मंगलवार, 30 जुलाई 2013

जिसकी नहीं कदर यहाँ पर ,ऐसी वो बेजान यहाँ है .

Rani of JhansiSarojoni NaiduBegum Hazrat MahalVijaylakshmi PanditKittur Rani ChennammaSucheta KriplaniAruna Asaf Ali
अबला हमको कहने से ,सबकी बढती शान यहाँ है ,
सफल शख्सियत बने अगर हम ,सबका घटता मान यहाँ है .
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बेटी घर की इज्ज़त होती ,इसलिए रह तू घर में ,
बेटा कहाँ फिरे भटकता ,उसका किसको ध्यान यहाँ है .
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बहन तू मेरी बुरी नज़र से ,तुझको रोज़ बचाऊंगा ,
लड़का होकर क्या क्या करना ,मुझको इसका ज्ञान यहाँ है .
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पराया धन है तू बेटी ,तेरी ससुराल तेरा घर ,
दो दो घर की मालिक को ,मिलता न मकान यहाँ है .
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बेटी वाले को बेटे पर ,खर्चे की फेहरिस्त थमा रहे ,
ऊँची मूंछ के रखने वाले ,बिकते सब इन्सान यहाँ हैं .
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बेटा अपना फिरे आवारा ,बहू लगा दो नौकरी पर ,
इतना सब करके भी नारी ,पाती बस फरमान यहाँ है .
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बीवी की खा रहे कमाई ,अपने शीश को खूब उठाकर ,
हमने ही लगवाई नौकरी ,उसकी न पहचान यहाँ है .
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लुटती अस्मत नारी की जब ,दोष उसी का ढूँढा जाये ,
वहशी और दरिंदों का ,न होता अपमान यहाँ है .
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कुछ रुपयों में सौदा होता ,भरी नगर पंचायत में ,
नारी को लज्जित करने पर ,भी मिलता सम्मान यहाँ है .
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खुदगर्जी से भरे मर्द और बिक रहा समाज है ,
नारी जीवन को क्या जग में ,रहने का स्थान यहाँ है .
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मुताबिक ''शालिनी'' के ही ,मुत्तफिक है हरेक नारी ,
जिसकी नहीं कदर यहाँ पर ,ऐसी वो बेजान यहाँ है .
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Savitribhai PhuleUsha MehtaBhikaiji CamaThe Brave Women of India 
                     शालिनी कौशिक
                                    [कौशल ]
शब्दार्थ -मुत्तफिक -सहमत 

रविवार, 28 जुलाई 2013

मात-पिता का संग मिले , -मात-पितृ दिवस की शुभकामनायें

मात-पिता का संग मिले ,  -मात-पितृ दिवस की शुभकामनायें 

पुण्योदय उस जीव का जग में,मात-पिता का संग मिले ,
पुण्यभूमि वह गृह धरा पर ,जिसमे इनका संग मिले .
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मात-पिता ही सदा मनाएं ,संतानों के उत्सव को ,
पुण्योत्सव तो वही कहाए ,इनकी खुशियाँ संग मिलें .
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पुण्यार्थ संतानें करती ,अनगिन कर्म ज़माने में ,
आदर दें इच्छा को इनकी ,पुण्य सच्चा संग मिले .
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पुण्यशील संतान वही है ,माने न जो बोझ इन्हें ,
कर्तव्य न प्रभु का वर है ,जिनको इनका संग मिले .
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श्रवण कुमार से तुलना मत कर ,राम न बनने की कोशिश ,
साधारण सी ख़ुशी ही दे दे ,पुलकित इनका संग मिले .
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मात-पिता जो देते हमको ,दे न सकेंगे कभी भी हम ,
थोडा दें एहसास साथ का ,पूरा इनका संग मिले .
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करे स्मरण आज ''शालिनी ''करे नमन इन चरणों में ,
धन्य तभी इस धरा पे जीवन ,हमको इनका संग मिले .
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                                   शालिनी कौशिक
                                             [कौशल ]


शनिवार, 27 जुलाई 2013

बहन की असलियत

Women_talking : Muslim young woman on the phone, looking at camera. Stock PhotoSad_man : Young man thinking about a solution , isolated on black Stock Photo

''भैय्या ''भाभी का सुना ,बड़ा दुःख हुआ ,आप और दोनों बेटियां तो अब बिल्कुल अकेले ही रह गए और देखो कितने दुःख की बात है ये और मैं आ भी नहीं सकते बहुत बीमार हैं ना और इतनी उम्र में इतनी दूर आना जाना संभव भी तो नहीं है . कोई बात नहीं तुम्हारे आने से हो भी क्या जायेगा ,जो होना था सो हो गया अपना और प्रमोद जी का ध्यान रखो ,पत्नी की मृत्यु पर भाई को लखनऊ बैठी बहन उत्तरा के सांत्वना देने पर मुजफ्फरनगर बैठे भाई कुमार ने समझाते हुए कहा .
दो महीने बाद ............
''भैय्या''आप यहाँ नहीं आ रहे ?छोटे की बेटी की शादी है ,मैं और ये तो यहाँ आये हुए हैं और आपके पास भी आना चाहते हैं .आप घर पर ही मिलोगे न ?
अरे नहीं उत्तरा ,कोई ज़रुरत नहीं है .....सड़के बहुत ख़राब हैं ,बेकार में तुझे और प्रमोद जी को बहुत तकलीफ होगी और मैंने पहले ही कह दिया था ,जो होना था सो हो गया ,अब ये सब बेकार की बाते हैं .तुझे कोई ज़रुरत नहीं यहाँ आने की .तू आराम से मेरठ में गीता की शादी में शामिल हो ,''मौज कर ''दिखावटी अपनापन दिखाने वाली बहन को फिर टालते हुए कुमार जी ने कहा .
और उधर .....चलो भाई अब हमें कोई कुछ नहीं कह सकता ,आखिर हम तो आना चाहते थे ,भैया ने ही मना कर दिया ,उत्तरा सुस्ताते हुए बोली ......पर दीदी आपको नहीं लगा ,हमें तो लग गया कि जेठ जी आपकी असलियत को पहचान गए ,मुस्कुराती उत्तरा पर छोटे  की बहु अमला की इस बात से घड़ों पानी गिर गया और छोटे की बहु ......चुटकी लेते हुए नहाने चल दी .
                   शालिनी कौशिक 
                           [कौशल ]

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

क्यूँ खामखाह में ख़ाला,खारिश किये पड़ी हो ,


Arabian couple relaxing & drinking tea Royalty Free Stock PhotoArabian couple relaxing & drinking tea Stock Images
Arabian couple relaxing & drinking tea Stock Photography

क्यूँ खामखाह में ख़ाला,खारिश किये पड़ी हो ,
खादिम है तेरा खाविंद ,क्यूँ सिर चढ़े पड़ी हो .
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ख़ातून की खातिर जो ,खामोश हर घड़ी में ,
खब्ती हो इस तरह से ,ये लट्ठ लिए पड़ी हो .
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खिज़ाब लगा दिखते,खालू यूँ नौजवाँ से ,
खरखशा जवानी का ,किस्सा लिए पड़ी हो .
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करते हैं खिदमतें वे ,दिन-रात लग तुम्हारी ,
फिर क्यूँ न मुस्कुराने की, जिद किये पड़ी हो .
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करते खुशामदें हैं ,खुतबा पढ़ें तुम्हारी ,
खुशहाली में अपनी क्यूँ,खंजर दिए पड़ी हो .
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खिलवत से दूर रहकर ,खिलक़त को बढ़के देखो ,
क्यूँ खैरियत की अपनी ,खिल्ली किये पड़ी हो .
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ऐसे खाहाँ की खातिर ,रोज़े ये दुनिया रखती ,
पर खामख्याली में तुम ,खिसियाये हुए पड़ी हो .
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खुद-इख़्तियार रखते ,खुसिया बरदार हैं फिर भी ,
खूबी को भूल उनकी ,खटपट किये पड़ी हो .
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क्या जानती नहीं हो ,मजबूरी खुद खसम की ,
क्यूँ सारी दुख्तरों को ,सौतन किये पड़ी हो .
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''शालिनी '' कहे खाला,खालू की कुछ तो सोचो ,
चढ़ते वे कैसे ऊपर ,जब बेंत ले पड़ी हो .
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                             शालिनी कौशिक
                                [WOMAN ABOUT MAN]

             
शब्दार्थ :-खाविंद-पति ,खातून-पत्नी ,खाला-मौसी ,खालू-मौसा खारिश -खुजली ,खुसिया बरदार -सभी तरह की सेवा करके खुश रखने वाला ,खर खशा-व्यर्थ का झगडा ,खाहाँ-चाहने वाला ,खिलवत -एकांत ,खिलक़त-प्रकृति ,खामख्याली -नासमझी

सोमवार, 22 जुलाई 2013

उत्तराखंड के दलितों की जय हो .

अमर उजाला हिंदी दैनिक से साभार 
''उत्तराखंड में दलितों का ब्राह्मण विद्रोह ''समाचार पढ़कर आज वास्तव में अगर कहूं तो मन खुश हो गया . स्वयं ब्राह्मण  होते हुए मैं  उनके इस कदम की सराहना कर  रही हूँ ,कारण केवल एक आज स्वयं ब्राह्मणों ने ही ब्राह्मणत्व का नाम डुबो दिया है . जिनकी समाज में उपस्थिति ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में है और उन्होंने स्वयं को ईश्वर ही मान लिया है और अपने हर कृत्य को सही ठहराने की जैसे कसम ही खा ली है .यही नहीं आज यह समुदाय न केवल ''पेट पूजक ''बल्कि ''धन पूजक ''के रूप में भी ख्याति पा रहा है और जिसके चरण छूकर सभी अपने को धन्य मानते हैं वही आज पूंजीपतियों व् धनिकों के चरणों में झुका जा रहा है .
   उत्तराखंड के दलितों ने आज इस वर्ग को चुनौती देने की ठानकर न केवल अपने वर्ग हेतु बल्कि समस्त वर्गों के लिए हितकारी कार्य किया है क्योंकि ये मात्र दलितों को ही नहीं बल्कि क्षेत्रवार भी भेदभाव की नीति अपनाते हैं .एक क्षेत्र के ब्राह्मण दूसरे क्षेत्र के ब्राह्मण को वरीयता नहीं देते .
               एक अपने ही बड़ों से सुनी बात आपको बता रही हूँ कि ऐसा हमारे एक बड़े को भी ब्राह्मण होते हुए भुगतना पड़ा .हमारे रिश्ते में परदादा जी लगने वाले रायबहादुर पंडित चंद्रभान  जी जो कोर्ट साहब के रूप में तब कानपुर में तैनात थे उन्हें भी श्राद्ध पक्ष में वहां के ब्राह्मणों ने आने से इन्कार कर दिया तब उन्हें पुलिस की सहायता से उन्हें अपने यहाँ श्राद्ध में आने को मजबूर करना पड़ा और ये बात कई दशक पुरानी है .
                     आज वर्णव्यवस्था ने लोगों में घमंड को कुछ ज्यादा ही बढ़ा दिया है एक और जहाँ वैश्यसमुदाय यह कहता है कि ''ब्राह्मण हमारी दया पर पलते हैं '' वहीँ ब्राह्मण समुदाय भी कहता है कि हम ही तुम्हारी शादी विवाह करवाते हैं यदि हम न हों तो तुम कुंवारे ही मर जाओगे .''कारण सभी जानते हैं बदलाव पुरानी मान्यताओं में ,जो ढांचा ऋग्वेद में पुरुष सूक्त में वर्णव्यवस्था का था वह आज बदल गया है .तब कर्म से वर्ण नियत होता था आज जन्म से नियत होने लगा है .तब शिक्षा से जुड़े लोग ब्राहमण माने जाते थे और उनका कार्य शिक्षा का प्रचार प्रसार था .क्षत्रियों का कार्य शस्त्र धारण कर समाज की रक्षा करना था .वैश्यों का कार्य व्यापार व् पशुपालन द्वारा संपत्ति का उत्पादन व् लोगों की उदर पूर्ति करना था .और शूद्रों का कार्य सभी वर्णों की सेवा करना था और तब जो भी जो कार्य करता था वह उसी वर्ण का समझा जाता था .आज स्थिति पलट चुकी है और सात्विकता से जुदा ब्राह्मण वर्ग व्यभचारी व् शराबी होने पर भी पंडित की उपाधि पाता है .लोगों का पेट भरने के स्थान पर उनके लिए मिलने वाले अनाज को गोदाम में छिपाने वाला वैश्य लाला जी बना फिरता है रक्षा का भार उठाने वाले स्वयं संरक्षक बनने के स्थान पर संहारक  बन जाते है और इतने पर भी राजा बने फिरते हैं बस दयनीय स्थिति है तो शूद्र की जिसमे शिक्षा का उजाला होने के बावजूद वर्ण में चौथा स्थान होने के कारण निम्न ही समझा जाता है .किसी बड़े आदमी के सामने कुर्सी पर बैठने तक का हक़ उसे नहीं मिलता है .और वह हीनता का बर्ताव ही सबसे पाता है .ऐसे में उत्तराखंड के दलितों का यह कदम समाज की कीचड को हटाने की दिशा में एक सराहनीय कदम कहा जा सकता है .
                      शालिनी कौशिक
                           [कौशल ]



रविवार, 21 जुलाई 2013

सबक दहेज़ के दानवों को



Purple turban with gem and pearls isolated on white - stock photo Father_daughter : mother and baby hands at homeIndian Headgear used in Marriages / occasions - stock photo
मंडप भी सजा ,शहनाई बजी ,
आई वहां बारात भी ,
मेहँदी भी रची ,ढोलक भी बजी ,
फिर भी लुट गए अरमान सभी .
समधी बात मेरी सुन लो ,अपने कानों को खोल के ,
होगी जयमाल ,होंगे फेरे ,जब दोगे तिजोरी खोल के .
आंसू भी बहे ,पैर भी पकड़े ,
पर दिल पत्थर था समधी का ,
पगड़ी भी रख दी पैरों में ,
पर दिल न पिघला समधी का .
सुन लो समधी ये भावुकता ,विचलित न मुझे कर पायेगी ,
बेटे पर खर्च जो मैंने किया ,ये मुझको न दे पायेगी .
देख पिता की हालत को ,
बेटी का घूंघट उतर गया .
सम्मान जिन्हें कल देना था ,
उनसे ही माथा ठन गया .
सुन लो बाबूजी बात मेरी ,अब खुद की खैर मना लो तुम ,
पकड़ेगी पुलिस तुम्हें आकर ,खुद को खूब बचा लो तुम .
सुनते ही नाम पुलिस का वे ,
कुछ घबराये ,कुछ सकुचाये ,
फिर माफ़ी मांग के जोड़े हाथ ,
बोले रस्मे पूरी की जाएँ .
पर बेटी दिल की पक्की थी ,बाबूजी से अड़कर बोली ,
अब शादी न ये होगी कभी ,बोलो चाहे मीठी बोली .
ए लड़की !बोलो मुँह संभाल ,
तू लड़की है ,कमज़ोर है ,
हम कर रहे बर्ताव शरीफ ,
समझी तू शायद और है .
बेटी से ऐसी भाषा पर ,बाप का क्रोध भी उबल पड़ा ,
समधी को पकड़ के  खुद ही पुलिस में  देने चल पड़ा .
आ गयी पुलिस , ले गयी पकड़ ,
लालच के ऐसे मारों को ,
देखा जिसने की तारीफें ,
अच्छा मारा इन यारों को .
लड़के वाला होने का घमंड ,जब हद से आगे जायेगा ,
बेटे का बाप बारातों संग ,तब जेले ही भर पायेगा .
बेटी ने लाकर पगड़ी को ,
पिता के शीश पर रख दिया .
पोंछे आंसू माँगा वादा ,
दुर्बल न होगा कभी जिया .
बदलेंगे सोच अगर अपनी ,कानून अगर हम मानेंगे ,
तब बेटी को अपने ऊपर न बोझ कभी हम मानेंगे .
सबक दहेज़ के दानवों को ,गर यूँ बढ़कर सिखलाएंगे ,
सच्चे अर्थों में हम जीवन बेटी को तब दे पाएंगे .
                शालिनी कौशिक 
                              [कौशल ]





गुरुवार, 18 जुलाई 2013

भावुकता स्नेहिल ह्रदय ,दुर्बलता न नारी की ,

The Brave Women of India21-Year-Old Shreya...
भावुकता स्नेहिल ह्रदय ,दुर्बलता न नारी की ,
संतोषी मन सहनशीलता, हिम्मत है हर नारी की .
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भावुक मन से गृहस्थ धर्म की , नींव वही जमाये है ,
पत्थर दिल को कोमल करना ,नहीं है मुश्किल नारी की.
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होती है हर कली पल्लवित ,उसके आँचल के दूध से ,
ईश्वर के भी करे बराबर ,यह पदवी हर नारी की .
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जितने भी इस पुरुष धरा पर ,जन्मे उसकी कोख से ,
उनकी स्मृति दुरुस्त कराना ,कोशिश है हर नारी की .
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प्रेम प्यार की परिभाषा को ,गलत रूप में ढाल रहे ,
सही समझ दे राह दिखाना ,यही मलाहत नारी की .
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भटके न वह मुझे देखकर ,भटके न संतान मेरी ,
जीवन की हर कठिन डगर पर ,इसी में मेहनत नारी की .
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मर्यादित जीवन की चाहत ,मर्म है जिसके जीवन का ,
इसीलिए पिंजरे के पंछी से ,तुलना हर नारी की .
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बेहतर हो पुरुषों का जीवन ,मेरे से जो यहाँ जुड़े ,
यही कहानी कहती है ,यहाँ शहादत नारी की .
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अभिव्यक्त क्या करे ''शालिनी ''महिमा उसकी दिव्यता की ,
कैसे माने कमतर शक्ति ,हर महिका सम नारी की .
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                      शालिनी कौशिक 
                               [कौशल ]

शब्दार्थ -मलाहत-सौंदर्य 
                                     

सोमवार, 15 जुलाई 2013

हे प्रभु !अब तो सद्बुद्धि दे ही दो मोदी पथभ्रष्ट को .


हे प्रभु !अब तो सद्बुद्धि दे ही दो मोदी पथभ्रष्ट को .


एक कहावत है -
  '' बड़ा नाम रखकर कोई आदमी बड़ा नहीं हो जाता ,बड़ा वह होता है जो बड़े काम करता है.''
पर शायद नरेन्द्र दामोदर मोदी ने यह नहीं सुनी क्योंकि जैसे जैसे लोकसभा चुनाव के दिन नज़दीक आ रहे हैं ,भाजपा के फायर ब्रांड नेता नरेन्द्र मोदी अपना आपा खोते जा रहे हैं .ब्लीचिंग पाउडर लेकर अपने चेहरे के दाग धोने में जुटे मोदी अपनी हडबडाहट में  जो कर रहे हैं उससे उनके चेहरे पर दाग और बढ़ते जा रहे हैं और उसे लेकर वे इस कदर परेशान हैं कि अब वे हाथ पैर मारने की स्थिति में
पहुँचते जा रहे हैं .कभी राहुल गाँधी को बच्चा कह अपने से कम आंकने वाले मोदी आज उनकी परिपक्वता के आगे स्वयं को हताश महसूस कर रहे हैं . और यही कारण है कि पहले गाँधी के गुजरात को मोदी के गुजरात कह उसका नाम डुबोने वाले आज अटल बिहारी वाजपेयी जैसी संतुलित ,धर्मनिरपेक्ष शख्सियत से तुलनाकर उनकी भी किरकिरी करने को आतुर हैं . 
 
जब जब संकट आता है सेक्युलरिज्म का बुर्का  पहनकर बनकर में छिप जाती है कॉंग्रेस''
            मोदी कहते हैं ''जब जब संकट आता है सेक्युलरिज्म का  बुर्का पहनकर बनकर में छिप जाती है कॉंग्रेस''.सेक्युलरिज्म की इतनी गूढ़ जानकारी आज तक किसी को भी नहीं थी  .नहीं जानते थे कि बुर्का सेक्युलरिज्म है .इस तरह तो जितने भी बुरका पहनने वाले हैं सभी सेक्युलर कहे जायेंगे और बिना बुर्के वाले स्वयं सोच लें ....................................फिर ये तो एक सत्य है कि हमारा संविधान सेक्युलर स्टेट की स्थापना करता है और यह भी कि कोई हिन्दू बुर्का नहीं पहनता और मोदी स्वयं को हिन्दू राष्ट्रवादी कहते हैं जिसका साफ मतलब है कि वे संविधान विरोधी हैं और जो संविधान को ही मान्यता नहीं देता उसका हमारे देश में क्या काम है यह समझ में नहीं आता

'मैं जन्म से हिंदू और राष्ट्रवादी हूं, यह कोई गुनाह नहीं है'

narendra modi

ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि -
''रिश्ता -ए-खून तोड़ डाला है ,सच का मज़मून तोड़ डाला है ,
आज वो देशभक्त बनता है ,जिसने कानून तोड़ डाला है .''
     मोदी कहते हैं कि'' सिर्फ कानून बनाने से थाली में नहीं आएगा खाना ''तो ये तो स्पष्ट ही है कि खाना थाली में आने से पहले तो कई प्रक्रियाओं से गुजरता है ..मसलन अगर दाल रोटी  तो दाल भिगोई जाती है फिर बनायीं जाती है ,आटा गूंथा जाता है फिर कहीं जाकर थाली के लिए रोटी दाल का जुगाड़ होता है और यदि ये ही न किया जाये तो क्या कच्ची दाल व् आटा कोई खा सकता है ऐसे ही यह कानून लोगों को खाना उपलब्ध करने की यू.पी,ए.सरकार की पुनीत पहल है और स्वागत योग्य है फिर क्यूं इस पर बढ़ते सरकार के कदम रोककर मोदी आम आदमी के पेट पर लात मारने में जुटे हैं ?
   मोदी कहते हैं'' राष्ट्रमंडल खेल आयोजित कर हमारे देश ने भ्रष्टाचार की वजह से अपना सम्मान खो दिया'' .इस तरह तो सारे विश्व को वे भ्रष्टाचारी कहने में जुटे हैं और फिर ये भी कहते हैं कि ''कोई पडोसी दोस्त नहीं ''अब जब इन जैसे  अनर्गल प्रलाप करने वाले नेता हो तो हम दोस्त कैसे पा सकते हैं  क्योंकि सभी यही कहते हैं इनके बारे में -
''हुए तुम दोस्त जिसके उसका दुश्मन आसमां क्यूं है ''
   भला कौन अपने पर यह झूठा इल्जाम बर्दाश्त करेगा .राष्ट्रमंडल खेलों के बाद सारे विश्व में भारतीय सफल आयोजन  की सराहना हुई और भारत को अभी हाल ही में क्रिकेट टी-२० ,विश्वकप व् चैम्पियन ट्राफी के अधिकार मिले हैं .अब यदि मोदी जी की ही बात को हम माने तो सारा विश्व भ्रष्टाचारी है और वह इस क्षेत्र में भारत की काबिलियत का लोहा मान रहा है और ऐसे आयोजन के अधिकार दे रहा है .
   पश्चिमी करण की चाह न रखने वाले मोदी हर जगह गुजरात व् गुजरातियों की ही रट लगाये फिरते हैं और बात उनकी खिलाफत की ही करते हैं .आज विश्व के विभिन्न देशो में सबसे ज्यादा गुजरातियों का ही जमावड़ा है जिनमे कहीं से लेकर कहीं तक भी पूर्व के प्रति प्यार सम्मान की भावना दृष्टिगोचर नहीं होती यदि दृष्टिगोचर होती है तो केवल ''मनी मेकिंग प्लान्स 'के प्रति जागरूकता और जो उनके प्रिय मोदी जी में भी दिखती है जो विश्व के विभिन्न बैंकों में जमा भारतीय काले  धन का पूरा हिसाब ऐसे रखते हैं जैसे वे बैंक इन्हीं के हों और ''जैसा खाए अन्न वैसा बने मन ''भावों को संजोने वाली भारतीय संस्कृति में वे काले धन को भारतीय जनता में बाँटने की बात करते हैं और कहते हैं -''यदि यह बाँट दिया जाये तो हर भारतीय के पास ३ लाख रूपए होंगे ''ये कैसे भारतीय संस्कृति के पुरोधा बनने की कोशिश कर रहे हैं मोदी जबकि भारतीय संस्कृति से इनका कोई लेना देना ही नहीं है जहाँ -
''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ''है वहीँ मोदी विवाह तो रचाते  हैं किन्तु उसके बाद जशोदा बेन की पूजा तो दूर वे उन्हें बेसहारा छोड़ देते हैं .
जहाँ -
''बच्चे मन के सच्चे ....ये वो नन्हे फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे ''
   और जिन्हें बड़ों द्वारा जीते रहो कामयाब बनो जैसे आशीर्वाद दिए जाते हैं वहीँ एक तरफ तो ये राहुल गाँधी को बच्चा कहते हैं दूसरी तरफ उनके अशुभ की भावना रखते हैं और कहते हैं कि उन्हें देश में कहीं नौकरी नहीं मिलेगी .
जहाँ -
''पिता के वचन निभाने और उनकी आज्ञा पालन के लिए राम १४ वर्ष का वनवास काटने राजसत्ता को त्याग कर वन में चल देते हैं वहीँ मोदी अपने दाल के पितामह की उपाधि प्राप्त लाल कृष्ण अडवाणी को सत्ता पाने की खातिर खून के आंसू रोने व् अपमान के घूँट पीने को मजबूर कर देते हैं .
जहाँ -
''घर की बहू लक्ष्मी का रूप मानी जाती है वहां ये निरंतर उसका ही अपमान करने में जुटे हैं और ऐसा करके अपने शीश को घमंड से ऊँचा उठाते हैं 
और जहाँ हिन्दू-मुस्लिम  भाई भाई का नारा लगता है वहीँ ये गुजरात के दंगों में मारे गए मुसलमान भाइयों को कुत्ते के बच्चों की संज्ञा दे इस देश के सौहार्द में आग लगाने की कोशिश करते हैं जबकि ऐसे ही पथभ्रष्टों के बारे में किसी ने कहा है -
''उजाड़े हैं गुलिस्ताँ तुमने 
    जिन हाथों से दीवानों ,
अगर तुम चाहते तो
        वीराने उनसे संवर जाते .''
ऐसे में बस यही कहा जा सकता है -
''ईश्वर अल्लाह  तेरे नाम ,मोदी को सम्मति दे भगवान ''
         शालिनी कौशिक 
                   [कौशल ]
    

रविवार, 14 जुलाई 2013

झुंझलाके क़त्ल करते हैं वे जनाब आली .

झुंझलाके क़त्ल करते हैं वे जनाब आली .

  नुमाइंदगी करते हैं वे जनाब आली ,
जजमान बने फिरते हैं वे जनाब आली .
...............................................................
देते हैं जख्म हमें रुख बदल-बदल ,
छिड़कते फिर नमक हैं वे जनाब आली .
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मुखालिफों को हक़ नहीं मुहं खोलने का है ,
जटल काफिये उड़ाते हैं वे जनाब आली .
................................................................
ज़म्हूर को कहते जो जनावर जूनून में ,
फिर बात से पलटते हैं वे जनाब आली .
..................................................................
फरेब लिए मुहं से मिलें हाथ जोड़कर ,
पीछे से वार करते हैं वे जनाब आली .
........................................................................
मैदान-ए-जंग में आते हैं ऐयार बनके ये ,
ठोकर बड़ों के मारते हैं वे जनाब आली .
......................................................................
जम्हूरियत है दागदार इनसे ही ''शालिनी ''
झुंझलाके क़त्ल करते हैं वे जनाब आली .
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                      शालिनी कौशिक 
                               [कौशल ]

शब्दार्थ -नुमाइंदगी-प्रतिनिधित्व ,जनाब आली -मान्य महोदय ,जजमान-यजमान ,जटल काफिये उड़ाना-बेतुकी व् झूठी  बाते करना ,जम्हूर-जनसमूह ,जम्हूरियत-लोकतंत्र .

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

अभिनेता प्राण को भावपूर्ण श्रृद्धांजलि -शालिनी कौशिक

Pran to be honoured with Dadasaheb Phalke Award



चले आज वे महज़ देह छोड़कर ,
नज़र सामने न कभी आयेंगे .
अगर देखें शीश उठाकर सभी ,
गगन में खड़े वे चमक जायेंगे .

                      शरीरों का साथ भी क्या साथ है ?
                       है चलती ही रहती मिलन व् जुदाई .
                       जो मिलते हैं अपनी आत्मा से हमें 
                      न मध्य में आती किसी से विदाई .

ये फ़िल्मी सितारे अज़र  हैं अमर हैं 
हमारे ख्वाबों में रोज़ आया करेंगे .
भले भूल जाएँ हमको हमारे ही अपने 
ये सबके दिलों पर छाये रहेंगे .

                      जो पैदा हुए हैं सभी वे मरेंगे ,
                       जो आये यहाँ पर सभी चल पड़ेंगे .
                       है इनकी कला का ये जादू सभी पर 
                       ये जिंदा थे ,जिंदा हैं और जिंदा रहेंगे .


अभिनेता प्राण को भावपूर्ण श्रृद्धांजलि 
                                   शालिनी  कौशिक 
                                           [कौशल ]

बुधवार, 10 जुलाई 2013

आगाज़-ए-जिंदगी की तकमील मौत है .


Standing Skeleton warrior Stock Photo
आगाज़-ए-जिंदगी की तकमील मौत है .
   
 दरिया-ए-जिंदगी की मंजिल मौत है ,
आगाज़-ए-जिंदगी की तकमील मौत है .
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बाजीगरी इन्सां करे या कर ले बंदगी ,
मुक़र्रर वक़्त पर मौजूद मौत है .
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बेवफा है जिंदगी न करना मौहब्बत ,
रफ्ता-रफ्ता ज़हर का अंजाम मौत है .
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महबूबा बावफ़ा है दिल के सदा करीब ,
बढ़कर गले लगाती मुमताज़ मौत है .
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महफूज़ नहीं इन्सां पहलू में जिंदगी के ,
मजरूह करे जिंदगी मरहम मौत है .
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करती नहीं है मसखरी न करती तअस्सुब,
मनमौजी जिंदगी का तकब्बुर मौत है .
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ताज्जुब है फिर भी इन्सां भागे है इसी से ,
तकलीफ जिंदगी है आराम मौत है .
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तक़रीर नहीं सुनती न करती तकाजा ,
न पड़ती तकल्लुफ में तकदीर मौत है .
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तजुर्बे ''शालिनी''के करें उससे तज़किरा ,
तख्फीफ गम में लाने की तजवीज़ मौत है .
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                 शालिनी कौशिक 
                             [कौशल]

शब्दार्थ-तकमील-पूर्णता ,मुक़र्रर-निश्चित ,बावफ़ा-वफादार , तअस्सुब-पक्षपात, तज़किरा-चर्चा ,तक़रीर-भाषण ,तकब्बुर-अभिमान ,तकाजा-मांगना ,मुमताज़-विशिष्ट ,मजरूह-घायल 

सोमवार, 8 जुलाई 2013

इमदाद-ए-आशनाई कहते हैं मर्द सारे .

Picture of Medieval King of England in the Middle Ages

हर दौर पर उम्र में कैसर हैं मर्द सारे ,
गुलाम हर किसी को समझें हैं मर्द सारे .
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बेटे का जन्म माथा माँ-बाप का उठाये ,
वारिस की जगह पूरी करते हैं मर्द सारे.
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ख़िताब पाए औरत शरीक-ए-हयात का ,
ठाकुर ये खुद ही बनते फिरते हैं मर्द सारे .
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रुतबा है उसी कुल का बेटे भरे हैं जिसमे ,
जिस घर में बसे बेटी मुल्ज़िम हैं मर्द सारे .
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लड़की जो बढे आगे रट्टू का मिले ओहदा ,
दिमाग खुद में ज्यादा माने हैं मर्द सारे .
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जिस काम में भी देखें बढ़ते ये जग में औरत ,
मिलकर ये बाधा उसमे डाले हैं मर्द सारे .
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मिलती जो रियायत है औरत को हुकूमत से ,
जरिया बनाके उसको लेते हैं मर्द सारे .
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आरामतलब जीवन औरत के दम पे पायें ,
आसूदा न दो घड़ियाँ देते हैं मर्द सारे .
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पाए जो बुलंदी वो इनाने-सल्तनत में ,
इमदाद-ए-आशनाई कहते हैं मर्द सारे .
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बाज़ार-ए-गुलामों से खरीदकर हैं लाते ,
इल्ज़ाम-ए-बदचलन उसे देते हैं मर्द सारे.
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मेहर न मिले मन का तो मारते जलाकर ,
खुद पे हुए ज़ुल्मों को रोते हैं मर्द सारे .
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हालात ''शालिनी''ही क्या -क्या बताये तुमको ,
देखो इन्हें पलटकर कैसे हैं मर्द सारे .
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शब्दार्थ:-ठाकुर -परमेश्वर ,कैसर-सम्राट ,आशनाई-प्रेम दोस्ती ,इमदाद -मदद ,आसूदा-निश्चित और सुखी ,इमदाद-ए-सल्तनत -शासन सूत्र .

              शालिनी कौशिक 
                    [कौशल ]



शनिवार, 6 जुलाई 2013

क्या ये जनता भोली कही जाएगी ?


   
''जवां सितारों को गर्दिश सिखा रहा था ,
 कल उसके हाथ का कंगन घुमा रहा था .
 उसी दिए ने जलाया मेरी हथेली को ,
  जिसकी लौ को हवा से बचा रहा था .''
तनवीर गाजी का ये शेर बयां करता है वह हालात  जो रु-ब-रु कराते हैं हमें हमारे सच से ,हम वही हैं जो सदैव से अपने किये की जिम्मेदारी लेने से बचते रहे हैं ,हम वही हैं जो अपने साथ कुछ भी बुरा घटित होता है तो उसकी जिम्मेदारी दूसरों पर थोपते रहते हैं हाँ इसमें यह अपवाद अवश्य है कि यदि कुछ भी अच्छा हमारे साथ होता है तो उसका श्रेय हम किसी दूसरे को लेने नहीं देते -''वह हमारी काबिलियत है ,,वह हमारा सौभाग्य है ,हमने अपनी प्रतिभा के ,मेहनत के बल पर उसे हासिल किया है .''...ऐसे ऐसे न जाने कितने महिमा मंडन हम स्वयं के लिए करते हैं और बुरा होने पर .....यदि कहीं किसी महिला ,लड़की के साथ छेड़खानी देखते हैं तो पहले बचकर निकलते हैं फिर कहते हैं कि माहौल बहुत ख़राब है ,यदि किसी के साथ चोरी ,लूट होते देखते हैं तो आँखें बंद कर पुलिस की प्रतीक्षा करते हैं आदि अदि .आज जनता जिन हालात से दो चार हो रही है उसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है ,एक तरह से सही भी है क्योंकि परिवार के बड़े का यह दायित्व बनता है कि वह परिवार की हर तरह की ज़रुरत को देखे और पूरी करे व् समस्याओं से भली भांति निबटे किन्तु  इससे परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती .
  *अभी हाल ही में १६ सितम्बर २०१२ को दिल्ली में दामिनी गैंगरेप कांड हुआ .जब तक बस में दामिनी व् उसका दोस्त थे किसी को जानकारी नहीं थी किन्तु जब वे सड़क पर गिरे हुए थे वस्त्र विहीन रक्त रंजित पड़े हुए थे क्या जनता में से किसी एक ने भी उनके पास जाकर मानव होने का सबूत दिया ,नहीं दिया ,बल्कि सभी गाड़ियाँ बचा-बचाकर निकल ले गए और सब कुछ पुलिस पर छोड़ दिया गया ,ये तो ,ये तो बस के भीतर कांड हो रहा था कोई नहीं जानता था कि क्या हो रहा है किन्तु २ अप्रैल २०१३ को कांधला [शामली]में चार बहनों पर तेजाब फेंका गया .एक बहन ने एक आरोपी को पकड़ा भी किन्तु जनता की व्यस्त आवाजाही की वह सड़क क्यूं नपुंसक बन गयी न तो किसी  आरोपी को तब पकड़ा और न ही बहनों की सहायता को आगे बढ़ी और वे बहनें खुद ही किसी तरह रिक्शा करके अस्पताल गयी .क्या ऐसी जनता को मदद का हक़दार कहा जा सकता है ? 
*दिनदहाड़े क़त्ल होते हैं ,लोगों के बीच में होते हैं जनता आरोपियों को पहचानती है ,आरम्भ में भावुकतावश गवाही भी देती है किन्तु बाद में होश में आये हुए की तरह अदालत में जाकर मुकर जाती है क्या कानून की सहायता जनता का कर्तव्य नहीं है ?क्या अपराधियों के इस तरह खुलेआम फिरने में जनता स्वयं मददगार नहीं है ?वीरप्पन जैसे कुख्यात अपराधी जो कानून व् प्रशासन की नाक में दम किये रहते हैं ,निर्दोषों का क़त्ल करते हैं क्या जनता की मदद  के बगैर वीरप्पन  इतने लम्बे समय तक कानून को धोखा दे सकता था ?
*खुलेआम लड़कियों के साथ छेड़खानी होती है दुष्कर्म की घटनाएँ बढ़ रही हैं और जनता धर्म,जाति व् वर्गों में ही उलझी हुई है .जिनके लड़के ऐसी वारदातें कर रहे हैं वे स्वयं दूसरे पक्ष पर दोषारोपण कर अपने लड़कों  को बचा रहे हैं  ,जनता में से ही एक वर्ग ऐसी घटनाओं का विरोध करने वालों को अंजाम भुगतने की धमकी दे रहा है ,क्या ये जनता की कारस्तानियाँ नहीं हैं ?क्या ये सभी की जानकारी में नहीं हैं ?
*खाद्य पदार्थों की बिक्री करने वाले व्यापारी अपने यहाँ असली नकली सभी तरह  का सामान रखते हैं .अनपढ़ ,सीधे साधे लोगों को यदि किसी सामान की ,क्योंकि उनके द्वारा उसकी मिलावट की जाँच किया जाना संभव नहीं होता इसलिए खुले रूप में बिक्री करते हैं और यदि पकड़ लिए जाएँ तो कहते हैं कि ''हमें अपने  बच्चे पालने हैं  ''क्या ये जनता नहीं है जिसे अपने बच्चे तभी पालने हैं  जब वह दूसरे के बच्चे मार ले .और ये तो पकडे जाने पर हाल हैं वर्ना मामला तो इससे पहले ही जाँच अधिकारी के आने की सूचना मिल जाने के कारण सामान को खुर्द बुर्द कर पहले ही रफा दफा कर दिया जाता है और व्यापारी को क्लीन चिट मिल जाती है और पकडे जाने में भी जनता की कोई निस्वार्थ कार्यवाही नहीं बल्कि एक गलत काम करने वाला अपनी प्रतिस्पर्धा के कारण अपने प्रतिद्वंदी को पकडवा देता है .क्या ये जनता भोली कही जाएगी ?
*अदालतों में काम नहीं होता इसी जनता की आम शिकायत है जबकि मुक़दमे जनता के ,वादी-प्रतिवादी जनता ,कभी वादी द्वारा अनुपस्थिति की दरख्वास्त तो कभी प्रतिवादी द्वारा ,वकील की अनुपस्थिति को तो कोर्ट कोई महत्व नहीं देती ,उस पर तारीख-पे तारीख पे तारीख का रोना भी जनता ही रोती है  ,अदालती कार्यवाही  को बेकार भी जनता ही कहती है क्या उसका ऐसी स्थिति में कोई योगदान नहीं ?
*बिजली के लिए पहले लगाये गए तारों पर कटिया डालकर बिजली आसानी से अवैध रूप से ली जा रही थी जब नए तार लगाने के लिए बिजली कर्मचारी जनता के बीच पहुँचते हैं तो उन्हें वही न्यायप्रिय जनता मार-पीटकर क्यूं भगा देती है मात्र इसलिए क्योंकि अब वे तार रबड़ के हैं और कटिया डालकर अवैध रूप से बिजली लेना संभव नहीं रहेगा .
*धूम्रपान सार्वजानिक स्थलों पर मना किन्तु जनता जब तब इस कानून का उल्लंघन करती है .गुटखा खाना मना पर कहाँ मना हुआ बिकना जनता चोरी छिपे इसका प्रयोग करती है .गाड़ियों पर काले शीशे माना किन्तु अब  भी दिखती हैं जनता की काले शीशे  की गाड़ियाँ .सिगरते १८ साल से कम उम्र के बच्चे को बेचना माना किन्तु वे खरीदते भी हैं और पीते भी हैं जनता के बीच में ही .
*कुपोषण का ठीकरा भी अब सरकार के माथे फोड़ा जा रहा है ,कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अन्न सड़ रहा है ,जनता को नहीं बांटा  जा रहा है ,सरकार की प्रतिबद्धता में कमी है किन्तु यदि सरकार इन्हें जनता में बाँटने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों में वितरित भी कर दे तो हाल क्या होगा ?जनता निश्चित दिन लेने पहुंचेगी और उसे अगले दिन ,किसी और समय कहकर टरका दिया जायेगा और जब बांटा जायेगा तब ऐसी आपाधापी में कि जनता को मात्र ऐसे पहुंचेगा जैसे ऊंट के मुहं में जीरा .
   *सरकार की योजना मिड-डे-मील ,जो अन्न आता है बच्चों में बाँटने के लिए कितने ही स्कूल उसे बाज़ार में बेच रहे हैं ऐसी सूचनाएँ सभी  जानते हैं .
  सरकार चाहे कौंग्रेस की हो या भाजपा की या जनता दल या किसी अन्य दल की ,जनता के हित  में बहुत सी योजनायें बनती हैं किन्तु पहले नेता ,फिर सरकारी अधिकारी फिर व्यापारी और फिर जनता में से हम में से ही कुछ दबंग उन्हें निष्फल बना  देते हैं .कुछ लोगों के लिए ही ये लाभकारी रहती हैं और जनता जनता का एक बड़ा वर्ग इसके लिए तरसता ही रहता है .क्यूं जनता यहाँ अपनी जिम्मेदारी से इंकार करती है जबकि इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता की ही है .
जब चुनाव का वक्त आता है ,वोट देने का नंबर आता है तब जनता गरीबी के कारण शराब ,साड़ी में बिक जाती है किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल गरीब जनता  ही बिकती है ,अमीर जनता भी बिकती है ,वह शरीफ ,योग्य ,ईमानदार प्रत्याशी के स्थान पर देखती है दबंगई ,वह देखती है कि किस प्रत्याशी में दम है कि मेरे मुक़दमे अदालत के बाहर  निबटवा दे ,मुझे अपने प्रभाव से टेंडर दिलवा दे ,दूसरे की जमीन का ये हिस्सा मुझे गुंडागर्दी से दिलवा दे ,मेरे साथ खड़ा हो तो दूसरों को भय ग्रस्त  करा दे .ऐसे में जनता सरकार को दोष देने का अधिकार ही कहाँ रखती है जबकि वह स्वयं भी इस देश को लूटकर खाने में लगी है .जब कोई कालिदास बन उसी शाख पर बैठकर उसी को काट रहा हो तो क्या उसे होने वाले नुकसान के लिए आकाश या पाताल को उत्तरदायी ठहराया जायेगा .डॉ.ओ.पी.वर्मा कहते हैं -
  ''बाग को माली जलाना चाहता है ,
 तुम नए पौधे लगाकर क्या करोगे .
लूट ली डोली कहारों ने स्वयं ही ,
सेज दुल्हन की सजाकर क्या करोगे .''
      शालिनी कौशिक  
             [कौशल  ]

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

तवज्जह देना ''शालिनी'' की तहकीकात को ,



गफलती में अपनी हम मार खा गए ,
गरकाब अपनी नैया हम खुद करा गए .
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गरजें जो मेघ आकर नाकाम बरसने में ,
गदगद हों बीज बोके अपने घर में आ गए .
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ख्वाजा बने हैं फिरते ख्वाहिश है गद्दियों की ,
संन्यासी समझ हम तो इन्हें सिर बिठा गए.
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रहमान पसोपेश में पहलू बचा रहे हैं ,
हमदर्द मुझ से बढ़कर धरती पे आ गए .
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मुखालफत की खातिर हदें तोड़ें तहजीबों की ,
दानाई में हमारी ये दीमक लगा गए .
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खुद्नुमा खुदगर्जी में डूबे खुमार में ,
खुद्नुमाई करके ये हमको लुभा गए .
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अब तक आज़ाद न हम एक जाल से ,
फिर दायमी इस धुंध में क्यूंकर समां गए .
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काजल की ये कोठरी जिनके यहाँ रहन ,
खिलौना उनके हाथ का खुद को बना गए .
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तवज्जह देना ''शालिनी'' की तहकीकात को ,
रहनुमा ही राह से हमको हटा गए .
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शब्दार्थ :-गफलती-असावधानी , पसोपेश-असमंजस ,गरकाब-जलमग्न ,गदगद-आनद विभोर ,गद्दी-राजा आदि का पद ,ख्वाजा-महात्मा ,रहमान-ईश्वर,खुद्नुमा-आत्मप्रशंसक,खुद्नुमाई-आत्मप्रशंसा की नुमाइश ,दानाई-बुद्धिमानी ,दायमी-चिरस्थायी ,रहन-गिरवी ,तवज्जह-ध्यान ,तहकीकात-खोज ,पहलू बचाना -बगल से निकल जाना .
  
                                              शालिनी कौशिक 
                                                         [कौशल ]


मंगलवार, 2 जुलाई 2013

लड़कों को क्या पता -घर कैसे बनता है ...

लड़कों को क्या पता -घर कैसे बनता है ...
Reckless : Cheerful member of societyReckless : a chef play with the knife Stock PhotoReckless : High-risk business, such as tightrope
एक समाचार -कैप्टेन ने फांसी लगाकर जान दी ,.
बरेली में तैनात २६ वर्षीय वरुण वत्स ,जिनकी पिछले वर्ष २८ जून को एच.सी.एल .कंपनी में सोफ्टवेयर  इंजीनियर रुपाली से शादी हुई थी ,ने घटना के कुछ देर पहले ही गुडगाँव में रह रही पत्नी से फोन पर बात की थी जिसमे दोनों के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया था और समाचार के मुताबिक नौकरी के कारण पति को समय न दे पाने के कारण दोनों में अक्सर विवाद होता था .
   ये स्थिति आज केवल एक घर में नहीं है वरन आज आधुनिकता की होड़ में लगे अधिकांश परिवारों में यही स्थिति देखने को मिलेगी .विवाह करते वक़्त लड़कों के लिए प्राथमिकता में वही लड़कियां हैं जो सर्विस करती हैं .यही नहीं एक तरह से आज लड़कियों के स्थान पर उन्हें पत्नी के रूप में एक मशीन चाहिए जो उनके निर्देशानुसार कार्य करती रहे ,अर्थात पहले सुबह को घर के काम निबटाये ,फिर अपने ऑफिस जाये नौकरी करे और फिर घर आकर भी सारे काम करे .बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई मशीन करती है .अब ऐसे में यदि कोई पति पत्नी से अलग से अपने लिए भी समय चाहता है तो उसकी यह उम्मीद तो बेमानी ही कही जाएगी .
  आरम्भ से लेकर आज तक महिलाओं के घर के कामों को कोई तरजीह नहीं दे गयी उनके लिए तो यही समझा जाता है कि वे तो यूँ ही हो जाते हैं .हमेशा बाहर जाकर अपनी मेहनत को ही पुरुषों ने महत्व दिया है और इसी का नतीजा है कि आज घर धर्मशाला बनकर रह गए हैं पुरुषों के रंग में रंगी नारियां भी आज काम नहीं वे भी अब वही सब कुछ करना चाहती है जो किसी भी तरह से पुरुषों को उनके सामने नीचा दिखा सके और घर इसलिये वे यहाँ भी पुरुषों के हाथ की कठपुतली ही बनकर रह गयी हैं और इसी विचारधारा के कारण घर ऐसे धर्मशाला बन गए हैं जहाँ दोनों ही कुछ समय बिताते हैं और फिर अपने गंतव्य की ओर मतलब ऑफिस की ओर चल देते हैं और इसका जो दुष्प्रभाव पड़ता है वह नारी पर ही पड़ता है क्योंकि घर तो उसका कार्यक्षेत्र माना जाता है और माना जाता रहेगा और ऐसे में यदि घर में कोई नागवार स्थिति आती है तो दोष उसी नारी के मत्थे मढ़ा जाता रहेगा  और उस पर तुर्रा ये कि आज महंगाई इतनी ज्यादा हो गयी है कि दोनों के काम करने पर ही घर चल सकता है ,मुझे तो नहीं लगता क्योंकि इस तरह से नारी के सौन्दर्य प्रसाधन और छोटे छोटे  बहुत  से व्यर्थ  के खर्चे  भी इसमें  जुड़ जाते हैं और घर की अर्थव्यवस्था वही डांवाडोल बनी रहती है किन्तु मेरी सोच को कौन देखता है देखते हैं नारी सशक्तिकरण जिसका फायदा आज भी पुरुष ही उठा रहा है और नारी को स्वतंत्रता के नाम पर बैलों की तरह जोत रहा है .
   पहले पति कमाकर लाता  था और पत्नी घर संभालती थी किन्तु आज दोनों को घर से जाने की जल्दी जिसमे पिसती है औरत ,जिसके काम के घंटे कभी कभी तो १८ भी हो जाते हैं और इस स्थिति के कारण बच्चों को जो लापरवाही झेलनी पड़ती है और उन्हें जो कुछ भी करने की आज़ादी मिल जाती है वह अलग ,घर में कोई होता ही नहीं जो देखे कि बच्चा किस दिशा में जा रहा है .वे पैसे से सब कुछ खरीदकर बच्चों के लिए सुख सुविधा का तमाम सामान जुटा देते हैं किन्तु जो सबसे ज़रूरी है वही नहीं दे पाते ,वह प्यार ,जो उन्हें जीवन के रणक्षेत्र में आगे बढ़ने को प्रेरित करता है ,वह स्नेह ,जो उन्हें देता है वह ताकत जिससे वे कड़े संघर्ष के बाद भी सफलता हासिल करते हैं ,वह समझ ,जो उनमे भरता  है आत्मविश्वास और ये सब नहीं कर पाते हैं इसलिये होते हैं  आरुषि जैसे  कांड .
   आज ये बदलती हुई प्राथमिकताओं का ही असर है कि शादी के वक़्त तो लड़की सुन्दर हो ,पढ़ी लिखी हो ,गृह्कार्यदक्ष हो नौकरी करती हो,देखा जाता है तब तो ऐसी कोई प्राथमिकता नहीं होती कि वह पति को समय भी दे और शादी के बाद ये भी जुड़ जाती है और फलस्वरूप होते हैं वरुण वत्स जैसे दुखद हादसे जिसके एक मात्र जिम्मेदार आज के युवा ही हैं ,लड़के ही हैं जिन्हें अपने स्टेटस के लिए लड़की चाहिए ''जॉब वाली ''क्योंकि वे नहीं जानते कि घर कैसे बनता है .
             शालिनी कौशिक
  [WOMAN ABOUT MAN ]