपुतली मात्र बन कर रह गए हैं .पूर्व में श्रीमती .अनुराधा शुक्ला जी भी इसी सरकारीतंत्र के हाथो की कठपुतली का शिकार बन नैनीताल से हटा दी गयी थी.
           इस प्रकार पहले भी और आज भी बहुत से युवा जो देश सेवा का स्वप्न संजोये आई.ए.एस.में आये या आ रहे   हैं वे इन पाबंदियों से दूर होने व् कठपुतली बनने से बचने के लिए ये सर्विस छोड़ देते हैं या छोड़ रहे हैं.वैसे भी सही काम करने वाले कब इन पाबंदियों को झेल सकते हैं?ऐसे ही हालत पर शायद नज्म मुज़फ्फर नगरी की ये पंक्तियाँ हमारे देश के इन कर्णधारों के जेहन में आ जाती होंगी-
"सलीका जिनको नहीं खुद जमीं पे चलने का,
वो मशवरा हमें देने लगे संभलने का."
शालिनी कौशिक

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

न्याय पथभ्रष्ट हो रहा है...

"इंसाफ जालिमों की हिमायत में जायेगा, ये हाल है तो कौन अदालत में जायेगा."
   राहत इन्दोरी के ये शब्द और २६ नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ के द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट  पर किया   गया दोषारोपण "कि हाईकोर्ट में सफाई के सख्त कदम उठाने की ज़रुरत है क्योंकि यहाँ कुछ सड़ रहा है."साबित करते हैं कि न्याय भटकने की राह पर चल पड़ा है.इस बात को अब सुप्रीम कोर्ट भी मान रही है कि न्याय के भटकाव ने आम आदमी के विश्वास को हिलाया है वह विश्वास जो सदियों से कायम था कि जीत सच्चाई की होती है पर आज ऐसा नहीं है ,आज जीत दबंगई की है ,दलाली की है .अपराधी     बाईज्ज़त     बरी हो रहे हैं और न्याय का यह सिद्धांत "कि भले ही सौ अपराधी छूट   जाएँ किन्तु एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए"मिटटी में लोट रहा है .स्थिति आज ये हो गयी है कि आज कातिल खुले आकाश के नीचे घूम रहे हैं और क़त्ल हुए आदमी की आत्मा  तक को कष्ट दे रहे हैं-खालिद जाहिद के शब्दों में-
"वो हादसा तो हुआ ही नहीं कहीं,
अख़बार की जो शहर में कीमत बढ़ा गया,
सच ये है मेरे क़त्ल में वो भी शरीक था,
जो शख्स मेरी कब्र पे चादर चढ़ा गया."
न्याय का पथभ्रष्ट होना आम आदमी के लिए बहुत ही कष्टदायक हो रहा है.आम आदमी खून के आंसू रो रहा है.निचले स्तर पर भ्रष्टाचार   को झेल जब वह उच्च अदालत में भी भ्रष्टाचार को हावी हुआ पाता है तो वह अपने होश खो बैठता है .अपराध कुछ और वह पलट कर कुछ और कर दिया जाता है और अपराधी को बरी होने का मौका कानूनन   मिल जाता है.हफ़ीज़ मेरठी के शब्दों में-
"अजीब लोग हैं क्या मुन्सफी की है,
हमारे क़त्ल को कहते हैं ख़ुदकुशी की है."
आश्चर्य की बात तो यह है कि संविधान द्वारा दिए गए कर्त्तव्य को उच्चतम न्यायालय जितनी मुस्तैदी से निभा रहा है उच्च न्यायालयों में वह श्रद्धा प्रतीत नहीं होतीजबकि संविधान द्वारा लोकतंत्र के आधार स्तम्भ में लोकतंत्र की मर्यादा बनाये रखने के जिम्मेदारी न्यायालयों को सौंपी गयी है और इस तरह उच्च न्यायालयों का भी ये उत्तरदायित्व बनता है कि वे भी उच्चतम न्यायालय की तरह न्याय के संरक्षक बने .उच्च न्यायालय अपनी गरिमा के अनुसार कार्य नहीं कर रहे हैं .कभी कर्णाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश दिनाकरण का मामला न्याय को ठेस लगाता है तो कभी सुप्रीम कोर्ट की इलाहाबाद हाईकोर्ट में "सडन"की टिपण्णी से सर शर्म से झुक जाता है प्रतीत होता है कि मुज़फ्फर रज्मी के शब्दों में न्याय भी ये कह रहा है-
"टुकड़े-टुकड़े हो गया आइना गिर कर हाथ से,
मेरा चेहरा अनगिनत टुकड़ों में बँटकर रह गया."
न्याय पथभ्रष्ट हो रहा है...

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

हिंदी अपने देश में..

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस  २१ फरवरी को मनाया गया किन्तु मातृभाषा के प्रति अनुराग की बात की जाये तो वह कम से कम हम भारतीयों में तो मिलना मुश्किल है.सभी कहते हैं कि अंग्रेज गए अंग्रेजी छोड़ गए और यह केवल कथन थोड़े ही है ये तो आम चलन है.न केवल पढ़े लिखे बुद्धिजीवी वर्ग में अपितु मात्र दो चार कक्षा पढ़े लोग भी अंग्रेज बनने के ही प्रति अग्रसर हैं .हमारे एक जानकार हैं जो स्वयं को चौथी ''फेल''कहते हैं और अपने को अंग्रेज दिखाने से बाज नहीं आते .अस्पताल को हॉस्पिटल कहते हैं,अदालत को कोर्ट कहते हैं और यदि इन शब्दों की  हिंदी पूछी जाये तो बगलें झांकते हैं.ये तो मात्र एक उदाहरण है और वह भी केवल इसलिए कि मैं ये कहना चाहती हूँ कि अंग्रेजी हमारे वतन की हवा में घुल चुकी है.और हम न चाहते हुए भी इसका प्रयोग करते हैं.अब यदि ''प्रयोग ''शब्द को ही लें तो कितने लोग इसका इस्तेमाल करते हैं गिनती  शून्य ही होगी क्योंकि लगभग सभी ''यूज '' शब्द इस्तेमाल करते हैं.''शून्य ''शून्य  ''को जानने वाले भी कम होंगे अब लगभग सभी ''जीरो ''को जानते हैं.हम हो या और कोई कितनी बार अपने को औरों से श्रेष्ठ दिखाने हेतु भी अंग्रेजी बोलते हैं क्योंकि एक आम सोच बन चुकी है कि हिंदी बोलने वाले पिछड़े हुए हैं.
    आप रूसियों को देखिये वे हर देश में अपनी भाषा बोलते हैं हमें उनसे सीख लेनी चाहिए और अपनी भाषा को उसका सम्माननीय स्थान देते हुए अपनाना चाहिए .भाषा संपर्क का साधन है .अंत में चेतन आनंद जी के शब्दों का प्रयोग करते हुए मैं केवल यही कहूँगी कि वही सफलता मायने रखती है जो अपनों को साथ रखते हुए मिले ,अपनों के साथ रहते हुए मिले और हिंदी हमारी अपनी है,हमारी मातृभाषा है-
''मैंने देखो आज नए अंदाज के पंछी छोड़े हैं,
ख़ामोशी के फलक में कुछ आवाज के पंछी छोड़े हैं,
अब इनकी किस्मत है चाहे कितनी दूर तलक जाये
मैंने कोरे कागज पर अल्फाज के पंछी छोड़े हैं.'' 

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

ye kya ho raha hai...

ब्लॉग एसोसिएशन अपने आपसी मन मुटाव में पडी हैं और जो असल में इनका उद्देश्य होना चाहिए उस और इनका ध्यान ही नहीं जा रहा है.मेरा मतलब है ये हम ही हैं जो अन्याय के खिलाफ मिलजुल कर आवाज उठा सकते हैं और हम ही इस और ध्यान नहीं दे रहे हैं.१७ फरवरी से अख़बारों में मुज़फ्फरनगर का गाँव भारसी की antrashtriy खिलाडी  "प्रियंका पंवार "
के उत्पीडन की ख़बरें छाई हैं और इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया  जा रहा है.एक और प्रियंका का उत्पीडन उन्हें तोड़ रहा है और दूसरी और वे राज्य का नाम रोशन कर रही हैं.३४ वें राष्ट्रीय खेलों में उन्होंने १०० मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीता है और सराहना में उन्हें क्या मिल रहा है केवल रोना.उनके पिता शिवकुमार पंवार भी उन्हें लेकर चिंतित हैं.
     प्रियंका के उत्पीडन में टी.टी. ई.अनु कुमार पर मुकदमा मुज़फ्फरनगर की नई मंडी कोतवाली में पंजीकृत कराया गया है.किन्तु उनके टी.टी.ई ने कहा है की उनके आरोपों में सच्चाई नहीं है और वे उनकी पत्नी से रंजिश रखती हैं.दूसरी और प्रियंका का अपने पिता से kahna   है कि उनके बड़े बड़े लोगों से सम्बन्ध हैं और मुझ पर कार्यवाही से हटने को दबाव बनाया जा रहा है .प्रियंका के पिता को डर है कि कहीं उनकी बेटी आत्महत्या न कर ले.अगर ऐसा होता है तो ये हम सभी के लिए शर्म की बात होगी .आखिर कितनी और रूचिकाएं राठोर की शिकार बनेंगी? आखिर कब तक हमारे उदईमानों को इस तरह के उत्पीडन झेलने होंगे? आखिर कब तक सच्चाई को सबूत की तलाश करनी होगी?कब तक?सच जो भी हो सामने आना चाहिए और फिर जो भी सच्चाई पर हो उसका साथ जनता को आगे बढ़कर देना चाहिए.मैं अभी केवल मामला आपके सामने रख रही हूँ पूरी सच्चाई तो धीरे धीरे ही सामने आएगी किन्तु ऐसी बातें मेरी लेखनी को कुछ लिखने को विवश कर देती हैं कि आखिर ये क्या हो रहा है?और हम चुप क्यों हैं-आशीष"अनल"के शब्दों में मैं तो यही कहूँगी-
बागवान बाग़   के लुटेरे होते देखें हैं,
माझी खुद अपनी नाव  को डुबोते देखें हैं,
लेखनी बन गयी है तब से मेरी ज्वालामुखी
जब से इस मात्रभू के नयन रोते देखें हैं.

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

जो किया सही किया..

एक प्रसिद्ध शायर का शेर है-
"हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती."
       शायद प्रधान मंत्री जी यही कह रहे हैं आजकल.क्योंकि चारों और से उनकी घेराबंदी  जो की जा रही है किन्तु जो आज सुबह के अमरउजाला में उनका बयान पढ़ा

जिसमे उन्होंने कहा "कि जितना दोषी नहीं उससे ज्यादा दिखाया जा रहा हूँ,इस्तीफ़ा नहीं दूंगा."
बयान पसंद आया.आप सोच सकते हैं कि मैं शायद चापलूसी की राह पर चल रही हूँ सोचिये सोचने से कौन रोकता है किन्तु यदि हम ध्यान से सोचे तो हमें उनकी ये बात कि गठबंधन धर्म के कारण मजबूरी की बात में कोई झूठ नजर नहीं आएगा.आप खुद सोचिये पहले संयुक्त परिवार की प्रथा थी और उसमे करने वाला एक होता था और खाने वाले सौ.उस का ही ये नतीजा है कि आज यह प्रथा टूट चुकी है.राजनीति में ये प्रथा अभी अभी आरंभ हुई है और इसके खामियाजे अभी से ही नजर आने लगे हैं.गलत हो या सही परिवार को बनाये रखना परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी हो जाती है और प्रधानमंत्री जी वही कर रहे हैं.
     अब एक बात और ,प्रधानमंत्री जी पर सारी जिम्मेदारी डाल कर हम अपनी जिम्मेदारी से मुहं   नहीं मोड़ सकते.हमारे संविधान ने हमें वोट का अधिकार दिया और हम अपने इस अधिकार का क्या इस्तेमाल करते हैं?कुछ नहीं .कहने को शिक्षित वर्ग अपने अधिकारों का अच्छी तरह इस्तेमाल कर सकता है किन्तु ये शिक्षित वर्ग ही है जो वोट के समय अपने वक़्त को कथित रूप से वोट डालने में बर्बाद नहीं करता.अपनी जरूरी मीटिंग्स करता है.घर बैठता है और अपने जितने काम "पेंदिंग्स -सूची "में होते हैं पूरे करता है और जो वर्ग कुछ नहीं जानता सिर्फ दो वक़्त की रोटी के, शराब की चसक के,भूख प्यास के वह वोट डालने जाता है और अपनी वोट बेच कर आ जाता है.मनमोहन सिंह जी जैसे काबिल नेता चुने नहीं जाते और चम्बल छोड़ नेता बने उम्मीदवार चुन लिए जाते हैं और सदन में बैठ देश का सर झुकाते हैं.मनमोहन जी जैसे नेता को राज्य सभा के जरिये सत्ता में शामिल किया जाता है और उस पर भी हम सच्चाई का साथ न दे हर समय उनकी आलोचना ढूंढते रहते हैं.और किसी को सही लगा हो या न हो पर मुझे बहुत अच्छा लगा है कि इस तरह की बातों से प्रधान मंत्री जी घबराये नहीं और इस्तीफा देने से मुकर गए.वैसे  भी जो व्यक्ति देश की बागडोर सँभालते हैं उन्हें ऐसी छोटी-मोटी परेशानियों से घबराना भी नहीं चाहिए क्योंकि उनकी नजर देश के लिए  ज्यादा करने की ओर रहती है.जैसी कि "अनवर हुसैन"कहते हैं-
"मौसमों की खबर नहीं रखता,
वो परिंदा जो पर नहीं रखता,
देखता हूँ मैं मंजिलों को ,
फासलों पर नजर नहीं रखता."
[http ://shalinikaushik2 .blogspot .com }
       

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

पत्रिका में मेरा आलेख

 प्रिय दोस्तों ,
  आज मैं बहुत खुश हूँ कारण ये है कि नारी ब्लॉग पर प्रकाशित मेरा एक आलेख"दहेज़ मृत्यु व कानूनी रुख" "समाज कल्याण "पत्रिका ने अपने फरवरी के अंक में प्रकाशित किया है.ये उपलब्धि  मैने "नारी ब्लॉग" से जुड़ कर पाई और"रचना जी "के माध्यम से मुझे इसकी सूचना प्राप्त हुई ,मैं आभारी हूँ रचना जी की और समस्त ब्लॉग परिवार की जिसने प्रतिपल मेरा उत्साहवर्धन किया है.

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

वेलेंटाइन डे-प्यार का दिन या कुछ और

वेलेंटाइन डे प्यार का दिन,एक ऐसा दिन जब जिधर देखो प्यार की खुशबू फ़ैल जाती है .दुकानों पर कहीं चोकलेट्स कार्ड्स,कई परफ्यूम ,टेडी बियर सज रहे हैं तो सड़कों पर युवाओं की कतारों की कतारें हैं.लगभग सभी जान चुके हैं कि १४ फरवरी का दिन वेलेंटाइन डे है लेकिन यह क्यों मनाया जाता है इससे शायद कुछ ही लोगों का वास्ता पड़ा होगा किन्तु मैं सबसे पहले इन संत वेलेंटाइन के देश का जिक्र करूंगी और वह भी यूं कि ये रोम के पास एक शहर के थे ,वही रोम जो इटली की राजधानी है और उस देश के इस दिवस को यहाँ के उसी युवा वर्ग ने कितनी खुली मानसिकता से अपना लिया जबकि उसी देश की सोनिया गाँधी को यहाँ अब तक भी विदेशी कहा जाता है जबकि उनका भी तो राजीव गाँधी से प्रेम ही था जिस कारण उन्होंने भारत को और भारत की संस्कृति को अपनाया तो उन्हें स्वीकारने में यहाँ संकीर्ण मानसिकता क्यों अपनाई जाती है?
        खैर यहाँ बात हो रही है सेंत वेलेंटाइन की तो जहाँ तक मुझे जानकारी है उन्होंने रोमन शासक क्लाडियस के सैनिकों पर महिलाओं के साथ प्यार जताने और विवाह करने पर प्रतिबन्ध को चुनौती दी थी और "पूरे रोम में घूमकर प्रेम के सूत्र को लोगो को समझाना शुरू किया था और इसकी जानकारी मिलने पर  क्लाडियस ने सेंत वेलेंटाइन को जेल में डलवा दिया था.और उन्हें फांसी की सजा सुनायी थी .सेंत वेलेंटाइन ने अपनी फांसी के लिए १४ फरवरी का दिन तय किया.उन्होंने अपनी फांसी के दिन ही जेलर की बेटी को सन्देश लिखा और उसे फ़ैलाने को भी.सन्देश के नीचे लिखा "तुम्हारा वेलेंटाइन"बस इसी दिन से प्यार जताने का यह तरीका अमर हो गया."[साभार-मनविंदर भिभर रिपोर्ट ,हिंदुस्तान ,शनिवार -१२ फर.२०११ मेरठ]
     एक और प्यार की खुशबू से वातावरण महक रहा है तो दूसरी ओर प्यार में दहशत के रंग दिखाई दे रहे हैं.अमर उजाला में शनिवार को प्रकाशित एक समाचार "लखनऊ में छात्रा को स्कूल के पास गोली मारी ".कुछ ऐसे ही हालत बयां कर रहा है जो  "प्यार"शब्द  के हमारी युवा पीढ़ी में गलत सन्देश की बात कह रहे हैं.क्या आप इसे प्यार कहेंगे जिसके वशीभूत हो आशीष वर्मा ने साक्षी की गोली मार कर हत्या कर दी .मुजफ्फरनगर में भी एस.डी. डिग्री कॉलिज  में एक युवक ने छात्रा की गोली मरकर हत्या कर डी थी.मैं ही क्या सभी प्यार को त्याग का ही रूप कहते हैं .जिसे प्यार करते हो उसकी ख़ुशी की खातिर खुद लुट जाने की बात की जाती है न कि उसे लूट लेने की.प्यार बलिदान देता है मांगता नहीं .आज वेलेंटाइन का सन्देश युवा पीढ़ी भुना रही है किन्तु अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने में .प्यार के गलत अर्थ लगाये जा रहे हैं ओर सेंत वेलेंटाइन का सन्देश अंधेरों में धकेला जा रहा है.प्यार कहता है कि यदि आप किसी से प्यार करते हो तो उसकी खातिर बिन मोल बिक जाओ ओर उसकी इच्छा के अनुसार चलो न कि उसे अपनी इच्छा अनुसार चलने को विवश करो.ये अपनी इच्छा लादने का ही नतीजा है कि ऐसे दिवस पर चप्पलें,गोलियां चलती है और प्यार की खुशबू की जगह खून की नदियाँ बहाई जाती हैं.मैं इस दिवस पर कवि संजय जैन के शब्दों में यही कहूँगी-
"प्रीत की लहरों पर हम चढ़ना उतरना सीख लें,
ओर अगर अच्छा लगे तो प्यार करना सीख लें." 

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

बढ़ चलो ए जिंदगी

हर अँधेरे को मिटाकर बढ़ चलो ए जिंदगी
आगे बढ़कर ही तुम्हारा पूर्ण स्वप्न हो पायेगा.


गर उलझकर ही रहोगी उलझनों में इस कदर,
डूब जाओगी भंवर में कुछ न फिर हो पायेगा.


आगे बढ़ने से तुम्हारे चल पड़ेंगे काफिले,
कोई अवरोध तुमको रोक नहीं पायेगा.

तुमसे मिलकर बढ़ चलेंगे संग सबके होसले,
जीना तुमको इस तरह से सहज कुछ हो पायेगा.

संग लेकर जब चलोगी सबको अपने साथ तुम,
चाह कर भी कोई तुनसे दूर ना हो पायेगा.

जुड़ सकेंगे पंख उसमे आशा और विश्वास के ,
''शालिनी'' का नाम भी पहचान नयी पायेगा.

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

"प्रकृति हमारी है ही न्यारी "

नित नूतन उल्लास से विकसित,
     नित जीवन को करे आल्हादित  ,
           नित कलियों को कर प्रस्फुटित ,
                  लहलहाती बगिया की क्यारी.
 प्रकृति     हमारी     है     ही     न्यारी.
  ऋतुराज वसंत का हुआ आगमन,
       सरसों से लहलहाया आँगन ,
               खिला चमन के पुष्पों का मन,
                  और खिल गयी धूप भी प्यारी.
प्रकृति      हमारी      है      ही     न्यारी.
ऋतुओं में परिवर्तन लाती,
         कभी रुलाती कभी हंसाती,
                कभी सभी के संग ये गाती,
                       परिवर्तन की करो तैयारी,
प्रकृति     हमारी     है    ही   न्यारी.
  कभी बैसाखी ,तीज ये लाये,
        कभी आम से मन भर जाये,
               कभी ये जामुन खूब खिलाये,
                      होली की अब आयी बारी,
प्रकृति    हमारी     है    ही    न्यारी.

         
         

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

व्यवस्था में सुधार होना ही चाहिए...

नित्यानंद जी का एक शेर है-
''उसे जो लिखना होता है वही वह लिखकर रहती है,
कलम को  सर कलम होने का बिलकुल डर नहीं होता.''
    आज यही बात मेरी लेखनी पर भी लागू होनी चाहिए क्योंकि आज मै इसके माध्यम से कुछ सरकारी व्यवस्थाओं पर ऊँगली उठाने जा रही हूँ जो मेरे दृष्टिकोण से सुधार चाहती है.
   बरेली में आई.टी.बी.पी.में ट्रेड मेन की भर्ती शहर ओर अभ्यर्थियों   के लिए जो स्थिति लेकर आयी सभी जानते हैं.२० अभ्यर्थी इस घटना में काल के गाल में समां चुके हैं ओर यदि इस तरह की व्यवस्था ही आगे भी जारी रहती है तो आगे भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता.
     इतनी बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों को एक दिन ,एक स्थान पर एकत्रित करना ओर फिर उस परीक्षा को स्थगित कर देना प्रशासन के लिए एक सामान्य कार्य हो सकता है किन्तु यह अभ्यर्थियों के लिए सामान्य बात नहीं है क्योंकि अपनी जगह से अपने सभी काम-काज छोड़कर दूर आना और आने पर सब कुछ विफल हो जाना बर्दाश्त के बाहर है.प्रशासन पहले से ही ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं करता कि थोड़े थोड़े अभ्यर्थी बुलाये जाएँ और जो आयें वे अपनी परीक्षा देकर संतुष्ट होकर जाएँ.परीक्षा मै सफलता असफलता तो बाद की बात है किन्तु परीक्षा का न होना ऐसी स्थिति उनके सामने नहीं आनी चाहिए.दूसरी बात यह कि प्रशासन यदि चाहे तो ऐसी परीक्षाओं को एक जगह न कर कई जगह आयोजित कर सकता है जो कि अभ्यर्थियों के लिए भी सहज सुगम स्थान हो और उन्हें इसके लिए लम्बे सफ़र और ठहरने के इंतजाम के बारे में ना सोचना पड़े.
       प्रशासन को इस और ध्यान देकर इस तरह की घटनाओ की पुनरावृत्ति रोकनी होगी और यह प्रशासन के हाथ में है.पी.सी.एस. परीक्षाओं में भी दूर दूर के अभ्यर्थियों को बुला लिया जाता है जबकि प्रशासन यदि हर जिले पर इसका इंतजाम करे तो न तो इतनी भीड़ होगी और ना ही इतनी व्यवस्था करनी होगी किन्तु देखने में तो यह आता है कि प्रशासन जब तक की कोई बड़ा आन्दोलन न हो जब तक लोगों के द्वारा शहादत   न दे दी जाये किसी मसले को गंभीरता से लेता ही नहीं है.यूं.पी.में लगभग तीन दशक से अधिवक्ता हाईकोर्ट बेंच के लिए संघर्षरत हैं और उनकी ये मांग जायज भी है क्योंकि यूं.पी. बहुत बड़ा है और इस कारण गरीब व्यक्ति ,साधन रहित व्यक्ति,समय के अभाव वाला व्यक्ति अन्याय बर्दाश्त कर रहा है किन्तु कोर्ट की शरण में नहीं जा रहा क्योंकि मामले हाईकोर्ट पहुँचते हैं और दूर बैठे अधिवक्ता में सही गलत का पता नहीं चलता और ना वह मामले में नित्य हाज़िर हो सकता है .ऐसी मांग भी सरकार के द्वारा पूरी नहीं की जाती .सरकार क्यों लोगों को जनता को भड़कने पर विवश करती है जबकि ये जनता की सरकार है और इसको स्वयं भी सभी स्थितियों की जानकारी है.इसलिए मेरा कहना यह है कि व्यवस्था में सुधार होना ही चाहिए.कवि दुष्यंत के शब्दों में-
''हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.''
           

समीक्षा - "ये तो मोहब्बत नहीं" - समीक्षक शालिनी कौशिक

समीक्षा -  '' ये तो मोहब्बत नहीं ''-समीक्षक शालिनी कौशिक उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ द्वारा प्रकाशित डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन...