गुरुवार, 30 मई 2013

संस्कृति रक्षण में महिला सहभाग

pretty hindu indian woman...editable vector illustration of ...स्मारिका- संस्कृति रक्षण में महिला सहभाग
यूनान ,मिस्र ,रोमां सब मिट गए जहाँ से ,
बाकी अभी है लेकिन ,नामों निशां हमारा .
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ,
सदियों रहा है दुश्मन ,दौरे ज़मां हमारा .
भारतीय संस्कृति की अक्षुणता को लक्ष्य कर कवि इक़बाल ने ये ऐसी अभिव्यक्ति दी जो हमारे जागृत व् अवचेतन मन में चाहे -अनचाहे विद्यमान  रहती है  और साथ ही इसके अस्तित्व में रहता है वह गौरवशाली व्यक्तित्व जिसे प्रभु ने गढ़ा ही इसके रक्षण के लिए है और वह व्यक्तित्व विद्यमान है हम सभी के सामने नारी रूप में .दया, करूणा, ममता ,प्रेम की पवित्र मूर्ति ,समय पड़ने पर प्रचंड चंडी ,मनुष्य के जीवन की जन्मदात्री ,माता के समान हमारी रक्षा करने वाली ,मित्र और गुरु के समान हमें शुभ कार्यों  के लिए प्रेरित करने वाली ,भारतीय संस्कृति की विद्यमान मूर्ति श्रद्धामयी  नारी के विषय में ''प्रसाद''जी लिखते हैं -
''नारी तुम केवल श्रद्धा हो ,विश्वास रजत नग-पग तल में ,
पियूष स्रोत सी बहा करो ,जीवन के सुन्दर समतल में .''
संस्कृति और नारी एक दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं .नारी के गुण ही हमें संस्कृति के लक्षणों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं .जैसे भारतीय नारी में ये गुण है  कि वह सभी को अपनाते हुए गैरों को भी अपना बना लेती है वैसे ही भारतीय संस्कृति में विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से आई संस्कृतियाँ समाहित होती गयी और वह तब भी आज अपना अस्तित्व कायम रखे हुए है और यह गुण उसने नारी से ही ग्रहण किया है .
   संस्कृति मनुष्य की विभिन्न साधनाओं की अंतिम परिणति है .संस्कृति उस अवधारणा को कहते हैं जिसके आधार पर कोई समुदाय जीवन की समस्याओं पर दृष्टि निक्षेप करता है .''आचार्य हजारी प्रसाद द्वैदी  ''के शब्दों में ,-
''नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं कलात्मक प्रयत्नों और भक्ति तथा योगमूलक अनुभूतियों के भीतर मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक और परिपूर्ण रूप को क्रमशः  प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम ''संस्कृति''शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं .''
    इस प्रकार किसी समुदाय की अनुभूतियों के संस्कारों के अनुरूप ही सांस्कृतिक अवधारणा का स्वरुप निर्धारित होता है .संस्कृति किसी समुदाय,जाति अथवा देश का प्राण या आत्मा होती है ,संस्कृति द्वारा उस जाति ,राष्ट्र अथवा समुदाय के उन समस्त संस्कारों का बोध होता है जिनके सहारे वह अपने आदर्शों ,जीवन मूल्यों आदि का निर्धारण करता है और ये समस्त संस्कार जीवन के समस्त क्षेत्रों में नारी अपने हाथों  से प्रवाहित  करती  है .जीवन के आरम्भ  से लेकर अंत तक नारी की भूमिका संस्कृति के रक्षण में अमूल्य है .
    भारतीय संस्कृति का मूल तत्व ''वसुधैव कुटुम्बकम ''है .सारी वसुधा को अपना घर मानने वाली संस्कृति का ये गुण नारी के व्यव्हार में स्पष्ट दृष्टि गोचर होता है .पूरे परिवार को साथ लेकर चलने वाली नारी होती है .बाप से बेटे में पीढ़ी  दर पीढ़ी संस्कार भले ही न दिखाई दें किन्तु सास से बहू तक किसी भी खानदान के रीति-रिवाज़ व् परम्पराएँ हस्तांतरित होते सभी देखते हैं .
    ''जियो और जीने दो''की परंपरा को मुख्य सूत्र के रूप में अपनाने वाली हमारी संस्कृति अपना ये गुण भी नारी के माध्यम  से जीवित रखते दिखाई देती है .हमारे नाखून जो हमारे शरीर पर मृत कोशिकाओं के रूप में होते हैं किन्तु नित्य प्रति उनका बढ़ना जारी रहता है ..हमारी मम्मी ने ही हमें बताया था कि उनकी दादी ने ही उनको बताया था -''कि नाखून काटने के बाद इधर-उधर नहीं फेंकने चाहियें बल्कि नाली में बहा देना चाहिए .''हमारे द्वारा ऐसा करने का कारण पूछने पर मम्मी ने बताया -''कि यदि ये नाखून कोई चिड़िया खाले तो वह बाँझ हो सकती है और इस प्रकार हम अनजाने में चिड़ियों की प्रजाति के खात्मे के उत्तरदायी हो सकते हैं .''
         इन्सान जितना पैसे बचाने के लिए प्रयत्नशील रहता है शायद किसी अन्य कार्य के लिए रहता हो .हमारी मम्मी ने ही हमें बताया -''कि जब पानी भर जाये तो टंकी बंद कर देनी चाहिए क्योंकि पानी यदि व्यर्थ में बहता है तो पैसा भी व्यर्थ में बहता है अर्थात खर्च होता है व्यर्थ में .
     घरों में आम तौर पर सफाई के लिए प्रयोग होने वाली झाड़ू के सम्बन्ध में दादी ,नानी ,मम्मी सभी से ये धारणा हम तक आई है कि झाड़ू लक्ष्मी स्वरुप होती है इसे पैर नहीं लगाना चाहिए और यदि गलती से लग भी जाये तो इससे क्षमा मांग लेनी चाहिए . और ये भावना नारी की ही हो सकती है कि एक छोटी सी वस्तु का भी तिरस्कार न हो . हमारी संस्कृति कहती है कि ''जैसा व्यवहार आप दूसरों से स्वयं के लिए चाहते हो वही दूसरों के साथ करो .''अब चूंकि सभी अपने लिए सम्मान चाहते हैं ऐसे में नारी द्वारा झाड़ू जैसी छोटी वस्तु को भी लक्ष्मी का दर्जा दिया जाना संस्कृति की इसी भावना का पोषण है वैसे भी ये मर्म एक नारी ही समझ सकती है कि यदि झाड़ू न हो तो घर की सफाई कितनी मुश्किल है और गंदे घर से लक्ष्मी वैसे भी दूर ही रहती हैं .
    हमारी संस्कृति कहती है -
   ''यही पशु प्रवर्ति है कि आप आप ही चरे ,
    मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे .''
भूखे को भोजन खिला उसकी भूख शांत करना हमारी संस्कृति में मुख्य कार्य के रूप में सिखाया गया है और इसका अनुसरण करते हुए ही हमारी मम्मी ने हमें सिखाया -''कि तुम दूसरे को खिलाओ ,वह तुम्हे मुहं से दुआएँ दे या न दे आत्मा से ज़रूर देगा .''
      भारतीय संस्कृति की दूसरों की सेवा सहायता की भावना ने विदेशी महिलाओं को भी प्रेरित किया .मदर टेरेसा ने यहाँ आकर इसी भावना से प्रेरित होकर अपना सम्पूर्ण जीवन इसी संस्कृति के रक्षण में अर्पित कर दिया .आरम्भ से लेकर आज तक नर्स की भूमिका नारी ही निभाती आ रही है क्योंकि स्नेह व् प्रेम का जो स्पर्श मनुष्य को जीवन देने के काम आता है वह प्रकृति ने नारी के ही हाथों में दिया है .
    हमारी ये महान संस्कृति परोपकार के लिए ही बनी है और इसके कण कण में ये भावना व्याप्त है .संस्कृत का एक श्लोक कहता  है -
  ''पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः ,
  स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः.
  नादन्ति शस्याम खलु वारिवाहा ,
  परोपकाराय  सताम विभूतयः ."    
    और नारी अपने फ़र्ज़ के लिए अपना सारा जीवन कुर्बान कर देती है .अपना या अपने प्रिय से प्रिय का भी बलिदान देने से वह नहीं हिचकती है .जैसे इस संस्कृति में पेड़ छाया दे शीतलता पहुंचाते हैं नदियाँ प्यास बुझाने के लिए जल धारण करती हैं .माँ ''गंगा ''का अवतरण भी इस धरती पर जन जन की प्यास बुझाने व् मृत आत्माओं की शांति व् मुक्ति के लिए हुआ वैसे ही नारी जीवन भी त्याग बलिदान की अपूर्व गाथाओं से भरा है इसी भावना से भर पन्ना धाय ने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दे कुंवर उदय सिंह की रक्षा की .महारानी सुमित्रा ने इसी संस्कृति का अनुसरण करते हुए बड़े भाइयों की सेवा में अपने दोनों पुत्र लगा दिए .देवी सीता ने इस संस्कृति के अनुरूप ही अपने पति चरणों की सेवा में अपना जीवन अर्पित कर दिया .उर्मिला ने लक्ष्मण की आज्ञा पालन के कारण अपने नयनों से अश्रुओं को बहुत दूर कर दिया ..
      नारी का संस्कृति रक्षण में सहभाग ऐसी अनेकों कहानियों को अपने में संजोये है इससे हमारा इतिहास भरा है वर्तमान जगमगा रहा है और भविष्य भी निश्चित रूप में सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगा .

                              शालिनी कौशिक 
                        [   कौशल ]
                             

सोमवार, 27 मई 2013

छत्तीसगढ़ नक्सली हमला -एक तीर से कई निशाने

छत्तीसगढ़ नक्सली हमला -एक तीर से कई निशाने 

छतीसगढ़ स्थित सुकमा जिले के दर्भा घाटी क्षेत्र में कॉंग्रेसी नेताओं के काफिले पर हुए नृशंस हमले को ऊपरी तौर पर एक नक्सली हमले के रूप में देखा जा रहा है किन्तु जैसे जैसे समाचार पत्रों में ये समाचार प्रकाशित हो रहा है और भुग्तभोगियों व् घटनाक्रम में बचे लोगों के बयान आ रहे हैं उससे यह साफ होता जा रहा है कि यह मात्र नक्सली हमला नहीं था वरन सोची समझी राजनितिक साजिश भी था .
     महेन्द्र कर्मा की हत्या का जहाँ तक सवाल है तो ये नक्सलियों की हिट लिस्ट में थे और नक्सलियों द्वारा उन पर पहले भी कई हमले किये जा चुके थे किन्तु नन्द कुमार पटेल ,प्रदेश अध्यक्ष की मौत को नक्सली हमले के परिणाम रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता है और यदि यह परिवर्तन यात्रा नक्सली क्षेत्र से निकालने पर पटेल को बात न मानने की सजा नक्सलियों ने दीभी तो उनके बेटे को किस कृत्या की सजा दी जबकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें नक्सलियों ने आसानी से जाने दिया जिनमे कोंटा के विधायक कवासी लकमा भी शामिल हैं .

नक्सली हमला: पटेल, उनके बेटे का शव बरामद


nand kumar patel and son killed by maoists  
एक तरफ दो-दो घंटे तक गोलीबारी होती है अपहरण होते हैं हत्याएं होती हैं और ऐसा नहीं कि किसी निजी क्षेत्र में ऐसा होता है बल्कि राज्य के अति संवेदनशील क्षेत्र में खुले आम इस नृशंस कार्यवाही को अंजाम दिया जाता है उस पर मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ रमण सिंह कहते हैं कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे अगर ऐसा सुरक्षा के पूरे इंतजाम में होता है तो बिना सुरक्षा इंतजाम में क्या होगा ये आम छत्तीसगढ़ निवासी की तो कल्पना से भी परे होगा .दर्भा घाटी पहले ही नक्सलियों का अड्डा रही है और वहां कार्यक्रम के लिए जाने वाले कौंग्रेस जेड सुरक्षा वाले नेताओं को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दिया जाना इस हमले को राजनितिक साजिश के घेरे में उसी तरह ले आती है जैसे १९९१ में राजीव गाँधी की हत्या के मामले में चन्द्र शेखर सरकार द्वारा उनकी सुरक्षा हटा लिया जाना संदेह के घेरे में हैं और फिर नक्सली हिट लिस्ट की बात करें तो पूर्व विधायक उदय मुदालियर ,योगेन्द्र शर्मा और अन्य का नक्सली अभियान से कोई वास्ता नहीं था हाँ वे कॉंग्रेसी अवश्य थे .
      आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए कौंग्रेस के दिग्गज नेताओं को चुन-चुनकर मारने के पीछे का कारण तो सहज ही समझा जा सकता है .एक तरफ तो इस हमले से कौंग्रेस की स्थिति राज्य में डांवाडोल करने की कोशिश की गयी है तो दूसरी तरफ रमण सिंह की तीसरी बार ताजपोशी की राह में अंगारों की सड़क का इंतजाम किया गया है क्योंकि तीसरी बार भाजपा का छत्तीसगढ़ में आना रमण सिंह के लिए भी भाजपा में उसकी कुर्सी का प्रबंध करता है जिस कुर्सी का प्रबंध गुजरात में हैट्रिक  लगा कर मोदी अपने लिए हासिल करने की जुगत में लगे हैं .

raman singh in problemनक्सली हमले ने बढ़ाई रमन सिंह की मुश्किलें  

ऐसे में हमला केवल नक्सली नही कहा जा सकता .ये तो वही बात हुई कि कोई व्यक्ति सात साल से लापता है तो मर ही गया होगा कि उपधारणा की जाये या फिर कोई व्यक्ति किस लाश के पास खड़ा है तो क़त्ल उसने ही किया होगा ,सोच लिया जाये .इस सोच पर चलकर हम मामले के भीतर के सत्य को कभी उजागर नहीं कर सकते .इसकी सच्चाई सामने लाने के लिए हमें इन तथ्यों को ध्यान में रखना ही होगा कि पुलिस द्वारा किसी भी घटना को मुठभेड़ का रूप दे दिया जाता है .किसी महत्वपूर्ण घटनाक्रम से ध्यान हटाना हो तो देश को आतंकवाद की आग में झोंक दिया जाता है .
          शालिनी कौशिक 
                  [कौशल ]

रविवार, 26 मई 2013

तेरे हर सितम से मुझको नए हौसले मिले हैं .''

प्रवीण शुक्ल कहते हैं -
''तुम्हें इस दौर के हालात का मंज़र बताऊँ क्या ,
 हुई है आँख मेरी आंसुओं से तर बताऊँ क्या ,
मैं अपने दुश्मनों से खुलके दो-दो हाथ कर लेता ,
उठा है दोस्तों के हाथ में पत्थर बताऊँ क्या .''
१९६७ में जन्मी एक विचारधारा जिसका उद्देश्य जनांदोलन के माध्यम से एक वर्गविहीन समाज की स्थापना करना था आज जिस उद्देश्य पर काम कर रहा है वह उसकी हाल की बहुत सी गतिविधियों से साफ़ हो गया है और वह महान उद्देश्य है ''एक व्यक्ति विहीन समाज की स्थापना .''
  वह आन्दोलन जो १९६७ में माकपा से विभाजित हुआ ,उग्रवादी धड़े का विचार था ,जिसमे चारू मजूमदार ,कानू सान्याल और सरोज दत्त थे जिन्होंने माओवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक होने के कारण भारतीय कमुनिस्ट पार्टी [मार्क्सवादी -लेनिनवादी ]बनाई और पश्चिमी बंगाल के दार्जिलिंग जिले के अत्यंत पिछड़े गाँव नक्सलबाड़ी में मई १९६७ में शोषक ज़मींदारों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर जिस सशस्त्र आन्दोलन की नीव रखी थी उसे ही नक्सलवाद के नाम से जाना गया और तब से लेकर आज तक किये जाने वाले इस आन्दोलन के नीति परिवर्तन ने इसे वर्ग विहीन समाज की स्थापना से भटकाकर व्यक्तिविहीन समाज की स्थापना की ओर धकेल दिया  है .
    सरकारी उपेक्षा के शिकार आदिवासी समुदाय को मोहरा बना यह आन्दोलन पिछले काफी समय से उथल-पुथल मचाने में लगा है और ऐसे में जिन राज्यों में यह आन्दोलन चरम पर है वहां की जनता को शोषण से बचाने के लिए आगे आने वाले नेताओं से नक्सलवादियों की रंजिश होना स्वाभाविक है और क्योंकि देश में कॉंग्रेसी नेताओं की जनता के हित में ऐसी परिस्थिति से जूझने की मंशा और हिम्मत कुछ ज्यदा है तो उनसे निबटने के लिए नक्सलवादी कुछ भी कर गुजरने की स्थिति में आ गए हैं और ऐसे में आदिवासियों को भी [जिनके लिए लड़ने का वे दम भरते हैं ]निशाने पर लेने से गुरेज नहीं कर रहे हैं और इसी का परिणाम है २५ मई २०१३ का छत्तीसगढ़ में कौंग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर नक्सली हमला .


नक्सली हमला: प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व बेटे समेत 27 की हत्या

Body of kidnapped Chhattisgarh Congress chief found 
जिसमे कई अन्य कॉंग्रेसी नेताओं के साथ साथ नक्सलियों ने सलवा जुडूम के संस्थापक ''महेन्द्र कर्मा'' को भी मौत के घाट उतार दिया जिनकी बदौलत वहां आम जनता को भी नक्सलियों से निबटने को हथियार सरकारी मदद के रूप में मिल गए थे .एक वर्ग विहीन समाज की स्थापना के उद्देश्य को लेकर चलने वाले नक्सल वादी अपने ही हैं और दुःख भी इसी बात का है कि ये युद्ध दोनों ओर से अपने अपनों के द्वारा लड़ा जा रहा है .भाई से भाई की दुश्मनी की विसंगति जो हमारे समाज में आई है उसका असर यहाँ भी पड़ा है और सत्ता की चाह इन्हें भी उसी कौंग्रेस का दुश्मन बनाने की राह पर ले आई है जिसने सिख आतंकवाद में इंदिरा गाँधी और लिट्टे आतंकवाद में राजीव गाँधी जैसे भारत रत्नों को खोया है .देश हित के लिए हमेशा अपना खून बहाकर दुश्मनों के दांत खट्टे करने की क्षमता रखने वाली कौंग्रेस को आने वाले विधानसभा चुनावों में अपने सफल प्रदर्शन के लिए भयाक्रांत करने की यह कोशिश  कितनी सफल रहेगी इसका जवाब तो कौंग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी जी ने दे ही दिया है

Rahul Gandhi calls Chhattisgarh attack, an attack on democracy   

Photo
 हाँ अन्य राज्यों में सरकार की नाकामी के नाम पर क्रोध का उबाल दिखाने वाली भाजपा आज क्यों अपनी कार्यक्षमता का आकलन नहीं करती ?क्यों नहीं बताती कि दो दो घंटे तक पहले से घोषित परिवर्तन रैली यात्रा के मार्ग पर क्यों अति संवेदनशील इलाके में सही सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गयी ?क्यों नहीं देखती अपनी क्षमता कि एक राज्य का नक्सलवाद तो संभलता नहीं फिर देश सँभालने की बात कैसे सोची जा सकती है जबकि देश में ऐसे नक्सलवाद को छोड़कर और भी बहुत से उथल-पुथल मचाने वाले मुद्दे हैं ?कौंग्रेस हमेशा से बलिदान देती आई है ,उस पर ऐसे हमलों से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है हाँ छत्तीसगढ़ में भाजपा की दुबारा ताजपोशी ज़रूर खतरे में पड़ गयी है .
        कॉंग्रेसी हिम्मत तो राहुल गाँधी ने अपने हौसले से बयां कर ही दी  है और ये हौसले वे रखते हैं इसमें कोई शक भी नहीं क्योंकि वे स्वयं ऐसे आतंकवाद में अपनी दादी व् पिता को खोने का दंश झेल चुके हैं और तब भी इससे टकराने को सामने खड़े हैं और इसलिए उनकी प्रेरणा उनके कार्यकर्ताओं में वास्तविक जोश भर सकती है क्योंकि सभी जानते हैं कि ये कोरी बयानबाजी नहीं हैं और न ही चुनावी स्टंट .उनके इरादे आज यही उजागर करते हैं -
  ''तू हर तरह से ज़ालिम मेरा सबर आजमाले ,
 तेरे हर सितम से मुझको नए हौसले मिले हैं .''

           शालिनी कौशिक 

गुरुवार, 23 मई 2013

कुपोषण और आमिर खान -बाँट रहे अधूरा ज्ञान


कुपोषण और आमिर खान -बाँट रहे अधूरा ज्ञान 

Aamir Khan to spread awareness against malnutrition 

Aamir to spread awareness against malnutrition   mwcd
''भोज्य तत्वों के गुण और परिमाण में अपर्याप्त तथा आवश्यकता से अधिक उपभोग द्वारा जो हानिकारक प्रभाव शरीर में उत्पन्न हो जाते हैं ,वे 'कुपोषण' ही हैं .''
   ''भोज्य तत्व ''गुण और परिमाण में शारीरिक आवश्यकतानुसार लेने चाहियें वर्ना इसके परिणाम बड़े भयानक निकलते हैं .
    इस प्रकार 
अपोषण +आवश्यकता से अधिक पोषण =कुपोषण 
    होता है और महान बालीवुड नायक आमिर खान कुपोषण के हटाने के लिए जिस मुहीम पर काम कर रहे हैं वे भारत में माँ और गर्भस्थ शिशु दोनों को इसी राह पर आगे बढ़ा रहे हैं  .वे कह रहे हैं कि छह माह तक बच्चे को केवल माँ का दूध ही दिया जाना चाहिए और कुछ नहीं मतलब कि वे माँ और बच्चा दोनों के लिए न चाहते हुए भी कुपोषण की राह खोल रहे हैं .
     माँ का दूध बच्चे के लिए प्रकृति प्रदत्त पोषाहार प्रदान करता है जो बच्चे को सहज ग्राह्य होने के साथ साथ शुद्ध एवं बाहरी आक्रमण से मुक्त रखता है .विश्व स्वास्थ्य संगठन ,कृषि एवं खाद्य संगठन ,संयुक्त राष्ट्र बाल कोष जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की मान्यता है कि भारत वर्ष जैसे विकासशील देशों की माताएं अपने बच्चों को तब तक स्तन-पान कराएँ जब तक ऐसा करना उनके लिए संभव हो तथा इसका उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़ता हो .साथ ही नवजात शिशु को पहले दिन का दूध अवश्य पिलाना चाहिए क्योंकि इस दूध में विद्यमान 'कोलेस्टम 'में विटामिन ए की बहुतायत मात्रा होती  है .उसकी आँतों में लाभकारी जीवाणु तथा पाचन संस्थान में एंजाइम उत्पन्न होते हैं .जो विशेष लाभदायक होते हैं .गाय का दूध पीने वाले बच्चों की आँतों में क्षारीय माध्यम उत्पन्न होता है ,जबकि माता का स्तनपान करने में अम्लीय माध्यम बनता है जो लाभकारी बैक्टीरिया  उत्पन्न करता है .
     मात्र इसी ओर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं आमिर खान जबकि एक पक्ष इसका और है और वह यह है -
     ''कि केवल माँ का दूध बच्चे की पोषण सम्बन्धी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति चार माह तक कर पाता है .इसके बाद  उसे बाहर से कुछ दिया जाना चाहिए नहीं तो बच्चे के विकास की गति धीमी हो जाती है .''
     माताओं की यह धारणा है कि जब तक बच्चा दूध पीता है उसे अन्य कोई आहार दिए जाने की आवश्यकता नहीं होती ,सही नहीं है. माँ के दूध में लोहा ,विटामिन सी और नायसिन आदि पोषक तत्त्व नहीं होते हैं .बच्चा जब अपनी माँ के गर्भ में पलता है तो उसके शरीर में इतना अतिरिक्त लोहा इकठ्ठा हो जाता है जो जन्म लेने के बाद केवल चार माह के लिए ही पूरा पड़ता है ऐसे में यदि उसके बाद कुछ ऊपरी  आहार न दिया जाये तो लोहे की कमी से रक्तहीनता उत्पन्न होती है ,विटामिन सी की कमी के कारण मसूड़े पुष्ट नहीं होते और उसके दांत ठीक से नहीं निकलते ,नायसिन की कमी के कारण ही स्तनपान करने वाले शिशुओं के मुहं में अक्सर छाले पड़ जाते हैं चार माह का हो जाने पर शिशु का आमाश्य ठोस पदार्थ पचाने लायक हो जाता है भले ही उसका एक भी दांत न निकला हो .बच्चों के पाचन संस्थान को अभ्यस्त बनाने के लिए भी अन्य आहार धीरे धीरे देना उचित होता है [साभार-आहार एवं पोषण विज्ञानं -विमला शर्मा ] 
    साथ ही एक दूध पिलाने वाली माँ का भोजन निम्नलिखित है -
भोज्य तत्व                          दूध पिलाती माँ 
कैलोरी                                 ३१०० 
प्रोटीन [ग्राम में ]                     ९८ 
कैल्शियम [ग्राम में ]                 १:३ 
लोहा [ग्राम में ]                        २० 
विटामिन ए अंतर्राष्ट्रीय इकाई    ८००० 
थायमिन [मिलीग्राम में ]           १.२ 
रायबोफ्लैमिन [''  '']                 १.९ 
एस्कोर्बिक [''  '']                      १०० 
विटामिन डी                            ४०० 
    और भारत जैसे देश में जहाँ इतनी जानकारी और सुविधाओं का अभाव है वहां एक माँ पर इस तरह का अतिरिक्त कार्य डालना जो कि उसके स्वयं इस विषम परिस्थिति से उभरने में बाधक हो सकता है और फिर जिस काम का दायित्व उस पर आमिर खान से प्रचार द्वारा डलवाया जा रहा है वह उसके शिशु के लिए लाभकारी न होकर उसके स्वास्थ्य के लिए भी घातक है ,ऐसे में अज्ञानता व् घोर गरीबी वाले इस देश में आमिर खान को अपने स्टारडम के प्रचार से उस जनता को ,जो स्टार के कहने पर कुछ भी गलत या सही करने के  लिए आगे बढ़ जाती है ,को भ्रम में डालने से बचना चाहिए और अपने इस कार्य से सही प्रचार के लिए देश की अनुभवी दाइयों व् बुजुर्ग उन महिलाओं से संपर्क करना चाहिए जिनके हाथों में पीला बढे हजारों लाखों नौनिहाल आज देश का नाम रोशन कर रहे हैं न कि उन शोध संस्थाओं से जिनके शोध कभी कुछ कहते हैं तो कभी कुछ  ,और देर सवेर जो स्वयं ही गलत साबित होते हैं .

                                 शालिनी कौशिक 
                                       [कौशल ]

बुधवार, 22 मई 2013

कल्पना पुरुष मन की .




अधिकार 
सार्वभौमिक सत्ता 
सर्वत्र प्रभुत्व 
सदा विजय 
सबके द्वारा अनुमोदन 
मेरी अधीनता 
सब हो मात्र मेरा 

कर्तव्य 
गुलामी 
दायित्व ही दायित्व 
झुका शीश 
हो मात्र तुम्हारा 
मेरे हर अधीन का 

बस यही कल्पना 
हर पुरुष मन की .

शालिनी कौशिक 
   

सोमवार, 20 मई 2013

बाबूजी शुभ स्वप्न किसी से कहियो मत ...[..एक लघु कथा ]

 
''मनोज सुन ''नरेन् ने आवाज़ लगाई ,हाँ ,क्या है ? ''फ्री है ?हाँ अभी तो एक घंटा फ्री ही हूँ ,तू बता न क्या कह रहा है ,पता है मनोज! मैंने आज सुबह सूर्योदय में एक खास सपना देखा है कि मैं राष्ट्रपति भवन में प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहा हूँ और पता है ये सपना मैंने सुबह सुबह देखा है ,नरेन् का चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था ,चल नरेन् तेरे तो मजे आ गए .कहते हैं सूर्योदय के समय देखे गए सपने तो १ से २ हफ्ते में फलदायी होते हैं ,फिर तो तेरे पास टाइम रहेगा नहीं चल मिठाई अभी खिला दे ,ये कह मनोज व् नरेन् रूम से बाहर निकलने ही वाले थे  कि गेट पर खड़े कन्हैय्या ने उन्हें रोकते हुए कहा ,''बाबूजी ! एक बात कहूँ ,देखिये बुरा मत मानियेगा ,कहूँ क्या ? हाँ ,हाँ ,कहो आज हमारा मूड बहुत अच्छा है बुरा मानने का तो सवाल ही नहीं उठता ,कहो जल्दी टाइम नहीं है ,मिठाई लेने जाना है ,व्यग्रता से नरेन् ने कन्हैय्या से से कहा ,''पता है बाबूजी ,मैंने भी आपकी ही तरह आज से दस साल पहले सुबह सुबह एक सपना देखा था कि मैं इस कॉलेज का प्रबंधक हो गया हूँ और मैंने ख़ुशी ख़ुशी अपना यह सपना सारे  मौहल्ले को सुना दिया था और मिठाई भी बाँट दी थी ,फिर ...फिर क्या हुआ?तुम फिर यहाँ एंट्री में क्या कर रहे हो ? बताता हूँ बाबूजी !मैं इसी ख़ुशी में कि सपना हफ्ते दस दिन में पूरा होने वाला है ,यहाँ भी आ गया और मैंने यहाँ के कॉलेज मैनेजमेंट को भी अपना सपना सुना दिया तो उसमे जो सबसे बुजुर्ग थे वे बोले -"कि कन्हैय्या ! तुमने अपना सपना हमें सुनाया और क्योंकि सपना सुनाने से वह निष्फल हो जाता है और इसी तरह से अशुभ सपने का प्रभाव कम किया जाता है .दूसरों को सुनाने से सपने के फल में कमी आती है और तुमने जो देखा था वह शुभ स्वप्न था जिसे तुमने अपनी व्यग्रता में निष्फल कर दिया  और क्योंकि यहाँ हफ्ते दस दिन में फलदायी होता तो ये तो वैसे भी निष्फल ही होना था क्योंकि यहाँ प्रबंधक का कोई चुनाव अभी साल भर से पहले नहीं होना है ,हाँ ! तुम अगर चाहो तो इसका फल कम होने पर भी इसका सबसे कम फल पा सकते हो हमारे यहाँ एंट्री की नौकरी है जहाँ यहाँ आने जाने वालों का बयोरा रखा जाता है तुम वह नौकरी पा सकते हो .''ये कहकर कन्हैय्या अपना रुंधा कंठ ले रूम से बाहर  निकल गया और नरेन् व् मनोज एक दूसरे का मुहं देखते रह गए .
      शालिनी कौशिक 
              [कौशल ]

रविवार, 19 मई 2013

हर अँधेरे को मिटाकर बढ़ चलो ए जिंदगी


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हर अँधेरे को मिटाकर बढ़ चलो ए जिंदगी
आगे बढ़कर ही तुम्हारा पूर्ण स्वप्न हो पायेगा.


गर उलझकर ही रहोगी उलझनों में इस कदर,
डूब जाओगी भंवर में कुछ न फिर हो पायेगा.


आगे बढ़ने से तुम्हारे चल पड़ेंगे काफिले,
कोई अवरोध तुमको रोक नहीं पायेगा.

तुमसे मिलकर बढ़ चलेंगे संग सबके होसले,
जीना तुमको इस तरह से सहज कुछ हो पायेगा.

संग लेकर जब चलोगी सबको अपने साथ तुम,
चाह कर भी कोई तुमसे  दूर ना हो पायेगा.

जुड़ सकेंगे पंख उसमे आशा और विश्वास के ,
''शालिनी'' का नाम भी पहचान नयी पायेगा.

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 26-मेरी प्रविष्टि दो दोहे


 

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 26


दो दोहे-
व्याकुल मन माँ वसुंधरा ,करें करुण पुकार ,
पर्यावरण के शोषण का ,बंद कर दो व्यापार .

निसर्ग नियम पर ध्यान दे ,निसंशय मिले निस्तार ,
मेरा जीवन ही मनुज ,तेरा जग आधार .

      शालिनी कौशिक 

शनिवार, 18 मई 2013

मेरी किस्मत ही ऐसी है .

 Woman_crying : beauty girl cry  


न होगा मुझको कुछ हासिल ,मेरी किस्मत ही ऐसी है ,
न फतह के होंगी काबिल ,मेरी किस्मत ही ऐसी है .

मयस्सर थी मुझे खुशियाँ ,अगर कुछ करके दिखलाती ,
नहीं कर पाई मैं कुछ भी , मेरी किस्मत ही ऐसी है .


खड़े हैं साथ में अपने ,न मानूं हूँ किसी की मैं ,
समझती खुद को बादशाह ,मेरी किस्मत ही ऐसी है .

नहीं चाहा था जो मैंने ,बिना मांगे ही मिल गया ,
जो चाहा न मिला मुझको ,मेरी किस्मत ही ऐसी है .

न पड़ना फेर में इसके ,यही कहती है ''शालिनी''
कहलवा देगी तुमको ये ,मेरी किस्मत ही ऐसी है .
   
            शालिनी कौशिक 
              [कौशल ]

गुरुवार, 16 मई 2013

ये गाँधी के सपनों का भारत नहीं .

ये गाँधी के सपनों का भारत नहीं .
Mere Sapno Ka Bharat

  के .एन .कौल कहते हैं -
''खुद रह गया खुदा भूल गया ,
   भूलना किसको था क्या भूल गया .
      याद हैं मुझको तेरी बातें लेकिन ,
         तू ही कुछ अपना कहा भूल गया .''
देश के संविधान का संरक्षक उच्चतम न्यायालय स्वयं नियम बनाता है और तोड़ता है .वक़्त का परिवर्तन उसे इसके लिए विवश करता है किन्तु जब सुधार की ओर बढ़ते कदम रोक दिए जाते हैं तो विवाद उठने स्वाभाविक हैं .
मो. गयासुद्दीन बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी.ए.आई.आर.१९७७ अस.सी. १९२६ ,१९२९ में उच्चतम न्यायालय कहता है -
''अपराध एक व्याधिकृत [PATHOLOGICAL ] पथ भ्रष्टता [ABERRATION ]है ,अपराधी का साधारणतया उद्धार किया जा सकता है .राज्य को प्रतिशोध की बजाय पुनर्वास [REHABILITATE  ] करना है निम्न मनः संस्कृति [sub -culture  ] जो समाज विरोधी आचरण की ओर ले जाती है ,का निराकरण असम्यक निर्दयता से नहीं अपितु पुनः संस्कृतिकरण से किया जाना है .इसलिए दंड शास्त्र में दिलचस्पी का केंद्र बिंदु व्यक्ति है और उद्देश्य समाज के लिए उसका उद्धार करना है .कठोर और बर्बर दंड देना भूतकाल और प्रतिगामी काल की यादगार है .आज मानव दंडादेश को उस मनुष्य की पुनर्निर्माण की प्रक्रिया के रूप में लेता है जिसका पतन अपराध करने में हो गया है और सामाजिक प्रतिरक्षा के एक साधन के रूप में अपराधी पुनर्वास में आधुनिक समाज का प्राथमिक हित है .इसलिए आतंक के बजाय एक चिकित्सीय दृष्टिकोण हमारे दंड न्यायालयों द्वारा ग्रहण किया जाना चाहिए क्योंकि व्यक्ति का पशु की तरह बंदी बनाया जाना उसके मस्तिष्क को मरोड़ देता है .''और अपने इसी मत का अनुसरण उच्चतम न्यायालय ने राकेश कुमार बनाम बी.एल.विग ,सु. सेन्ट्रल जेल तिहाड़ ए.आई.आर १९८१ एस.सी.१९६७ में किया जब उसने यह कहा कि -''दंडादेश का दांडिक प्रयोजन सुधारात्मक है .''
    ऐसे में संजय दत्त को उनके अपराध के लिए जेल भेज दिए जाने में उच्चतम न्यायालय को कौन सा सुधार नज़र आया है यह हम नहीं कह सकते हाँ इतना अवश्य कह सकते हैं कि उन्हें जेल भेजकर उच्चतम न्यायालय ने सुधार की ओर बढ़ते एक मस्तिष्क को मोड़ने का प्रयास अवश्य किया है .

       
महात्मा गाँधी जी ने कहा था कि -;;पाप से घृणा करो ,पापी से नहीं .''और हम इस कथन पर अमल करें या नहीं किन्तु अपराध किये जाने पर १८ महीने जेल की सजा भुगत चुके संजय दत्त जो २० साल से सुधारात्मक राह पर चल पड़े हैं और एक सभ्य  नागरिक के रूप में अपने प्रशंसकों को आदर्श समाज की स्थापना के लिए प्रेरित कर रहे हैं ,को जेल में धकेल कर तो यही साबित कर रहे हैं कि भारत आज गाँधी के सपनो का भारत नहीं क्योंकि यहाँ पाप से नहीं पापी से ही घृणा की जाती है .अंत में लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी के शब्दों में यही कहूँगी -''जो जहाँ है ,वहीँ पर परेशान है ,
वक़्त सब पर बराबर मेहरबान है ,
पूरी दुनिया की रखता हूँ यूँ तो खबर ,
आदमी सिर्फ अपने से अंजान है ,
बेरुखी ही मिलेगी यहाँ हर तरफ ,
ये शहर है ,यही इसकी पहचान है ,
जिसपे मिलते थे इंसानियत के कदम ,
वो सड़क दूर तक आज वीरान है .''
       शालिनी कौशिक 
               [कौशल ]

बुधवार, 15 मई 2013

कायरता की ओर बढ़ रहा आदमी .


दरिंदा है मनोज, अपनी पत्नी से भी किया था रेप   

'गुड़िया' खतरे से बाहर, आरोपी ने कबूला गुनाह   

झुलसाई ज़िन्दगी ही तेजाब फैंककर ,   

 

acp slapped girl in delhi

''कायर होता जा रहा है आदमी ''
दिल्ली में एक पञ्च वर्षीय बालिका से गैंगरेप ,शामली में चार सगी बहनों पर तेजाब उडेला ,मायके गयी पत्नी तो जल मरा ,महिला से छेड़खानी मारपीट ,रामपुर में अज़ीम नगर थाना क्षेत्र में सामूहिक दुष्कर्म के बदले सामूहिक दुष्कर्म ,मोदीनगर में कैथवादी में पानी भरने गयी छात्रा से छेड़छाड़ कपडे फाड़े आदि आदि आदि दिल दहल जाता है मन क्षुब्ध हो जाता है रोज रोज ये समाचार देखकर पढ़कर किन्तु नहीं रुक रहे हैं ये और नहीं मिल पा रहा है कोई समाधान  इन्हें रोकने का .पुरुष जो नारी को अपने से दोयम दर्जा समाज में ,इस सृष्टि में प्रदान करता है और उसके संरक्षण का दायित्व अपने ऊपर लेता है .वही पुरुष आज बात बात पर स्त्री पर हमले कभी यौनाचार ,कभी तेजाब उडेलना कभी मारपीट करना आदि के रूप में करने लगा है और वह भी उस देश में जहाँ नारी की पूजा की जाती है ,जहाँ कहा जाता है -
''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ,रमन्ते तत्र देवता .'' 
       विभिन्न धर्मग्रंथों में नारी का सम्मान ,सुरक्षा का दायित्व पुरुषों को दिया गया है -
-मनुस्मृति के ८/३४९ में कहा गया है -नारी और ब्राह्मण की रक्षा करने के लिए धर्मयुद्ध में किसी को मारना पड़े तो भी दोष नहीं होता है .
-नारी के सम्बन्ध में अन्य स्मृतियाँ कहती है -
         ''जो लोग नारी जाति  से घृणा करते हैं ,समझना चाहिए कि वे अपनी माता का ही अपमान करते हैं .जिस पर नारी की कोप दृष्टि है उस पर भगवान का भी अभिशाप लगा हुआ है .जिस दुष्ट के व्यवहार से नारी की आँखों से आंसू बहते हैं वह देवता के क्रोधानल से भस्म हो जाता है .जोव्यक्ति नारी के दुःख दर्द में उसकी हंसी उडाता हैं उसका अकल्याण होता है .ईश्वर  भी उसकी प्रार्थना नहीं सुनते . ''
 बचपन से युवावस्था हो या प्रौढ़ावस्था नारी सम्मान और संरक्षण संस्कारों के रूप में पुरुषों को पहनाया जाता है अनार्य और संस्कारों से दूर परिवारों का तो नहीं पता किन्तु सभ्य सुसंस्कृत परिवार अपने बच्चों को इसी तरह के आभूषणों  से विभूषित करते हैं और अपने परिवार के पुरुषों पर महिलाओं के सम्मान व् संरक्षण का भार सौंपते है .रक्षा बंधन का पर्व मनाया तो हिन्दू धर्मावलम्बियों द्वारा जाता है किन्तु उसके कच्चे धागे का मान मुसलमान भी रखते हैं .रानी पद्मावती की राखी पर हुमायूँ का आना सभी जानते हैं .नारी को परिवार की समाज की इज्ज़त माना जाता है और आज यही मान्यता नारी के जीवन के लिए खतरा बन चुकी है क्योंकि आदमी में जो प्रतिशोध की भावना है उसका शिकार नारी को ही होना पड़ रहा है .प्यार और वह भी एकतरफा अगर लड़की ने स्वीकार नहीं किया तो या तो उसे बलात्कार का शिकार होना पड़ता है या फिर तेजाब से झुलसना पड़ता है .
     छेड़खानी ,जिसका आमतौर पर सभी महिलाएं शिकार होती हैं चुपचाप सहना इसे अपनी नियति मान रहती हैं किन्तु यदि कोई इसका शेरनी बन प्रतिरोध कर देती है तो इससे भी पुरुष के पौरुष को चोट पहुँचती है जबकि वह जानता है कि वह गलत कर रहा है तब भी यह नहीं सोच पाता कि ज़रूरी नहीं है कि आज की नारी भी बरसों से चुपचाप रहने वाली कोई गुडिया नहीं होगी और जब वह नारी का शेरनी रूप देखता है तो जो ढंग वह उससे निबटने के लिए आजमा रहा है वे उसकी कायरता की ही गवाही दे रहे हैं .वह अपने गलत काम के लिए माफ़ी नहीं मांग रहा ,शर्मिंदा नहीं हो रहा बल्कि महिला के साथ मारपीट को उतारू हो रहा है और इस श्रेणी में वह किसी भी महिला की उम्र का अंतर नहीं कर रहा है उसका यह व्यवहार चाहे दो साल की मासूम हो या ६० साल की वृद्धा सबके साथ ही नज़र आ रहा है .पहले जहाँ  महिलाओं के ,लड़कियों के अपहरण की घटनाएँ न के बराबर ही सुनने में आती थी ,आज निरंतर बढती जा रही हैं .पहले जहाँ लोगों के आपसी झगड़ों में महिलाओं को , लड़कियों को एक तरफ कर दिया जाता था आज बर्बरता का शिकार बनाया जा रहा है .
    प्रतिशोध की भावना में झुलसता आदमी ,हार का दंश झेलता आदमी आज इतना गिर गया है कि प्राकृतिक रूप से ताकत में अपने से कमजोर बनायीं गयी नारी पर ज़ुल्म करने पर आमादा हो गया है .
    लड़कियां परिवार  की इज्ज़त होती हैं ,लड़कियां शरीर से कोमल होती हैं ,लड़कियां मेहनती होती हैं ,वे पराया धन होती हैं ,परिवार में सबकी प्रिय होती हैं आदि आदि आदि सभी बातें आज उनके खिलाफ ही जा रही हैं .किसी परिवार की इज्ज़त ख़राब करनी हो तो उसकी बहु बेटी से बलात्कार करो ,किसी लड़की ने यदि एकतरफा प्यार का प्रस्ताव ठुकरा दिया तो उसे उसके सौंदर्य का घमंड मान तेजाब से झुलसा देना आज आम प्रतिक्रिया हो गयी है किसी को समाज में मुहं दिखने के काबिल न छोड़ना हो तो उसके साथ दुष्कर्म करो ,काम वासना को पूरी करना हो तो लड़की के साथ हैवानियत करो और यदि वह न मिल पाए तो ऐसे में ये कायर पुरुष आज छोटे मासूम लड़कों को भी शिकार बनाने से नहीं चूक  रहे हैं .अपनी एक से बढ़कर एक कुत्सित इच्छाओं को पूरी करने के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं और इस सबके बाद अपनी पहचान छिपाने के लिए अपने शिकार की हत्या और सभी कुछ इतना आसान कि क्या कहने ?लड़की में इतने बलशाली पुरुषों ,हैवान जानवरों का सामना करने की हिम्मत ही कहाँ ?वह तो इस सबके बाद भी दोषी न केवल समाज की नज़रों में बल्कि अपनी स्वयं की नज़रों में और इसका परिणाम भी आज दिखाई दे रहा है लड़कियां स्वयं को मौत के हवाले कर रही हैं ,कहीं तेजाब पी कर तो कहीं आग में झुलस कर .
    लड़कियों की तो नियति पुरुषों ने यही बना दी है जिसके कारन कन्या भ्रूण हत्या तक को लोग अंजाम देते हैं क्योंकि ऐसी घटनाएँ देख हर किसी में हिम्मत नहीं है कि वह लड़कियों को पैदा होते देख सके नहीं दे सकते वे अपने लड़के को ऐसे संस्कार जिनसे ऐसी घटनाएँ घटित ही न हों और परिणाम स्वरुप पुरुषों का परचम लहराता रहता है ,अभिमान बढ़ता जाता है और आज यही अभिमान है जो हैवानियत में तब्दील हो गया है और पुरुष को कायरता की ओर बढ़ा रहा है .
      शालिनी कौशिक
      

सोमवार, 13 मई 2013

अख़बारों के अड्डे ही ये अश्लील हो गए हैं .





बेख़ौफ़ हो गए हैं ,बेदर्द हो गए हैं ,
हवस के जूनून में मदहोश हो गए हैं .

चल निकले अपना चैनल ,हिट हो ले वेबसाईट ,
अख़बारों के अड्डे ही ये अश्लील हो गए हैं .


पीते हैं मेल करके ,देखें ब्लू हैं फ़िल्में ,
नारी का जिस्म दारू के अब दौर हो गए हैं .

गम करते हों गलत ये ,चाहे मनाये जलसे ,
दर्द-ओ-ख़ुशी औरतों के सिर ही हो गए हैं .

उतरें हैं रैम्प पर ये बेधड़क खोल तन को ,
कुकर्म इनके मासूमों के गले हो गए हैं .

आती न शरम इनको मर्दानगी पे अपनी ,
रखवाले की जगह गारतगर हो गए हैं .

आये कभी है पूनम ,छाये कभी सनी है ,
इनके शरीर नोटों की अब रेल हो गए हैं .

कानून की नरमी ही आज़ादी बनी इनकी ,
दरिंदगी को खुले ये माहौल हो गए हैं .

मासूम को तडपालो  ,विरोध को दबा लो ,
जो जी में आये करने में ये सफल हो गए हैं .

औरत हो या मरद हो ,झुठला न सके इसको ,
दोनों ही ऐसे जुर्मों की ज़मीन हो गए हैं .

इंसानियत है फिरती अब अपना मुहं छिपाकर ,
परदे शरम के सारे तार-तार हो गए हैं .

''शालिनी'' क्या बताये अंजाम वहशतों का ,
बेबस हों रहनुमा भी अब मौन हो गए हैं .

[मौलिक व् अप्रकाशित ]

शालिनी कौशिक
  [कौशल]



शनिवार, 11 मई 2013

मिला जिससे हमें जीवन उसे एक दिन में बंधवाती .-HAPPY MOTHER'S DAY

Mother : illustration of mother embracing child in Mother s Day Card Stock Photo 

तरक्की इस जहाँ में है तमाशे खूब करवाती ,
मिला जिससे हमें जीवन उसे एक दिन में बंधवाती .

महीनों गर्भ में रखती ,जनम दे करती रखवाली ,
उसे औलाद के हाथों है कुछ सौगात दिलवाती .

सिरहाने बैठ माँ के एक पल भी दे नहीं सकते ,
दिखावे में उन्हीं से होटलों में मंच सजवाती .


कहे माँ लाने को ऐनक ,नहीं दिखता बिना उसके ,
कुबेरों के खजाने में ठन-गोपाल बजवाती .

बढ़ाये आगे जीवन में दिलाती कामयाबी है ,
उसी मैय्या को औलादें, हैं रोटी को भी तरसाती .

महज एक दिन की चांदनी ,न चाहत है किसी माँ की ,
मुबारक उसका हर पल तब ,दिखे औलाद मुस्काती .

याद करना ढूंढकर दिन ,सभ्यता नहीं हमारी है ,
हमारी मर्यादा ही रोज़ माँ के पैर पुजवाती .


किया जाता याद उनको जिन्हें हम भूल जाते हैं ,
है धड़कन माँ ही जब अपनी कहाँ है उसकी सुध जाती .

वजूद माँ से है अपना ,शरीर क्या बिना उसके ,
उसी की सांसों की ज्वाला हमारा जीवन चलवाती .


शब्दों में नहीं बंधती ,भावों में नहीं बहती ,
कड़क चट्टान की मानिंद हौसले हममे भर जाती .

करे कुर्बान खुद को माँ,सदा औलाद की खातिर ,
क्या चौबीस घंटे में एक पल भी माँ है भारी पड़ जाती .



मनाओ इस दिवस को तुम उमंग उत्साह से भरकर ,
बाद इसके किसी भी दिन क्या माँ है याद फिर आती .

बाँटो ''शालिनी''के संग रोज़ गम ख़ुशी माँ के,
 फिर ऐसे पाखंडों को ढोने की नौबत नहीं आती .

              शालिनी कौशिक 
                       [कौशल]




शुक्रवार, 10 मई 2013

औरत की नज़र में हर मर्द है बेकार .



  Thai Massage
फरमाबरदार बनूँ औलाद या शौहर वफादार ,
औरत की नज़र में हर मर्द है बेकार .

करता अदा हर फ़र्ज़ हूँ मक़बूलियत  के साथ ,
माँ की करूँ सेवा टहल ,बेगम को दे पगार .


मनसबी रखी रहे बाहर मेरे घर से ,
चौखट पे कदम रखते ही इनकी करो मनुहार .


फैयाज़ी मेरे खून में ,फरहत है फैमिली ,
फरमाइशें पूरी करूँ ,ये फिर भी हैं बेजार .

हमको नवाज़ी ख़ुदा ने मकसूम शख्सियत ,
नादानी करें औरतें ,देती हमें दुत्कार .


माँ का करूँ तो बीवी को बर्दाश्त नहीं है ,
मिलती हैं लानतें अगर बेगम से करूँ प्यार .

बन्दर बना हूँ ''शालिनी ''इन बिल्लियों के बीच ,
फ़रजानगी फंसने में नहीं ,यूँ होता हूँ फरार .




     शालिनी कौशिक
           [WOMAN ABOUT MAN]
 

शब्दार्थ :फरमाबरदार -आज्ञाकारी ,बेजार-नाराज ,मक़बूलियत -कबूल किये जाने का भाव ,मनुहार-खुशामद,मनसबी-औह्देदारी ,फरहत-ख़ुशी ,फैयाजी-उदारता मकसूम -बंटा हुआ .फर्ज़ंगी -बुद्धिमानी .

गुरुवार, 9 मई 2013

जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .



बात न ये दिल्लगी की ,न खलिश की है ,
जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .



न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें ,
फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया  की है .



पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के ,
रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .



नाते नहीं होते हैं कभी पहले बाद में ,
खोया इन्हें तो रोने में आँखें तबाह की हैं.



मौत के मुहं में समाती रोज़ दुनिया देखते ,
सोचते इस पर फ़तेह  हमने हासिल की है .



जिंदगी गले लगा कर मौत से भागें सभी ,
मौके -बेमौके ''शालिनी''ने भी कोशिश ये की है .


शालिनी कौशिक
[कौशल ]



क्या आदमी सच में आदमी है ?

''आदमी '' प्रकृति की सर्वोत्कृष्ट कृति है .आदमी को इंसान भी कहते हैं , मानव भी कहते हैं ,इसी कारण आदमी में इंसानियत ,...