रविवार, 30 जून 2013

मुसलमान हिन्दू से कभी अलग नहीं


मुसलमान हिन्दू से कभी अलग नहीं
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 ''दिल में जब रौशनी की ख्वाहिश हो ,
      शौक से मेरा घर जला लेना .''-मोहम्मद अकरम 
       एक दूसरे के प्रति कुर्बानी के भाव तक प्रेम में आकंठ डूबे हिन्दू-मुस्लिम समुदायों वाला यह देश चंद कट्टरपंथियों के कारण पिछले कुछ समय से जिस दौर से गुजर रहा है वह हम सभी के लिए शर्मनाक है क्योंकि -
''अब तो रह रहके जली लाशों की बू आती है ,
   पहले ऐसी तो न थी मेरे चमन की खुशबू .''
भारत में हिन्दू व् मुसलमान समुदाय कभी एक दूसरे से अलग नहीं रहे .ये हमेशा एक दूसरे के दुःख में दुखी व् एक दूसरे की ख़ुशी में हर उत्सव हर जलसे में शामिल रहे हैं .जहाँ ईद मिलन के अवसर पर हिन्दू सबसे पहले अपने भाई मुसलमान की चौखट पर ईद मिलने पहुँचते हैं वहीँ दीवाली की मिठाई खाने में मुसलमान भी हिन्दू भाई से पीछे नहीं रहते .जहाँ हिन्दू बहन रानी पद्मावती के रक्षा के लिए मुग़ल बादशाह हुमायूँ भाई बन पहुँचता है वहीँ हिन्दू परिवारों के कितने ही बच्चे मुसलमान दाइयों के संरक्षण में पलते हैं .जहाँ हिन्दू विधवा बूढी महिला का कोई करने वाला न होने पर मुसलमान बेटा बन अपने परिवार सहित सेवा सुश्रुषा करता है वहीँ मुस्लिम भाई के दुर्घटनाग्रस्त होने पर उसके साथ अस्पताल में हिन्दू बहुसंख्या में उपस्थित हो उसके परिवार को धैर्य बंधाते हैं .
      कांवड़ यात्रा हो या जगन्नाथ रथ यात्रा ,मुस्लिम भाइयों के सहयोग को नकारना किसी के वश की बात नहीं .गंगा हिन्दुओं की परम पूज्य ,पवित्र नदी आज प्रदूषण से आहत है  तो उसके सफाई अभियान हेतु भी मुस्लिम सहयोग की बातें सामने आ रही हैं .

 

     अभी केदारनाथ में हुई त्रासदी में मुस्लिमों द्वारा आपदा पीड़ितों के लिए बचाव अभियान में भी भाग लिया जा रहा है और सहायतार्थ धनराशि भी भेजी जा रही है .

प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी ने कपिल सिब्बल को ७५,०००/-रूपए के धनराशि आपदा पीड़ितों की सहायतार्थ दी .मुज़फ्फरनगर में आपदा पीड़ितों के लिए दुआओं का सिलसिला जारी है .
       आपस के ऐसे भावना प्रधान सम्बन्ध होने के बावजूद हम आज क्यूं वोटों में तब्दील होते जा रहे हैं ?क्यूं मंदिर -मस्जिद के नाम पर एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं जबकि हम जानते हैं -
''ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर ,
      या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो .''
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''मन चंगा तो कठोते में गंगा ''
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    सब जानते हैं प्रभु इस धरती के कण-कण में व्याप्त हैं .स्वयं नृसिंह भगवान हिरण्य कश्यप को यह प्रत्यक्ष दिखा चुके हैं .ऐसे ही खुदा की इबादत के लिए नमाज़ी को किसी ईमारत की ज़रुरत नहीं ,वह कहीं भी खुले आकाश के नीचे स्वच्छ भूमि पर पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बैठकर अपने ख़ुदा को याद करता है फिर ये आपस की तकरार हम इतनी हावी क्यूं होने दे रहे हैं कि वह रंजिश का रूप लेती जा रही है .हम अपने निजी जीवन में एक दूसरे से फूल व् खुशबू की तरह जुड़े हैं जो कभी अलग नहीं हो सकते .हम एक दूसरे के साथ ही इस दुनिया में अस्तित्व रखते हैं और एक दूसरे के बिना इस दुनिया में हमारा कोई वजूद ही नहीं है इसलिए हमें आपसी सद्भाव को ,प्रेम को बहुत से झंझावातों से बचाए रखना है और एक दूसरे के लिए अपने जज्बातों में आपसी प्रेम सद्भावना की जोत जलाये रखना है .जैसे कि अशोक 'साहिल'जी कहते हैं -
''काबा-ओ-काशी को कुछ नजदीक लाने के लिए ,
 मैं भटकता फिर रहा हूँ पुल बनाने के लिए ,
बेझिझक मेरे लहू का कतरा कतरा खींच लो 
अपने अपने जख्म का मरहम बनाने के लिए .''
       शालिनी कौशिक 
       [कौशल]

 

गुरुवार, 27 जून 2013

फहमाइश देती ''शालिनी ''इन हुक्मरानों को ,



बेचकर ईमान को ये देश खा गए .
बरगला अवाम को ये दिन दिखा गए .
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साहिबे आलम बने घूमे हैं वतन में ,
फ़र्ज़ कैसे भूलना हमको सिखा गए .
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वीरान सबका आज कर अपना संवारे कल ,
फरेबी मेहरबान लूटकर खा गए .
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ज़म्हूरियत के निगहबान जमघट के तलबगार ,
वादों के लचर झूले में सबको झुला गए .
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फ़ालिज जुदा हो लोकतंत्र देखे टुकुर-टुकुर ,
बेबसी के आंसू उसको रुला गए .
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फिजायें तक जिस मुल्क की मुरौवत भरी ,
हवाएं भी वहां की बेरहम बना गए .
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बेताबी में हथियाने को सत्ता की ये कुर्सी ,
फ़स्ले-बहार में हमें खिज़ा थमा गए .
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फहमाइश देती ''शालिनी ''इन हुक्मरानों को ,
झुलसाएगी वो आग जिसे कल लगा गए .
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शब्दार्थ- फहमाइश -चेतावनी ,फालिज जुदा -लकवे से मारा हुआ ,मुरौवत -मानवता ,फ़स्ले-बहार -वसंत ऋतू ,हुक्मरानों -हुक्म चलने वालों ,खिज़ा-पतझड़,

    शालिनी कौशिक 

          [कौशल ]

मंगलवार, 25 जून 2013

संजय जी -कुमुद और सरस को अब तो मिलाइए.


Saraswatichandra-StarPlus.jpg
''सरस्वती चन्द्र '' संजय लीला भंसाली का यह धारावाहिक इस वक्त स्टार प्लस  व् दूरदर्शन पर प्रसारित हो रहा है और यह प्रसिद्द गुजराती उपन्यास सरस्वतीचंद्र पर आधारित है जो कि १९ वीं सदी में लिखा गया था .

Saraswatichandra (Abridged)
Cover
Front Cover of Saraswatichandra (Abridged)
Author(s)Govardhanram M. Tripathi
Original titleSaraswatichandra
TranslatorVinod Meghani
CountryIndia
LanguageGujarati
ISBN81-260-2346-5
कुमुद सुन्दरी व् सरस्वती चन्द्र व्यास की यह प्रेम कहानी आज सभी दर्शकों को बांधे हुए है .किन्तु धारावाहिक की आरंभिक पंक्ति ''मुकम्मल मोहब्बत की अधूरी दास्तान''दिल बैठा देती है .दोनों ही चरित्र बहुत ही शालीन और भारतीय संस्कृति की मान्यताओं का सम्मान करने वाले हैं किन्तु सरस्वती चन्द्र की सौतेली माँ   गुमान की साजिशें और कुमुद की बुआ के पति की प्रतिशोध की प्रवर्ति दोनों के मिलन में बाधा उपस्थित कर देते हैं.
        धारावाहिक की आरंभिक पंक्ति ने इस कदर दिल दुखाया है कि विकिपीडिया पर इसकी कहानी की खोज की जिसमे पता चला कि बहुत पहले 1968 में इस पर फिल्म भी बन चुकी है 

Saraswatichandra film 1968.jpg
Saraswatichandra (1968)
Directed byGovind Saraiya
StarringNutan
Manish
Music byKalyanji-Anandji
CinematographyNariman A. Irani
Release date(s)1968
CountryIndia
LanguageHindi
और उससे यही पता लगा कि कुमुद की शादी उत्पन्न परिस्थितियों के कारण कहीं और हो जाती है . और यही सबसे बर्दाश्त न करने वाली स्थिति है .यह उपन्यास १९ वीं सदी में लिखा गया और तब से लेकर आज की स्थिति बहुत पलट चुकी है किन्तु कहानी के विचार संकल्पना में आज तक कोई परिवर्तन नहीं किया गया आज तक थोड़े बहुत परिवेश के परिवर्तन के साथ यही दुखांत कहानी प्रस्तुत की जाती रही है . आज यदि हम भारतीय धार्मिक संदेशों की बात करें तो यही देखते हैं कि ''भगवान् किसी की सबसे प्रबल इच्छा को अवश्य पूर्ण करते हैं ''और तब से लेकर आज तक यदि यह कहानी किसी भी सत्य घटना पर आधारित है तो ये मुकम्मल मोहब्बत अवश्य भगवान का आशीर्वाद पा चुकी होगी किन्तु संजय लीला भंसाली जी को देवदास ,हम दिल दे चुके सनम जैसी फिल्मे बनाते बनाते प्यार भरे दिलों को उजाड़ने की जैसे आदत पड़ चुकी है .जो प्यार भारतीय संस्कृति की भावनाओं के विपरीत हो उसे लेकर वे ऐसा प्रयोग कर सकते हैं किन्तु क्या नहीं कर सकते वे सुखांत कुमुद सरस की प्रेम कहानी का अंत .
ये तो हुई भावुक अपील दो प्यार भरे दिलों को लेकर किन्तु यदि हम अपने आज  के सामाजिक परिवेश में बढती सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध बढती विद्रोह की प्रवर्ति को देखें तो क्या सही है इस तरह की कहानी दिखाना जहाँ बड़ी बड़ी साजिशें मात्र इसलिए रची जाती हैं कि मेरे बेटे को लक्ष्मीनंदन की संपत्ति  मिल जाये ,मेरी पत्नी ने मुझे जेल भिजवाया उसे अपनी बेटी का जीवन उजाड़कर सजा दी जाये ,मेरी शादी भले ही दूसरी हो एक इन्स्पेक्टर के शादी को रोकने की उसने कैसे कोशिश की इसलिए उसकी शादी भी रोक दी जाये और ये सब तो सफल हो जाएँ और असफल हो जाएँ वही सत्य वही अच्छाई जिसे हम हर वर्ष दशहरा के पर्व पर रावन को जले देख आत्मसात करते हैं ,असफल हो जाये वही प्यार जो एक माँ अपनी बेटी से करती है ,वह  स्नेह  जो एक बाप  अपने बेटे से -बेटी से करता है .
 
लक्ष्मी नंदन ने अपनी पत्नी का दर्जा दिया एक नाचने वाली को ये इस धारावाहिक के द्वारा यदि समाज में फैलती बुराई  के रूप में देखें तो धारावाहिक का यही रूप सही है क्योंकि यह दिखता है कि ऐसी औरत कभी अच्छी नहीं हो सकती और आगे भी ऐसा धारावाहिक उन औरतों के जो किसी मजबूरी वश  ऐसे पेशे में फंस गयी हैं पुनर्वास को रोकता है किन्तु यदि संजय लीला भंसाली जी इसमें गुमान  का ही ह्रदय परिवर्तन करा उसी से  इन दोनों के प्यार को मुकम्मल मोहब्बत की सम्पूर्ण दास्तान के रूप में स्थापित कराते हैं तो वे एक साथ हमारे समाज में बहुत से आदर्शों को जन्म दे सकते हैं .हमारे ये धारावाहिक साहित्य के ही समान समाज का आइना होते हैं किन्तु क्या हमेशा  सत्य ही दिखायेंगे फिर समाज में सुधार कैसे कर पाएंगे ?
समाज में आदर्श की स्थापना भी इस माध्यम से आसानी से की जा सकती है आज अधिकांश धारावाहिक साजिशों से भरे हैं किन्तु हर धारावाहिक इतना गहरा असर नहीं रखता जितना इस धारावाहिक का है ऐसे में संजय जी की जिम्मेदारी बढ़ जाती है और ये उन्हें निभानी भी चाहिए यदि वे इस धारावाहिक में गुमान के माध्यम से ही कुमुद को सरस से मिलाते  हैं  तो एक तो सौतेली माँ को लेकर कुछ मिथक जो लगभग  सच्चाई का रूप ले चुके हैं टूट सकते हैं ,दूसरे आज की बहुत सी मजबूरीवश ऐसे धंधे में फंसी नारियों के पुनर्वास  की संभावनाएं बढती हैं और तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य वह यह कि परिवार द्वारा तय की गयी शादियाँ जो हमारे समाज में होती आई हैं दो अंजान व्यक्तियों को प्रेम के बंधन में बांध सकती हैं ,इस धारणा को बलवती बनाती हैं.

Gautam Rode.jpg
इस कारण और सरस कुमुद के चरित्रों के जन भावनाओं से जुड़े होने के कारण संजय लीला भंसाली जी से अनुरोध है कि कुमुद और सरस के प्यार को अंधकार में न खोने दें बल्कि इसे हमारी आने वाली पीढ़ियों  में इस सन्देश को आत्मसात करने का माध्यम बनाये कि परिवार से जुड़कर और उसकी भावनाओं का सम्मान कर भी अपने जीवन में अपना मनचाहा पाया जा सकता है .इसलिए आज तक भले ही इस उपन्यास का पूर्णरूप से अनुसरण किया गया हो अब परिवर्तन चाहिए संजय जी -कुमुद और सरस को अब तो मिलाइए.
                                       शालिनी कौशिक 
                                              [कौशल ] 

सोमवार, 24 जून 2013

मोदी व् मीडिया -उत्तराखंड त्रासदी से भी बड़ी आपदा

पिलाकर गिराना नहीं कोई मुश्किल ,
गिरे को उठाये वो कोई नहीं है .
ज़माने ने हमको दिए जख्म इतने ,
जो मरहम लगाये वो कोई नहीं है .
  हरबंस सिंह ''निर्मल'' जी के यही शब्द आज दोहराने को मन करता है .उत्तराखंड में इतनी बड़ी त्रासदी कि स्वयं मीडिया को आरम्भ में कोई सही अनुमान  नहीं था कि कितने लोग फंसे हैं या हमारे बीच में अब नहीं रहे हैं दैनिक जागरण के मुख्य पृष्ठ पर २२ जून को समाचार का शीर्षक था कि ''संकट में ६० हज़ार जिंदगियां ''और देखिये किस कदर हावी है राजनीति हमारे मीडिया पर कि ऐसे में भी उसी पृष्ठ  पर समाचार देता है ''कौंग्रेस को न बहा ले जाये उत्तराखंड सैलाब ''क्यों नहीं लिखता कि ''जागिये भारतवासियों कहीं वहां के लोगों पर गुजरती आपदा  न बहा ले जाये हमारे देश में बसा सद्भाव ''   
    एक तरफ जिदंगी मौत से जूझ रही थी और दूसरी तरफ दुकानदार उन्हें १० रूपए का बिस्कुट का पैकिट १०० में बेच रहे थे ,पायलट विमान में बैठने के पैसे मांग रहा था ५०००० /-और यही नहीं नेपाली लूट रहे थे जिन्दा महिलाओं के जेवर  हाथ  काट  कर .
और हमारा मीडिया देख रहा था कि किस तरह इस आपदा का ठीकरा कौंग्रेस के माथे फोड़ा जाये नहीं देख रहा था कि ये समय मदद का है और वे मोदी जो आज देश में जबरदस्ती प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार घोषित किये जा रहे हैं और देश के सबसे समृद्ध राज्य के स्वामी बने हुए हैं ऐसे में देते हैं कुल २ करोड़ रूपए की मदद और देखते हैं जाकर आपदा  में फंसे केवल गुजराती लोगों को  और उस पर तुर्रा ये कि वे वहां से अपने गुजराती भाइयों को बचा ले गए और वह भी एक दो नहीं १५,००० को कमाल  है अगर वे इतने लोगों को बचा सकते थे तो उन्होंने क्यों सरकार से यह पेशकश नहीं की कि मैं सभी को बचा लूंगा और मेरे आगे सेना क्या  है जो कि रोज कुछ ही लोगों को बचा पा रही है कमाल है उन्हें वहां भी बस गुजराती ही दिखाए दिए क्या चुनाव पश्चात् वहीँ के नागरिकों को जीने देंगे या कहीं और भी जीवन का संचार करने का इरादा है यदि अभी खोल दें अपने इरादे तो आपके इधर के जो दो चार समर्थक हैं अपना रास्ता अभी नाप लेंगे . 
कॉंग्रेस को केदारनाथ दुर्घटना मे फसे लोगो से भी ज्यादा दान की रक्कम की पड़ी है ये कौनसी राजनीति है ? .... मोदी ने तो नहीं खेली ऐसी राजनीति ...मोदी जी तो 15000 गुजराती लोगो को बचाकर चले भी गए  ''
'
अब देखिये ये हैं सच्चाई ब्लॉग पर लिखने वाले तुलसी जी जिनका ब्लॉग लेखन मात्र गाँधी परिवार की बुराई लिखने में ही देश का कल्याण देखता है और ये भी मोदी की ही जय-जयकार करते हुए नहीं सोचते कि आज जो सर्वाधिक धन्यवाद्  के पात्र हैं उनका आभार व्यक्त न करके वे मोदी को उनसे ऊपर दर्जा दे रहे हैं  जो केवल गुजरात गुजरात ही रटते रहते हैं ''साथ ही दान की रकम की सार्थकता आज यही है कि जो इस काम को करने में सक्षम हैं उनके कामों में कोई आर्थिक बाधा उनके बढ़ते क़दमों को न रोक दे और क्या मोदी का इसमें २ करोड़ से ज्यादा योगदान की हैसियत नहीं थी हो सकता है क्योंकि उन्हें अपने प्रचार के लिए शायद हमारे उन आपदा पीड़ितों से ज्यादा धन की आवश्यकता  है फिर उन्हें वोट चाहियें जो आजकल बहुत कम ही लोकप्रियता के बल पर मिलते हैं और फिर किसी की ऐसी लोकप्रियता हो भी कि उसे नोट न खरचने पडें फिर हमारे फौजी आज जिस पुनीत काम में लगें हैं उस वे अपना फ़र्ज़ मानते हैं न कि वोट बटोरने की राजनीति बस दुःख केवल ये है कि हमारे मीडिया व् मोदी जी उनके काम नकारकर अपने को भगवान्  का दर्जा दिलवाने में लगे हैं 

जंगलों में फंसे 500 लोग अब भी कर रहे मदद का इंतजार


उत्तराखंड में 48 घंटे में बचानी है 50 हजार जिंदगियां!  



एक तरफ ५०० लोग जंगल में फंसे हैं ,एक तरफ ४८ घंटे में बचानी हैं ५०००० हज़ार जिंदगियां और मोदी भाग गए केवल अपने गुजरातियों को बचाकर ,पता नहीं कब वे देश के बारे  में और देशवासियों  के बारे  में सोचेंगे  जो कहते हैं कि देश  माँ  है फिर क्या हम  सभी उनके उसी माँ  की औलाद  नहीं क्या उनके भाई बहन नहीं फिर वे हर जगह गुजरातियों की ही क्यों तरफदारी करते हैं और उनके अनुसार वे १५००० को बचा कर ले गए जबकि हमरे फौजी जिन्हें देवदूत का दर्जा दिया जा रहा है वे कभी १६ लोगों को बचाते हैं कभी ५८१ को कभी १९४ को और यही नहीं इसके लिए वायु सेना अपने इतिहास का सबसे बड़ा ऑपरेशन करती है जबकि मोदी ऐसे ही सब कर लेते हैं तो क्यूं सेना का समय यहाँ बर्बाद किया जा रहा है सेना पर देश की और भी जिम्मेदारियां हैं .मेरा भारत सरकार से अनुरोध है कि वे सेना को तुरंत  वहां से हटाकर बगैर हिचक के मोदी की सहायता लें मोदी देशभक्त हैं और देश पर अपने परिवार प्रेम को  भी कुरबान कर चुके हैं ऐसे में वे भगवान का दर्जा रखते हैं और जब भगवान धरती पर हों तब उनके दूतों की कोई आवश्यकता नहीं .
modi attacks on congress uttrakhand flood and rescue operation
उत्‍तराखंड में राहत और बचाव कार्य के लिए सेना की मध्य कमान ऑपरेशन 'सूर्या होप' चला रही है। शनिवार को लखनऊ में कमांडिंग इन चीफ अनिल चैत ने ऑपरेशन की जानकारी दी।
 rescue operation of army and itbp in flood hit uttarakhandfloods and disaster in uttarakhandsurvivers get help   
आज मोदी और मीडिया ने ये साबित कर दिया है कि हमारे दिलों से आपसी प्यार सद्भावना  ख़त्म हो चुकी है केवल स्वार्थ हावी हो चुका है जो ऐसे में हमें आम आदमी की पीड़ा को नहीं देखने देती देखने देती है तो मात्र सत्ता हित ,राजनीति देखती है तो मात्र ये कि राहुल गाँधी घोड़े पर गायब क्यूं क्या देश से वोट मांगने  वाले इस व्यक्ति का दायित्व नहीं कि वह पहले वहां  से सभी अपनों की सकुशल वापसी के लिए जो कर सकते हैं करें उनका अपने चुनावी अभियान  का आरंभ करना किसी को नहीं दिखता, दिखता  है तो केवल राहुल गाँधी का आपदा के समय बाहर  होना,क्या इस आपदा को भी उनके माथे मढ़ा जायेगा क्या दैव  को भी उनके हाथ में उसी तरह कहा जायेगा जैसे सभी हत्याओं में इंदिरा  ,सोनिया का नाम जोड़ दिया जाता है .
   आज यदि मोदी जी को देश से जरा मात्र भी प्रेम है तो उन्हें चक दे इंडिया के नायक कबीर खान से प्रेरणा लेनी होगी जो टीम को एक करने के लिए उन्हें राज्य से अलग देश से जुड़ने को प्रेरित करता है .

                               Chak De! India.jpg   

नहीं तो उनके बारे में और हमारे मीडिया के बारे में हमें यही कहना होगा कि वे तो इस त्रासदी से भी बड़ी आपदा है और जिनसे निबटने के लिए सेना भी नाकाफी है .  सत्यपाल ''अश्क  ''जी के शब्दों में आज उनके लिए यही कहना होगा -
''मांग कर वो घर से मेरे और क्या ले जायेगा ,
होगा जो उसके मुकद्दर का लिखा ले जायेगा ,
रास्ते ने मंजिलों तक और भी भटका दिया 
सोचते थे मंजिलों तक रास्ता ले जायेगा .''
             शालिनी कौशिक 
                        [कौशल ]

रविवार, 23 जून 2013

पाखंडों का अजगर घूमे ,अपना मुख फैलाकर .

As members prepare for the grand inauguration, ceremonies will take place including various blessings of the temple.

तौबा करते धर्मस्थल में ,भक्त यूँ भीड़ बढाकर ,
पाप काटते रोज़ चढ़ावा ,ज्यादा खूब चढ़ाकर .

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सारे साल है मारे बच्चे ,रखे खूब कमाकर ,
दाई कराये तीर्थ यात्रा बस में लोग बैठाकर .

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खाली हाथ ही जाना मुझको ,बोले ये चिल्लाकर ,
पैसे बीमे के वे खाता ,लोग जो जाएँ जमाकर .

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देता दावत नेताओं को ,बाप का धन लुटाकर ,
विधवा माँ को सबके आगे ,पागल बड़ी दिखाकर .

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इस दुनिया में जिधर भी देखो ,अपनी आँख घुमाकर,
पाखंडों का अजगर घूमे ,अपना मुख फैलाकर .

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                      शालिनी कौशिक 
                          [कौशल ]

शुक्रवार, 21 जून 2013

गरजकर ऐसे आदिल ने ,हमें गुस्सा दिखाया है .



A Hindu devotee tries to take a holy dip in the flooded waters of river Ganges in the northern Indian town of Haridwar
गरजकर ऐसे आदिल ने ,हमें गुस्सा दिखाया है .
 
ख़ुदा ने आज़माया है ,अज़ाब हम पर आया है .
किया अजहद ज़ुल्म हमने ,अदम ने ये बताया है .


कस्साबी नारी सहे ,मुहं सी आदमजाद  की .
इन्तहां ज़ुल्मों की उसपर ,उफान माँ का लाया है .


करे खिलवाड़ कुदरत से ,आज के इन्सां बेखटके ,
खेल अपना दिखा रब ने ,कहकहा यूँ लगाया है .


गेंहू के संग में है पिसती ,सदा घुन ही ये बेचारी ,
किसी की कारस्तानी का ,किसी को फल चखाया है .


लूटकर बन्दों को उसके ,खजाने अपने हैं भरते ,
सभी को जाना है खाली ,काहे इतना जुटाया है .


खबीस काम कर-करके ,खरा करने मुकद्दर को ,
पहुंचना रब की चौखट पर ,बवंडर ये मचाया है .


कुफ्र का बढ़ना आदम में ,समझना खिलक़त से बढ़कर ,
चूर करने को मदहोशी ,सबक ऐसे सिखाया है .


गज़ब पड़ना अजगैबी का ,हदें टूटी बर्दाश्त की ,
गरजकर ऐसे आदिल ने ,हमें गुस्सा दिखाया है .


समझ लें आज कबीले ,सहमकर कहती ''शालिनी '',
गालिबन ये हमारी ही ,करम रेखों का साया है .


शब्दार्थ-अजगैबी-दैवी ,अजहद-बहुत ,आज़माना -परीक्षा लेना ,अज़ाब-पाप के बदले में मिलने वाला फल ,अदम-परलोक,काहे -किसलिए ,उफान-उबाल,आदमजाद-आदमी,आदिल-इंसाफ करने वाला ,कस्साबी-कसाई का काम ,कुफ्र-नास्तिकता ,खबीस-नापाक,खरा -निष्कपट,गज़ब पड़ना -अचानक भरी संकट पड़ना ,गालिबन-सम्भावना है कि,करम रेख-भाग्य में लिखी हुई बात .

     शालिनी कौशिक 
             [कौशल]



कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

orange rosesbouquet of spring roses 1


   न बदल पायेगा तकदीर तेरी कोई और ,
      तेरे हाथों में ही बसती है तेरी किस्मत की डोर ,
   अगर चाहेगा तो पहुंचेगा तू बुलंदी पर 
      तेरे जीवन में भी आएगा तरक्की का एक दौर .


तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने ,
    दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी .
 जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत ,
      कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .


तकदीर बनाने के लिए सुनले मेहरबां,
     दिल में जीतने का हमें जज्बा चाहिए .
छूनी है अगर आगे बढ़के तुझको बुलंदी 
      क़दमों में तेरे जोश और उल्लास चाहिए .



मायूस होके रुकने से कुछ होगा न हासिल ,
    उम्मीद के चिराग दिल में जलने चाहियें .
चूमेगी कामयाबी आके माथे को तेरे 
     बस इंतजार करने का कुछ सब्र चाहिए .


क्या देखता है बार-बार हाथों को तू अपने ,
   रेखाओं में नहीं बसती है तकदीर किसी की .
गर करनी है हासिल तुझे जीवन में बुलंदी 
   मज़बूत इरादों को बना पथ का तू साथी .

             शालिनी कौशिक 

                    [कौशल]

गुरुवार, 20 जून 2013

ये है मर्द की हकीकत


Hand writing I Love Me with red marker on transparent wipe board. - stock photoSelfish business man not giving information to others.Mad expression on his face.White background. - stock photoScale favoring self interest rather than personal values. - stock vector   
ये है मर्द की हकीकत 
''प्रमोशन के लिए बीवी को करता था अफसरों को पेश .''समाचार पढ़ा ,पढ़ते ही दिल और दिमाग विषाद और क्रोध से भर गया .जहाँ पत्नी का किसी और पुरुष से जरा सा मुस्कुराकर बात करना ही पति के ह्रदय में ज्वाला सी भर देता है क्या वहां इस तरह की घटना पर यकीन किया जा सकता है ?किन्तु चाहे अनचाहे यकीन करना पड़ता है क्योंकि यह कोई पहली घटना नहीं है अपितु सदियों से ये घटनाएँ पुरुष के चरित्र के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती रही हैं .स्वार्थ और पुरुष चोली दामन के साथी कहें जा सकते हैं और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए पुरुषों ने नारी का नीचता की हद तक इस्तेमाल किया है .
       सेना में प्रमोशन के लिए ये हथकंडे पुरानी बात हैं किन्तु अब आये दिन अपने आस पास के वातावरण में ये सच्चाई दिख ही जाती है .पत्नी के माध्यम से पुलिस अफसरों से मेल-जोल ये कहकर-
''कि थानेदार साहब मेरी पत्नी आपसे मिलना चाहती है .''
नेताओं से दोस्ती ये कहकर कि -
''मेरी बेटी से मिलिए .''
तो घिनौने कृत्य तो सबकी नज़र में हैं ही साथ ही बेटी बेचकर पैसा कमाना भी दम्भी पुरुषों का ही कारनामा है .बेटी को शादी के बाद मायके ले आना और वापस ससुराल न भेजना जबकि उसे वहां कोई दिक्कत नहीं संशय उतपन्न करने को काफी है और उस पर पति का यह आक्षेप कि ये अपनी बेटी को कहीं बेचना चाहते हैं जबकि मैने इनके कहने पर अपने घर से अलग घर भी ले लिया था तब भी ये अपनी बेटी को नहीं भेज रहे हैं ,इसी संशय को संपुष्ट करता है .ये कारनामा हमारी कई फिल्मे दिखा भी चुकी हैं तेजाब फिल्म में अनुपम खेर एक ऐसे ही बाप की भूमिका निभा रहे हैं जो अपनी बेटी का किसी से सौदा करता है .
    जो पुरुष स्त्री को संपत्ति में हिस्सा देना ही नहीं चाहता आज वही स्टाम्प शुल्क में कमी को लेकर संपत्ति पत्नी के नाम खरीद रहा है पता है कि मेरे कब्जे में रह रही यह अबला नारी मेरे खिलाफ नहीं जा सकती तो जहाँ पैसे बचा सकता हूँ क्यूं न बचाऊँ ,इस तरफ सरकारी नारी सशक्तिकरण को चूना लगा रहा है . जिसके घर में पत्नी बेटी की हैसियत  गूंगी गुडिया से अधिक नहीं होती वही सीटों के आरक्षण के कारन स्थानीय सत्ता में अपना वजूद कायम रखने के लिए पत्नी को उम्मीदवार बना रहा है .जिस पुरुष के दंभ को मात्र इतने से कि ,पत्नी की कमाई खा रहा है ,गहरी चोट लगती है ,वह स्वयं को -
''जी मैं  उन्ही  का पति हूँ जो यहाँ  चैयरमेन के पद  के लिए खड़ी हुई थी ,''
  या फिर अख़बारों में स्वयं के फोटो के नीचे अपने नाम के साथ सभासद  पति लिखवाते शर्म का लेशमात्र भी नहीं छूता .
   पुरुष के लिए नारी मात्र एक जायदाद की हैसियत रखती है और वह उसके माध्यम से अपने जिन जिन स्वार्थों की पूर्ति कर सकता है ,करता है .सरकारी योजनाओं के पैसे खाने के लिए अपने रहते पत्नी को ''विधवा ''तक लिखवाने  इसे गुरेज नहीं .संपत्ति मामले सुलझाने के लिए घोर परंपरावादी माहौल में पत्नी को आगे बढ़ा बात करवाने में शर्म नहीं .बीवी के किसी और के साथ घर से बार बार भाग जाने पर जो व्यक्ति पुलिस में रिपोर्ट लिखवाता फिरता है वही उसके लौट आने पर भी उसे रखता है और उसे कोई शक भी नहीं होता क्योंकि वह तो पहले से ही जानता है कि  वह घर से भागी है बल्कि उसके घर आने पर उसे और अधिक खुश रखने के प्रयत्न करता है वह भी केवल यूँ कि अपने जिस काम से वह कमाई कर रही है वह दूसरों के हाथों में क्यों दे ,मुझे दे ,मेरे लिए करे ,मेरी रोटी माध्यम बने . 
    पुरुष की एक सच्चाई यह भी है .कहने को तो यह कहा जायेगा कि ये बहुत ही निम्न ,प्रगति से कोसों दूर जनजातियों में ही होता है जबकि ऐसा नहीं है .ऑनर किलिंग जैसे मुद्दे उन्ही जातियों में ज्यादा दिखाई देंगे क्योंकि आज के बहुत से माडर्न परिवारों ने इसे आधुनिकता की दिशा में बढ़ते क़दमों के रूप में स्वीकार कर लिया है किन्तु वे लोग अभी इस प्रवर्ति को स्वीकारने में सहज नहीं होते और इसलिए उन्हें गिरा हुआ साबित कर दिया जाता है क्योंकि वे आधुनिकता की इन प्रवर्तियों को गन्दी मानते हैं किन्तु यहाँ मैं जिस पुरुष की बात कह रही हूँ वे आज के सभ्यों में शामिल हैं ,हाथ जोड़कर नमस्कार करना ,स्वयं का सभ्य स्वरुप बना कर रखना शालीन ,शाही कपडे पहनना और जितने भी स्वांग  रच वे स्वयं को आज की हाई सोसाइटी का साबित कर सकते हैं करते हैं ,किन्तु इस सबके पीछे का सच ये है कि वे शानो-शौकत बनाये रखने के लिए अपनी पत्नी को आगे कर दूसरे पुरुषों को लूटने का काम करते हैं .इसलिए ये भी है आज के मर्द की एक हकीकत .
                    शालिनी कौशिक 
                        [कौशल ]

बुधवार, 19 जून 2013

यू.पी.की डबल ग्रुप बिजली

Birds On The Wire Stock Photo - 1293150Birds On The Wire Stock Photography - 1293152 
लगे हुए थे एक माह से ,हिन्दू मुस्लिम भाई ,
थम गया था जीवन सारा ,चौपट हुई कमाई .


मना रहे थे अफसरों को ,देकर दूध मलाई ,
नेताओं ने भी आकर ,पीठ थी थपथपाई .


बिलबिलाते गर्मी से ,छत पर खाट जमाई,
पंखा झलते-झलते रहते ,नींद न फिर भी आई .


धरने करते नारे गाते ,बिछा के जब चटाई,
सीधी बातों से न माने ,तब की खूब पिटाई .


लातों के इन भूतों के ,तब बात समझ में आई ,
बिजली आने की परमिशन ,ऊपर से दिलवाई .


बजे नगाड़े ढोल तमाशे ,सबने खाई मिठाई ,
गले मिले और हाथ मिलकर ,दी गयी खूब बधाई .


डबल ग्रुप से ऐसी बिजली,देख के शामत आई ,
न चमकी दिन में आकर,न रात को पड़ी दिखाई .


                 शालिनी कौशिक 
                          [कौशल]

मंगलवार, 18 जून 2013

जनता की पहली पसंद -कौंग्रेस

 आज सुबह का दैनिक जागरण देखा .अन्य समाचार जहाँ देश में जगह जगह हुई भयावह घटनाओं के बारे में बता रहे थे वहीँ एक खबर दिल को सुकून दे रही थी कि पूरी तरह पतंनोंमुख भारतीय राजनीती  में अभी भी आशा की किरण हैं इस देश के लिए ''कौंग्रेस के बूते ''
      कलीम देहलवी ने कहा है -
     ''हमारा फ़र्ज़ है रोशन करें चरागे वफ़ा ,
       हमारे अपने मवाफिक हवा मिले न मिले .''
   और इसी भावना को साबित करती है आज के समाचार पत्र में प्रकशित माननीय प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह जी की यह टिप्पणी -

राहुल गांधी मेरी जगह लेते हैं, तो मुझे बेहद खुशी होगी'
एक ओर जहाँ भारतीय जनता पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए जूझती नज़र आ रही है और उसके वरिष्ठ से वरिष्ठ नेता अपने आचरण से हिंदूवादी पार्टी व् इसके समर्थकों का सर झुकाते नज़र आ रहे हैं वहीँ कौंग्रेस ,जो इस वक़्त एक लम्बे समय से सत्ता में जमी होने के कारण आलोचनाओं का शिकार है  ,अपने गरिमामय आचरण से देश का व् अपने समर्थकों का गौरव बढ़ा रही है .
     भाजपा के लाल कृष्ण अडवाणी ने अभी फ़िलहाल तो मोदी को चुनावी कमान सौंपे जाने को लेकर सत्ता के गलियारों में जो नौटंकी की उसने भाजपाइयों के चेहरों पर हवाइयां उड़ा दी

The race for prime minister
The race for prime minister
      उनका ये आचरण तो निंदनीय था ही किन्तु मोदी जिन्हें इस वक़्त सबसे लोकप्रिय नेता ,चमत्कारी  नेता ,सबसे सफल मुख्यमंत्री जैसे विशेषणों से नवाज़ा जा रहा है का आचरण क्या कहा जायेगा ?मुझे पता है सब यही कहेंगे -
''हम कुछ नहीं बोलेगा क्योंकि हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है ''
    मोदी का यह आचरण बहुत कटु निंदा का भागी होना चाहिए कि अपने कारण वे बबाल होते देखते रहे किन्तु अपने लिए यह नहीं कहा गया कि 
    यह मेरा दल ही नहीं मेरा घर है और मैं इसकी निस्वार्थ बिना किसी पद के सेवा करूंगा .''
यही नहीं उनका घमंड १७ साल का गठबंधन लेके डूब गया और उनके माथे पर शिकन तक नहीं आई .ये है भाजपा जहाँ हर कोई प्रधानमंत्री पद के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है भले ही आँगन में दीवार खड़ी हो जाये या बरसों का साँझा चूल्हा चौका अलग हो जाये .
    सिर्फ यही नहीं अन्य भी महानुभाव हैं इस लाइन में -
*मायावती-प्रधानमंत्री बनने को तैयार .
*मुलायम सिंह -यू.पी.के मुख्यमंत्री पद को भी एक ओर कर इस लाइन में जुड़े हैं .
*आज़म खान -मैं हूँ वजीरे आज़म .
    शायद ऐसे ही नेताओं को दृष्टि में रखते हुए कहा है -
''भ्रष्ट राजनीति हुई ,चौपट हुआ समाज .
हर वानर को चाहिए ,किष्किन्धा का राज .''
  ऐसे में कौंग्रेस प्रशंसा की हक़दार है .प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही नहीं उनकी पार्टी में कई ऐसे नेता हैं जो यह आदर्श प्रस्तुत करते रहते हैं इनमे सबसे ऊँचा स्थान है यू.पी.ए.अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी जी का जिन्होंने पर्याप्त बहुमत ,जनसमर्थन होते हुए मात्र कुछ दंगों पे उतारू नेताओ को जनता का अहित करने को रोकने के लिए देश के सबसे महत्वपूर्ण पद को माथे से लगाकर ठुकरा  दिया .

Rahul Gandhi.JPG

Wrong to ask me about prime ministership: Rahul Gandhi
 और यही नहीं राहुल गाँधी भी इस पद की ओर बढ़ते अपने क़दमों को बखुशी रोक लेते  हैं मात्र उन लालची नेताओं के कारण जिन्हें  सत्ता अपने प्राणों से भी ज्यादा प्रिय है और जिनके लिए सत्ता मात्र उनके घर की गुलामी के लिए ही बनी है .करूणानिधि जी जिन्हें गठबंधन में अपने तीन तीन बीवियों के बच्चों के लिए पद की लालसा यहाँ ले आती ई और राहुल इन जैसे नेताओं के देश को तहस नहस करने के मंसूबों को ख़त्म करने के लिए और यहाँ स्थिरता बनाये रखने के लिए इन्ही को ये पद लेने देते हैं और तमाम बुद्धिजीवियों को अपने को 'अमूल बच्चा ''कहने देते  हैं जबकि ये उनकी अपने देश को प्यार करने की और इस उम्र में उन अनुभवों को धारण करने की शक्ति है जो हमारे यहाँ के बड़े से बड़े बुजुर्ग व् ढाढ़ी रखने वाले  नेताओं के पास भी नहीं है .
    और यही नहीं कौंग्रेस के अन्य नेता भी इसी राह पर चलते हैं और किसी भी पद को सहज भाव से ठुकरा कर संगठन से जुड़े रहते हैं .अजय माकन इस लिस्ट में सबसे नया नाम हैं .
      और यही वजह है कि भावनाओं की कद्र करने वाली जनता कौंग्रेस को ही सबसे ज्यादा प्यार करती है और अपने खुराफाती दिमागों से जनता की बुद्धि फेरने में लगे उन सभी नेताओं को हाशिये पर डाल देती है जिनका मकसद केवल सत्ता हासिल करना ही है भले ही उसके लिए उन्हें जनता को दंगों की आग में झौंकना पड़े ,जहरीले शीतल पेयों को हरी झंडी दिखानी पड़े ,जनता की लाश पर जन्मदिन मनाना पड़े या फिर रामपुर तिराहा जैसे कांड करने पड़ें .
    हंस की भांति नीर-क्षीर-विवेक रखने वाली भारतीय जनता अपने हितेषियों को पहचानती है और उससे प्रेम करती है .यही प्रेम है जिसके दम पर कौंग्रेस सरकार बनती है और आगे भी सत्ता में सेंध लगाने में जुटे विरोधी दलों पर डी.डी . टी.छिड़ककर प्रधानमंत्री जी के मुहं से कहलवाती है -
''तीसरी बार भी संप्रंग की सरकार बनेगी .''
   और इस सबके पीछे वजह है कौंग्रेस के पास ऐसे ईमानदार ,अनुभवी जनता के हितेषी नेताओं का होना जिनके लिए जनता अपने परिवार का दर्जा रखती है न कि मात्र वोट का और इसलिए जनता का प्यार इन्हें मिलता है और मिलता रहेगा क्योंकि कुंवर बैचैन ने भी कहा है -
    ''तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी ,
    किसी के पाँव से कांटा निकल कर देखो .
               शालिनी कौशिक
                     [कौशल]

    

रविवार, 16 जून 2013

बघंबर पहनकर आये ,असल में ये हैं सौदागर .


If Narendra Modi and Rahul Gandhi are all we get as options for prime minister, any other leader from the yet to be formed Third Front for the top job is not unwelcome at all. Neither the Congress-it\'s still cagey about its choice-nor the BJP-it has more or less decided on Modi-present us with a choice that is difficult to resist.

Neither Modi nor Rahul fit into the definition of a leader of a country with huge complexities. The latter is still discovering and making sense of India and the former firmly believes that India is an extension of Gujarat and all intricate problems confronting India, be it the area of economy or foreign affairs, render themselves to simplistic solutions. Both pretend to be outsiders impatient with the state of the polity. Both want to be the agent of the great change, but neither the powerful articulation of Modi nor the indecipherable silence of Rahul really tell us whether they are good enough for the task.
 Gandhinagar: Gujarat Chief Minister Narendra Modi today announced a nation-wide campaign to collect small pieces of iron from farmers for using it to build the proposed \'Statue of Unity\' in the memory of Sardar Vallabhbhai Patel.
 
On the day of Sardar Patel\'s birth anniversary on 31 October 2013, we will launch a nation-wide campaign, covering more than five lakh villages throughout the country to collect small pieces of iron of any tool used by farmers from each village, that will be used in the building the statue, Modi said in Gandhinagar before his inaugural address at the all India conference on livestock and dairy development 
बजरिये बख्शीश-ए-लोहा ,सोयी जनता जगायेंगे .
फिर एक नयी इबारत गढ़ ,साथ सबको ले आयेंगे .


भले ही दृढ इरादों ने ,उन्हें लौह-पुरुष बनाया था ,
ढालकर उनको मूरत में ,लोहा तो ये दिलवाएंगे .


मिटटी के लौंदे में लिपटे ,वे तो साधारण मानव थे .
महज़ लोहमय शख्सियत को ,लोहसार ये बनायेंगे .


मुखालिफ ने लगायी थी ,शहर में खुद की ही मूरत .
उसने खुद दम पर था खाया ,ये दूजे का खा जायेंगे .


उड़ायें ये मखौल उनके ,जो बनके लग गए हैं मूरत .
भला खुद बनवाये बुत की ,हंसी को रोक पाएंगे .


न खाने को हैं दो रोटी ,न तन ढकने को हैं कपडे .
ऐसे में इन इरादों से ,क्या जीवन ये दे पाएंगे .


फैलसूफी  में अपनी ये ,रहनुमा बनने आये हैं .
राहजनी खुलेआम करके ,उड़नछू ये हो जायेंगे .


रियाया अपनी समझकर ,रियायत ऐसे करते हैं .
साँस की एवज में लोहा ,ये सबसे लेकर जायेंगे .


बघंबर पहनकर आये ,असल में ये हैं सौदागर .
''शालिनी''ही नहीं इनको ,सभी पहचान जायेंगे .

शब्दार्थ:-बजरिये-के द्वारा ,बख्शीस-दान,लोहसार -फौलाद,इस्पात ,फैलसूफी-धूर्तता ,रियाया -प्रजा ,रियायत-मेहरबानी ,बघंबर-बाघ की खाल

   शालिनी कौशिक
           [कौशल] .

शुक्रवार, 14 जून 2013

मगरमच्छ कितने पानी में ,संग सबके देखें हम भी .


सन्दर्भ :-17 साल पुराने जदयू-भाजपा गठजोड़ में अलगाव तय 

Modi vs Nitish?

           मोदी और नीतीश

     कितने दूर कितने पास   


तोहमतें लगनी हों तो लगती रहें ,तुनक मिज़ाजी दिखाएंगें हम भी .
है जुदाई अगर उनकी किस्मत में ,बखुशी दूर जायेंगे हम भी .



हम न करते हैं बात मज़हब की ,अपने ख्वाबों में महज़ कुर्सी है .
अपना हीरा क़ुबूल उनको नहीं ,उनके सौदे से दूर हैं हम भी .


बात बिगड़ी थी अभी थोड़ी सी ,धीरे धीरे संभल ही जाएगी .
बात मानी अगर यूँ गैरों की ,क्या पता दूर जा गिरें हम भी .


बगावत नहीं हैं कर सकते ,हमारी भी है मजबूरी .
नहीं मुहं खोलेंगे अपना ,कसम अब खाते हैं हम भी .


सियासत करनी है हमको ,नहीं थियेटर चलाना है .
बिताने को जहाँ दो पल ,देख कुछ लेते थे हम भी .


आज जिसकी रेटिंग ज्यादा ,सभी उसके पीछे भागें .
लगाकर पूरे दम ख़म को ,भागते फिर रहे हम भी .


''शालिनी''की नहीं केवल ,ये पूरे भारत की मंशा .
मगरमच्छ कितने पानी में ,संग सबके देखें हम भी .


शब्दार्थ :तुनक मिज़ाजी-चिडचिडापन ,बखुशी-प्रसन्नतापूर्वक .

शालिनी कौशिक 

     

गुरुवार, 13 जून 2013

सब पाखंड घोर पाखंड मात्र पाखंड

सब पाखंड 
घोर पाखंड  
मात्र पाखंड 
Mature indian woman namaste greeting -

भाईसाहब नमस्कार 
कह रही थी मैडम ,
हाथ जोड़कर 
और भाईसाहब 
सिर घमंड से उठाकर 
स्वीकार कर रहे थे .
head swami Naimisharanya ashram 2011 from The Three Lives of Panditji 
पंडित जी ! प्रणाम 
कह रहा था भक्त ,
और पंडित जी 
गर्दन हिलाकर 
हाथ उठाकर 
भगवान बन रहे थे .
bride
मम्मी जी पाय लागूं ,
कह बहु झुकी 
सास के पैर छूने ,
पर घुटनों को ही 
हाथ लगाकर 
अपने कमरे में 
चली गयी .


दोनों हाथ मिलाकर 
सिर झुकाकर 
खद्दरधारी नेता 
मुख पर मुस्कान 
बिखेर एक दूसरे का 
अभिवादन कर रहे थे .


और झलक रहा था 
सभी तरफ से 
वो पाखंड 
जो छिपाए नहीं छिपता .


भाईसाहब जिन्हें       
नमस्कार किया
 जा रहा था बढ़-चढ़कर   
घर आने पर 
चाय बनाने से इंकार कर . 



पंडित जी को प्रणाम 
पर दान के समय  
सस्ते से सस्ते खरीदकर 
और पंडित जी का 
पैसे वाले को बड़ा 
आशीर्वाद देकर .


बहू का सास 
के खाने से 
मिष्ठान को हटाकर 


नेताओं का
 पीठ पीछे 
छुरा घोंपकर 


सभी से 
एक ही सत्य 
था उजागर 
सब पाखंड 
घोर पाखंड  
मात्र पाखंड .



              शालिनी कौशिक 
                           [कौशल ]



बुधवार, 12 जून 2013

रुखसार-ए-सत्ता ने तुम्हें बीमार किया है .



 ये राहें तुम्हें कभी तन्हा न मिलेंगीं ,
तुमने इन्हें फरेबों से गुलज़ार किया है .


ताजिंदगी करते रहे हम खिदमतें जिनकी ,
फरफंद से अपने हमें बेजार किया है .


कायम थी सल्तनत कभी इस घर में हमारी ,

मुख़्तार बना तुमको खुद लाचार किया है .


करते कभी खुशामदें तुम बैठ हमारी ,
हमने ही तुम्हें सिर पे यूँ सवार किया है .


एहसान फरामोश नहीं हम तेरे जैसे ,

बनेंगे हमसफ़र तेरे इकरार किया है .


गुर्ग आशनाई से भरे भले रहें हो संग ,
रुखसार-ए-सत्ता ने तुम्हें बीमार किया है .


फबती उड़ाए ''शालिनी''करतूतों पर इनकी ,
हमदर्दों को मुखौटों ने बेकार किया है .

शब्दार्थ ;गुलज़ार-चहल-पहल वाला ,ताजिंदगी-आजीवन ,गुर्ग आशनाई   -कपटपूर्ण मित्रता ,फबती उड़ाए -चुटकी लेना .

शालिनी कौशिक 

      [कौशल]



सोमवार, 10 जून 2013

जो बोया वही काट रहे आडवानी


advani resigns from all prime posts of bjp, rajnath reject 
''आज माना कि इक्तदार में हो ,हुक्मरानी के तुम खुमार में हो ,
ये भी मुमकिन है वक़्त ले करवट ,पाँव ऊपर हों सर तगार में हो .''
    कुछ साल पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी जी को बीमार बताकर नेपथ्य में जाने को अडवाणी जी ने अपने गुट के साथ मिलकर विवश किया था तब अटल जी के मन में यही विचार उभरे होंगे जो अब मोदी जी के लिए अडवाणी जी के मन में सभी को उभरते नज़र आ रहे हैं .किन्तु जैसा कि भारतीय संस्कृति का नियम है जो जो बोता है वही काटता है  ,के परिणाम स्वरुप आज अडवाणी जी भी उसी स्थिति में पहुँच चुके हैं और पार्टी में मोदी जी के बढ़ते प्रभाव के फलस्वरूप स्वयं को अपमानित महसूस कर रहे हैं यही कारण है कि उन्होंने अपनी तरफ से अपनी पार्टी का बहिष्कार कर दिया जिसे वे स्वयं राष्ट्र हित के लिए बनी पार्टी कहते हैं .
    भारतीय जनता पार्टी ,यही नाम है उस दल का और जैसे कि आज भारतीय जनता के ही मानक पलट चुके हैं वैसे ही पलट चुके हैं इस पार्टी के सिद्धांत .आज की भारतीय जनता अपने बड़े  बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में भेजने लगी है क्योंकि उसके लिए ये नाकारा हो चुके होते हैं ,किसी काम के नहीं रहते ऐसे विचार आज की भारतीय जनता रखने लगी है और वह भी खासकर तब जबसे मोदी जी जैसे इस पार्टी में प्रमुखता ग्रहण कर रहे हैं जो दूसरे दलों के विद्वान नेताओं की उम्र को लेकर जब तब खिल्ली उड़ाते ही नज़र आते हैं . और जब यह पार्टी इसी भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व करती है तो यह कैसे लाल कृष्ण अडवाणी जी को पार्टी के लिए प्रासंगिक मान सकती है.इसलिए ऐसे में जब पार्टी अपनी विशेषता खोती जा रही है  ,जो कि उन्होंने अपने इस्तीफे में भी लिखा है -

Full Text of L K Advani's resignation letter to Rajnath Singh

Here's the full text of BJP patriarch L K Advani's resignation letter to party chief Rajnath Singh.
Dear Shri Rajnath Singhji,
All my life I have found working for the Jana Sangh and the Bharatiya Janata Party a matter of great pride and endless satisfaction to myself.
For some time I have been finding it difficult to reconcile either with the current functioning of the party, or the direction in which it is going. I no longer have the feeling that this is the same idealistic party created by Dr Mookerji, Deen Dayalji, Nanaji and Vajpayeeji whose sole concern was the country, and its people. Most leaders of ours are now concerned just with their personal agendas.
I have decided, therefore, to resign from the three main fora of the party, namely, the National Executive, the Parliamentary Board, and the Election Committee. This may be regarded as my resignation letter.
Yours Sincerely
L K Advani   
ऐसे में भारतीय संस्कृति के प्रति उपेक्षा का बर्ताव करने वाले मोदी को वे चुनावी कमान के मुखिया के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं ,जिनसे न तो अपने विवाह को निभाया गया जिसके लिए फेरे लेते वक़्त उन्होंने वचन लिए होंगे -
  
  विवाह संस्कार - सबसे महत्वपूर्ण रस्म है ''सप्तपदी ''जिसके  पूरे होते ही किसी दम्पति का विवाह सम्पूर्ण और पूरी तरह वैधानिक मान लिया जाता है .हिन्दू विवाह कानून के मुताबिक सप्तपदी या सात फेरे इसलिए भी ज़रूरी हैं ताकि दम्पति शादी की हर शर्त को अक्षरशः स्वीकार करें .ये इस प्रकार हैं -
 १- ॐ ईशा एकपदी भवः -हम यह पहला फेरा एक साथ लेते हुए वचन देते हैं कि हम हर काम में एक दूसरे  का ध्यान पूरे प्रेम ,समर्पण ,आदर ,सहयोग के साथ आजीवन करते रहेंगे .
  २- ॐ ऊर्जे द्विपदी भवः -इस दूसरे फेरे में हम यह निश्चय करते हैं कि हम दोनों साथ साथ आगे बढ़ेंगे .हम न केवल एक दूजे को स्वस्थ ,सुदृढ़ व् संतुलित रखने में सहयोग देंगे बल्कि मानसिक व् आत्मिक बल भी प्रदान करते हुए अपने परिवार और इस विश्व के कल्याण में अपनी उर्जा व्यय करेंगे .
 ३-ॐ रायस्पोशय  त्रिपदी भवः -तीसरा फेरा लेकर हम यह वचन देते हैं कि अपनी संपत्ति की रक्षा करते हुए सबके कल्याण के लिए समृद्धि का वातावरण बनायेंगें .हम अपने किसी काम में स्वार्थ नहीं आने देंगे ,बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानेंगें .
 4- ॐ मनोभ्याय चतुष्पदी  भवः -चौथे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि आजन्म एक दूजे के सहयोगी रहेंगे और खासतौर पर हम पति-पत्नी के बीच ख़ुशी और सामंजस्य बनाये रखेंगे .
 ५- ॐ प्रजाभ्यःपंचपदी भवः -पांचवे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि हम स्वस्थ ,दीर्घजीवी संतानों को जन्म  देंगे और इस तरह पालन-पोषण करेंगे ताकि ये परिवार ,समाज और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर साबित हो .
 ६- ॐ रितुभ्य षष्ठपदी  भवः -इस छठे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि प्रत्येक उत्तरदायित्व साथ साथ पूरा करेंगे और एक दूसरे का साथ निभाते हुए सबके प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे .
     ७-ॐ सखे सप्तपदी भवः -इस सातवें और अंतिम फेरे में हम वचन देते हैं कि हम आजीवन साथी और सहयोगी बनकर रहेंगे .
   और जिन्हें उन्होंने कभी पूरा नहीं किया जबकि वे उन भगवान राम के नाम पर अपनी सत्ता की नीवं रखने चले हैं जिनके लिए ''प्राण जाये पर वचन न जाये ''जीवन का मूल सिद्धांत है .ऐसे मोदी जी को स्वीकारना ,जो कि भारतीय संस्कृति को दरकिनार कर मुगलों की संस्कृति को अपना कर ''औरंगजेब ''बनने जा रहे हैं , किसी भी सच्चे भाजपाई के लिए असहनीय होगा .ऐसे में जब भाजपा के मूल ढांचे में ही परिवर्तन होने जा रहा है तो आडवानी जी को अप्रासंगिक ही कहा जायेगा .
                  और आडवानी जी के मन के भाव तो इसी शेर से अभिव्यक्त किये जा सकते है -
  ''जब जब तहजीबें नीली हो जाती हैं ,
    कुछ नस्लें जहरीली हो जाती हैं .''
        शालिनी कौशिक 
            [कौशल ]

रविवार, 9 जून 2013

नारी व् सशक्तिकरण :छतीस का आंकड़ा

UP high school result declare todaysome unknown facts of jiah's life entrepreneur-women-success

नारी सशक्त हो रही है .इंटर में लड़कियां आगे ,हाईस्कूल में लड़कियों ने लड़कों को पछाड़ा ,आसमान छूती लड़कियां ,झंडे गाडती लड़कियां जैसी अनेक युक्तियाँ ,उपाधियाँ रोज़ हमें सुनने को मिलती हैं .किन्तु क्या इन पर वास्तव में खुश हुआ जा सकता है ?क्या इसे सशक्तिकरण कहा जा सकता है ?
नहीं .................................कभी नहीं क्योंकि साथ में ये भी देखने व् सुनने को मिलता है .
*आपति जनक स्थिति में पकडे गए तीरंदाज,
*बेवफाई से निराश होकर जिया ने की आत्महत्या ,
*गीतिका ने ,
*फिजा ने और न जाने किस किस ने ऐसे कदम उठाये जो हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कलंक है .

गोपाल कांडा के कारण गीतिका ,चाँद के कारण फिजा के मामले सभी जानते हैं और ये वे मामले हैं जहाँ नारी किसी और के शोषण का शिकार नहीं हुई अपितु अपनी ही महत्वकांक्षाओं  का शिकार हुई .अपनी समर्पण की भावना के कारण ढेर हुई ये नारियां नारी के सशक्तिकरण की ध्वज की वाहक बनने जा रही थी किन्तु जिस भावना के वशीभूत हो ये इस मुकाम पर पहुंचना चाहती थी वही इनके पतन का या यूँ कहूं कि आत्महत्या का कारण बन गया ..ये समर्पण नारी को सशक्त नहीं होने देगा क्योंकि ये समर्पण जो सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ आधुनिक बनने की गरज में नारी करती है इसका खामियाजा भी वही भुगतती है क्योंकि प्रकृति ने उसे जो माँ बनने का वरदान दिया है वह उसके लिए इस स्थिति में अभिशाप बन जाता है और ऐसे में उसे मुहं छुपाने को या फिर आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ता है .पुरुष के प्रतिष्ठा या चरित्र पर इसका लेशमात्र भी असर नहीं पड़ता .नारायणदत्त तिवारी जी को लीजिये ,पता चल चुका है ,साबित हो चुका है कि वे एक नाजायज़ संतान के पिता हैं किन्तु तब भी न तो उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में कोई अंतर आया और न ही उन्हें कहीं बहिष्कृत किया गया जबकि यदि उनकी जगह कोई नारी होती तो उसे कुलता ,कुलच्छनी जैसी संज्ञाओं से विभूषित करने से कोई बाज़ नहीं आता और हद तो ये है कि ऐसी स्थिति होने पर भी नारी अपनी ऐसी भावनाओं पर कोई अंकुश नहीं लगा पाती .
ऐसे ही बड़े बड़े दावे किये जाते हैं कि लड़कियां आत्मनिर्भर हो रही हैं ,सत्य है ,डाक्टर बन रही हैं इंजीनियर बन रही हैं साथ ही बहुत बड़ी संख्या में टीचर बन रही हैं किन्तु ये ऊपरी सच है अंदरूनी हालात-
*-इंजीनियर रीमा मेरिट में स्थान बना बनती है और बेवकूफ बनती है अपने साथी लड़के से ,शादी करती है किन्तु नहीं बनती और माँ बाप कुंवारी बता उसकी दूसरी शादी करते हैं ,क्यूं बढ़ जाते हैं  उसके कदम आधुनिकता की होड़ में स्वयं को सक्षम निर्णय लेने वाला दिखाने में और अगर बढ़ जाते हैं तो क्यूं नहीं निभा पाती उस प्यार को जो उसे सामाजिक मर्यादाओं से बगावत को मजबूर करता है और फिर क्यूं लौट आती है उन्हीं मर्यादाओं के अधीन जिन्हें कभी कोरी बकवास कह छोड़ चुकी थी ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
*कस्बों में लड़कियां बारहवीं पास करते ही वहां के स्कूलों में पढ़ाने जाने लगी हैं .''जॉब ''कर रही हैं ,स्वावलंबी हो रही हैं ,कह सिर गर्व से ऊँचा किये फिरते हैं सभी फिर क्यों लुट रही हैं ,क्यों अपनी तनख्वाह नहीं बताती ,क्यों ज्यादा तनख्वाह पर साइन कर कम वेतन ख़ुशी ख़ुशी ले रही हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
*पंचायतों में ,नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित हो रहे हैं ,महिलाएं चुनी जा रही हैं ,शासन कर रही हैं सुन गर्व से भर जाती हैं महिलाएं ,फिर क्यूं पंचायतों की ,नगरपालिकाओं की बैठकों में अनुपस्थित रहती हैं ,क्यों उनकी उपस्थिति के साइन तक उनके पति ही करते हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
*बैनामे संपत्तियों के महिलाओं के नाम हो रहे हैं ,महिलाएं संपत्ति की मालिक हो रही हैं ,क्या नहीं जानते हम कि मात्र स्टाम्प ड्यूटी घटाने को ये स्वांग भी पुरुष ही रच रहे हैं ,कितनी सही तरह से संपत्ति की मालिक हो रही हैं महिलाएं स्वयं भी जानती हैं ,क्या वे अपनी मर्जी से उसका इस्तेमाल कर सकती हैं ,क्या वे स्वयं उसे बेच सकती हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
वास्तविकता यही है कि नारी कभी भी पुरुष की गुलामी से आज़ाद नहीं हो सकती क्योंकि ये गुलामी उसने स्वयं चुनी है .वह स्वयं उसके हाथों की कठपुतली बनी रहना चाहती है .पुरुष ने उसे हमेशा गहनों ,कपड़ों के लोभ में ऐसे जकड़े रखा हैं कि वह कहीं भी हो इनमे ही सिमटकर रह जाती है .पुरुष के इस बहकावे में नारी इस कदर फंसी हुई है कि बड़ी से बड़ी नाराजगी भी वह उसे कोई गहना ,कपडा देकर दूर कर देता है और वह बहकी रहती है एक उत्पाद बन कर .यही सोच है कि पढ़ी लिखी वकील होने के बावजूद फिजा चाँद के शादी व् बच्चों के बारे में जानते हुए भी उसकी पत्नी बनाने के बहकावे में आ जाती है और समाज में उस औरत का दर्ज पा जाती हैं जिसे ''रखैल''कहते हैं .यही सशक्तिकरण का ढोंग है जिसमे फिल्मो में ,मॉडलिंग में लड़कियां अपना तन उघाड़ रही हैं  ,वही स्वयं को सशक्त दिखाने की पहल में यही हवा हमारे समाज में बही जा रही है .फिल्मो में शोषण का शिकार हमारी ये हीरोइने तो इस माध्यम से नाम व् पैसा कमा रही हैं  किन्तु एक सामान्य लड़की इस राह पर चलकर स्वयं को तो अंधे कुएं में धकेल ही रही है और औरों के लिए खाई तैयार कर रही है .फिर क्यों आश्चर्य किया जाता है बलात्कार ,छेड़खानी की बढती घटनाओं पर ,ये तो उसी सशक्तिकरण की उपज है जो आज की नारी का हो रहा है और परिणाम सामने हैं
उसे केवल यही सुनता है जो पुरुष सुनाता है -
''है बनने संवरने का जब ही मज़ा ,
कोई देखने वाला आशिक भी हो .''
नहीं सुनती उसे वह करून पुकार जो कहती है -
''दुश्मन न करे दोस्त ने जो काम किया है ,
उम्र भर का गम हमें इनाम दिया है .''
.इसी सोच के कारण अपने आकर्षण में पुरुष को बांधने के लिए वह निरंतर गिरती जा रही है और स्वयं को सशक्त दिखाने के लिए फांसी पर चढ़ती जा रही है .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]









संभल जा रे नारी ....

''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपन...