गुरुवार, 31 जुलाई 2014

कब मिलेगा फरीदा को न्याय


मकान में उतरा करंट, फुफेरी बहन झुलसी, लोगों ने जाम लगाया
अमर उजाला ब्यूरो
खतौली। बरसात के दौरान अचानक हाईटेंशन लाइन का करंट मकान में दौड़ जाने से मासूम बालक की मौत हो गई, जबकि उसकी फुफेरी बहन झुलस गई। बालक की मौत से गुस्साए लोगों ने बिजली विभाग के खिलाफ हंगामा कर प्रदर्शन किया और शव को सड़क पर रख कर जाम लगा दिया। सूचना पर पहुंचे एसडीएम और सीओ ने परिजनों और लोगों को समझा बुझाकर जाम खुलवाया।
बालाजीपुरम निवासी विनोद पुत्र प्रकाश के मकान के पास से ही हाईटेंशन लाइन जा रही है, जिसकी एंगल दीवार पर ही लगा रखी है। मंगलवार दाेपहर करीब एक बजे बरसात के दौरान अचानक हाईटेंशन लाइन के एंगल पर लगा इंसुलेटर फट गया और करंट मकान में फैल गया। इस दौरान विनोद का चार साल का बेटा मानू जीने पर खेल रहा था, जिसकी करंट से मौत हो गई।
जबकि उसकी फुफेरी बहन बबीता झुलस गई। बालक की मौत से परिजनों में कोहराम मच गया। सूचना पर माेहल्ले वालों की भीड़ एकत्र हो गई। फोन करके आपूर्ति बंद कराई गई। लोगों ने बिजली वालों के खिलाफ हंगामा करते हुए शव को इंदिरा मूर्ति के पास सड़क पर रख कर जाम लगा दिया। करीब पौने चार बजे एसडीएम वैभव शर्मा, सीओ डीके मित्तल, इंस्पेक्टर गजेंद्र सिंंह मौके पर पहुंचे और पीड़िताें को उचित मुआवजा दिलवाने, इस लाइन हटवाने का आश्वासन देकर लोगों को शांत किया। तब पुलिस ने बालक के शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा। बच्चे की मां लता ने बिजली विभाग के खिलाफ तहरीर दी है।[[अमर उजाला से साभार ]
अब बात फरीदा की 
अभी पिछले दिनों की बात है एक महिला बेगम फरीदा पत्नी मोहम्मद महबूब ,इस्लाम नगर, कांधला [शामली ] मेरे पास एक शपथपत्र बनवाने के लिए आई .जब उसके उसमे दस्तखत की बात आई तो उसने उसमे अंगूठा लगाने की बात की तो मैंने उसे उसमे बाएं हाथ का अंगूठा लगाने को कहा क्योंकि कानूनी दस्तावेजों में बायें हाथ के अंगूठे को ही प्रामाणिक माना जाता है ,तब वह कहने लगी कि उसके बायाँ हाथ ही है  तब मेरा ध्यान उसके चुन्नी से ढके हुए हाथ पर गया जो कि कटा हुआ था ,मैंने पूछा कि यह कैसे कटा तब वह कहने लगी कि हाईटेंशन लाइन का तार गिर गया था ,मैंने देखा कि उसके पैर की  उँगलियाँ भी सब ऐसे जुड़ गयी थी कि वे कभी अलग थी ऐसा कोई नहीं कह सकता था .मैंने उससे पूछा कि ये कब हुआ तो उसने कहा कि 20-21 साल हो गए हैं  ,तब मैंने पूछा कि तुम्हें कोई मुआवज़ा मिला तब वह कहने लगी कि सब जगह जाकर देख लिया अपने ही पैसे खर्च हो गए मिला एक रुपया भी नहीं .
    अब ऐसे में जब आज तक फरीदा ही न्याय के लिए भटक भटककर थक हारकर अपने घर बैठ चुकी है तब बबीता  के लिए न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

शालिनी कौशिक 
    [कौशल ]

सोमवार, 28 जुलाई 2014

सभी को ईद मुबारक के साथ ही हरियाली तीज की शुभकामनायें

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ईद मुबारक के  साथ ही सभी को हरियाली तीज की  शुभकामनायें

मुबारकबाद सबको दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
महक इस मौके में भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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मुब्तला आज हर बंदा ,महफ़िल -ए -रंग ज़माने में ,
मिलनसारी यहाँ भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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मुक़द्दस दूज का महताब ,मुकम्मल हो गए रमजान ,
शमा हर रोशन अब कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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रहे मज़लूम न कोई ,न हो मज़रूह हमारे से ,
मरज़ हर दूर अब कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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ईद खुशियाँ मनाने को ,ख़ुदा का सबको है तौहफा ,
मिठास मुरौव्वत की भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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भुलाकर मज़हबी मुलम्मे ,मुहब्बत से गले मिल लें ,
मुस्तहक यारों का कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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फ़तह हो बस शराफत की ,तरक्की पाए बस नेकी ,
फरदा यूँ हरेक कर दूँ ,जुदा अंदाज़  हैं मेरे .
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फरहत बख्शे फरिश्तों को ,खुदा खुद ही यहाँ आकर ,
फलक इन नामों से भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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फ़िरासत से खुदा भर दे ,बधाई ''शालिनी ''जो दे ,
फिर उसमे फुलवारी भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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शब्दार्थ -मजलूम -अत्याचार से पीड़ित ,मजरूह-घायल ,मुरौव्वत-मानवता ,मुलम्मे-दिखावे ,मुस्तहक-अधिकारी ,फरदा -आने वाला  दिन ,फरहत-ख़ुशी ,फरिश्तों -सात्विक वृति वाला व्यक्ति। फ़िरासत -समझदारी।
और ईद मुबारक के  साथ ही सभी को हरियाली तीज की  शुभकामनायें


शालिनी कौशिक
[कौशल ]

रविवार, 27 जुलाई 2014

सानिया विरोध :भाजपा की अंदरुनी शक्ल


आपने एक फ़िल्मी गाना तो सुना ही होगा -
''मेरी मर्ज़ी
    मैं चाहे ये करूँ ,मैं चाहे वो करूँ ,
                       मेरी मर्ज़ी''
और इसी गाने की तर्ज़ पर आप आजकल एक सत्तारूढ़ दल को देख व् परख सकते हैं जो इसे कुछ मोड़कर यूँ गाते फिरते हैं -
''मेरी मर्ज़ी
    मैं चाहे ये कहूँ  ,मैं चाहे वो कहूँ  ,
                       मेरी मर्ज़ी''
आप सभी वैसे इनके पक्ष में कभी नहीं बोलेंगे किन्तु जो सच्चाई है उसे नाकारा भी तो नहीं जा सकता और सच्चाई ये है कि सोनिया गांधी जिनकी शादी भारतीय नागरिक राजीव गांधी से हुई उन्हें कभी भारत की बहू न स्वीकारने वाले भाजपाई हमेशा उन्हें इटली की बेटी ही कहते फिरते हैं और आज जब अपनी बेटी पर बात आई तो उसे अपनी बेटी न कहकर पाकिस्तान की बहू कहकर अपने से अलग करने की कोशिश की जा रही है .
       सानिया मिर्जा भारत की एक ऐसी टेनिस स्टार जिसने भारत का नाम टेनिस के आकाश में सुनहरे अक्षरों में अंकित किया .भारत में उनसे पहले कोई महिला टेनिस खिलाड़ी हुई हो हमें याद नहीं पड़ता .जिस दिन से सानिया मिर्जा ने इस क्षेत्र में पदार्पण किया उस दिन से वे भारत के लिए गौरव का विषय ही रही हैं.
     कभी उनकी ड्रैस को लेकर तो कभी जीवन शैली को लेकर मुस्लिम वर्ग द्वारा ही विवाद खड़े किये जाते रहे हैं किन्तु उन सबको दरकिनार कर वे एक मजबूत शख्सियत के रूप में टेनिस से जुडी रही और निरंतर प्रगति पथ पर आगे बढ़ती रही .जहाँ भारत से प्रतिभा का निरंतर पलायन जारी है वहीँ सानिया ने पाकिस्तानी खिलाड़ी शोएब मलिक से विवाह के बावजूद भारत से ही जुड़े रहने में गर्व की अनुभूति की और इस सबके बावजूद अपने को सबसे बड़ा देशभक्त मानने वाली पार्टी के तेलंगाना के के.लक्ष्मण कहते हैं ''कि सानिया पाकिस्तान की बहू हैं .''......हाँ हैं ,पर    उससे पहले वे भारत की बेटी हैं और पाकिस्तान की बहू होने से भी उन पर कोई कलंक नहीं लग जाता क्योंकि पाकिस्तान भी अपने देश का ही अंग है अपना ही भाई है इस तरह की बयानबाजी को लेकर सानिया का यह कहना -''कि उन्हें नहीं पता कि कब तक उन्हें भारतीयता और देशभक्ति साबित करनी पड़ेगी .''न केवल उनके दिल की पीड़ा को वरन भारत में रह रहे हर मुसलमान के दिल की पीड़ा को ज़ाहिर करता है .

Sania Mirza Condemns BJP Leader's Comments: 'I Am Indian, Will Always Remain One'

Sania Mirza Condemns BJP Leader's Comments: 'I Am Indian, Will Always Remain One'
ऐसा नहीं है कि मात्र हिन्दूओं ने ही इस देश को आज़ादी दिलाई वरन हर धर्म हर कौम के नुमाइंदे ने इस देश को आज़ादी दिलाने में अपनी जान कुर्बान की है फिर चंद भटके हुए लोगों के कारण पूरी कौम को इस तरह गद्दार करार देना व् उसकी देशभक्ति पर शक करना इस देश की जड़ों को काटने के समान है जो आपसी प्रेम और सद्भाव की खाद और पानी से ही फलती फूलती आई हैं ..प्रसिद्द शायर मुज़फ्फर रज्मी इसी दुःख को अपने शब्दों में बहुत ही भावुक अंदाज़ में बयां करते हैं -
''वो ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने ,
   लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पायी .''
 साथ ही ,सानिया एक बेहतरीन खिलाडी हैं खिलाड़ी से ये उम्मीद करना कि वे उनके साथ आंदोलन में झंडे लेकर चलती ,नारे लगाती ,भूख हड़ताल करती तो इसे गलत ही कहा जायेगा ,खिलाडी  का काम अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हुए अच्छा प्रदर्शन करना होता है और देश का नाम ऊँचा करना होता है और सानिया ने यह काम बखूबी किया है और तेलंगाना इस देश का ही एक हिस्सा है और ऐसे में उनका देश के लिए कुछ करना तेलंगाना के लिए भी करने के समान माना जायेगा .फिर किसी को ब्रांड एम्बेसडर तभी बनाया जाता है जब उसकी कुछ उपलब्धियां हो ,नाम हो ,अब किसी सड़क चलते किसी सामान्य जन को तो ब्रांड एम्बेसडर बनाया नहीं जाता .साफ है कि उसकी उपलब्धियों से फायदा उठकर अपना फायदा करना इस कार्य में निहित है ऐसे में सानिया को ब्रांड एम्बेसडर बनाकर सानिया पर नहीं वरन स्वयं तेलंगाना के हित में ही कार्य किया जा रहा है क्योंकि इस तरह सानिया की उपलब्धियों से फायदा उठाया जायेगा .


      और रही भाजपा की बात तो उसने हर बार महिलाओं के प्रति असम्मान की भावना को ही तरजीह दी है .जिस पद के योग्य इस बार सुषमा स्वराज जी थी उस पर नरेंद्र मोदी जी को सुशोभित किया गया है जबकि विपक्ष का नेता लोकसभा में वही होता है जो पार्टी में सर्वश्रेष्ठ हो .यही नहीं इनके एक नेता सुब्रमणियम स्वामी उन्हें तो लगता है कि सोनिया हो या सानिया सभी तरफ आग उगलनी है .इनके नेता गिरिराज किशोर सोनिया गांधी के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं और पार्टी में एक आवाज़ भी उन्हें फटकारती नहीं और इस पर भी यह पार्टी महिला सम्मान और सुरक्षा की बात जोर शोर से करती है और सामान्य जन की भाषा में कहा जाये तो इसके लिए ''पदम श्री '' लेना चाहती है जबकि अपनी ऐसी विचारधारा से यह स्वयं ही अपनी मंशा को संदेह के घेरे में ले आती है  जब भाजपा देश की इन सामर्थ्यवान महिलाओं के प्रति यह भाव रखती है तो सामान्य कमजोर महिलाओं के प्रति क्या भाव रखेगी इसकी सहज कल्पना की जा सकती है .कल तक यह चीख-चीखकर महिलाओं के लिए आवाज़ उठा रही थी पर आज स्थिति अलग है आज यह सत्ता मद में डूबी है अब तो इसके लिए बस यही कहा जा सकता है -

''आज माना कि इक़तदार में हो ,हुक्म रानी के तुम खुमार में हो ,
ये भी मुमकिन है वक्त ले करवट ,पाँव ऊपर हों सर तगार में हो .''

शालिनी कौशिक 
      [कौशल ]

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

धर्म भी आज यही कह रहा है -





     कविवर गोपाल दास ''नीरज''ने कहा है -
  ''जितनी देखी दुनिया सबकी दुल्हन देखी ताले में
   कोई कैद पड़ा मस्जिद में ,कोई बंद शिवाले में ,
    किसको अपना हाथ थमा दूं किसको अपना मन दे दूँ ,
   कोई लूटे अंधियारे में ,कोई ठगे उजाले में .''
धर्म के   ये ही दो रूप हमें भी दृष्टिगोचर होते हैं .कोई धर्म के पीछे अँधा है तो किसी के लिए धर्म मात्र दिखावा बनकर रह गया है .धर्म के नाम पर सम्मेलनों की ,विवादों की ,शोर-शराबे की संख्या तो दिन-प्रतिदिन तेजी से बढती जा रही है लेकिन जो धर्म का मर्म है उसे एक ओर रख दिया गया है .आज जहाँ देखिये कथा वाचक कहीं भगवतगीता ,कहीं रामायण बांचते नज़र आयेंगे ,महिलाओं के सत्संगी संगठन नज़र आएंगे .विभिन्न समितियां कथा समिति आदि नज़र आएँगी लेकिन यदि आप इन धार्मिक समारोहों में कथित सौभाग्य से  सम्मिलित होते हैं तो ये आपको पुरुषों का  बड़े अधिकारियों, नेताओं से जुड़ने का बहाना ,महिलाओं का एक दूसरे की चुगली करने का बहाना  ही नज़र आएगा .
     दो धर्म विशेष ऐसे जिनमे एक में संगीत पर पाबन्दी है तो गौर फरमाएं तो सर्वाधिक कव्वाली,ग़ज़ल गायक आपको उसी धर्म विशेष में मिलेंगे और एक अन्य धर्म के प्रवचन स्थल पर उन उपदेशों को दरकिनार कर उनके ही धर्मावलम्बियों का बड़ी संख्या आगमन भी दिखेगा .
     धर्मान्धता देखकर ही कबीर दास ने कहा था -
''पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहार ,
ताते ये चाकी भली ,पीस खाए संसार .''

''कांकर पाथर जोरि के मस्जिद लई बनाये ,
ता चढ़ी मुल्ला बाँगी  दे ,क्या बहरा हुआ खुदाए .''
इन  धर्मों के कामों में यदि कुछ कहा जाये तो बबाल पैदा हो जाते हैं  और न कहने पर जो शोर-शराबे की मार पड़ती है वह असहनीय है .लाउडस्पीकर ,जेनरेटर,डी.जे.जैसे अत्याधुनिक यंत्रों के प्रयोग ने आज जनता को वास्तव में ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन के रूप में सिरदर्द दे दिया है .रोज कोई न कोई आयोजन है और प्रतिदिन उपदेशों के नदियाँ बह रही हैं .फिर भी देश समाज के हाल बेहाल हुए जा रहे हैं .
   कहीं भजन बजता है -
''भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत करना ,
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम कांटे बनकर मत रहना .''

लोग गाते हैं गुनगुनाते हैं ,तालियाँ बजाते हैं और करते क्या हैं वही जो करना है -लूट -खसोट ,इधर का मॉल उधर -उधर का मॉल इधर .चारों ओर ढकोसले बाजी चल रही है ..भगवा वेश में २५-३० लोगों की बस रोज किसी न किसी शहर में पहुँचती है ,दिन निर्धारित है किस किस दिन आएंगे .भगवा वस्त्र पहनकर आते हैं लोगों से, दुकानदारों से धार्मिक भावना के नाम पर ५०-५० पैसे लेते हैं और अपने अड्डे पर पहुंचकर शराब ,जुए,भांग में उड़ाते हैं .धर्म आज ऐसे ही दिखावों का केंद्र बनकर रह गया है .
     जगह जगह आश्रम खुले हैं .अन्दर के धंधे सभी जानते हैं यही कि ये आश्रम राजनीतिज्ञों के दम पर फल फूल रहे हैं और आम जनता बेवकूफ बन उन साधू महात्माओं के चरण पूज रही है .जिनके काले कारनामे आये दिन सभी के सामने आ रहे हैं .कहने को इन साधू संतों को सांसारिक माया-मोह से कुछ लेना -देना नहीं और  सांसारिक  सुख सुविधा का हर सामान इनके आश्रमों में भरा पड़ा है .दिन प्रतिदिन आश्रमों की चारदीवारी बढती जा रही है और कितने ही अपराधिक कार्य यहाँ से संचालित किये जाते हैं और प्रशासन जनता में इनके प्रति निष्ठा के कारण उसके भड़कने की आशंका से इनपर हाथ डालते हुए घबराते हैं और इसी का दुष्प्रभाव है कि आज जनता की धर्मान्धता का लाभ उठाकर ये आश्रम बहुत बड़े क्षेत्र को निगलते जा रहे हैं .
   इसी कारण लगता है कि आज धर्म भी जनता से अपना पीछा छुड़ाने के मूड में है क्योंकि जो काम आज धर्मस्थलों से संचालित हो रहे हैं और धर्म के नाम पर संचालित किये जा  रहे है उन्हें हमारे किसी भी धर्म ने महत्व नहीं दिया .इसलिए लगता है कि धर्म भी आज यही कह रहा है -
''वो आये मेरी कब्र पे दिया बुझाके चल दिए ,
दिए में जितना तेल था सर पे लगाके चल दिए .''
           शालिनी कौशिक
                  [कौशल ]


रविवार, 20 जुलाई 2014

विकास के लिए वी.आई.पी. के कन्धों के सहारे की उम्मीद आखिर क्यूँ ?


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Stephanie Strom
Bornc. 1963
Dickinson, Texas
Occupationjournalist
Notable credit(s)The New York Times
स्टेफ़नी स्ट्रॉम [अमर उजाला में प्रकाशित ] अपने एक आलेख ''बनारस को कैसे संवारेंगे मोदी '' में लिखती हैं -''इस शहर के लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिजली कब तक साथ देगी ?नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगा किनारे बसे इस शहर के लोगों को तकरीबन निर्बाध बिजली मिल रही है वरना पहले आठ से दस घण्टे उन्हें बिजली के बिना रहना पड़ता था .कालीन निर्यातक और कार डीलर एहसान खान कहते हैं पिछले महीने उन्हें जेनरेटर की खास ज़रुरत नहीं पड़ी .''
      ऐसे ही हाल इटावा मैनपुरी के होते हैं जब मुलायम सिंह सत्ता में आते हैं इसी तरह बादलपुर-सहारनपुर चमकते हैं जब मायावती सत्ता में आती हैं आखिर क्यों होता है ऐसा ? जिस देश में लोकतंत्र हो और लोकतंत्र को चलाने वाली प्रधान संस्था संसद के अहम सदन लोकसभा तक में यह रिवाज़ हो कि वहां लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने पर अध्यक्ष मात्र अध्यक्ष होगा किसी पार्टी विशेष का सदस्य नहीं ,वहां इस तरह का भेदभाव कहाँ तक स्वीकार्य हो सकता है और उस स्थिति में जहाँ देश का संविधान धर्म ,जाति ,लिंग तक के भेदभाव पर रोक लगाता है वहां क्षेत्र-क्षेत्र का भेद ,कि कहने को देश में बिजली का हाहाकार है ,अनुपलब्धता है ,स्वयं मेरे क्षेत्र में ही बिजली सुबह ४ बजे भाग जाती है और दिन में कभी १२ बजे तो कभी एक बजे आती है किन्तु वी.आई.पी. क्षेत्र में बिजली की वर्षा हो रही है ,जहाँ कहीं वी.आई.पी.दौरे हों वहां वी.आई.पी. की उपस्थिति तक बिजली उपस्थित और वी.आई.पी. के जाते ही ऐसे गायब जैसे गधे के सिर से सींग .कहाँ तक बर्दाश्त योग्य है .
   आज बनारस को मोदी मिल गए और मोदी प्रधानमंत्री हो गए तो बनारस के उत्थान की आशा की जा रही है ,इटावा मैनपुरी की जगमग से बदहाल यू.पी.की आँखें चौधियां रही हैं ,क्यूँ इस देश में हर जगह विकास के लिए वी.आई.पी. के कन्धों के सहारे की उम्मीद की जाती है ?क्यूँ अपने क्षेत्र का विधायक /सांसद सत्ताधारी दल का होते हुए भी अपना क्षेत्र प्रगति के लिए तरसता है ?और सत्ताधारी दल के सांसदों/विधायकों के क्षेत्र जब बदहाल अवस्था में हो तो विपक्षी दल के सांसदों/विधायकों से फिर आशा ही क्या की जा सकती है ?
   हमारे देश में सांसदों/विधायकों को अपने क्षेत्र में कार्यों के लिए निधि दी जाती है कार्य होते नहीं ,विकास होता नहीं और निधि बच जाती है क्षेत्र ज़रूरतमंद ही बने रहते हैं और सांसद/विधायक करोड़पति से अरबपति बनते जाते हैं पर तब भी वैसे वी.आई.पी. नहीं बन पाते जो अपने क्षेत्र का वैसा कल्याण कर सके जैसा कुछ विशेष वी.आई.पी,.कर पाते हैं.    देश के संविधान ने हर सांसद विधायक को बराबर की अहमियत दी है ,राष्ट्रपति के चुनाव में उनके वोट का मूल्य इस बात का पुख्ता सबूत है किन्तु इस सबके बावजूद वी.आई.पी. व् सामान्य सांसद/विधायक का अंतर साफ़ दिखाई देता है सब क्षेत्रों का वह उद्धार नहीं होता ,वह कल्याण नहीं होता जो इन वी.आई.पी. पसंद के क्षेत्रों का होता है और ऐसे में अपनी समस्याओं से छुटकारे का बस एक ही उपाय नज़र आता है ऐसे वी.आई.पी. की पसंद का क्षेत्र अपने क्षेत्र को बनाने की भगवान से प्रार्थना करना क्योंकि यदि मोदी ,मुलायम,मायावती जैसे वी.आई.पी. हमारे क्षेत्र से विधायक या सांसद होंगे तो हम भी गर्मी में सुहाने मौसम का ,सर्दी में गरमाई का और बरसात में पकोड़ों का आनंद ले रहे होंगे अर्थात हमारे क्षेत्र का भी कल्याण हो जायेगा .ऐसे में बस भगवान से यही प्रार्थना है -
  ''मोदी,मुलायम,मायावती दे दो अब भगवान ,
    इनके आने से बनें जन-जन के सब काम ,
   बिजली मिले चौबीस घंटे चमके अपना क्षेत्र
   हर मुश्किल से मुक्ति के होवें सब इंतज़ाम .''

शालिनी कौशिक
  [कौशल ]

शनिवार, 19 जुलाई 2014

लखनऊ की निर्भया की कहानी, पिता की जुबानी;ये है उत्तर प्रदेश की हवा सुहानी

खनऊ की निर्भया की कहानी, पिता की जुबानी

story of lucknow gangrape victim

मोहनलालगंज कोतवाली में बैठे उस दुबले-पतले शख्स का शरीर कांप रहा था। चेहरा दर्द, चिंता, उलझनों और अबूझ सवालों से बोझिल हो चुका था। मन कहीं खोया हुआ था।

रह-रहकर आंखें भीग जाती थीं। रुलाई रोकने की कोशिश में कई बार चेहरा दोनों हथेलियों से ढक लिया। डीआईजी नवनीत सिकेरा ने उनसे बातचीत शुरू की तो आंखों से आंसुओं का सैलाब निकल गया। बोले, ‘ऐसा क्यों हो गया?’

यह शख्स बलसिंहखेड़ा प्राथमिक विद्यालय में दरिंदगी की शिकार युवती के पिता हैं। उन्होंने बताया कि बेटी हिम्मत हारने वाली नहीं थी। छह साल पहले पति की मौत के बाद से वह अकेले ही बच्चों को संभाल रही थी। बोले-ससुरालवालों ने भी मुंह मोड़ लिया।

बेटी के लिए जिंदगी का एक-एक दिन बड़ा मुश्किल था। फोन पर वह अपनी तकलीफों का जिक्र करती तो कलेजा मुंह में आ जाता।

अक्सर वह बेटी से सबकुछ छोड़कर घर आने की बात कहते थे, तो बेटी उनसे सिर्फ जमाने से लड़ने का हौसला और आशीर्वाद मांगती थी।

कहती थी, ‘कुछ सपने हैं, जिन्हें पूरा करना है।’
बातचीत के दौरान जब लहूलुहान बेटी की जीजिविषा के बारे में चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने बताया कि बचपन से ही बहुत जुझारू थी। बड़ी होने के नाते उस पर जिम्मेदारियां ज्यादा थीं।

विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाए वह हिम्मत से काम लेती थी। उन्होंने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए बेटी की शादी जल्दी कर दी थी।

उसने इंटर तक की पढ़ाई की थी। पिता ने बताया कि दो माह पूर्व परिवार में एक शादी के सिलसिले में वह घर आई थी। इसके बाद से उससे सिर्फ फोन पर ही बातचीत हो रही थी।

युवती के पिता ने बताया कि वह देवरिया में शिक्षण कार्य करते हैं। युवती उनके तीन बच्चों में बड़ी थी। उसकी शादी 15 साल पहले देवरिया में ही हुई थी।

युवक राजधानी के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में संविदा पर नौकरी करता था। उसके 13 साल की बेटी और छह साल का बेटा है। दामाद की किडनी खराब थीं। बेटी ने अपनी एक किडनी पति को दे दी थी।

छह साल पहले दामाद की मौत हो गई। उसकी जगह बेटी को अस्पताल में नौकरी दे दी गई। वह दोनों बच्चों के साथ किराए के मकान में रहती थी।

उन्होंने बताया कि बृहस्पतिवार दोपहर बेटी के घर न आने की जानकारी पाकर वह राजधानी पहुंचे। देर रात बेटी के साथ हुई हैवानियत की जानकारी मिली तो सदमा सा लग गया।
थाना में बैठे युवती के पिता ने नाती-नातिन का हालचाल लेने के लिए फोन लगाया तो माहौल गमगीन हो गया। नातिन की आवाज सुनते ही उनका गला भर आया।

बस मुंह से यही निकला, ‘गुड़िया तुम ठीक हो। कोई परेशानी तो नहीं।’ इसके बाद आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। उनकी यह हालत देखकर डीआईजी भी भावुक हो गए।
लखनऊ के मोहनलाल गंज में गैंगरेप के बाद जान गंवाने वाली युवती के गांव के लोग पूरे घटनाक्रम को लेकर अवाक हैं।

देवरिया जिले के गौरीबाजार क्षेत्र के इस गांव में शुक्रवार सुबह घटना का पता चला तो हर कोई सन्न रह गया। गांव के लोगों ने बताया कि पांच साल पहले बीमारी से पति की मौत हो जाने के बाद मृतक आश्रित के रूप में उसे लखनऊ के संजय गांधी पीजीआई में नौकरी मिल गई थी। वही पूरे घर का खर्च चलाती थी।

लखनऊ में ही बेटे और बेटी की पढ़ाई कराने के कारण, उसका गांव आना कम होता था। गांव वालों की चर्चा में दोनों बच्चों के भविष्य को लेकर भी सवाल उठाए जाते रहे।][अमर उजाला से साभार ]
     अभी दो दिन पहले ही ये समाचार समाचार पत्रों की सुर्खियां बना हुआ था और बता रहा था उत्तर प्रदेश के बिगड़ते हुए हालात की बदहवास दास्ताँ .एक तरफ महिलाओं के साथ उत्तर प्रदेश में दरिंदगी का कहर ज़ारी है और दूसरी तरफ कोई इसे मोबाईल और कोई नारी के रहन सहन से जोड़ रहा है .भला यहाँ बताया जाये कि एक महिला जो कि दो बच्चों की माँ है उसके साथ ऐसी क्रूरता की स्थिति क्यूँ नज़र आती है जबकि वह न तो कोई उछ्र्न्खिलता का जीवन अपनाती है और न ही कोई आधनिकता की ऐसी वस्तु वेशभूषा जिसके कारण आजके कथित बुद्धिजीवी लोग उसे इस अपराध की शिकार होना ज़रूरी करार देते हैं ?यही नहीं अगर ऐसे में उत्तर प्रदेश की सरकार यह कहती है कि यहाँ स्थिति ठीक है तो फिर क्या ये ही ठीक स्थिति कही जाएगी कि नारी हर पल हर घडी डरकर सहमकर अपनी ज़िंदगी की राहें तय करे .

ऐसे में बस नारी मन तड़प उठता है और बस यही कहता है -

जुर्म मेरा जहाँ में इतना बन नारी मैं जन्म पा गयी ,
जुर्रत पर मेरी इतनी सी जुल्मी दुनिया ज़ब्र पे आ गयी .
........................................................................................
जब्रन मुझपर हुक्म चलकर जहाँगीर ये बनते फिरते ,
जांनिसार ये फितरत मेरी जानशीन इन्हें बना गयी .
.....................................................................................
जूरी बनकर करे ज़ोरडम घर की मुझे जीनत बतलाएं ,
जेबी बनाकर जादूगरी ये जौहर मुझसे खूब करा गयी .
.........................................................................................
जिस्म से जिससे जिनगी पाते जिनाकार उसके बन जाएँ ,
इनकी जनावर करतूतें ही ज़हरी बनकर मुझे खा गयी .
..............................................................................
जांबाजी है वहीँ पे जायज़ जाहिली न समझी जाये ,
जाहिर इनकी जुल्मी हरकतें ज्वालामुखी हैं मुझे बना गयी .
...............................................................................................
बहुत सहा है नहीं सहूँगी ,ज़ोर जुल्म न झेलूंगी ,
दामिनी की मूक शहादत ''शालिनी''को राह दिखा गयी .

शालिनी कौशिक 
  [कौशल ]

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

सभी धर्म एक हैं

''बाद तारीफ़ में एक और बढ़ाने के लिए,
वक़्त तो चाहिए रू-दाद सुनाने के लिए.
मैं दिया करती हूँ हर रोज़ मोहब्बत का सबक़,
नफ़रतो-बुग्ज़ो-हसद दिल से मिटाने के लिए.''

हमारा भारत वर्ष संविधान  द्वारा धर्म निरपेक्ष घोषित किया गया है कारण आप और हम सभी जानते हैं किन्तु स्वीकारना नहीं चाहते,कारण वही है यहाँ विभिन्न धर्मों का वास होना और धर्म आपस में तकरार की वजह न बन जाएँ इसीलिए संविधान ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया ,किन्तु जैसी कि आशंका भारत के स्वतंत्र होने पर संविधान निर्माताओं को थी अब वही घटित हो रहा है और सभी धर्मों के द्वारा अपने अनुयायियों  को अच्छी शिक्षा देने के बावजूद आज लगभग सभी धर्मों के अनुयायियों में छतीस का आंकड़ा तैयार हो चुका है.
  सभी धर्मो  के प्रवर्तकों ने अपने अपने ढंग से मानव जीवन सम्बन्धी आचरणों को पवित्र बनाने के लिए अनेक उपदेश दिए हैं लेकिन यदि हम ध्यान पूर्वक देखें तो हमें पता चलेगा कि सभी धर्मों की मूल भावना एक है और सभी धर्मों का अंतिम लक्ष्य मानव जाति को मोक्ष प्राप्ति की और अग्रसर करना है .संक्षेप में सभी धर्मों की मौलिक एकता के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-
[१]-सभी धर्म एक ही ईश्वर की सत्ता को मानते हैं . 
[२]-सभी धर्म मानव प्रेम ,सदाचार,धार्मिक सहिष्णुता और मानवीय गुणों के विकास पर बल देते हैं .
[३]-सभी धर्म विश्व बंधुत्व की धारणा को स्वीकार करते हैं  .
[४]-सभी धर्मों का जन्म मानव समाज व् धर्म में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए ही हुआ है .
[५]- सभी मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना मानते हैं.
      उपरलिखित पर यदि हम यकीन करें तो हमें सभी धर्म एक से ही दिखाई देते हैं .एक बार हम यदि अपने भारत देश के प्रमुख धर्मों के सिद्धांतों पर विचार करें तो हम यही पाएंगे की सभी का एक ही लक्ष्य है और वह वही अपने अनुयायियों के जीवन का कल्याण.अब हम हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई धर्मों के प्रमुख  सिद्धांतों पर एक दृष्टि डालकर देखते है कि वास्तविकता क्या है-
हिन्दू धर्म के प्रमुख सिद्धांत -
१-यह धर्म एक ही ईश्वर कि सर्वोच्चता में यकीन करता है.साथ ही बहुदेववाद में भी इसकी अटूट आस्था है.
२-हिन्दू धर्म आत्मा की अमरता में आस्था रखता है.
३-परोपकार ,त्याग की भावना,सच्चरित्रता  तथा सदाचरण हिन्दू धर्म के प्रमुख अंग हैं.
इस्लाम धर्म के प्रमुख सिद्धांत-
१-ईश्वर एक है .
२-सभी मनुष्य एक ही ईश्वर के बन्दे हैं अतः उनमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए.
३-आत्मा अजर और अमर है.
४-प्रत्येक मुस्लमान के पांच अनिवार्य कर्त्तव्य हैं  
-१-कलमा पढना.
२-पांचों समय नमाज पढना ,
३-गरीबों व् असहायों को दान देना .
४-रमज़ान के महीने में रोज़ा रखना और 
५-जीवन  में एक बार मक्का व मदीने की यात्रा [हज] करना.
ईसाई धर्म के प्रमुख सिद्धांत -
१-एक ईश्वर में विश्वास.
२-सद्गुण से चारित्रिक विकास .
३-जन सेवा और जन कल्याण को महत्व.
सिख धर्म के  प्रमुख सिद्धांत-
१-ईश्वर एक है .वह निराकार और अमर है ,उसी की पूजा करनी चाहिए.
२-सभी व्यक्तियों को धर्म और सदाचार का पालन करना चाहिए.
३-प्रत्येक मनुष्य को श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए.
४-आत्मा के परमात्मा से मिलने पर ही मोक्ष प्राप्त होता है.
५-जाति-पाति के भेदभाव से दूर रहना चाहिए.सभी को धर्म पालन करने का समान अधिकार है.
 तो अब यदि हम इन बातों पर विचार करें तो हमें इस समय धर्म को लेकर जो देश में जगह जगह जंग छिड़ी है उसमे कोई सार नज़र नहीं आएगा.हमें इन शिक्षाओं को देखते हुए आपस के मनमुटाव को भुँलाना होगा और इन पंक्तियों को ही अपनाना होगा जो प्रह्लाद ''आतिश '' ने कहे हैं-
''बीज गर नफरत के बोये जायेंगे,
      फल मोहब्बत के कहाँ से लायेंगे.''
             शालिनी कौशिक 

शब्दार्थ
रू-दाद=दास्तान,व्यथा-कथा 
नफ़रतो-बुग्ज़ो-हसद=घृणा-ईर्ष्या  

रविवार, 13 जुलाई 2014

नारी से भी वही मिलेगा जो तुम दोगे साथ निभाकर .

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आज करूँ आगाज़ नया ये अपने ज़िक्र को चलो छुपाकर ,
कदर तुम्हारी नारी मन में कितनी है ये तुम्हें बताकर .
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 जिम्मेदारी समझे अपनी सहयोगी बन काम करे ,
साथ खड़ी है नारी उसके उससे आगे कदम बढाकर .
...............................................................................
 बीच राह में साथ छोड़कर नहीं निभाता है रिश्तों को ,
अपने दम पर खड़ी वो होती ऐसे सारे गम भुलाकर .
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 कैद में रखना ,पीड़ित करना ये न केवल तुम जानो ,
जैसे को तैसा दिखलाया है नारी ने हुक्म चलाकर .
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 धीर-वीर-गंभीर पुरुष का हर नारी सम्मान करे ,
आदर पाओ इन्हीं गुणों को अपने जीवन में अपनाकर .
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 जो बोओगे वो काटोगे इस जीवन का सार यही ,
नारी से भी वही मिलेगा जो तुम दोगे साथ निभाकर .
....................................................................................................................
 जीवन रथ के नर और नारी पहिये हैं दो मान यही ,
''शालिनी''करवाए रु-ब-रु नर को उसका अक्स दिखाकर .
            
           शालिनी कौशिक
  [WOMAN ABOUT MAN]

शनिवार, 12 जुलाई 2014

पश्चिमी यूपी से न्याय करे मोदी सरकार

 पश्चिमी यूपी से न्याय करे मोदी सरकार

            
                                                                            


                           
 पश्चिमी यू.पी.उत्तर प्रदेश का सबसे समृद्ध क्षेत्र है .चीनी उद्योग ,सूती वस्त्र उद्योग ,वनस्पति घी उद्योग ,चमड़ा उद्योग आदि आदि में अपनी पूरी धाक रखते हुए कृषि क्षेत्र में यह उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वाधिक राजस्व प्रदान करता है .इसके साथ ही अपराध के क्षेत्र में भी यह विश्व में अपना दबदबा रखता है .यहाँ का जिला मुजफ्फरनगर तो बीबीसी पर भी अपराध के क्षेत्र में ऊँचा नाम किये है और जिला गाजियाबाद के नाम से तो अभी हाल ही में एक फिल्म का भी निर्माण किया गया है .यही नहीं अपराधों की राजधानी होते हुए भी यह क्षेत्र धन सम्पदा ,भूमि सम्पदा से इतना भरपूर है कि बड़े बड़े औद्योगिक घराने यहाँ अपने उद्योग स्थापित करने को उत्सुक रहते हैं और इसी क्रम में बरेली मंडल के शान्ह्जहापुर में अनिल अम्बानी ग्रुप के रिलायंस पावर ग्रुप की रोज़ा  विद्युत परियोजना में २८ दिसंबर २००९ से उत्पादन शुरू हो गया है .सरकारी नौकरी में लगे अधिकारी भले ही न्याय विभाग से हों या शिक्षा विभाग से या प्रशासनिक विभाग से ''ऊपर की कमाई'' के लिए इसी क्षेत्र में आने को लालायित रहते हैं .इतना सब होने के बावजूद यह क्षेत्र पिछड़े हुए क्षेत्रों में आता है क्योंकि जो स्थिति भारतवर्ष की अंग्रेजों ने की थी वही स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बाकी उत्तर प्रदेश ने व् हमारे भारतवर्ष ने की है .
     ''सोने की चिड़िया''अगर कभी विस्तृत अर्थों में भारत था तो सूक्ष्म अर्थों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश आज भी है .यहाँ से लेने को तो सभी लालायित रहते हैं किन्तु देने के नाम पर ठेंगा दिखाना एक चलन सा बन गया है .आज पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दम पर फल-फूल रहा है .छात्रों को राज्य सेवा ,शिक्षा में कहीं भी आने के लिए परीक्षा देनी हो तो अपने पैसे व् समय अपव्यय करने के लिए तैयार रहो और चलो इलाहाबाद या लखनऊ .समझौते की गुंजाईश न हो ,मरने मिटने को ,भूखे मरने को तैयार हैं तो चलिए इलाहाबाद ,जहाँ पहले तो बागपत से ६४० किलोमीटर ,मेरठ से ६०७ किलोमीटर ,बिजनोर से ६९२ किलोमीटर ,मुजफ्फरनगर से ६६० किलोमीटर ,सहारनपुर से ७५० किलोमीटर ,गाजियाबाद से ६३० किलोमीटर ,गौतमबुद्ध नगर से ६५० किलोमीटर ,बुलंदशहर से ५६० किलोमीटर की यात्रा कर के धक्के खाकर ,पैसे लुटाकर ,समय बर्बाद कर पहुँचो फिर वहां होटलों में ठहरों ,अपने स्वास्थ्य से लापरवाही बरत नापसंदगी का खाना खाओ ,गंदगी में समय बिताओ और फिर न्याय मिले न मिले ,परीक्षा पास हो या न हो उल्टे पाँव उसी तरह घर लौट आओ .ऐसे में १९७९ से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट खंडपीठ के आन्दोलन कारियों में से आगरा के एक अधिवक्ता अनिल प्रकाश रावत जी द्वारा विधि मंत्रालय से यह जानकारी मांगी जाने पर -''कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खंडपीठ स्थापना के लिए कोई प्रस्ताव विचाराधीन है ?''पर केन्द्रीय विधि मंत्रालय के अनुसचिव के.सी.थांग कहते हैं -''जसवंत सिंह आयोग ने १९८५ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित करने की सिफारिश की थी .इसी दौरान उत्तराखंड बनने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले उत्तराखंड के अधिकार क्षेत्र में चले गए वहीँ नैनीताल में एक हाईकोर्ट की स्थापना हो गयी है .इस मामले में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय मागी गयी थी .इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश  ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की किसी शाखा की स्थापना का कोई औचित्य नहीं पाया है .''
     सवाल ये है कि क्या उत्तराखंड बनने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट से दूरी घट गयी है ?क्या नैनीताल हाईकोर्ट इधर के मामलों में दखल दे उनमे न्याय प्रदान कर रही है ?और अगर हाईकोर्ट के माननीय  मुख्य न्यायाधीश को इधर खंडपीठ की स्थापना का कोई औचित्य नज़र नहीं आता है तो क्यों?क्या घर से जाने पर यदि किसी को घर बंद करना पड़ता है तो क्या उसके लिए कोई सुरक्षा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी.में तो ये हाल है कि जब भी किसी का घर बंद हो चाहे एक दिन को ही हो चोरी हो जाती है .और क्या अपने क्षेत्र से इलाहाबाद तक के सफ़र के लिए किसी विशेष सुविधा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी. में तो आर.पी.ऍफ़.वाले ही यात्रियों को ट्रेन से धकेल देते हैं .राजेश्वर व् सरोज की घटना अभी एक दिन पूर्व की ही है जिसमे सरोज की जान ही चली गयी .क्या इलाहाबाद में वादकारियों के ठहराने व् खाने के लिए कोई व्यवस्था की गयी है ?जबकि वहां तो रिक्शा वाले ही होटल वालों से कमीशन खाते हैं और यात्रियों को स्वयं वहीँ ले जाते हैं .और क्या मुक़दमे लड़ने के लिए वादकारियों को वाद व्यय दिया जाता है या उनके लिए सुरक्षा का कोई इंतजाम किया जाता है ?जबकि हाल तो ये है कि दीवानी के मुक़दमे आदमी को दिवालिया कर देते हैं और फौजदारी में आदमी कभी कभी अपने परिजनों व् अपनी जान से भी हाथ धो डालता है .पश्चिमी यू.पी .की जनता को इतनी दूरी के न्याय के मामले में या तो अन्याय के आगे सिर झुकाना पड़ता है या फिर घर बार  लुटाकर न्याय की राह पर आगे बढ़ना होता है .
     न्याय हो या शिक्षा का क्षेत्र दोनों में ही यदि हाईकोर्ट व् सरकार अपनी सही भूमिका निभाएं तो बहुत हद तक जन कल्याण भी कर सकती है और न्याय भी .आम आदमी जो कि कानून की प्रक्रिया के कारण ही बहुत सी बार अन्याय  सहकर घर बैठ जाता है और दूरी को देख छात्र परीक्षा देने से पीछे हट जाता है ,दोनों ही आगे बढ़ेंगे यदि हाईकोर्ट ,शिक्षा प्रशासन ,सरकार सही ढंग से कार्य करें .यह हमारा देश है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था है फिर हमें ही क्यों परेशानी उठानी पड़ती है ?यदि वेस्ट यू.पी.में हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित की जाती है तब निश्चित रूप से मुक़दमे बढ़ेंगे और इनसे होने वाली आय से जो सरकारी खर्च में इस स्थापना के फलस्वरूप बढ़ोतरी हुई होगी वह तो पूरी होगी ही सरकार की आय में भी बढ़ोतरी होगी और जनता में सरकार के प्रति विश्वास भी बढेगा जो सरकार के स्थायित्व के लिए व् भविष्य में कार्य करने के लिए बहुत आवश्यक है .   शिक्षा परीक्षा की जो प्रतियोगिताएं इलाहाबाद ,लखनऊ में आयोजित की जाती हैं उससे वहां पर छात्रों व् उनके परिजनों की बहुत भीड़ बढती है जिसके लिए प्रशासन को बहुत सतर्कता से कार्य करना होता है उसे यदि  जिले या मंडलों के कॉलेज में बाँट दिया जाये तो सरकार पर इतने इंतजाम का बोझ नहीं पड़ेगा और प्रतिभागियों को भी सुविधा रहेगी .वे आसानी से सुबह को अपने घर से जाकर शाम तक घर पर लौट सकेंगे और इस तरह न उन्हें अपने घर की चिंता होगी और न प्रशासन को व्यवस्था की . किन्तु पूर्व का अर्थात इलाहाबाद व् लखनऊ का राजनीतिक प्रभाव इतना ज्यादा है कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जायेगा जिससे पश्चिम की जनता वहां से कटे और उनकी आमदनी पर प्रभाव पड़े भले ही इधर की जनता लुटती पिटती रहे .इसलिए कोई भी प्रयास जो इस दिशा में किया जाता है वह सफल नहीं हो .चाहे केन्द्रीय रेल बजट हो या उत्तर प्रदेश सरकार का बजट हो इधर के लिए ऐसे ही काम किये जाते हैं जो ''ऊंट के मुहं में जीरा'' ही साबित होते हैं .
    आज स्थिति ये है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ठगा जा रहा है और ये यहाँ की जनता को ही अब सोचना होगा कि उसे मात्र कुछ भाग लेना है या अपना पूरा अधिकार .कृषि ,उद्योग ,धन आदि सभी संपदाओं से भरपूर इस क्षेत्र को अब छोटे मोटे इन तुच्छ प्रलोभनों का मोह त्यागना होगा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए ही आगे बढ़ना होगा क्योंकि इसके बगैर यहाँ की जनता का कल्याण नहीं होगा और हर मामले में पूर्व को पश्चिम के सिर पर ही बैठाया जाता रहेगा .इसलिए अब तो यहाँ की जनता को यही कहना होगा -
       ''बहकावों में न आयेंगे ,
           अपना अस्तित्व बनायेंगे .
       तुम ना समझोगे औचित्य ,
            हम ना तुमको समझायेंगे .
        हम जनता हैं ,हम ताकत हैं ,
           अब तुमको भी दिखलायेंगे .

         छोटी मोटी मांगे न कर ,
          अब राज्य इसे बनवाएँगे .''
  

  शालिनी कौशिक
        [कौशल]


     

न कोशिश ये कभी करना -gazal

न कोशिश ये कभी करना .



दुखाऊँ दिल किसी का मैं -न कोशिश ये कभी करना ,
बहाऊँ आंसूं उसके मैं -न कोशिश ये कभी करना.

नहीं ला सकते हो जब तुम किसी के जीवन में सुख चैन ,
करूँ महरूम फ़रहत से-न कोशिश ये कभी करना .

चाहत जब किसी की तुम नहीं पूरी हो कर सकते ,
करो सब जो कहूं तुमसे-न कोशिश ये कभी करना .

किसी के ख्वाबों को परवान नहीं हो तुम चढ़ा सकते ,
हक़ीकत इसको दिखलाऊँ-न कोशिश ये कभी करना .

ज़िस्म में मुर्दे की जब तुम सांसे ला नहीं सकते ,
बनाऊं लाश जिंदा को-न कोशिश ये कभी करना .

समझ लो ''शालिनी ''तुम ये कहे ये जिंदगी पैहम ,
तजुर्बें मेरे अपनाएं-न कोशिश ये कभी करना .
                                  शालिनी कौशिक 
                                       [कौशल]

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

मुकम्मल है वही सम्बन्ध मुहब्बत नींव है जिसकी


तमन्ना जिसमे होती है कभी अपनों से मिलने की
रूकावट लाख भी हों राहें उसको मिल ही जाती हैं ,
खिसक जाये भले धरती ,गिरे सर पे आसमाँ भी
खुदा की कुदरत मिल्लत के कभी आड़े न आती है .
............................................................................................
फ़िक्र जब होती अपनों की समय तब निकले कैसे भी
दिखे जब वे सलामत हाल तसल्ली दिल को आती है ,
दिखावा तब नहीं होता प्यार जब होता अपनों में
मुकाबिल कोई भी मुश्किल रोक न इनको पाती है .
.......................................................................
मुकद्दर साथ है उनके मुक़द्दस ख्याल रखते जो
नहीं मायूसी की छाया राह में आने पाती है ,
मुकम्मल है वही सम्बन्ध मुहब्बत नींव है जिसकी
महक ऐसे ही रिश्तों की सदा ये सदियाँ गाती हैं .
..........................................................................
खोलती है अपनी आँखें जनम लेते ही नन्ही जान
फ़ौज वह नातेदारों की सहमकर देखे जाती है,
गोद माँ की ही देती है सुखद एहसास वो उसको
जिसे पाकर अनजानों में सुकूँ से वो सो पाती है .
.........................................................................
नहीं माँ से बड़ा नाता मिला इस दुनिया में हमको
महीनों कोख में रखकर हमें दुनिया में लाती है ,
जिए औलाद की खातिर ,मरे औलाद की खातिर
मुसलसल कायनात शिद्दत से माँ के नग़मे गाती है .
...................................................................................................
जहाँ में माँ का नाता ही बिना मतलब जो देता साथ
कभी न माँ की आँखों पर लोभ की बदली छाती है ,
भले ही दीवारें ऊँची खड़ी हों उसकी राहों में
कभी औलाद से मिलना न उसका रोक पाती हैं .
................................................................
''शालिनी ''ने यहाँ देखे तमाम नाते रिश्तेदार
बिना मतलब किसी को ना किसी की याद आती है ,
एक ये माँ ही होती है करे महसूस दर्द-ए-दिल
इधर हो मिलने की हसरत उधर हाज़िर हो जाती है .
..............................................................
शालिनी कौशिक
       [कौशल ]






शनिवार, 5 जुलाई 2014

शामली कैराना को संयुक्त रूप से जिला घोषित करे उत्तर प्रदेश सरकार

शामली 28 सितम्बर २०११ को मुज़फ्फरनगर से अलग करके एक जिले के रूप में स्थापित किया गया .जिला बनने से पूर्व शामली तहसील रहा है और यहाँ तहसील सम्बन्धी कार्य ही निबटाये जाते रहे हैं. न्यायिक कार्य दीवानी ,फौजदारी आदि के मामले शामली से कैराना और मुज़फ्फरनगर जाते रहे हैं और जिला बनने से लेकर आज तक शामली तरस रहा है एक जिले की तरह की स्थिति पाने के लिए क्योंकि सरकार द्वारा अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए जिलों की स्थापना की घोषणा तो कर दी जाती है किन्तु सही वस्तुस्थिति जो क़ि एक जिले के लिए चाहिए उसके बारे में उसे न तो कोई जानकारी चाहिए न उसके लिए कोई प्रयास ही सरकार द्वारा किया जाता है .पूर्व में उत्तर प्रदेश सरकार ऐसा बड़ौत क्षेत्र के साथ भी कर चुकी है जिले की सारी आवश्यक योग्यता रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बागपत को जिला बना दिया गया . आज शामली जो क़ि न्यायिक व्यवस्था में बिलकुल पिछड़ा हुआ है उसके न्यायालयों को जिले के न्यायालय का दर्ज देने की कोशिश की जा रही है उसके लिए शामली के अधिवक्ता भवन स्थापना के लिए शामली में अस्थायी भवनों की तलाश करते फिर रहे हैं और कैराना जो क़ि इस संबंध में बहुत अग्रणी स्थान रखता है उसे महत्वपूर्ण दर्ज देने से दूर रखा जा रहा है जबकि शामली वह जगह है जहाँ आज तक सिविल जज जूनियर डिवीज़न तक की कोर्ट नहीं है और कैराना के bare में आप जान सकते हैं क़ि वहां न्यायिक व्यस्था अपने सम्पूर्ण स्वरुप में है -
''आज कैराना न्यायिक व्यवस्था के मामले में उत्तरप्रदेश में एक सुदृढ़ स्थिति रखता है कैराना में न्यायिक व्यवस्था की पृष्ठभूमि के बारे में बार एसोसिएशन कैराना के पूर्व अध्यक्ष ''श्री कौशल प्रसाद एडवोकेट ''जी बताते हैं -
'' '' सन १८५७ में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के द्वारा ऐतिहासिक क्रांति का बिगुल बजने के बाद मची उथल-पुथल से घबराये ब्रिटिश शासन के अंतर्गत संयुक्त प्रान्त [वर्तमान में उत्तर प्रदेश ] ने तहसील शामली को सन 1887 में महाभारत काल के राजा कर्ण की राजधानी कैराना में स्थानांतरित कर दिया तथा तहसील स्थानांतरण के दो वर्ष पश्चात् सन १८८९ में मुंसिफ शामली के न्यायालय को भी कैराना में स्थानांतरित कर दिया .ब्रिटिश शासन काल की संयुक्त प्रान्त सरकार द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश [तत्कालीन संयुक्त प्रान्त ]में स्थापित होने वाले चार मुंसिफ न्यायालयों -गाजियाबाद ,नगीना ,देवबंद व् कैराना है.मुंसिफ कैराना के क्षेत्राधिकार में पुरानी तहसील कैराना व् तहसील बुढ़ाना का परगना कांधला सम्मिलित था .मुंसिफी कैराना में मूल रूप से दीवानी मामलों का ही न्यायिक कार्य होता था .विचाराधीन वादों की संख्या को देखते हुए समय समय पर अस्थायी अतिरिक्त मुंसिफ कैराना के न्यायालय की स्थापना भी हुई ,परन्तु सन १९७५ के आसपास माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा कैराना में स्थायी अतिरिक्त मुंसिफ कैराना के न्यायालय की स्थापना की गयी .इस न्यायालय के भवन के लिए ९ मार्च सन १९७८ को उच्च न्यायालय इलाहाबाद के प्रशासनिक न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री ह्रदयनाथ सेठ द्वारा भवन का शिलान्यास किया गया .बार एसोसिएशन कैराना की निरंतर मांग के उपरांत दिनांक ६ मई 1991 को कैराना में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय की स्थापना की गयी .तथा बाद में ४ जनवरी 1993 से कैराना में सिविल जज सीनियर डिविजन का न्यायालय स्थापित हुआ २ अप्रैल २०११ में यहाँ ए.डी.जे.कोर्ट की स्थापना हुई .''.
ऐसे में राजनीतिक फैसले के कारण शामली को भले ही जिले का दर्जा मिल गया हो किन्तु न्यायिक व्यवस्था के सम्बन्ध में अभी शामली बहुत पीछे है .शामली में अभी कलेक्ट्रेट के लिए भूमि चयन का मामला भी पूरी तरह से तय नहीं हो पाया है जबकि कैराना में पूर्व अध्यक्ष महोदय के अनुसार तहसील भवन के नए भवन में स्थानांतरित होने के कारण ,जहाँ १८८७ से २०११ तक तहसील कार्य किया गया वह समस्त क्षेत्र इस समय रिक्त है और वहां जनपद न्यायाधीश के
न्यायालय के लिए उत्तम भवन का निर्माण हो सकता है .साथ ही कैराना कचहरी में भी ऐसे भवन हैं जहाँ अभी हाल-फ़िलहाल में भी जनपद न्यायाधीश बैठ सकते हैं और इस सम्बन्ध में किसी विशेष आयोजन की आवश्यकता नहीं है.फिर कैराना कचहरी शामली मुख्यालय से मात्र १० किलोमीटर दूरी पर है .
ऐसे में क्या ये ज़रूरी नहीं है क़ि सरकार सही स्थिति को देखते हुए शामली को कैराना के साथ मिलकर जिला घोषित करे जिससे इस व्यवस्था के करने में वह पैसा जो जनता की गाढ़ी कमाई से सरकार को मिलता है व्यर्थ में व्यय न हो और सरकार का काम भी सरल हो जाये और फिर ये कहाँ का न्याय है क़ि एक जगह जो पहले से ही न्याय के क्षेत्र में उचाइयां हासिल कर चुकी है उसे उसके मुकाबले निचले दर्जे पर रखा जाये जो उसके सामने अभी बहुत निचले स्थान पर है .उत्तर प्रदेश सरकार को इस पर विचार करते हुए शामली कैराना को संयुक्त रूप से जिला घोषित करना ही चाहिए .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

''आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है ..''

किसी शायर ने कहा है -

''कौन कहता है आसमाँ में सुराख़ हो नहीं सकता ,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों .''

भारतवर्ष सर्वदा से ऐसी क्रांतियों की भूमि रहा है जिन्होंने हमेशा ''असतो मा सद्गमय ,तमसो मा ज्योतिर्गमय ,मृत्योर्मामृतं गमय''का ही सन्देश दिया है और क्रांति कभी स्वयं नहीं होती सदैव क्रांति का कारक भले ही कोई रहे पर दूत हमेशा आम आदमी ही होता है क्योंकि जिस तरह से लावा ज्वालामुखी के फटने पर ही उत्पन्न होता है वैसे ही क्रांति का श्रीगणेश भी आम आदमी के ह्रदय में उबलते क्रोध के फटने से ही होता है .

आम आदमी की ताकत क्या है ये अभी हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में देखने को मिला जब आम जनता ने वोट के अधिकार का इस्तेमाल कर सत्तारूढ़ दल को उखाड़ फेंका और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को बरसों बाद स्पष्ट बहुमत दिया .इन चुनावों में जनता ने दिखा दिया कि आम जनता बेवकूफ बनने वालों में नहीं है .लुभावने वादों और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को दरकिनार कर जनता ने देशहित देखते हुए एकजुट होकर वोट दिया और जनता को उसकी इस ताकत का एहसास दिलाने वाला शख्स भी एक आम आदमी ही रहा ,माननीय नरेंद्र मोदी जी जिन्होंने आज सच्चे अर्थों में लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए चाय बेचने से लेकर प्रधानमंत्री पद तक का सफर सफलतापूर्वक पूर्ण किया है और ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार हुआ है .हमारे देश ने आदिकाल से लेकर आज तक विपत्तियों के बहुत से दौर झेले हैं और तमाम झंझावातों को झेलते हुए हमारा देश आज विश्व में शिखर की ओर बढ़ने में जुटा है .

डेढ़ सौ वर्षों की गुलामी हमारे भारतवर्ष ने झेली और अंग्रेजों के अत्याचारों को सहा किन्तु अंग्रेजों को हमारे क्रांतिकारियों के सामने हमेशा मुंह की खानी पड़ी .हमारे देश के महान क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आजाद को गिरफ्तार करने के बावजूद वे उन्हें तोड़ नहीं पाये .उनकी वीरता अंग्रेजों के सामने भी अपने मुखर अंदाज में थी -

''पूछा उसने क्या नाम बता -आजाद ,
पिता को क्या कहते -स्वाधीन,
पिता का नाम -
और बोलो किस घर में हो रहते ?
कहते हैं जेलखाना जिसको वीरों का घर है ,
हम उसमे रहने वाले हैं ,उद्देश्य मुक्ति का संघर्ष है .''

साइमन कमीशन का भारत की जनता ने कड़ा विरोध किया और अंग्रेजों की लाठियों की मार को भी झेला-

''लाठियां पड़ी गिर पड़े जवाहर लाल वहां ,
औ पंत गिरे थे ऊपर उन्हें बचाने को .''

ये एक आम आदमी की ही ताकत थी जिसने ब्रिटिश हुकूमत को खौफ से भर दिया था .अल्फ्रेड पार्क में स्वयं की गोली से शहीद हो चुके चंद्रशेखर आजाद के मृत शरीर के पास तक जाने की हिम्मत ब्रिटिश पुलिस में नहीं थी ,कई गोलियां उनके मृत शरीर पर बरसाकर ही वह आगे बढ़ने का साहस कर पायी थी .

सत्य व अहिंसा के दम पर अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाले महात्मा गांधी को तो ब्रिटिश हुकूमत कभी भुला ही नहीं पायेगी जिन्होंने बिना किसी हथियार के हथियारों से लैस फिरंगियों को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया -

''दुनिया में लड़ी तूने अजब ढब की लड़ाई ,
दागी न कहीं तोप न बन्दूक चलाई ,
दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई
वाह रे फ़कीर खूब करामात दिखाई .
चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल.
....दुनिया में तू बेजोड़ था इंसान बेमिसाल .''
...जिस दिन तेरी चिता जली रोया था महाकाल .
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.''
. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत एक ''सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य'' बना .यहाँ राजशाही ख़त्म हुई जनता का शासन आरम्भ हुआ और आम आदमी की ताकत पर यह लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना .

२०१२ आम आदमी की ताकत के हिसाब से अगर देखा जाये तो अति महत्वपूर्ण वर्ष कहा जायेगा .जहाँ आज तक बलात्कार पीड़िता को स्वयं जनता ही अपराधी का दर्जा देती थी वही दामिनी गैंगरेप कांड में दामिनी के साथ खड़ी हो गयी .पूरा देश एक स्वर में दामिनी के लिए न्याय मांग रहा था और मांग रहा था उसके लिए जीवन की दुआएं .अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित था, कड़ाके की ठण्ड के बावजूद जनता आंदोलन रत थी और सारे देश में जैसे किसी को अन्य कोई समस्या रह ही नहीं गयी थी ,रह गयी थी तो केवल दामिनी की चिंता और उसके अपराधियों के लिए फांसी की सजा की मांग ,सरकार हिल गयी थी जनता के वे तेवर देखकर और समझ में आ गया था कि जनता को यूँ ही जनार्दन नहीं कहा जाता .

उसके बाद आम आदमी की ताकत दिखाई प्रसिद्द समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने जिन्होंने सरकार को ही अल्टीमेटम दे दिया लोकपाल के लिए और यह जनता की ही ताकत है जो लोकपाल पास हुआ है .
ये आम आदमी की ही ताकत है जो राजनीति में घाघ दो पार्टियों को धता बताते हुए दिल्ली की गद्दी एक नयी नवेली पार्टी ''आम आदमी पार्टी ''को सौंपती है और ये भी आम आदमी की ही ताकत है जो आम आदमी पार्टी को अपने कर्तव्य से विमुख देख उसे जड़ से उखाड़कर फेंक देती है .

आरोप-प्रत्यारोप आम आदमी करता है किन्तु सर्वजन हिताय व् सर्वजन सुखाय के लिए और जब वह अपनी ताकत से उस स्थिति में आता है तब काम करता है और यह साबित करता है कि ऐसा कुछ नहीं जो आम आदमी के हाथ में न हो ,उसके हाथ में सब कुछ है बस उसे उस दिशा में सोचना भर होता है क्योंकि -

''आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है ..''

आज आम आदमी न केवल परिवर्तन ला सकता है बल्कि ला रहा है .ये आम आदमी के दिमाग की ही ताकत है जो अग्नि-५ बना और उसने चीन के दिल में भारत के लिए दहशत भर दी,ये आम आदमी की ही सामूहिक शक्ति है जो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को कारगिल के बाद भारत आने को मजबूर कर पायी ,ये आम आदमी की ताकत है जो उसे सूचना का अधिकार दिलाती है जिससे सरकारी तंत्रो में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने में उसे मदद मिलती है ,ये आम आदमी की ताकत है जो माँ को पिता के साथ संतान के शैक्षिक अभिलेखों में स्थान दिलाती है और ये भी आम आदमी की ही ताकत है जो बार-बार गिरने के बावजूद ,विध्वंस के बावजूद इस देश को खड़ा करती है और आम आदमी की इसी ताकत को इस देश ने माना है और उसे महत्व दिया है .आम आदमी यहाँ अपनी ताकत को विश्व में एक आदर्श रूप में प्रस्तुत करता है और उसे नतमस्तक होने को मजबूर करता है .आम आदमी की इसी ताकत को शकील''ज़मील'' ने यूँ व्यक्त किया है -

''जो बढ़के सीना-ए-तूफ़ान पे वार करता है ,
खुदा उसी के सफीने को पार करता है .''

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...