शनिवार, 28 मई 2011

भ्रष्टाचार का वास्तविक दोषी कौन?


भारतीय ब्लॉग लेखक मंच पर आज महाभारत -२ के परिणाम घोषित किये गए हैं और घोषित परिणामों के अनुसार मेरे निम्न आलेख को तीसरा  स्थान प्राप्त हुआ है-




२० मार्च २०११ का हिंदुस्तान देखिये क्या कहता है-
       करप्शन कप का जारी खेल,पैसे की है रेलमपेल,
कलमाड़ी के चौके तो ए-राजा के छक्के,सब हैं हक्के-बक्के,
बना कर गोल्ड नीरा यादव हो गयी क्लीन-बोल्ड,
नीरा राडिया की फील्डिंग,और वर्मा-भनोट की इनिंग,
सी.बी.आई ने लपके कुछ कैच,
हसन अली मैन ऑफ़ द मैच ,
आदर्श वालों की बैटिंग,
बक अप जीतना है वर्ल्ड करप्शन कप.
     हांग-कांग स्थित पोलटिकल एंड इकोनोमिक रिस्क कंसल्टेंसी का खुलासा भ्रष्टाचार में भारत चौथे नंबर पर और स्थानीय स्तर के नेता राष्ट्रिय स्तर के नेताओं के मुकाबले अधिक भ्रष्ट .
    २४ मार्च २०११ के हिंदुस्तान के नक्कारखाने शीर्षक के अंतर्गत राजेंद्र धोद्परकर लिखते हैं''यहूदी की लड़की''नाटक का प्रख्यात संवाद है ,
''तुम्हारा गम गम है हमारा गम कहानी ,
तुम्हारा खून खून है,हमारा खून पानी.''
  अमेरिका के राष्ट्रपति थिओडोर रूजवेल्ट का एक वाक्य है  ,जो उन्होंने निकारागुआ के तानाशाह सोमोजा के बारे में कहा था कि''यह सही है कि वह है लेकिन वह हमारा है [छूटे हुए शब्द का अंदाज़ा आप खुद लगा लें]ये दोनों वाक्य भारतीय राजनीति के सूत्र वाक्य हैं.''
  भारतीय  राजनीति  भ्रष्टाचार  के  दल  दल  में  फंसी  है  .भारतीय  राजनीति  ही  क्या  कहें हर  क्षेत्र  भ्रष्टाचार की गहरे को छू रहा है .सबसे पहले नगर पालिकाओं में भ्रष्टाचार जहाँ मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने   तक के लिए ऊपर से पैसे देने पड़ते हैं ताकि वह ठीक समय से मिल जाये.दुकानों पर जाओ तो खाने के सामान में पौष्टिक तत्व कम और कंकड़ पत्थर ज्यादा मिलते हैं.सब्जी मंडी जाओ तो  चमकदार अपनी और आकृष्ट करने वाली सब्जियों में रासायनिक तत्वों की महक ज्यादा आती है.दूध में दूध कम  पानी ज्यादा मिलता है.विद्यालयों में जाओ तो पढाई ,प्रवेश के नाम पर लूट खसोट ज्यादा दिखती है .प्रतियोगी परीक्षा देने जाओ तो अभ्यर्थी के ज्ञान से ज्यादा महत्व उसके माँ-बाप की कमाई रखती है .न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाओ तो स्वयं सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ३० अप्रैल  हिंदुस्तान में प्रकाशित वक्तव्य-''भ्रष्टाचार से सुप्रीम कोर्ट आहत शीर्षक के अंतर्गत-दूसरों को क्या कहें जब हम खुद शीशे के घर में बैठे हैं .हमारी बिरादरी के लोग ऐसे मुकदमों का फैसला करते हैं जिनसे  वे खुद लाभान्वित होते हैं.साथ ही नौकरशाहों के लिए भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा-इनमे यह जबरदस्त आपसी समझ है-,''तू मेरी कमर खुजा मैं तेरी खुजाऊं.'' विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख आदि छपवाने में पहचान लेखक की आलेखन क्षमता से ज्यादा वजन रखती है.हालात ये हैं कि नदीम नैय्यर कहते हैं-
''उम्मीदों पर ओस गिरा दी जाती है,
    चूल्हे की आग बुझा दी जाती है ,
पहले हमको खाक बनाया जाता है,
   फिर चुपके से खाक उड़ा दी जाती है.''
आज भारत में भ्रष्टाचार एक अहम् मुद्दा है और जहाँ देखो वहां भ्रष्टाचार पर हमले हो रहे हैं और तब भी रक्तबीज की तरह भ्रष्टाचार का राक्षस फैलता जा रहा है .जिसे देखो वह भ्रष्टाचार के खिलाफ गला फाड़ रहा है और ऐसा लगता है कि उस गला फाड़ने वाले को ही भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा तकलीफ है .राज्य के लोग केंद्र को कोस रहे हैं और केंद्र सारा ठीकरा राज्य के सर फोड़ रहा है.हरेक राजनीतिक दल,सामाजिक गुट व्यापारी वर्ग आदि के लिए दुसरे का भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार है और अपना खुद का भ्रष्टाचार मजबूरी है.इस सन्दर्भ में सबसे चौन्काऊँ व् नाटकीय टिपण्णी कर्नाटक के पूर्व मुख्या मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने की है .उनका मानना है-''कि यदि महात्मा गाँधी भी होते तो आज भ्रष्टाचार के जल से निकलने का रास्ता नहीं दूंढ पाते और वह भी भ्रष्टाचार के जरिये बैंक में  धन इकठ्ठा करते या राजनीति छोड़ देते.''
     आज राजनीतिक क्षेत्र में तो लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं किन्तु यह तो भ्रष्टाचार का मात्र एक क्षेत्र है और सर्वाधिक महत्व यह इसलिए रखता है क्योंकि यदि इस क्षेत्र में किसी की अच्छी पहचान है तो उसके अपने कम चुटकियों में हो जाते हैं किन्तु यदि हम पूर्ण रूप से विचार करें तो भ्रष्टाचार के सम्पूर्ण स्वरुप पर विचार करना होगा और इसको हटाने के लिए एकजुट होकर ठोस प्रयास करना होगा.वसीम बरेलवी ने कहा है-
''वैसे तो एक आंसू ही बहाकर मुझे ले जाये ,
वैसे कोई तूफान मुझे हिला नहीं सकता.
उसूलों पे अगर आंच आये टकराना ज़रूरी है,
जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना ज़रूरी है.''
   आज भ्रष्टाचार मिटाने को अन्ना खड़े हो रहे हैं ,बाबा रामदेव आगे बढ़ रहे हैं साथ इनके करोड़ों हाथ जुड़ रहे हैं किन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण है सम्पूर्ण जन समाज का उठ खड़े होना जिसने अपना मतलब पूरा करने को हर क्षेत्र में स्वयं को दबाना ज़रूरी समझा .कैसे भी हो अपना भविष्य संवारने का स्वप्न देखा .भ्रष्टाचार  में स्वयं में कोई बुरे नहीं है ये तो जनता का भय व् स्वार्थ है जो इसे बढ़ने का समय व् स्थान दे रहा है .स्वयं देखें कि एक मच्छर जो आपके आस-पास उड़ता है आप या तो उससे डरकर मच्छरदानी का सहारा लेते हैं या कोइल जला कर अपने पास से दूर भगा देता हैं किन्तु ये मच्छर से मुक्ति नहीं होती मुक्ति के लिए प्रशासन द्वारा फोगिंग कराये जाने पर ही पूर्ण राहत दिखाई देती है.मतलब सम्पूर्ण सफाया.हमारे क्षेत्र का ही उदहारण लें-विभिन्न सफाई कर्मी जो घरों से गंदगी ढोकर लाते हैं कहीं भी चाहे वह सुन्दर स्वच्छ इलाका हो या भरी जन समूह का इलाका गंदगी डालना शुरू कर देता हैं और लोग उनसे सम्बन्ध न बिगड़ जाएँ ,वे उनके घर कम करना बंद न कर दें इस डर से उनसे कुछ नहीं कहते,क्योंकि वे मात्र अपना हित देखते हैं और इस स्वहित देखने की नीति ने ही भ्रष्टाचार को बढाया है .और इस लिए मेरी नज़र में भ्रष्ट्राचार का वास्तविक दोषी और कोई नहीं सम्पूर्ण जनसमूह है .आप ही बताइए कि वही सी.बी.आई.जिसने आरुशी केस बंद कर दिया था आखिर न्यायालय का आदेश आने पर कैसे क्लोज़र रिपोर्ट ले आयी?जिस लोकपाल बिल पर सरकार आगे बढ़ने को तैयार नहीं होती थी कैसे जनता के एकजुट होने पर समिति बना आगे की कार्यवाही को तैयार हो गयी?क्यों मुज़फ्फरनगर की कचहरी में मास्टर विजय सिंह दबंग लोगों के भूमि हथियाने के खिलाफ १४-१५ साल से धरने पर बैठे है और उनकी एक नहीं सुनी जाती ?कारण है अन्ना के साथ जन समूह का जुड़ना और मास्टर विजय सिंह के साथ जन समूह का अभाव.
  बेस मेयेरसेन  ने कहा है-
''भ्रष्टाचार के अपराध का हमेशा ही एक और गुनाहगार होता है और वह है हमारी उदासीनता.''
  और हम यही अपनाते हैं,और इस तरह हम इस आचरण के सबसे बड़े दोषी हैं.हर जगह या हर गलत काम के खिलाफ हमें अन्ना या बाबा रामदेव नहीं मिलेंगे हमें स्वयं ही इस दिशा में मजबूती से आगे बढ़ना होगा.हम लोग यह मानते हैं कि ये हमारे बस का काम नहीं है ,आर्थर एश के शब्दों में -
''सफलता सफ़र है मंजिल नहीं,काम करना अक्सर नतीजे से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है.''
हमें'' जैसे भी हो अपना काम हो ''की नीति  से हटना होगाताभी हम भ्रष्टाचार की आग में पानी डाल पाएंगे,अन्यथा तो हम ही वह घी हैं जो इस आग को भड़का रहे हैं .आज राठोड ,कलमाड़ी पिट रहे हैं कोई मनोज शर्मा व् कोई उत्सव शर्मा बनकर इनपर हमले कर रहे हैं और यही जनाक्रोश है जो इसे जड़ से उखड कर फैंकेगा.हम ही हैं जो इसे बढ़ाने के दोषी हैं और हम ही हैं जो इसे आइना दिखा सकते हैं,माधव मधुकर के शब्दों में -
''दोष किसका है इसे बाद में तय कर लेंगे,
पहले इस नाव को तूफां से बचाया जाये.
ऐब औरों के गिनाने में महारत है जिसे,
ऐसे हर शख्स को आइना दिखाया जाये.
पी सकें आके जहाँ मन के मुताबिक प्यासे,
आओ मयखाना कोई ऐसा बनाया जाये.
मिल सके धूप हर आँगन को बराबर जिससे,
ऐसा सूरज कोई धरती पे उगाया जाये.
जल्द मंजिल पे पहुंचना है तो लाजिम है यही,
अपने क़दमों को जरा तेज़ बढाया जाये.''
   शालिनी कौशिक [एडवोकेट]


         

शुक्रवार, 27 मई 2011

उपलब्धियों पर हावी होती अव्यवस्थाएं:इलाज के अभाव में राजस्थान की जेलों में दम तोड रहे कैदी‏:खुशबू(इन्द्री)करनाल-






 आज देश की संप्रग सरकार के दो साल पूरे हो गये|इस दौरान अपने द्वारा किये गये विकास कार्यों का सरकार ने आज एक लेखा जोखा भी जारी किया|इस अवसर पर प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने कहा कि किसी भी भ्रष्टाचारी को बख्शा नही जायेगा|माना कि सरकार ने अपने दो साल के कार्यकाल में कुछ विकासपरक काम किये होंगे|लेकिन इस दौरान सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों को भी झेले हैं और अब तक सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के मामले भी कांग्रेस के शासनकाल में ही उजागर हुए हैं|दूसरी और इस दौरान देश भर में अव्यवस्थाओं के दौर भी देखने को मिले हैं|देश की जनता को इस वक्त जहाँ शिक्षा शेत्र में और चिकित्सा सुविधाओं के आभाव के दौर से जूझना पड़ रहा अहि वहां देश की जेलों में रहने वाले कैदियों को ये अव्यवस्थाएं झेलनी पड़ रही हैं|  
राजस्थान की जेलों में मेडिकल सुविधाओं के अभाव में हर चौथे दिन किसी न किसी कैदी की जान जा रही है। राज्य की जेलों के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो साल 2009 और 2010 में जेलों में 180 कैदियों की मौत बीमारी के कारण हो चुकी है । फिर चाहे सबसे सुरक्षित कही जाने वाली जोधपुर सेंट्रल जेल हो या जयपुर सेंट्रल जेल। मरने वाले में सबसे ज्यादा 50 कैदी जयपुर सेंट्रल जेल से हैं। वहीं कोटा सेंट्रल जेल में गुजरे दो सालों में 29 कैदियों की सांसे उखड़ गईं। उदयपुर सेंट्रल जेल से 26 कैदियों की जीवन डोर टूट गई। बीकानेर सेंट्रल जेल में बीमारी और अन्य कारणों से बीते दो सालों में 19 कैदी मारे गए। देश की दूसरी सबसे सुरक्षित जेल जोधपुर सेंट्रल जेल से बीते दो सालों में 15 कैदी हमेशा के लिए आजाद हो चुके हैं। भरतपुर सेंट्रल जेल से पांच, अजमेर सेंट्रल जेल से नौ ओर गंगानगर जेल से दो कैदियों की मौत हो चुकी है। वहीं अलवर जिला जेल से दो कैदी, निंबाहेड़ा उपकारागार से एक कैदी, हनुमानगढ़ जिला जेल से तीन कैदी, डीडवाना जेल से एक कैदी, मांडलगढ़ जेल से एक कैदी, जैतसर जेल से दो कैदी, कोटपूती जेल से दो कैदी, सिरोही, भीलवाड़ा और करौली जेल से एक-एक कैदी की मौत हो चुकी है। चूरू की राजगढ़ जेल से तीन कैदियों की मौत हो चुकी है। डीग, नागौर, ब्यावर, पाली, बीछवाल, राजसिंहनगर जेल से भी एक-एक कैदी की बीमारी से मौत हो गई। वहीं सांगानेर में स्थित खुली जेल से भी एक कैदी की मौत हो चुकी है। रिकॉर्ड्स के अनुसार, राज्य की जेलों में मरने वाले कैदियों में सबसे ज्यादा मौतें टीबी से होना सामने आया है। जेलों में प्राथमिक उपचार के अलावा अन्य गंभीर बीमारियों से निपटने के लिए दी जानेवाली मेडिकल सुविधाओं के हालात भी नाजुक हैं। अन्य रोगों से निपटने के लिए भी प्राथमिक उपचार के साधनों का अभाव है। हर साल कैदियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन सुविधाएं वहीं की वहीं हैं।
इन अव्यवस्थाओं को और भ्रष्टाचार के आरोपों को सरकार की उपलब्धियों पर या दो साल का कायकाल पूरा होने की ख़ुशी पर कालिख कहा जाये तो कुछ गलत नही|क्योंकि अव्यवस्थाएं होते हुए उपलब्धियां अधूरी ही होती हैं|जनता को तो सुविधाएँ चाहियें उपलब्धियां नही|
खुशबू(इन्द्री)करनाल
खुशबू जी के आलेख मुझे गहरे तक प्रभावित कर रहे हैं और इसलिए मैं उन्हें अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर आप सभी की राय उन तक पहुँचाना चाहती हूँ कृपया उनके आलेखों पर राय उनके इ-मेल पर अवश्य प्रेषित करें.उनका इ-मेल है
''media1602 @gmail .com ''

बुधवार, 25 मई 2011

हमें खबर है ख़ुशी के घर है पूरी पहरेदारी.


दुःख सहने की जीवन में अब कर ली है तैयारी 
हमें खबर है ख़ुशी के घर है पूरी पहरेदारी.

ऐसे कर्म किये जीवन में दुःख ही दुःख अब सहना है,
मन ही मन घुटते रहना है किसी से कुछ न कहना है.
सबकी आती है अपनी भी आ गयी अब तो बारी,
हमें खबर है ख़ुशी के घर है पूरी पहरेदारी.

भला किसी का किया नहीं सोच में भी न लाये,
इसीलिए अब दिन हमारे सब ऐसे कटते जाएँ.
किसी से हट जाये भले दुःख अपना रहेगा जारी,
हमें खबर है ख़ुशी के घर है पूरी पहरेदारी.

मिलना जुलना बंद किया है जीवन अपना कोसेंगे,
अब तक नादानी भोगी है अब बेचैनी भोगेंगे.
जीती हो भले ही सबसे दुःख से ''शालिनी''हारी,
हमें खबर है ख़ुशी के घर है पूरी पहरेदारी.
                   शालिनी कौशिक 

मंगलवार, 24 मई 2011

भूखे पेट ही सोना पड़ता है।-खुशबू(इन्द्री)करनाल

खुशबू(इन्द्री)करनाल 
  आपने अपने आसपास या फिर रेड लाइट सिग्नल पर ऐसे बच्चों और बुजुर्गो को जरूर देखा होगा, जो दूसरों से मांगकर अपना पेट भरते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि इन्हें पूरे दिन कुछ नहीं मिल पाता और भूखे पेट ही सोना पड़ता है। भूख किसी भी सभ्य समाज के लिए एक बदनुमा दाग की तरह होती है। फिर भी इस हकीकत को दरकिनार कर देते हैं। दरअसल, इसके लिए हमारी कुछ आदतें ही जिम्मेदार हैं। जब आप किसी होटल या रेस्त्रां में लंच या डिनर करने जाते हैं तो वहां एक से ज्यादा डिश ऑर्डर तो कर देते हैं, लेकिन पूरा खाना किसी भी रूप में संभव नहीं होता। और जो खाना आप रेस्त्रां की मेज पर छोड़कर आते हैं, वह बर्बाद ही होता है। इसी तरह शादी या किसी समारोह की पार्टी में जो लोग जाते हैं, उनमें से ज्यादातर अपनी प्लेट में अधिक खाना रख लेते हैं, जिसे बाद में कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाता है। जरा सोचिए, यह खाना कई लोगों की भूख शांत कर सकता था, लेकिन कूड़ेदान में जाकर बर्बाद हो जाता है। खाने की बर्बादी पर पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ के फूड एंड एग्रीकल्चर संगठन यानी एफएओ की रिपोर्ट में ऐसा आंकड़ा उजागर किया है, जो पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में एक साल में करीब 130 करोड़ टन खाद्य सामग्री या तो बेकार हो जाती है या फिर उसे फेंक दिया जाता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि खाना बेकार करने की समस्या औद्योगिक देशों में सबसे ज्यादा है। आंकड़ों के मुताबिक, विकासशील देशों में 63 करोड़ टन और औद्योगिक देशों में 67 करोड़ टन खाने की बर्बादी हर साल होती है। अफ्रीका महाद्वीप में हर साल करीब 23 करोड़ टन भोजन का उत्पादन होता है, जबकि अमीर देशों में 22.2 करोड़ टन खाना बर्बाद हो जाता है। कहने का अर्थ यह है कि जितना खाना एक महाद्वीप में रहने वाले लोगों की एक साल में भूख मिटाता है, उतना तो अमीर देश बर्बाद कर देते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि पूरी दुनिया में कई देश भुखमरी की समस्या से जूझ रहे हैं और दूसरी ओर बड़े पैमाने पर खाने की बर्बादी हर साल हो रही है। एक अध्ययन के मुताबिक अमेरिका और ब्रिटेन में संपन्न लोग जितना भोजन खराब करते हैं, उससे दुनिया के 1.5 अरब भूखे लोगों को खाना खिलाया जा सकता है। पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका और ब्रिटेन में संपन्न लोग रेस्त्रां में थोड़ा-बहुत भोजन खाकर शेष छोड़ देते है। यदि इस बचे हुए भोजन को गरीब लोगों को खिला दिया जाता तो इसका सदुपयोग हो जाता, परंतु रेस्त्रां के मालिक इस बचे हुए भोजन को कूड़ेदान के हवाले कर देते हैं। खाने की बर्बादी में भारत भी कम पीछे नहीं है। हमारे यहां सबसे ज्यादा खाने की बर्बादी शादी समारोहों और पार्टियों में होती है। छोटे से छोटे समारोह में भी कम से कम 20 पकवान तैयार कराए जाते हैं। और मामला किसी रईस का हो तो पकवानों की गिनती करना ही मुश्किल हो जाता है। हमारे देश में सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ शादियों की तड़क-भड़क भी बढ़ती ही जा रही है। समाज का नव धनाढ्य तबका विवाह समारोहों को अपनी हैसियत दिखाने का एक अवसर मानता है और इस मौके पर बेहिसाब खर्च करता है। बड़ी शादियों में खाने की स्टॉल कई सौ मीटर तक फैली हो सकती हैं। इसमें शामिल होने वाले लोग पहले तो अपनी क्षमता से ज्यादा प्लेट में खाना परोस लेते हैं, जो जब खाया नहीं जाता तो उसे बर्बाद कर देते हैं। हमारे यहां शादियों में मेहमानों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है। इसलिए मेजबान हमेशा कुछ अधिक लोगों के भोजन का इंतजाम करके चलता है ताकि अधिक लोग आने पर खाने की कमी नहीं रहे, लेकिन ऐसा बहुत कम ही होता है कि किसी समारोह में भोजन कम पड़ जाए। समारोहों में अक्सर खाना ज्यादा बन जाता है और अंत में उसे कूड़ेदान के हवाले ही करना पड़ता है। कैटर्स भी मानते हैं कि शादी या दूसरी पार्टियों में कई प्रकार के व्यंजन रखने से खाने की बर्बादी होती है। उनके मुताबिक, खाने की बर्बादी दो तरह से होती है, एक तो लोगों द्वारा थाली में ज्यादा जूठन छोड़ने से और दूसरा, मेहमानों के उम्मीद से कम आने पर। कैटर्स का मानना है कि जितने ज्यादा पकवान होंगे उतनी ही बर्बादी होगी। पिछले दिनों भारत सरकार ने शादी-ब्याह और अन्य सामाजिक समारोहों में खाने की बर्बादी को लेकर चिंता जताई और इसे रोकने के लिए गंभीर कदम उठाने की बात भी कही। खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री केवी थॉमस का कहना था कि इसके लिए जागरूकता अभियान तो चलाया ही जाएगा और सरकार जल्द ही ऐसा विधेयक लाने वाली है, जिससे शादियों में बनने वाले विभिन्न व्यंजनों की संख्या पर रोक के साथ-साथमेहमानों की संख्या को भी नियंत्रित किया जा सके। सरकार का कहना है कि इसके लिए पाकिस्तान में शादियों के लिए लागू एक व्यंजन व्यवस्था का अध्ययन किया जाएगा। अगर यह हमारे देश के हिसाब से सही रही तो इसे कानून बनाकर लागू किया जा सकता है। थॉमस का कहना था कि सरकार ने विवाह समारोहों में खाने की बर्बादी का पता लगाने के लिए कोई विधिवत अध्ययन तो नहीं कराया है, लेकिन अनुमान है कि यह बर्बादी 15 से 20 प्रतिशत तक की है। भारत जैसे देश के लिए जहां अब भी एक बड़ा तबका भुखमरी का शिकार है, यह शर्मनाक है। शादी में अपव्यय रोकने के लिए तमाम सामाजिक तथा धार्मिक संगठन भी अपनी ओर से पहल करते रहे हैं, लेकिन उसका कोई खास असर पड़ता नजर नहीं आ रहा है। सवाल है कि क्या सरकार के प्रयासों का कोई लोगों पर प्रभाव पड़ेगा? वैसे तो सामाजिक समारोहों पर किसी तरह के नियंत्रण का विचार कोई नया नहीं है। साठ के दशक में सरकार गेस्ट कंट्रोल ऑर्डर ला चुकी है। सरकार जो करेगी, वह तो बाद की बात है, लेकिन इससे पहले हमें इस बात का प्रण लेना होगा कि आगे से हम जब भी किसी शादी या पार्टी में जाएंगे, वहां उतना ही खाना अपनी प्लेट में लेंगे, जितना हम खा सकते हों। साथ ही अपने साथियों, रिश्तेदारों और दोस्तों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। भारतीय परंपराओं में माना गया है कि किसी भूखे व्यक्ति को खाना खिलाना सबसे बड़ा पुण्य होता है। खाने की बर्बादी को रोककर हम न केवल अपने देश से बल्कि पूरी दुनिया से भुखमरी नामक राक्षस का अंत कर सकेंगे। यदि भोजन की बर्बादी तुरंत नहीं रोकी गई तो वह दिन दूर नहीं, जब पूरी दुनिया के देशों भयानक अकाल का सामना करना पड़ेगा। खाने की बर्बादी को हमें हर हालत में रोकना होगा ताकि कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए
खुशबू गोयल जी ने ये आलेख मुझे मेल के ज़रिये भेजा है आप सभी इसे पढ़ कर अपने विचार खुशबू जी के निम्न मेल पर भेज सकते हैं-
[media1602 @gmail .com ] 

शनिवार, 21 मई 2011

तुम्हारी याद





जब थे तुम तब लड़ते थे हम परस्पर,
अब तुम्हारी याद में मिलकर रोते हैं अक्सर.

कभी सोचा भी न था तुम यूं चले जाओगे,
रोता बिलखता देखकर भी पास नहीं आओगे.

कौन जानता था कि तुम धोखेबाज़ हो,
धोखा देने वालों के सर का तुम ताज हो.

भले हम हों लड़ते भले हम झगड़ते ,
भले दिन में कई बार मिलते बिछड़ते.

तुम्हारे साथ थे रोते तुम्हारे साथ थे हँसते,
पर अब तो अकेले ही रोते तड़पते.

फूल सूख जाते हैं पेड़ गिर जाते हैं,
मगर अपने पीछे खुशबू छोड़ जाते हैं.

पर तुम तो वो फूल थे,
जो खुशबू के साथ अपना सब कुछ छोड़ गए .

शुक्रवार, 20 मई 2011

खुशबू (इन्द्री)करनाल-article( क्या अब भारत पूर्ण साक्षर देश बन पायेगा )


खुशबू (इन्द्री)करनाल


साल 2010  में भारत सरकार ने देश में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून लागू किया जिसके तहत 6   से 14   साल तक के हर बच्चे के लिए शिक्षा प्राप्त करना अनिवार्य होगा | अपनी तरफ से तो सरकार ने इस कानून को  एक बहुत बड़ी उपलब्धि बताया| लेकिन सरकार कि यह उपलब्धि देश की जनता को पूरी तरह से शिक्षित कर पाने में सफल होती नहीं दिख रही | आज भी देश के सभी बच्चों की स्कूलों तक पहुंच नहीं है| क्योंकि लोगों को इस कानून बारे जानकारी नहीं है| दूसरे देश के कुछ राज्यों में  यह कानून लागू नहीं किया गया है| हांलाकि इस कानून के अंतर्गत बच्चों को सुलभ सुविधाओं सहित शिक्षा तो मिल जायेगा लेकिन क्या वह आधार मिल पायेगा जो उन्हें आज के तकनीकी और प्रतियोगिता भरे समाज में सफल कर सके| देश की आधी से ज्यादा जनता सरकारी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करती है | लेकिन इन स्कूलों में उन्हें वैसी शिक्षा नहीं मिल पाती जैसी मिलनी चाहिए | कानून के अंतर्गत यह प्रावधान भी किया गया है कि निजी स्कूल अपने कोटे का २५ प्रतिशत कमजोर वर्ग के लिए रखेंगे | लेकिन इस नियम का पालन कितना होगा पता नहीं | पालन हो भी गया तो बाकी के 75 प्रतिशत बच्चे क्या करेंगे | उनके लिए तो सरकारी स्कूल ही एकमात्र विकल्प बचेगा| लेकिन सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था की हालत तो बदतर है | कहीं पर अध्यापक  नहीं तो कहीं पर बैठने की,पुस्तकालय,शौचालय,पीने के पानी की व्यवस्था नहीं | अध्यापक हैं तो पढ़ाने का अनुभव नहीं | जिम्मेदारी का एहसास नहीं | स्कूल आते हैं , बैठते हैं,खाते पीते हैं,घूमते फिरते हैं और चले जाते हैं| कक्षा में जाकर ओपचारिकता निभा देतें हैं वो भी कभी कभी | देश के ज्यादातर स्कूलों में ये हालात हैं| क्योंकि अध्यापकों  को पता है कि कोई उन पर लगाम कसने वाला नहीं | क्योंकि कही पर प्रिंसिपल नहीं | अगर है तो कुछ कहता नहीं | अधिकारी आकर देखते नहीं | हाँ उन्हें वेतन जरुर मिल जाता है| कम करे या न करे | कुछ स्कूलों में तो बच्चों से शारीरिक श्रम कराया जाता है | अगर स्कूल में कोई निर्माण कार्य चल रहा है तो बच्चों से ईंट पत्थर उठ्वाएं जाते हैं | कमरों कि साफ सफाई करायी जाती है | मानो स्कूल में सफाई कर्मी न हों | क्या देश के शिक्षा सुधारक ये बता सकतें हैं कि उनके सरकारी स्कूलों में बच्चें शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं या मजदूरी करने | कुछ समय पहले सरकार ने बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा देने के लिए सर्व साक्षरता अभियान चलाया था जो असफल रहा |क्योंकि स्कूलों में कंप्यूटर लैब ही नहीं हैं|कंप्यूटर लैब हैं तो सिस्टम नहीं| सिस्टम हैं तो सिखाने वाले नहीं| सरकार ने सरकारी स्कूली बच्चों को दोपहर का भोजन उपलब्ध कराने के उदेश्य से मिड डे मील योजना शुरू की| वह भी धूल चाटती  नज़र आई |कहीं पर राशन नहीं तो कहीं पर पकाने वाले नहीं | राशन है तो गला सड़ा |पकाने वाले हैं तो सफाई से नहीं पकाते | अधपका चूल्हे की दुर्गन्ध वाला|अगर इस तरह का वातावरण और शिक्षा सरकार द्वारा बच्चों को दी जनि है तो यह कानून बेकार ही साबित होगा |अगर सरकार भ्रष्ट प्रशासन और इस तरह की शिक्षा व्यवस्था के साथ एक मजबूत,खुशहाल और पूर्ण साक्षर भारत का सपना देख रही है तो यह सपना अधूरा ही रहेगा | अगर सरकार वाकई भारत को पूर्ण साक्षर देश बनाना चाहती है तो दिल्ली में बैठ  कर नए नए नियम और कानून बना देने से कुछ नहीं होगा| बच्चों के बीच में जाकर उनकी समस्याएं पूछें जाने कि उन्हें क्या चाहिए तब जाकर सोचिये कि किस तरह कि शिक्षा व्यवस्थाएं और नियम बनायें जाएँ| सबसे ज्यादा जरूरी तो यह देखना है कि जो कानून बनाये गए हैं वे पूरी तरह लागू भी हुए हैं या नहीं| केवल कानून बना देने से ही जम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती | अगर वाकई में सरकार शिक्षा को भारतीयों की सफलता की कुंजी बनाना चाहती  है तो शिक्षा व्यवस्था का आधारभूत ढांचा मजबूत करना ही पड़ेगा |
ख़ुशी ने यह आलेख मेरे ब्लॉग के लिए मुझे मेल से भेजा है आप सभी इसे पढ़कर अवश्य राय दें ख़ुशी का इ-मेल आई डी ये है-media1602 @gmail .com  

सोमवार, 16 मई 2011

आलोचना की रोटी

          ''वो आये मेरी कब्र पे दिया बुझाके चल दिए,
           दिए में जितना तेल था सर पे लगाके चल दिए.''
कई लेख पढ़े ''तवलीन सिंह जी''के और मन में आया कि क्या वास्तव में वे अपनी लेखनी को बर्बाद करने पे तुली हैं?पर रविवार १५ मई के अमर उजाला में ''तमाशे की रोटी''शीर्षक युक्त उनके आलेख ने शक को यकीन में बदल दिया .राहुल गाँधी जी के जिस कार्य की तारीफ मीडिया में,जनता में जोर शोर से की गयी उसे पढ़कर सुनकर तो लगा जैसे तवलीन सिंह जी की लेखनी जल भुन गयी और जला भुना पाठकों के समक्ष परोस दिया.
       हमारे यहाँ प्राचीन समय से राजा महाराजा [ये उदाहरण इसलिए क्योंकि तवलीन जी राहुल जी को युवराज कहती हैं जबकि वे अपने बारे में ऐसा कुछ नहीं कहते]जनता की समस्याएँ स्वयं देखने के लिए रातों को चोरी छिपे जनता के बीच जाया करते थे .राहुल जी ने भी कई दिन से चर्चाओं में छाये भट्ठा पारसोल गाँव में किसानो के बीच जाकर ऐसी ही कार्यवाही को अंजाम दिया और अत्याचार की आग में झुलस रहे किसानो को दो पल की राहत दी.उन्होंने किसानो के ही बताने पर बिटोड़े की राख अपनी गाड़ी में जाँच हेतु भरवाई.मैं आपसे पूछती हूँ कि इसमें राहुल जी ने सही कार्य किया या गलत?और यदि गलत तो वह क्यों?
        तवलीन सिंह जी के आलेख की निकृष्टता तो यहीं ज़ाहिर होती है कि वे राजनीति  में सुन्दरता और जवानी को लाभदायक बताती हैं [फिर तो सारी फिल्म इंडस्ट्री यहीं होनी चाहिए] और अपने इसी तराजू पर वे राहुल गाँधी की सफलता को तोलती हैं भला वे बताएं कि यदि राजनीति सुन्दरता और जवानी पर टिकी है तो विश्व के सबसे वयोवृद्ध नेता हमारे यहाँ कैसे जनता में छाये हैं?वे राहुल जी की तुलना राजनाथ सिंह जी से करती हैं और राहुल जी की चमक को उनके ऊपर छाये अँधेरे का कारण बताती हैं.जबकि राजनाथ सिंह जी की असंवेदनशीलता वह बाधा है जो उन्हें राजनीति के आकाश में चमकने से रोकती है और राहुल जी की संवेदनशीलता ही राजनीति में उनकी चमक को निरंतर बढ़ा रही है.राजनाथ सिंह जी के हेलीकोप्टर का पायलट    मर जाता है और वे पहले सभा को संबोधित करने पहुँच जाते हैं जबकि राहुल जी इलाज के लिए तड़प रहे एक ऐसे व्यक्ति की मदद को आगे बढ़ते हैं और जीवन की आशा उसके मुख पर बिखेरते हैं जो उन्हें चेहरे से पहचानता भी नहीं था.
         भट्ठा पारसोल में हुए किसानो पे अत्याचार के हालत पर राहुल जी की ये टिपण्णी''कि उन्हें भारतीय होने पर शर्म महसूस होती है''तवलीन जी के लिए उनकी देशभक्ति पर ऊँगली उठाने का मुद्दा बन गया जबकि राहुल जी का यह कथन एक सच्चे भारतीय का कथन है .वे राहुल जी को पंजाब में खेतों में सड़ते अनाज  पर ऐसी टिपण्णी करने की सलाह देती हैं पर क्या भूल जाती हैं कि जलियाँ वाला बाग कांड १३ अप्रैल १९१९ को पंजाब में ही हुआ पर वह अंग्रेजों के शासनकाल में हुआ था तब देश गुलाम था और आज देश आज़ाद है और सत्ता में बैठे भारतीय अंग्रेज बन गए हैं और जनता वही  गुलामों की श्रेणी में है .अपने ही लोगों द्वारा अत्याचार की आग में झुलसाये जा रहे किसानो की हालत देखकर किसी भी सच्चे भारतीय को अपने भारतीय होने पर शर्म आएगी.खेतों में सड़ता अनाज  तो तवलीन जी की आँखों में आंसू भर देता है किन्तु जीते जागते इन्सान की दुर्दशा  देख यदि राहुल जी ऐसे टिपण्णी करते हैं तो तवलीन जी को एतराज है क्योंकि वे गाँधी फैमली के हैं .ऐसा आलेख लिखने से पहले तवलीन जी को आज के हिंदुस्तान के पृष्ठ ११ पर भट्ठा पारसोल में पुलिस बर्बरता की चशमदीद गवाह नेहा की जुबानी ही जान  लेना चाहिए था कि ''आवाज़ उठाने का मुआवजा चुका रहे हैं हम''नेहा जिसकी वहां पुलिस ने टांग तोड़ दी नेहा के पिता कहाँ किस हालत में हैं पता नहीं.और यह नेहा का ही देश है जहाँ आज उसे गैर देश में रहने जैसी जिंदगी गुजारनी पद रही है .क्या एक सच्चे भारतीय के उद्गार राहुल जी से अलग हैं?मैं तो नहीं मानती मेरा मानना तो यह है कि जो ऐसी स्थिति में भारतीय होने का गर्व दिखा रहा है वह महज़ बनावट ओढ़ रहा है .
             बात बात में सत्ता की बागडोर सोनिया जी के हाथों में कहकर तवलीन सिंह जी और कुछ अन्य आलोचक भी भारतीय संविधान को ही नकारते से लगते हैं जिसके अनुसार सत्ता की धुरी संसद है,संविधान का संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय है और सर्वोच्च न्यायालय की जनता के अधिकारों के प्रति जवाबदेही व् जागरूकता हमारे लिए गौरव का विषय है चुनाव आने पर सभी नेता जनता में अधिक सक्रीय होते हैं किन्तु लगता है कि तवलीन सिंह  जी हमारे नेताओं  से भी अधिक सक्रिय हैं जिनकी  लेखनी का केवल एक विषय होता है और वह है गाँधी परिवार और इस परिवार की आलोचना ही उन्हें चर्चा में बनाये रखती है.तो वे इससे पीछे क्यों हटें?
       मेरा तवलीन सिंह जी से यही कहना है की अपनी  लेखनी को  स्वस्थ आलोचना की कसोटी  पर परखें  और उसी  पर रहें  वर्ना  वही होगा  जो  अधिकांश  आलोचकों   के  साथ   होता है .कटु  आलोचना और वह भी प्रतिद्वन्द  पर आधारित प्रतीत  होने   वाली   आलोचना सदैव   पठनीय    नहीं होती  और ऐसे  आलोचक  गुमनामी  के  अंधेरों  में खो   जाते  हैं.इस देश  के  पाठक   चाहे   वे किसी भी क्षेत्र से हों  तथ्यों पर आधारित स्वस्थ आलोचना ही स्वीकार करते हैं व्यक्तिगत द्वन्द पर आधारित आलोचना नहीं .
                                                 शालिनी कौशिक 

शनिवार, 14 मई 2011

क्या करूं कुछ समझ नहीं आ रहा ?

क्या   करूं कुछ  समझ  नहीं आ रहा ?आजकल ब्लॉग जगत से बिलकुल कट कर रह गयी हूँ.इतने अच्छे वैचारिक आलेख आ रहे हैं और मैं उन पर अपनी राय भी प्रस्तुत नहीं कर पा रही हूँ टिपण्णी करने के लिए जैसे ही सम्बंधित ब्लॉग के लिंक पर क्लिक करती हूँ  ऊप्स लिख कर आ जाता है न ही मेल खुल पा रहे हैं .कल तो सारे दिन ब्लोग्गर पर यही लिख कर आता रहा कि असुविधा के लिए खेद है .आज जैसे ही ब्लॉग खुले मैंने सोचा कि ब्लॉग जगत से पोस्ट के माध्यम से ही जुड़ जाऊं.
            अभी पिछले रविवार को एक मैगजीन में मैंने प्रख्यात गायिका आशा भोंसले जी का एक साक्षात्कार आधारित आलेख पढ़ा और सच कहूं तो बहुत गुस्सा आया पूछेंगे क्यों ?क्योंकि वे कह रही थी कि वे आजकल की कोई फिल्म नहीं देखती हैं क्योंकि इनमे इमोशंस नहीं होते हैं इससे अच्छा तो कार्टून मूवी देख लो.उनकी ऐसी बाते मैंने अपनी बहन को बताई तो वह कहने लगी कि आशा भोंसले जी से ऐसी उम्मीद नहीं थी.ये तो पुरानी पीढ़ी द्वारा नई पीढ़ी को नीचा दिखाने की बात हुई.वह कहने लगी कि एक तरफ अमिताभ बच्चन जी हैं जो कहते हैं कि आज के कलाकार हमसे ज्यादा मेहनत करते हैं मैं भी उसकी बात को सुनकर सोचने लगी कि वास्तव में पुरानी पीढ़ी के लोग नई पीढ़ी को कम करके ही आंकते हैं आये दिन पुराने संगीत से नए संगीत की तुलना की जाती है और पुराने के सामने नए को बेकार कह नीचा दिखाया जाता है.जहाँ तक संगीत की बात है तो उसमे मुझे कुछ खास ज्ञान नहीं है किन्तु मैं यह दावे के साथ कह सकती हूँ कि कुछ नई फिल्मे ऐसी है जिनकी तारीफ हर पीढ़ी के व्यक्ति को मुक्त कंठ से करनी चाहिए.जैसे ''विवाह''आदर्श के मामले में और स्वच्छ प्रदर्शन के मामले में इस फिल्म पर कोई ऊँगली नहीं उठाई जा सकती .वे कैसे कह सकती हैं कि आजकल की फिल्मो में इमोशंस नहीं होते ''एक विवाह ऐसा भी''इमोशंस से भरपूर एक ऐसी फिल्म है कि शायद ही किसी भावुक  व्यक्ति की आँखों से आंसू न टपका दे.
                             ये नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी का वास्तव में देखा जाये तो कोई झगडा ही नहीं है क्योंकि अपने आसपास के कई परिवारों को देखकर मैं ये सही अनुमान लगा चुकी हूँ कि जैसे माँ-बाप होते है वैसे ही बच्चे होते हैं .मेरी बहन के साथ पढने वाली एक लड़की ऐसी थी कि जब मेरी बहन की कक्षा में पोजीशन आती तो वो उसके पीछे फिरने लगती और जब दूसरी लड़की की आती तो वह उनके पीछे फिरने लगती हमें बहुत अजीब लगता किन्तु जब हम उसके माँ-बाप को जाने तो हमारी शंका का समाधान हो गया.जिन घरों में हमने देखा कि बेटा माँ बाप की सेवा करता है वहां बच्चों में सेवा के भाव पनपते देखे किन्तु जहाँ बेटे ही माँ -बाप से अलग रहते हैं उन घरों में बच्चे भी सेवा से दूर जा रहे हैं और इस कार्य को खुद पर बोझ  समझ रहे हैं .इसलिए नई पीढ़ी को दोष देना पुरानी पीढ़ी को छोड़ना होगा और अपने कार्य कलापों में सुधार कर उनके समक्ष आदर्श प्रस्तुत करना होगा  जब नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी द्वारा महत्व दिया जायेगा और उनमे संस्कारों का ज्ञान भरा जायेगा तभी एक सार्थक समाज हम सभी के सामने आ पायेगा.नई पीढ़ी को कम करके आंकना पुरानी पीढ़ी की ही हार की पहचान है और उन्हें ये स्वीकारना होगा .

सोमवार, 9 मई 2011

हम कौन थे?क्या हो गए?और क्या होंगे अभी?...............

हम कौन थे?क्या हो गए?और क्या होंगे अभी?...............
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी.
                 आज कुछ ब्लोग्स पर ''शिखा कौशिक जी''द्वारा प्रस्तुत आलेख ''ब्लोगर सम्मान परंपरा का ढकोसला बंद कीजिए''चर्चा में है और विभिन्न ब्लोगर में से कोई इससे सहमत है तो कोई असहमत.चलिए वो तो कोई बात नहीं क्योंकि ये तो कहा ही गया है कि जहाँ बुद्धिजीवी वर्ग होगा वहां तीन राय बनेंगी सहमति ,असहमति और अनिर्णय की किन्तु सबसे ज्यादा उल्लेखनीय टिप्पणियां ''दीपक मशाल जी ''की और ''डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री जी ''की रही .एक और दीपक जी पुरुस्कृत सभी ब्लोगर्स का पक्ष लेते हैं जबकि शिखा जी द्वारा किसी भी ब्लोगर पर कोई आक्षेप किया ही नहीं गया है उनका आक्षेप केवल चयन प्रक्रिया पर है तो दूसरी और डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री जी ''खट्टा मीठा तीखा पचाने की सलाह देते हैं भूल जातेहै कि ''जो डर गया वो मर गया'' की उक्ति आजकल के नए ब्लोगर्स के सर चढ़कर बोल रही है.दोनों में से कोई भी आलेख के मर्म तक नहीं पहुँचता जिसका साफ साफ कहना है कि पहले आप सम्मान दिए जाने के दिशा निर्देश तैयार कीजिये और जिस तरह अन्य पुरुस्कारों के आयोजन में होता है नामांकन चयन इत्यादि  प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही सम्मान के हक़दार का चयन कीजिये. अन्यथा जैसा कि सभी सम्मानों के आयोजन में विवाद पैदा हो जाते हैं वैसा ही यहाँ हो जाने में कोई देर नहीं है.
                साथ ही दीपक 'मशाल' जी ने तो हद ही कर दी उन्होंने तो शिखा जी को यहाँ तक कह दिया कि ''वे भी एक इनाम लिए बैठी हैं''उन्हें यह जानकारी तो होनी ही चाहिए कि शिखा जी ने ये पुरस्कार महाभारत-१ के नाम से आयोजित प्रतियोगिता में जीता है और इसमें क्रमवार ढंग से सभी कुछ किया गया था.पहले प्रतियोगिता का विषय घोषित किया गया फिर भाग लेने की तिथि निर्धारित की गयी उसके बाद क्रमवार अभ्यर्थियों के आलेख प्रकाशित किये गए और अंत में डॉ.श्याम गुप्त जी  और डॉ.अनवर जमाल जी को निर्णायक के रूप में निर्णय करने के लिए कहा गया अंत में उन आलेखों में से चयन किये जाने के बाद शिखा जी को विजेता घोषित किया गया.क्या ऐसी पारदर्शिता वे इन सम्मान समारोह में अपनाई गयी ,अपने तर्कों द्वारा साबित कर सकते हैं?जिन सम्मान समारोहों के पक्ष में वे खड़े हैं उनमे केवल अंतिम स्थिति दिखाई देती है और वह है ''विजेता घोषित करने की''उससे पहले चयन प्रक्रिया का कोई नामो-निशान नहीं है.और रही पुरुस्कार पाने वाले ब्लोगर्स के लेखन आलेखन क्षमता की तो वह देखना निर्णायक मंडल का काम है हमारा नहीं.
                           आज यदि हम देखते हैं तो हमें इस बात पर गर्व होता है कि हम ब्लॉग जगत से जुड़े हैं उस ब्लॉग जगत से जो देश की समस्याओं को उठाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है और दे भी रहा है.ऐसे में यदि यहाँ कोई गलत बात सर उठाती है तो उसे कुचलने में हर जागरूक ब्लोगर को अपना योगदान देना चाहिए न कि लेखक की व्यक्तिगत महत्वकांक्षा पूरी न होने जैसी तुच्छ बात कह कर उसे हतोत्साहित करने का प्रयास किया जाना चाहिए.स्पष्ट तौर पर शिखा जी के आलेख का मर्म यही है कि ये सम्मान समारोह क्योंकि पूर्ण रूप से पारदर्शिता पर आधारित नहीं हैं इसलिए मात्र ढकोसला बन कर रह गए हैं ऐसे में इससे अच्छा यही है कि ''ब्लोगर मीट'' का आयोजन हो जहाँ हर कर्त्तव्य निष्ठ ब्लोगर को अन्य ब्लोगर का प्यार व् सराहना मिले कवि श्रेष्ठ ''दुष्यंत सिंह ''के शब्दों में मैंने उनके आलेख का यही मर्म समझा है-
   ''हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
   इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.
   सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
    मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.''
                                  शालिनी कौशिक 
              शिखा कौशिक जी का आलेख आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं-
              

शुक्रवार, 6 मई 2011

आस्था पर हमला

   १ मई २०११ को हिंदुस्तान दैनिक में प्रकाशित समाचार ''कांधला के ऐतिहासिक मंदिर में चोरी''और ४ मई २०११ को प्रकाशित समाचार ''चोरी हुई मूर्ति खंडित अवस्था में मिली''से कांधला में पुलिस व्यवस्था की खामियों का सहजता से पता चलता है क्योंकि ये चोरी वहां सुबह और शाम की पूजा के बीच में हुई और दिनदहाड़े हुई इस वारदात को खोलने में पुलिस अभी तक नाकाम है.जबकि चोरी हुई कुछ मूर्तियों में से लक्ष्मी ,कुबेर, हनुमान की मिश्रित धातु की प्रतिमाएं तथा राधा कृष्ण की चोरी की प्रतिमा चोर खंडित अवस्था में मंदिर में पोलीथिन में वापस सफलता पूर्वक पहुंचा चुके हैं.
                    अन्दोसर नाम के इस शिवालय की पृष्ठभूमि यह है किवर्तमान में स्थित शिवालय के उत्तर में एक बाग़ था  बाग़ के उत्तर में एक सरोवर था जिसमे कमलगट्टे आदि का उत्पादन किया जाता था इस सरोवर का नाम आनंद सरोवर था .इस प्रकार यह वर्तमान शिवालय ''आनंद सरोवर शिवालय ''के नाम से विख्यात था इसका अपभ्रंश ही अब ''अन्दोसर शिवालय'' है.
                   वर्तमान  में  अन्दोसर शिवालय के नाम से विख्यात यह मंदिर कांधला का सबसे विशाल क्षेत्र में फैला मंदिर है जिसकी काफी भूमि कृषि कार्य में प्रयुक्त की जाती है .मंदिर के इतिहास के बारे में यहाँ के स्थानीय संवाददाता अधूरी व् असत्य जानकारियां समाचार पत्रों में अपने नाम से प्रकाशित करते रहे हैं जबकि अधिकांशतया समाचारपत्रों में इस सम्बन्ध में भ्रामक जानकारी ही दी गयी है.अब जब यहाँ मेरे जीवन में पहली बार चोरी की कुत्सित घटना घटित हुई तब मेरे मन में इस मंदिर के इतिहास के बारे में जानने की जिज्ञासा जाग्रत हुई और मैंने इस सम्बन्ध में खोजबीन कर कुछ तथ्य एकत्र किये जो आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ.-
       राजस्व अभिलेखों में यह शिवालय ''शिवाला हकीम शिवनाथ''के नाम से भी दर्ज था. क्योंकि १८०० इसवी के प्रारंभ में इस शिवालय के स्थापना हकीम शिवनाथ निवासी कांधला ने की थी जो पुर्सिवाडा[पंजाब] से आकर क़स्बा कांधला के निवासी हो गए थे.अंग्रेजी शासनकाल में शामली में मुंसिफ शामली का न्यायालय स्थित था .इस शिवालय की भूमि के दक्षिण भाग के मालिक हकीम शिवनाथ थे तथा इस शिवालय में उत्तर कीभूमि की मालिक मोहल्ला सरावज्ञान क़स्बा कांधला निवासी एक महिला थी कागजात में ये दर्ज है कि हकीम शिवनाथ ने उक्त महिला वाले भाग में भगवान शिव के लिंग[पिंडी]की स्थापना करा दी थी जिस पर उक्त महिला व् मोहल्ला सरावज्ञान के जैन बिरादरी के दो व्यक्तियों ने मुंसिफ शामली के यहाँ एक दीवानी वाद प्रतिनिधि के रूप में दायर किया था जिसमे मुंसिफ शामली ने तहसीलदार बुढ़ाना को आयुक्त नियुक्त करके  ये आदेश दिया था कि वे मौका मुआयना करके न्यायालय को ये रिपोर्ट दें कि क्या शिवलिंग की स्थापना जैन महिला के भाग में हुई है ?तहसीलदार बुढ़ाना ने विवादित  स्थल का निरीक्षण करने के बाद न्यायालय को ये रिपोर्ट दी थी कि शिवलिंग की स्थापना जैन महिला की भूमि में हुई है परन्तु शिवलिंग को वहां से हटाया जाना उचित नहीं है क्योंकि इससे क़स्बा कांधला के हिन्दू समाज की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचेगी इसलिए जैन महिला को एक आना मुआवजा दिलाया जाये.न्यायालय ने तहसीलदार बुढ़ाना की रिपोर्ट स्वीकार कीथी और जैन महिला को एक आना मुआवजा दिला दिया गया था .तभी से उक्त शिवालय स्थापित चला आ रहा है .
ये तथ्य श्री कौशल प्रसाद एडवोकेट जी द्वारा मुझे पता चले हैं श्री कौशल प्रसाद एडवोकेट जी हकीम शिवनाथ जी के वंशज हैं और उन्होंने ये बताया कि उन्हें ये तथ्य अपने ही पूर्वज पंडित श्री ताराचंद जी से पता चले और ये भी कहा कि उनके पास मुंसिफ शामली के आदेश की डिक्री भी है जो उर्दू में लिखी गयी है.
             अंत में मैंने उनसे जानना चाहा कि जैसे कि लगभग हर मंदिर का प्रबंध स्थापना करने वालों के वंशजों के हाथ में होता है तो हकीम शिवनाथ जी ने इस मंदिर का प्रबंध अपने वंशजों के हाथ में क्यों नहीं दिया तो वे मुस्कुरा कर कहते हैं वे जानते थे कि ऐसी सम्पदा से बाद में विवाद पैदा होते हैं और वे नहीं चाहते थे कि उनके परिवार के लोग आर्थिक स्थिति बिगड़ने की स्थिति में मंदिर से कोई अनुचित आर्थिक लाभ उठायें इसलिए उन्होंने मंदिर का प्रबंध किसी वैश्य परिवार के हाथों में सौंप दिया.
                     इस प्रकार की भावना रखने वाले स्थापक द्वारा स्थापित ये मंदिर आज ऐसी स्थिति से जूझ रहा है ऐसे में वर्तमान प्रबंधकों और पुलिस विभाग दोनों का कर्त्तव्य है कि जल्द से जल्द चोरी खोलें और मंदिर को उसके प्राचीन भव्य स्वरुप में लाने में सहयोग करें.
                                                           शालिनी कौशिक [एडवोकेट]

बुधवार, 4 मई 2011

दिल के जज़्बात

हमने चाहा था कि न कहें उनसे,
    पर बिन कहे ये मन न माना.
         हमने लाख छुपाना चाहा दिल के जज्बातों को,
                हो गया मुश्किल उन्हें दिल में दबाये जाना.

वो आये सामने मेरे कहा मन में जो भी आया,
न कुछ मेरा ख्याल किया न ही दुनिया से छिपाया.
          उनकी बातों के असर को मैंने अब है जाना,
            दिल के जज्बातों को मुश्किल है दबाये जाना.

उनकी चाहत थी हमें मन के ख्यालात बताएं,
 हमारी समझ के घेरे में कुछ देर से आये.
            अब तो आगे बढ़ने में लगेगा एक ज़माना,
            दिल के जज्बातों को मुश्किल है दबाये जाना.
                                           शालिनी कौशिक 

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...