रविवार, 31 जुलाई 2011

जख्म देकर जाएँगी.





उलझने हावी हैं दिल पर कब तलक ये जाएँगी,
जिंदगी लेके रहेंगी या तहीदस्त जाएँगी.

है अजब अंगेज़ हाल-ए-दिल हमारा क्या कहें,
मीठी बातें उनकी हमको खाक ही कर जाएँगी.

भोली सूरत चंचल आँखें खींचे हमको अपनी ओर ,
फसलें-ताबिस्ता में ये यकायक आग लगा जाएँगी.

रवां-दवां रक्स इनका है इसी जद्दोजहद में ,
कैसे भी फ़ना करेंगी ले सुकून जाएँगी.

सोच सोच में व्याकुल क्या करेगी ''शालिनी''
जाते जाते भी उसे ये जख्म देकर जाएँगी.

                    शालिनी कौशिक


शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

चोर पक्के बने हुए हैं.

जोश में खड़े हुए हैं,
     हाथ इनके मुड़े हुए हैं .
कवियों ने जो कवितायेँ लिखी
         उनको पढने में लगे हुए हैं .
चापलूस चेहरे पर अपने ,
     कृत्रिम हंसी लिए हुए हैं.
बाहर बाहर प्रेम दिखाकर,
      भीतर भीतर जले हुए हैं.
अपनी टांग को अड़ाकर,
     दूसरों में फंसे हुए हैं.
कहने को कवि मगर,
     चोर पक्के बने हुए हैं.
     
                     शालिनी कौशिक 

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

अपनी रूह होती .






न मिलती गर जिंदगी हमें फारिग़  अपनी रूह होती,
न पशेमानी कुछ न करने की न रंजीदा अपनी रूह होती .

जिंदगी है इसलिए हमको मिलना  मिलकर बिछड़ना होता,
ये न होती तो न रगबत कोई न तहीदस्त अपनी रूह होती.

जिंदगी नाम फ़ना होने का न मय्यसर तुम्हे कुछ होगा,
न ज़बूँ तुमको ही मिल पाती न खुश्क अपनी रूह होती.


न होते मुबतला उजालों  में तुमको मेरे लिए मोहलत होती ,
तब न महदूद मेरी  उमरे-तवील तब न शाकी अपनी रूह होती.

न समझो शादमां मुझको न  मसर्रत हासिल ''शालिनी''को ,
बुझेगी शमा-ए-जिंदगी जिस रोज़ कर तफरीह अपनी रूह होती.

                                     शालिनी कौशिक 



शब्द-अर्थ:-फारिग़-किसी काम से मुक्त होना, रन्जीदा-ग़मगीन, पशेमानी-शर्मिंदगी , मुब्तला-घिरा हुआ रहना, उमरे-तवील-लम्बी उम्र ,रगबत-चाहत, मसर्रत-ख़ुशी ,शादमां-खुशहाल, तफरीह-घूमना फिरना,मौज-मस्ती करना,शाकी-शिकायत करने वाला,महदूद-हदबंदी ,तहीदस्त-खाली हाथ ,ज़बूँ-जिक्र-मिठास

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

पर ये तन्हाई ही हमें जीना सिखाती है.




ये जिंदगी तन्हाई को साथ लाती है,
   हमें कुछ करने के काबिल बनाती  है.
सच है मिलना जुलना बहुत ज़रूरी है,
     पर ये तन्हाई ही हमें जीना  सिखाती है.

यूँ तो तन्हाई भरे शबो-रोज़,
          वीरान कर देते हैं जिंदगी.
उमरे-रफ्ता में ये तन्हाई ही ,
        अपने गिरेबाँ में झांकना सिखाती है.

मौतबर शख्स हमें मिलता नहीं,
     ये यकीं हर किसी पर होता नहीं.
ये तन्हाई की ही सलाहियत है,
     जो सीरत को संजीदगी सिखाती है.
        शालिनी कौशिक 

शनिवार, 23 जुलाई 2011

राज्यों को और अधिक शक्तियां एवं संसाधन सौंपने से राष्ट्र की उन्नति तीव्र गति से होगी

राज्यों को और अधिक शक्तियां एवं संसाधन  सौंपने से राष्ट्र की उन्नति तीव्र गति से होगी 

केंद्र तथा राज्यों में शक्तियों का वितरण एक ऐसी विशेषता है जो संघात्मक संविधानों में प्रमुख है .प्रो.के.सी.व्हव्हियर के अनुसार -,''संघात्मक सिद्धांत से तात्पर्य है ,संघ व् राज्यों में शक्तियों का वितरण ऐसी रीति से किया जाये कि दोनों अपने अपने क्षेत्र में स्वतंत्र हों ,किन्तु एक दूसरे के सहयोगी भी हों.''इसका तात्पर्य यह है कि राज्यों को कुछ सीमा तक स्वायत्ता होनी चाहिए .अमेरिकन संविधान संघात्मक संविधानों का जन्म दाता है उसमे केंद्र की शक्तियां परिभाषित की गयी है ,राज्यों की नहीं  .अमेरिकन संविधान में अवशिष्ट शक्तियां राज्यों में निहित की गयी हैं .परिणाम स्वरुप राज्य अधिक शक्तिशाली थे ;किन्तु कालांतर में आवश्यकता पड़ने पर केंद्र की शक्तियां बढती गयी और राज्यों की स्वायत्ता का ह्रास होता गया वर्तमान में स्थिति यह है कि  राज्यों की स्वायत्ता नाम मात्र की रह गयी है.
      भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण की जो योजना अपनाई गयी है उसमे प्रारंभ से ही केंद्र को सशक्त बनाया गया है कारण मात्र यही था कि  इससे देश की एकता एवं अखंडता को सुरक्षित रखा जा सके तथा उसका समुचित आर्थिक विकास हो सके और इस सबके लिए अनु.२४५-२५५ के अधीन संघ और राज्यों में विधायी शक्तियों के वितरण से संबंधित उपबंध  हैं  जिनमे संघ सूची के विषयों पर केंद्र सरकार व् राज्य सूची के विषयों पर राज्य सरकार विधि बना सकती हैजबकि अवशिष्ट शक्तियां संघ सरकार में ही निहित हैं समवर्ती सूची पर संघ और राज्य दोनों विधि बना सकते हैं  किन्तु यदि दोनों में असंगति है तो संघ द्वारा बनाई गयी विधि राज्य विधि पर अभिभावी होगी .इसके अतिरिक्त अनु.२४९ ,२५०,२५२,२५३ और ३५६ के अधीन उल्लिखित परिस्थितियों में संघ को राज्य सूची के विषय पर विधि बनाने की शक्ति है .अनु.२५६ से २६३ के अधीन प्रशासनिक शक्तियों के वितरण की व्यवस्था की गयी है .इस मामले में विभिन्न शक्तियों से राज्यों पर केन्द्रीय नियंत्रण का उपबंध किया गया है .इस प्रकार हम देखते हैं की राज्यों की स्वायत्ता बिलकुल समाप्त हो जाती है .इसी प्रकार राजस्व के वितरण के क्षेत्र में भी संघ का राज्यों पर पर्याप्त नियंत्रण है और यही आज राष्ट्र की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा कही जा सकती है संघ की आय के स्रोत राज्य की अपेक्षा अधिक हैं जबकि जनता की कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन का उत्तरदायित्व राज्यों पर अधिक है इस प्रयोजन के लिए राज्योंको पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है .यह सत्य है की संघ द्वारा वसूले गए करों से हुई आय की पर्याप्त मात्र राज्यों को दी जाती है .राज्यों को दी जाने वाली रकम वित्त आयोग की सिफारिश पर दी जाती है किन्तु व्यव्हार में वित्त आयोग से अधिक महत्वपूर्ण योजना आयोग हो गया है जोकि कानून द्वारा  स्थापित निकाय न होकर एक राजनीतिक संस्था है .ये अनुदान केंद्र की इच्छा पर निर्भर करते हैं .एक वर्ष में राज्यों को दिए जाने वाले कुछ अनुदान का ३० प्रतिशत वित्त आयोग के अधिकार में है और ७०%वैविकिक अनुदान है जो योजना आयोग की सिफारिश पर राज्यों को दिया जाता है और जिस कारण राज्यों द्वारा जनता के कल्याण की योजनायें संसाधनों के अभाव में लटक जाती हैं .
आर्थिक दृष्टिकोण से वर्तमान में किसी भी राज्य को आत्मनिर्भर नहीं कहा जा सकता है जबकि सभ्यता के विकास व् वैज्ञानिक प्रगति का युग है .लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जनता की मांगे निरंतर बढ़ रही हैं इन मांगों की पूर्ति हेतु राज्यों को निरंतर अधिक आर्थिक स्रोतों आवश्यकता  साथ ही अलग अलग राज्य अलग अलग समस्या से ग्रस्त  हैं जिसमे क्षेत्रवाद ,भाषावाद जातिवाद ,नक्सलवाद आदि प्रमुख हैं .ये समस्याएं जहाँ राज्य के स्थायित्व में निरंतर कष्ट उत्पन्न करती है वहीँ केंद्र  के लिए मात्र छोटी सी घटना होती है.इस तरह की घटनाओं के प्रतिफल स्वरुप होने वाली दुर्घटनाओं का जो खामियाजा सम्बंधित सरकार   को अपने  अस्तित्व  पर  भुगतना  पड़ताहै वैसा केंद्र  सरकार को नहीं करना होता इसलिए ऐसी समस्याओं से जिस दृढ़ता व् मनोबल से राज्य सरकार निबट सकती है केंद्र सरकार नहीं कर सकती बशर्ते इनसे निबटने की पर्याप्त शक्तियां केंद्र के पास हों.
    इस प्रकार जहाँ तक हम देखते हैं राज्यों के पास शक्तियां व् संसाधन सीमित मात्र में उपलब्ध हैं और राज्यों को अपने निर्धारित कार्यों के संपादन के लिए केंद्रीय सरकार का मुहं देखना पड़ता है राज्य सरकारों को दिए गए दायित्व के अनुरूप उन्हें आय के स्रोत नहीं दिए गए हैं इस सन्दर्भ में मद्रास के मुख्यमंत्री अन्नादुरै का कथन उल्लेखनीय है.उनके अनुसार-''वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था  उत्तरदायित्वों में भाग लेने की दृष्टि से संघात्मक है किन्तु साधनों की प्राप्ति की दृष्टि से एकात्मक है .''और यह वास्तविकता है .सीमित संसाधनों की दृष्टि से ही संविधान में जो  कल्याणकारी राज्य का आदर्श रखा गया है उसकी स्थापना मुश्किल है .बात बात में केन्द्रीय अनुदान की आवश्यकता  विकास की दृष्टि से राज्यों को पीछे धकेल रही है .सरकारिया आयोग की सिफारिशों में भी संविधान में संशोधन करके निगम कर ,मॉल के पारेषण पर कर तथा विज्ञापन और संवाद प्रसारण पर कर को राज्यों में बांटे जाने की सिफारिश की गयी है .
                  केंद्र द्वारा राज्यों को अधिक शक्तियां व् संसाधन सौंपने का परिणाम न केवल राज्य बल्कि राष्ट्र की प्रगति में तेज़ी ला सकता है उदाहरण  के लिए में ही ३० जुलाई २०१० के अमर उजाला का प्रमुख समाचार  इस बात की पुष्टि करता है .अमर उजाला कहता है कि ,''शिक्षा का अधिकार कानून [आर टी आई ] को अमली  जामा पहनाने के लिए राज्य सरकारों को अब ज्यादा पैसे मिलेंगे .केंद्र ने इसके लिए राज्यों और अपने बीच हिस्सेदारी का अनुपात नए सिरे से तय किया है .अब राज्य सरकारों को इस कानून के क्रियान्वयन  में महज ३२ फीसदी खर्च करने होंगे जबकि केंद्र सरकार 68 फीसदी खर्च उठाएगी इस प्रकार राज्यों को यह स्वायत्ता मिलने पर आर टी आई की राह का रोड़ा दूर होगा और शिक्षा का अधिकार अधिक   लोगों तक पहुँच बना कर राष्ट्र के लिए प्रगति दायक होगा .
        इसी तरह ३० जुलाई २०१० में गृहमंत्री पी चिदंबरम के बयाँ को प्रमुखता दी गयी है जिसमे उन्होंने तीन साल के नक्सलवाद को ख़त्म करने का दावा किया है .हिंदुस्तान के अनुसार-'' गृहमंत्री ने सदस्यों को आश्वासन दिया है कि नक्सलवाद से निपटने के लिए केंद्र व् राज्य पूरी तरह से मिलकर काम कर रहे हैं .''इसके तहत राज्यों को और हेलीकोप्टर उपलब्ध कराये जायेंगे साथ ही प्रभावित राज्यों में ४०० नए थाने भी खोलने के लिए केन्द्रीय मदद दी जाएगी इस मदद में ८० प्रतिशत केंद्र का और २० प्रतिशत राज्यों की भागीदारी होगी .चार राज्यों ने अपने यहाँ नक्सलवाद से निपटने के लिए युनिफायिद कमान बनाने का भी फैसला किया है चिदंबरम ने ये भी जानकारी दी कि प्रभावित राज्यों में विकास कार्यों को तेज़ करने के लिए योजना आयोग के सदस्य सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समूह भी स्थापित किया गया है इससे स्थानीय ज़रूरतों और स्थितियों के अनुसार विकास कार्यों को आगे बढाया जा सकेगा .
    इस प्रकार हम कह सकते हैं कि केवल मजबूत केंद्र से ही राष्ट्र की प्रगति असंभव  है इसे संभव बनाने  के लिए समृद्ध राज्य का होना भी ज़रूरी है और आज के इस युग में राज्यों द्वारा अपने विकास के लिए सुसमृद्ध होना आवश्यक है और ऐसा केंद्र द्वारा राज्यों को अधिक  शक्तियां व् संसाधन सौंपने पर ही संभव है .
       ''मुमकिन है सफ़र हों आसां ,
                   कुछ साथ तो चलकर देखें .
            कुछ तुम भी बदलकर देखो,
                     कुछ हम भी बदलकर देखें.
            शालिनी कौशिक
           

बुधवार, 20 जुलाई 2011

''तेरहवीं'


''तेरहवीं''

''पापा''अब क्या करोगे ,दीदी की शादी को महीना भर ही रह गया है और ऐसे में दादाजी की मृत्यु, ये तो बहुत बड़ा खर्चा पड़ गया ,विजय ने परेशान होते हुए अपने पापा मनोज से कहा .मनोज बोला -''बेटा;क्यों परेशान होता है ,ये तो हमारे लिए बहुत आराम का समय है .वो कैसे पापा?
इसलिए न तो मैं पिताजी का वो ऐसे बेटा कीमैं तो तेरे चाचाओं  से  पहले ही कह दूंगा की मुझे तो अपनी बेटी की शादी की तैयारी करनी है इसलिए न तो मैं अंतिम संस्कार ही कर पाऊँगा और न ही इससे सम्बंधित कोई खर्चा ,वैसे भी हम वैश्य जातिऔर सभी जानते हैं की वैश्य जाति में शादी में  के हैं और सभी जानते हैं की वैश्य जाति में  शादी में कितना खर्चा होता है .पापा की बात सुन विजय के चेहरे पर भी चमक आ गयी ,तभी जैसे उसे कुछ याद आया और वह बोला ,''पर पापा चाचा तो बाबाजी के पैसे मांगेगे और कहेंगे कीहमें वे ही दे दो हम उनसे ही उनके अंतिम संस्कार  का खर्चा निकाल लेंगे ,अरे बेटा तू तो बहुत आगे की सोच रहा है ,पिताजी के पास अब कोई पैसा था ही कहाँ ,वो तो सारा ही बाँट चुके थे और रहा जो उनके बक्से में कुछ पैसा रखा है उसे उठा और अपने कमरे में ले चल ,वो कह देंगे की उनके खाने और इलाज में खर्च हो गया .''
इस तरह जब मनोज का बेटा विजय संतुष्ट हो गया और वह वो बक्सा अपने कमरे में ले गया तब मनोज ने भाइयों को फोन पर पिताजी के मरने की सूचना दी और भाइयों के आने पर उन्हें अपना फैसला सुना दिया .आपस की बातों से ये निश्चय हुआ की पिता का अंतिम संस्कार दूसरे नंबर का बेटा करेगा और मनोज की बेटी की शादी की बात कहकर कम से कम 
पैसे में तेरहवीं आदि कर दी जाएगी .
जैसे जैसे जो सोचा गया था सभी भाइयों ने मिलकर वह कर दिया और तेरहवीं के बाद जब मेहमान जाने लगे तो सभी के हाथ जोड़कर अपने बनाये हुए पिता के वाक्य सभी के सामने दोहरा दिए .मनोज ने कहा-''पिताजी ने ही कहा था की मेरे कारण पोती की शादी में कोई कमी न करना वर्ना मेरी आत्मा नरक में भटकती रहेगी .''मनोज के ये शब्द सभी मेहमानों के दिल में घर कर गए और सभी उसे सांत्वना दे अपने अपने घर चले गए .

शालिनी कौशिक
http://shalinikaushik2.blogspot.com
 

सोमवार, 18 जुलाई 2011

एनआरआइ बच्चों और भारतवंशियों की युवा पीढ़ी को नया पाठ्यक्रम शुरू करने की तैयारी

खुशबु(इन्द्री) 
भारत अब विदेशों में बसे भारतवंशियों की जनरेशन नेक्स्ट से दोस्ती बढ़ाने की कोशिश में जुट गया है। एनआरआइ बच्चों और भारतवंशियों की युवा पीढ़ी को भारतीय सभ्यता, संस्कृति से पहचान कराने के लिए सरकार इस कड़ी में एक नया पाठ्यक्रम शुरू करने की तैयारी कर रही है। स्टडी इंडिया प्रोग्राम (एसआइपी) के सहारे 18-26 वर्ष के भारतीय मूल के विदेशी युवाओं को देश की कला, धरोहर, इतिहास के अलावा सामाजिक व आर्थिक विकास गाथा से परिचित कराने और इस देश से जुड़ी उनकी जड़ों को नया पानी देने की योजना है। इस कार्यक्रम को शक्ल देने में लगा प्रवासी भारतीय कार्य मंत्रालय चार सप्ताह के एसआइपी के लिए विश्वविद्यालयों और बड़े शैक्षणिक संस्थानों की तलाश में जुटा है। मंत्रालय के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि एसआइपी की अभिकल्पना एक ऐसे पाठ्यक्रम की है जिसे समर स्कूल की तर्ज पर चलाया जा सके। मंत्रालय की प्रस्तावित योजना गर्मियों और सर्दियों की छुट्टी के दौरान साल में दो बार इस पाठ्यक्रम को आयोजित करने की है, जिसमें भारतीय मूल के तीस विदेशी छात्रों का चयन किया जाएगा। मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार एसआइपी में शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहलुओं के अलावा छात्रों के अनुभव व यात्रा कार्यक्रम भी शामिल होंगे। शैक्षणिक पाठ्यक्रम में समसामयिक भारत के विकास, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्थाओं के अलावा सामाजिक और प्रशासनिक तंत्र से भी पहचान कराई 
जाएगी। इसके अलावा पाठ्यक्रम का सांस्कृतिक पहलू भारतीय पुराण, इतिहास, हस्तकला, नृत्य, संगीत, पाक कला और भाषाओं से भी उनकी पहचान बढ़ाएगा। वैसे प्रवासी भारतीय कार्य मंत्रालय इससे मिलती-जुलती एक योजना पहले से चला रहा है जिसका नाम नो इंडिया प्रोग्राम है, लेकिन स्टडी इंडिया प्रोग्राम के सहारे कोशिश इसे पाठ्यक्रम की शक्ल देने की है। उल्लेखनीय है कि प्रवासी भारतीय कार्य मंत्रालय विदेशों में बसे एनआरआइ और भारतवंशियों के बच्चों को शैक्षणिक छात्रवृत्तियों की सुविधा पहले से मुहैया करा रहा है। स्कॉलरशिप प्रोग्राम फार डायस्पोरा चिल्ड्रेन की इस योजना के तहत हर साल सौ छात्रवृत्तियां दी जाती हैं। इसके अलावा तकनीकी पाठ्यक्रमों में 15 फीसदी सीटें भी एनआरआइ बच्चों के लिए उपलब्ध हैं।
खुशबू जी को आप अपनी प्रतिक्रियाएं निम्न इ-मेल   पर भेज  सकते  हैं 
khushboo.goyal@gmail.com
लेखिका-खुशबू गोयल 
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

देख लेना तब जिस्म में रूह न रहेगी.





इस कदर धोखे मिलेंगे ज़माने में,
            तो ये जिंदगी जिंदगी न रहेगी.
कैसे जी पाएंगे इस ज़माने में ,
               जो आपकी नज़रें इनायत न रहेंगी.

तुमको पाने की खातिर दुनिया में,
                 चाहा अनचाहा बहुत कुछ कर गए.
क्या तुम मिलोगे हमें तब जाकर ,
             जब इन चिरागों में रोशनी न रहेगी.

अब तो चाहत है बस यही अपनी ,
                तुमको कभी कभी याद आ जाएँ हम .
हमसे मिलने भी  आओगे गर तुम,
                देख लेना तब जिस्म में रूह न रहेगी.
-- 

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

बचपन के वो पल

बचपन के वो पल






 आज बैठे बैठे बचपन की याद आ गयी.शायद मानव जीवन का सबसे खूबसूरत समय यही होता है .मनुष्य जीवन के तनावों से परे यह समय मेरी नज़रों में स्वर्णिम कहा जा सकता है .हरदम रोमांच से भरा बचपन रहा है हमारा  बिलकुल वैसे ही जैसे सीमा पर जवानों का रहता है उनको सामना करना होता है पडोसी देश की सेनाओं का तो हमें हरदम सामना करना पड़ता खतरनाक वानर सेनाओं का .होश सँभालते ही बंदरों की फ़ौज मैंने घर में देखी और घर हमारा इतने पुराने समय का बना है कि कहीं कोई रास्ता बंद नहीं था कहीं से भी बन्दर आ जा सकते थे जहाँ चलो ये देखकर चलो कहीं यहीं पर बन्दर बैठा हो .
   एक बार की बात तो ये है कि जब मैं बहुत छोटी थी तो अपनी बुआजी के साथ छज्जे पर लेटी थी तो एक बन्दर मेरे ऊपर से कूद कर गया था .एक बार जब मैं कहीं बाहर से आकर केले खा रही थी तो बन्दर मेरे हाथ से केले छीन कर भाग गया था .यूँ तो हमारा एक प्यारा सा कुत्ता भी था जो बंदरों की परछाई देखकर ही भौंक पड़ता था पर हाल ये था कि  एक बार जब वह बन्दर को आगे बढ़ने से रोक रहा था तो बन्दर ने उसके मुहं पर थप्पड़ तक मार दिया था सन १९८७ में २९ मई की शाम को हमारा प्यारा कुत्ता हमें हमेशा के लिए बंदरों में अकेला छोड़ गया और तब शुरू हुआ बंदरों का खतरनाक दौर जिसमे मम्मी के भी बंदरों ने दो बार काट लिया और वो भी ऐसा वैसा नहीं काफी खून मम्मी का बहा भी .ऐसे खतरनाक दौर में हमारे यहाँ कुछ नए बन्दर और जुड़ गए मैं क्योंकि उनकी शक्ल पहचानती थी इसलिए उनके कुछ नाम भी रख दिए थे एक बन्दर जिसका कान कुछ कटा हुआ था  उसका नाम तो ''कनकटा ''वैसे ही पड़ गया था बहुत खतरनाक बन्दर था वो और उसके साथ थी एक बंदरिया जिसका नाम मैंने 'चांटो  'रख दिया और आप भी यदि उससे मिलते तो उसके खतरनाक होने का अंदाजा लगा सकते थे .जब तक वह रही हम घर में एक कमरे में ही लगभग बंद रहते अभी कुछ महीने पहले ही उसके स्वर्ग सिधारने  का पता चला.
  बस एक ही किस्सा लिखती हूँ क्योंकि यदि मैं बंदरो पर लिखती रही तो बहुत पेज  भर जायेगा बस एक ही किस्सा है जिसमे मैं बंदरों को कुछ परेशान कर पाई थी,किस्सा यूँ है कि मैंने छत से देखा कि बन्दर छत के नीचे इकठ्ठा है और हम नीचे नहीं जा पाएंगे तो मैंने बंदरो के बड़े बड़े पत्थर मारे जो उनके लग भी गए और उसके बाद मैं तेजी से भाग कर कमरे में आयी बस शुक्र ये रहा कि बन्दर जीने से आये अगर वे छत से ही छत से ही आते तो उस दिन मेरी शामत आ गयी थी 
   ऐसे ही किस्सों से भरा है मेरा बचपन ,क्यों सही कहा न सैनिकों जैसा था मेरा बचपन 
                                  शालिनी कौशिक 

बुधवार, 13 जुलाई 2011

दलित उत्पीड़न में बिहार चौथे नंबर पर‏


राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष डॉ. पी एल पुनिया ने दलित वर्ग को जारी आरक्षण पर सवाल उठाने वालों की यहां जमकर खबर ली। उन्होंने कहा कि दलित समुदाय के लोगों को जितना हक मिलना चाहिए था, वह अभी तक नहीं मिल सका है। बावजूद इसके लोग उसे बीच में रोके जाने की बात करते हैं। उन्होंने न्यायपालिका में भी एससी-एसटी को आरक्षण दिए जाने की वकालत करते हुए कहा कि एससी-एसटी के उत्पीड़न के मामले में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के बाद बिहार चौथे स्थान पर है। पुनिया रविवार को आयोग द्वारा पटना में आयोजित जागरूकता शिविर में बोल रहे थे। पुनिया ने कहा कि 63 साल की आजादी के बाद यह समाज आज भी गुरबत में है। करीब तीन सप्ताह पूर्व केंद्रीय योजना आयोग द्वारा जारी एक सर्वेक्षण के मुताबिक पूरे देश में जितने भी गरीब हैं, उसमें आधे से अधिक दलित हैं। उन्होंने कहा कि एससी-एसटी समुदाय के 75 प्रतिशत लोग आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश की कुल आबादी में 16.2 प्रतिशत एससी एवं 8.2 प्रतिशत एसटी समुदाय की आबादी है, लेकिन उनके लिए केंद्र या राज्य स्तर पर नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था को पूरी तरह लागू नहीं की जा रही है। केंद्र में सरकारी नौकरियों में एससी के लिए 15 प्रतिशत और एसटी समुदाय के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है, लेकिन केंद्रीय स्तर पर सचिव संवर्ग के 88 पद होने के बावजूद उसमें एससी समुदाय के एक भी सदस्य को स्थान नहीं दिया गया है। पुनिया ने कहा कि आउटसोर्सिग और अनुबंध के तहत की जा रही बहाली में आरक्षण की व्यवस्था न होने से कर्मियों का शोषण भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसलिए इस पर रोक लगाई जानी चाहिए। आयोग इस संबंध में जल्द ही राष्ट्रपति को पत्र भेजेगा। उन्होंने न्यायपालिका में भी एससी-एसटी को आरक्षण दिए जाने की वकालत की। पुनिया ने कहा कि एससी-एसटी के आरक्षण को लेकर अधीनस्थ अदालतों द्वारा जो कथित तौर पर भ्रांतिपूर्ण निर्णय हो जाते हैं उसकी एक रिपोर्ट बनाकर आयोग उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर करने जा रहा है। उन्होंने कहा कि एससी-एसटी की जनसंख्या के मामले बिहार का देश में 16वां स्थान है, लेकिन इस समुदाय के साथ होने वाले उत्पीड़न के मामले में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के बाद यह चौथे स्थान पर है। उन्होंने कहा कि एससी-एसटी को प्राप्त अधिकारों और उन्हें दी जा रही सुविधाओं से इस समुदाय को अवगत कराने के उद्देश्य से आयोग द्वारा देश के कई अन्य प्रदेशों में इस प्रकार का जागरूकता अभियान कार्यक्रम की शुरूआत की गई है और इसका असर दिखने लगा है।
खुशबू(इन्द्री)करनाल
khushbu.goyal16@gmail.com
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सोमवार, 11 जुलाई 2011

विश्व जनसँख्या दिवस

आज सुबह रेडियो मिर्ची सुन रही थी तो अनंत और सौरभ के कार्यक्रम से पता लगा कि आज विश्व जनसँख्या दिवस है .पता तो ये बहुत पहले से था तबसे जबसे इस दिन विश्व की जनसँख्या ६ अरब हो गयी थी  पर ये हम जैसे लोगों को यद् भी क्यों रहेगा जिनका परिवार पहले से ही बहुत छोटा है जब ये उन्ही लोगों को याद  नहीं रहता जिन्होंने आज देश विश्व सभी की स्थिति बहुत बिगाड़ दी है.
        जब भी बचपन में कोई निबंध याद करते थे जनसँख्या से सम्बंधित तो उसमे इसके कारण में एक बड़ा कारण ''अशिक्षा''लिखा जाता था और हमें जब भी कोई अनपढ़ दिखाई देता था हम उसे देख कर देश की ख़राब स्थिति के लिए जिम्मेदार मान लेते थे  पर आज जब हमें कहने को काफी समझ आ चुकी है तब हम अपने आस पास के बहुत से ऐसे परिवार देख रहे हैं जो कहने को सुशिक्षित है,सभ्य हैं और उनके बहुत बड़े बड़े परिवार हैं.भारतीय समाज बेटे के होने तक बच्चे करता ही रहता है और अब ये लालसा इतनी आगे बढ़ चुकी है कि एक बेटा हो जाये तो कहा जाता है कि ''दो तो होने ही चाहियें''.
     आज जो भारत या कहें सरे विश्व में स्थिति है उसके जिम्मेदार हमारे पूर्वजों को ही कहा जायेगा.अपनी मम्मी और दादी से मैंने जाना कि पहले औरतें इस तरह के कॉम्पिटिशन किया करती थी और तो और यदि कोई महिला एक या दो ही बच्चे करती थी तो और औरतें उसे उकसाकर और बच्चे करा लिया करती थी.हमारी जानकर ही एक आंटी जो एक स्कूल में शिक्षिका हैं उनके दो ही बच्चे थे एक बेटा और एक बेटी पर उन्हें और औरतों ने ये कह कर ''कि क्या दो हो बच्चे करके रह गयी''उकसा दिया और अब उनके तीन बच्चे हैं और बड़े भाई बहन से उस बच्चे का अंतर लगभग ८ साल का है.चलिए यहाँ तो फिर भी खैर है हमारे एक अंकल जिनके सबसे पहले बेटा हुआ और जो अपनी बातों से भी काफी आधुनिक नज़र आते हैं उसके बाद ४ लड़कियां बेटे बढ़ने की ख्वाहिश में कर ली.और एक पडोसी जो कि इंटर कोलेज में प्रवक्ता हैं उनके दो बेटियों के बाद एक बेटा हो गया तब भी उनकी इच्छा बेटे के लिए ख़त्म नहीं हुई और उन्होंने उसके बाद तीन बेटियां और पैदा कर ली इसी तरह हद तो एक और अंकल ने की है जिनके एक के बाद एक बेटे होते रहे और वे करते रहे सात बेटे इस तरह उन्होंने देश की जनसँख्या में बढ़ा दिए हाँ रुके वे तभी जब आठवें  नंबर पर बेटी हो गयी.ये तो कुछ लोग हैं जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए मुश्किलें  पैदा कर दी हैं और मैं नहीं मान सकती इसलिए यह बात कि अशिक्षित लोग इसके लिए ज्यादा उत्तर दायी हैं जब मेरे सामने ऐसे उदाहरन हैं और हो सकता है कि आपके सामने भी हों.आज इसी कारण यह भयावह स्थिति पैदा हो गयी है कि अब यदि किसी के दो बच्चें भी हों तो जनसँख्या का बोझ बढ़ता दिखाई देता है.
    शालिनी कौशिक 

शनिवार, 9 जुलाई 2011

क्या यही प्यार है-

 क्या यही प्यार है-
   ''न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर  ,
   ऐसे ही लोग चले आये हैं मयखाने में.''
कवि गोपाल दास ''नीरज''की या पंक्तियाँ आजकल के कथित प्रेमी-प्रेमिकाओं पर शत-प्रतिशत खरी उतरती हैं .भले ही कोई मुझसे सहमत हो न हो पर अमर उजाला के आज के मुख्य पृष्ठ पर  छाये एक समाचार ''दुल्हन उठाने आया एम्.एल.सी.का बेटा ''पढ़कर मैं यही कहूँगी.
     समाचार के अनुसार ''बसपा एम्.एल.सी. एवं उत्तराखंड अध्यक्ष मेघराज जरावरे का परिवार सरसावा में रहता है .बताया गया है कि उनका भतीजा सन्नी सरसावा के एक शर्मा परिवार की लड़की के पीछे पड़ा था .लड़की की शादी देवबंद के शिव चौक कायस्थ वाडा निवासी रिटायर्ड बैंक कर्मी नत्थुराम शर्मा के बेटे मोनू से गुरुवार को होनी थी .सन्नी के डर से   लड़की का परिवार शादी के लिए देवबंद पहुँच गया था आरोप है कि देर शाम जरावरे का बेटा अमित अपनी सहारनपुर के मिशन कम्पाऔन्द   निवासी  फ्रेंड पिंकी और तीन लड़कों के साथ शादी के मंडप में पंहुचा .उसने शराब पी रखी थी उसने ऐलान कर दिया कि दुल्हन उसके भाई की अमानत है ,वह उसे लेकर जायेगा.दुल्हन के विरोध से वहां अफरा तफरी मच गयी.
      क्या यही है आज का प्यार जो ऐसी स्थितियां अपने कथित प्यार के लिए उत्पन्न करता है .ये तो वही बात हुई -
'' हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे ''
     सभी का प्यार के लिए यही कहना है कि प्यार त्याग का दूसरा नाम है .पहली बात तो ये है कि जब दुल्हन ने उनके इस कदम का विरोध किया तो साफ बात ये है कि वह शादी खुद की मर्जी से कर रही थी और ऐसे में यदि वह  उससे प्यार करता था तो उसे  अपने प्यार के लिए अपनी भावनाओं का बलिदान करना चाहिए था किन्तु आज के समय में पुराने समय जैसे पवित्र प्यार की कल्पना तक नहीं की जा सकती .दूसरी बात आज हर आकर्षण को प्यार का नाम दे दिया जाता है और यह आकर्षण अधिकांशतया एक तरफ़ा होता है और इसका खामियाजा आये दिन लड़कियों को भुगतना पड़ता है  .कहीं बस में बैठी ,कहीं कोलेज में आई लड़की को गोली से उड़ा दिया जाता है तो कहीं लड़की के चेहरे पर तेजाब डाल उसे अभिशप्त जिंदगी जीने को मजबूर किया जाता है .एक ओर जहाँ लड़कियों के सशक्तिकरण की कोशिशें की जा रही हैं वहीँ दूसरी ओर ऐसी घटनाएँ लड़कियों व् उनके परिजनों में भय व्याप्त कर रही हैं और मैं नहीं समझती कि ये प्यार है .प्यार में भय का कोई स्थान नहीं .फिल्म मुग़ले-आज़म का लोकप्रिय गीत -
''जब प्यार किया तो डरना क्या''
     भी इसी बात का समर्थन करता है और ये घटनाएँ प्यार की मूल भावनाओं को दरकिनार करते हुए स्वार्थ की भावना को ही ऊपर दिखा रही है .साथ ही जहाँ कहीं भी किसी लड़के लड़की की बात आती है तो पुलिस प्रशासन और मीडिया तुँरंत प्रेम सम्बन्ध जोड़ देता है और बदनामी का कलंक लग जाता है लड़की के माथे पर जिसका दोष केवल इतना है कि वह लड़की है .इसलिए ऐसी घटनाएँ केवल आजकल के प्यार जो अधिकांशतया [महज आकर्षण है]पर सवालिया निशान खड़ा करती हैं.ऐसे में अंत में भी कवि गोपाल दास ''नीरज''की यही पंक्तियाँ कहूँगी -
''जिनको खुशबू की न कोई पहचान थी ,
उनके घर फूलों की डोली आ गयी .
मोमबत्ती भी जिनसे नहीं जल सकी,
उनके हाथों में अब रौशनी आ गयी.
     शालिनी कौशिक 

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

कर जाता है....

कर जाता है....


दिखाता मुख की सुन्दरता,टूट जाता इक  झटके में,
वहम हम रखते हैं जितने खत्म उनको कर जाता है.

है हमने जब भी ये चाहा,करें पूरे वादे अपने,
दिखा कर अक्स हमको ये, दफ़न उनको कर जाता है.

करें हम वादे कितने भी,नहीं पूरे होते ऐसे,
दिखा कर असलियत हमको, जुबां ये बंद कर जाता है 

कहें वो आगे बढ़ हमसे ,करो मिलने का तुम वादा,
बांध हमको मजबूरी में, दगा उनको दे जाता है.
                       शालिनी कौशिक 
-- 

सोमवार, 4 जुलाई 2011

सभी धर्म एक हैं-ये जानो

''बाद तारीफ़ में एक और बढ़ाने के लिए,
वक़्त तो चाहिए रू-दाद सुनाने के लिए.
मैं दिया करती हूँ हर रोज़ मोहब्बत का सबक़,
नफ़रतो-बुग्ज़ो-हसद दिल से मिटाने के लिए.''

हमारा भारत वर्ष संविधान  द्वारा धर्म निरपेक्ष घोषित किया गया है कारण आप और हम सभी जानते हैं किन्तु स्वीकारना नहीं चाहते,कारण वही है यहाँ विभिन्न धर्मों का वास होना और धर्म आपस में तकरार की वजह न बन जाएँ इसीलिए संविधान ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया ,किन्तु जैसी कि आशंका भारत के स्वतंत्र होने पर संविधान निर्माताओं को थी अब वही घटित हो रहा है और सभी धर्मों के द्वारा अपने अनुयायियों  को अच्छी शिक्षा देने के बावजूद आज लगभग सभी धर्मों के अनुयायियों में छतीस का आंकड़ा तैयार हो चुका है.
  सभी धर्मो  के प्रवर्तकों ने अपने अपने ढंग से मानव जीवन सम्बन्धी आचरणों को पवित्र बनाने के लिए अनेक उपदेश दिए हैं लेकिन यदि हम ध्यान पूर्वक देखें तो हमें पता चलेगा कि सभी धर्मों की मूल भावना एक है और सभी धर्मों का अंतिम लक्ष्य मानव जाति को मोक्ष प्राप्ति की और अग्रसर करना है .संक्षेप में सभी धर्मों की मौलिक एकता के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-
[१]-सभी धर्म एक ही ईश्वर की सत्ता को मानते हैं . 
[२]-सभी धर्म मानव प्रेम ,सदाचार,धार्मिक सहिष्णुता और मानवीय गुणों के विकास पर बल देते हैं .
[३]-सभी धर्म विश्व बंधुत्व की धारणा को स्वीकार करते हैं  .
[४]-सभी धर्मों का जन्म मानव समाज व् धर्म में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए ही हुआ है .
[५]- सभी मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना मानते हैं.
      उपरलिखित पर यदि हम यकीन करें तो हमें सभी धर्म एक से ही दिखाई देते हैं .एक बार हम यदि अपने भारत देश के प्रमुख धर्मों के सिद्धांतों पर विचार करें तो हम यही पाएंगे की सभी का एक ही लक्ष्य है और वह वही अपने अनुयायियों के जीवन का कल्याण.अब हम हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई धर्मों के प्रमुख  सिद्धांतों पर एक दृष्टि डालकर देखते है कि वास्तविकता क्या है-
हिन्दू धर्म के प्रमुख सिद्धांत -
१-यह धर्म एक ही ईश्वर कि सर्वोच्चता में यकीन करता है.साथ ही बहुदेववाद में भी इसकी अटूट आस्था है.
२-हिन्दू धर्म आत्मा की अमरता में आस्था रखता है.
३-परोपकार ,त्याग की भावना,सच्चरित्रता  तथा सदाचरण हिन्दू धर्म के प्रमुख अंग हैं.
इस्लाम धर्म के प्रमुख सिद्धांत-
१-ईश्वर एक है .
२-सभी मनुष्य एक ही ईश्वर के बन्दे हैं अतः उनमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए.
३-आत्मा अजर और अमर है.
४-प्रत्येक मुस्लमान के पांच अनिवार्य कर्त्तव्य हैं  
-१-कलमा पढना.
२-पांचों समय नमाज पढना ,
३-गरीबों व् असहायों को दान देना .
४-रमज़ान के महीने में रोज़ा रखना और 
५-जीवन  में एक बार मक्का व मदीने की यात्रा [हज] करना.
ईसाई धर्म के प्रमुख सिद्धांत -
१-एक ईश्वर में विश्वास.
२-सद्गुण से चारित्रिक विकास .
३-जन सेवा और जन कल्याण को महत्व.
सिख धर्म के  प्रमुख सिद्धांत-
१-ईश्वर एक है .वह निराकार और अमर है ,उसी की पूजा करनी चाहिए.
२-सभी व्यक्तियों को धर्म और सदाचार का पालन करना चाहिए.
३-प्रत्येक मनुष्य को श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए.
४-आत्मा के परमात्मा से मिलने पर ही मोक्ष प्राप्त होता है.
५-जाति-पाति के भेदभाव से दूर रहना चाहिए.सभी को धर्म पालन करने का समान अधिकार है.
 तो अब यदि हम इन बातों पर विचार करें तो हमें इस समय धर्म को लेकर जो देश में जगह जगह जंग छिड़ी है उसमे कोई सार नज़र नहीं आएगा.हमें इन शिक्षाओं को देखते हुए आपस के मनमुटाव को भुँलाना होगा और इन पंक्तियों को ही अपनाना होगा जो प्रह्लाद ''आतिश '' ने कहे हैं-
''बीज गर नफरत के बोये जायेंगे,
      फल मोहब्बत के कहाँ से लायेंगे.''
             शालिनी कौशिक 

शब्दार्थ
रू-दाद=दास्तान,व्यथा-कथा 
नफ़रतो-बुग्ज़ो-हसद=घृणा-ईर्ष्या  

रविवार, 3 जुलाई 2011

पीछे देखोगे साथ में भीड़ जुट जाएगी.







है  अगर चाहत तुम्हारी सेवा परोपकार की,
तो जिंदगी समझो तुम्हारी पुरसुकूं पायेगी. 
दुनिया में किसी को मिले न मिले 
दुनियावी  झंझटों से मुक्ति मिल जाएगी.

हैं फंसे आकर अनेकों इस नरक के जाल में,
मुक्ति चाह जब उनकी आत्मा तडपायेगी     .
तब उन्हें देख तुमको हँसते मुस्कुराते हुए
जिंदगी जीने की नयी राह एक मिल जाएगी.

मोह अज्ञानवश फिर रहे भटक रहे,
मौत के आगोश में गर जिंदगी जाएगी.
अंत समय ज्ञान पाने की ललक को देखना
इच्छा अधूरी है ये मन में दबी रह जाएगी.

देख तुमको एक भी शख्स सुधर जाये अगर,
सफलता खुशियाँ तुम्हारे गले लग जाएँगी.
साथ पाकर एक और एक ग्यारह बनोगे
पीछे देखोगे साथ में भीड़ जुट जाएगी.
               शालिनी कौशिक 
http://shalinikaushik2.blogspot.com



शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.





मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती,
बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.

जी लेता है इन्सान गर्दिशी हज़ार पल,
एक पल भी हमको साँस ये लेने नहीं देती.

भूली हुई यादों के सहारे रहें गर हम,
ये जिंदगी राहत से गुजरने नहीं देती.

जीने के लिए चाहियें दो प्यार भरे दिल,
दीवार बनके ये उन्हें मिलने नहीं देती.

बैठे हैं इंतजार में वो मौत के अगर,
आगोश में लेती उन्हें बचने नहीं देती.

                      शालिनी कौशिक 

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...