मंगलवार, 30 सितंबर 2014

कृतज्ञ दुनिया २ अक्टूबर की




एक की लाठी सत्य अहिंसा एक मूर्ति सादगी की,

दोनों ने ही अलख जगाई देश की खातिर मरने की .

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जेल में जाते बापू बढ़कर सहते मार अहिंसा में ,

आखिर में आवाज़ बुलंद की कुछ करने या मरने की .

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लाल बहादुर सेनानी थे गाँधी जी से थे प्रेरित ,

देश प्रेम में छोड़ के शिक्षा थामी डोर आज़ादी की .

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सत्य अहिंसा की लाठी ले फिरंगियों को भगा दिया ,

बापू ने अपनी लाठी से नीव जमाई भारत की .

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आज़ादी के लिए लड़े वे देश का नव निर्माण किया ,

सर्व सम्मति से ही संभाली कुर्सी प्रधानमंत्री की .

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मिटे गुलामी देश की अपने बढ़ें सभी मिलकर आगे ,

स्व-प्रयत्नों से दी है बढ़कर साँस हमें आज़ादी की .

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दृढ निश्चय से इन दोनों ने देश का सफल नेतृत्व किया

ऐसी विभूतियाँ दी हैं हमको कृतज्ञ दुनिया इस दिन की .

शालिनी कौशिक

[कौशल]

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

चिंता - चिता सम मानव की खातिर ,

 मिटा देती है जीवन का
       समस्त अस्तित्व चिंताएं ,
ये आ जाती हरेक मन में
     बिना हम सबके बुलाये ,
सुकून का कोई भी पल
     ये हम पर रहने न देती ,
तड़पने की टीस भरकर
      ये हमको तोहफे हैं देती ,
नहीं बच सकते हम इनसे
    नहीं कर सकते इनको दूर ,
ये तोड़ें स्वाभिमान सबका
    ये सबकी खुशियां करती दूर ,
कही जाती है ये चिंता
     चिता सम मानव की खातिर ,
घिरा जैसे कोई इनसे
         हुआ शमशान में हाज़िर .

शालिनी कौशिक
       [कौशल ]

सोमवार, 22 सितंबर 2014

मुल्क से बढ़कर न खुद को समझें हम,


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''मुख्तलिफ  ख्यालात भले रखते हों ,मुल्क से बढ़कर न खुद  को समझें हम,
बेहतरी हो जिसमे अवाम की अपनी ,ऐसे क़दमों को बेहतर  समझें हम.
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है ये चाहत तरक्की की राहें आप और हम मिलके पार करें ,
जो सुकूँ साथ मिलके चलने में इस हकीक़त को ज़रा समझें हम .
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कभी हम एक साथ रहते थे ,रहते हैं आज जुदा थोड़े से ,
अपनी आपस की गलतफहमी को थोड़ी जज़्बाती  भूल  समझें हम .
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देखकर आंगन में खड़ी दीवारें आयेंगें तोड़ने हमें दुश्मन ,
ऐसे दुश्मन की गहरी चालों को अपने हक में कभी न  समझें हम .
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न कभी अपने हैं न अपने कभी हो सकते ,
पडोसी मुल्कों की फितरत को खुलके समझें हम .
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कहे ये ''शालिनी'' मिल  बैठ मसले  सुलझा लें ,
अपने अपनों की मोहब्बत को अगर समझें हम .
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         शालिनी कौशिक 
                  [ कौशल ]

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

गुलामी नारी की नियति..कभी न मिल सकती मुक्ति .


बढ़ रही हैं

गगन छू रही हैं

लोहा ले रही हैं

पुरुष वर्चस्व से

कल्पना

कपोल कल्पना

कोरी कल्पना

मात्र

सत्य

स्थापित

स्तम्भ के समान प्रतिष्ठित

मात्र बस ये

विवशता कुछ न कहने की

दुर्बलता अधीन बने रहने की

हिम्मत सभी दुःख सहने की

कटिबद्धता मात्र आंसू बहने की .

न बोल सकती बात मन की है यहाँ बढ़कर

न खोल सकती है आँख अपनी खुद की इच्छा पर

अकेले न वह रह सकती अकेले आ ना जा सकती

खड़ी है आज भी देखो पैर होकर बैसाखी पर .

सब सभ्यता की बेड़ियाँ पैरों में नारी के

सब भावनाओं के पत्थर ह्रदय पर नारी के

मर्यादा की दीवारें सदा नारी को ही घेरें

बलि पर चढ़ते हैं केवल यहाँ सपने हर नारी के .

कुशलता से करे सब काम

कमाये हर जगह वह नाम

भले ही खास भले ही आम

लगे पर सिर पर ये इल्ज़ाम .

कमज़ोर है हर बोझ को तू सह नहीं सकती

दिमाग में पुरुषों से कम समझ तू कुछ नहीं सकती

तेरे सिर इज्ज़त की दौलत वारी है खुद इस सृष्टि ने

तुझे आज़ाद रहने की इज़ाज़त मिल नहीं सकती .

सहे हर ज़ुल्म पुरुषों का क्या कोई बोझ है बढ़कर

करे है राज़ दुनिया पर क्यूं शक करते हो बुद्धि पर

नकेल कसके जो रखे वासना पर नर अपनी

ज़रुरत क्या पड़ी बंधन की उसकी आज़ादी पर ?

मगर ये हो नहीं सकता

पुरुष बंध रो नहीं सकता

गुलामी का कड़ा फंदा

नहीं नारी से हट सकता

नहीं दिल पत्थर का करके

यहाँ नारी है रह सकती

बहाने को महज आंसू

पुरुष को तज नहीं सकती

कुचल देती है सपनो को

वो अपने पैरों के नीचे

गुलामी नारी की नियति

कभी न मिल सकती मुक्ति .



शालिनी कौशिक

[कौशल ]

शनिवार, 13 सितंबर 2014

हिंदी के विभिन्न मुद्दों पर मेरी अभिव्यक्ति -क्या आप सहमत हैं






1-हिंदी ब्लॉगिंग हिंदी को मान दिलाने में समर्थ हो सकती है -



हिंदी ब्लॉग्गिंग आज लोकप्रियता के नए नए पायदान चढ़ने में व्यस्त है .विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं की तानाशाही आज टूट रही है क्योंकि उनके द्वारा अपने कुछ चयनित रचनाकारों को ही वरीयता देना अनेकों नवोदित कवियों ,रचनाकारों आदि को हतोत्साहित करना होता था और अनेकों को गुमनामी के अंधेरों में धकेल देता था किन्तु आज ब्लॉगिंग के जरिये वे अपने समाज ,क्षेत्र और देश-विदेश से जुड़ रहे हैं और अपनी भाषा ,संस्कृति ,समस्याएं सबके सामने ला रहे हैं . ब्लॉगिंग के क्षेत्र में आज सर्वाधिक हिंदी क्षेत्रों के चिट्ठाकार जुड़े हैं और.अंग्रेजी शुदा इस ज़माने में हिंदी के निरन्तर कुचले हुए स्वरुप को देख आहत हैं किन्तु हिंदी को उसका सही स्थान दिलाने में जुटे हैं और इस पुनीत कार्य में ज़माने से जुड़े रहने को अंग्रेजी से २४ घंटे जुड़े रहने वाले भी हिंदी में ब्लॉग लेखन में व्यस्त हैं .

हम सभी जानते हैं कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं मातृभाषा भी है और दिल की गहराइयों से जो अभिव्यक्ति हमारी ही कही जा सकती है वह हिंदी में ही हो सकती है क्योंकि अंग्रेजी बोलते लिखते वक़्त हम अपने देश से ,समाज से ,अपने परिवार से ,अपने अपनों से वह अपनत्व महसूस नहीं कर सकते जो हिंदी बोलते वक़्त करते हैं .

हिंदी जहाँ अपनों को कभी आप ,कभी तुम व् कभी तू से स्नेह में बांधती है अपनेपन का एहसास कराती है वहीँ अंग्रेजी इस सबको ''यू ''पर टिका देती है और दूर बिठाकर रख देती है ..

आज हिंदी ब्लॉग्गिंग के जरिये दूर-दराज बैठे ,बड़े बड़े पदों को सुशोभित कर औपचारिकता की टोपी पहनने वाले व्यक्तित्व साहित्यकार व् रचनाकार में परिवर्तित हो रहे हैं और इसी क्षेत्र में जुड़े अंजान ब्लोगर से जुड़ रहे हैं .अपनी अभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया की इच्छा रख रहे हैं और अन्यों की अभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं और ये सब सुखद है इसलिए क्योंकि इससे अपने विचारों का दूसरों पर प्रभाव भी देखने में आसानी होती है और साथ ही यह भी पता चलता है कि आज भी लोगों के मन में हिंदी को लेकर मान है ,सम्मान है और हिंदी को उसका सही स्थान दिलाये जाने की महत्वाकांक्षा भी .

आज हिंदी ब्लॉगिंग के जरिये दूर-दराज बैठे ,बड़े बड़े पदों को सुशोभित कर औपचारिकता की टोपी पहनने वाले व्यक्तित्व साहित्यकार व् रचनाकार में परिवर्तित हो रहे हैं और इसी क्षेत्र में जुड़े अंजान ब्लोगर से जुड़ रहे हैं .अपनी अभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया की इच्छा रख रहे हैं और अन्यों की अभिव्यक्ति पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं और ये सब सुखद है इसलिए क्योंकि इससे अपने विचारों का दूसरों पर प्रभाव भी देखने में आसानी होती है और साथ ही यह भी पता चलता है कि आज भी लोगों के मन में हिंदी को लेकर मान है ,सम्मान है और हिंदी को उसका सही स्थान दिलाये जाने की महत्वाकांक्षा भी . आज हिंदी ब्लॉगिंग का बढ़ता प्रभाव ही समाचारपत्रों में ब्लॉग के लिए स्थान बना रहा है .पत्रकारों का एक बड़ा समूह हिंदी ब्लॉग्गिंग से जुड़ा है और समाचार पत्रों में संपादक के पृष्ठ पर ब्लॉग जगत को महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है .पाठकों की जिन प्रतिक्रियाओं को समाचार पत्र कूड़े के डिब्बे के हवाले कर देते थे आज उनके ब्लॉग से अनुमति ले छाप रहे हैं क्योंकि जनमत के बहुमत को लोकतंत्र में वरीयता देना सभी के लिए चाहे वह हमारे लोकतंत्र का कोई सा भी स्तम्भ हो अनिवार्य है और इसी के जरिये मीडिया आज विभिन्न मुद्दों पर जनमत जुटा रहा है और यही हिंदी ब्लॉगिंग आज हिंदी भाषियों को तो जोड़ ही रही है विश्व में अहिन्दी भाषियों को भी इसे अपनाने को प्रेरित कर रही है .यही कारण है कि आज बड़े बड़े राजनेता भी जनता से जुड़ने के लिए ब्लॉगिंग से जुड़ रहे हैं .आज वे हिंदी की जगह अपने ब्लॉग पर अंग्रेजी में लिख रहे हैं किन्तु वह दिन भी दूर नहीं जब वे जनता को अपने करीबी दिखने के लिए हिंदी के करीब आयेंगे क्योंकि जनता इससे जुडी है और जनता से जुड़ना उनकी आवश्यकता भी है और मजबूरी भी . इसलिए ये निश्चित है कि जिस तरह से हिंदी ब्लॉगिंग विश्व में अपना डंका बजा रही है वह इन राजनेताओं को भी अपना बनावटी लबादा उतरने को विवश करेगी और अपनी ताकत से परिचित कराकर सही राह भी दिखाएगी और इस तरह जनता को अपने से जोड़ने के लिए उन्हें हिंदी का हमराही बनाएगी .वैसे भी अपनी ताकत हिंदी ब्लॉगिंग ने आजकल के विभिन्न हालातों पर हर समस्या के जिम्मेदार को कठघरे में खड़ा कर दिखा ही दी है .नित्यानंद जी के शब्द यहाँ हिंदी ब्लॉगिंग की उपयोगिता व् निर्भीकता को अभिव्यक्त करने के लिए उत्तम हैं -

''उसे जो लिखना होता है ,वही वह लिखकर रहती है ,

कलम को सरकलम होने का बिलकुल डर नहीं होता .''



2-





हिंदी की जगह आज अंग्रेजी ही घेरती जा रही है -[हिंदी बाज़ार की भाषा है गर्व की नहीं ,हिंदी गरीबों अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गयी है .]

हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा बस कहने मात्र को ही रह गयी है .जिस प्रकार यह कहा गया है कि भारत में गाय की पूजा होती है और भारत में ही गाय काटी जाती है इसी सत्य पथ का अनुसरण आज ही क्या जबसे हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर विराजमान किया गया है तब से ही किया जा रहा है .

भारत एक ऐसा देश है जहाँ लोकतंत्र की स्थापना की गयी थी यहाँ के स्वतंत्रता आन्दोलन में जुटी जनशक्ति देखकर और दुःख भी यहाँ का ये लोकतंत्र ही बनकर रह गया .जनता के प्रतिनिधि सत्ता में बैठकर स्वयं को जनता के सेवक न मानकर उसके सिर का ताज मानकर बैठ गए .और जनता भी कौन दोषमुक्त कही जाएगी वह भी अपने स्वार्थ सिद्ध करने में जुट गयी और परिणाम यह हुआ की यहाँ स्वार्थपूर्ति की दोनों ओर से ऐसी रेलमपेल चली की देश हित गहरे अंधकार में डूब गया .विभिन्न संस्कृतियों ,भाषाओँ के मेल वाला हमारा यह देश आज ऐसे जंगल में फंसकर रह गया है जहाँ जिसको जितना हिस्सा मिल जाता है वह हड़प लेता है .कोई सख्ती यहाँ चल ही नहीं पाती और इसलिए कोई सही काम इस देश में होना एक स्वप्न बनकर रह गया है .चीन जैसा देश सख्ती से एक बच्चे का कानून लागु कर सकता है फिर भारत क्यूं नहीं ?चीन गुलाम नहीं होता क्योंकि वहां गद्दार नहीं हैं किन्तु भारत गुलाम होता है और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी उसी ताकत का गुलाम रहता है क्योंकि यह उसकी इच्छा में है .

कोई भी कार्य जब तक उसके पीछे जनशक्ति न हो ,होना इस देश में असंभव है क्योंकि यहाँ एक -एक वोट एक ऐसी संपत्ति है जिसे हासिल करने के लिए सत्ताधारी दल कोई भी जुगत भिड़ाते हैं .गुलामी के दौरान यहाँ की जनता अंग्रेजियत की ऐसी गुलाम हुई कि आज तक भी उस दासता से मुक्त नहीं हुई .''dogs and indians are not allowed ''भी आज तक हिन्दुस्तानियों का अंग्रेजी प्रेम न घटा पाए .किसी हिंदुस्तानी के घर के द्वार पर कहीं भी यह देखने को नहीं मिला कि ''अंग्रेजी का हम अपमान नहीं करते क्योंकि हमारे यहाँ अतिथि देवो भवः की परंपरा है किन्तु हिंदी के घर में अंग्रेजी मात्र अतिथि है और वही रहेगी ,वह इस मकान की मालकिन नहीं बन सकती .''और यह लिखा होना मुश्किल है क्योंकि यहाँ की जनता अंग्रेजी के रंग में ऐसी रंगी जा रही है कि ये कहना कि हिंदी बाज़ार की भाषा है ,तो ये भी कहाँ सच है ?

बाजार में दुकानों पर जो गर्व ''शॉप ''लिखने में महसूस किया जाता है वह दुकान लिखने में नहीं ,सर्राफ स्वयं को ''गोल्ड स्मिथ'' कहलवाना ज्यादा पसंद करता है .पंसारी चाहता है कि उसे ''टिम्बर मर्चेंट ''कहा जाये .सर्राफ की दुकानों से चादर व् गोल तकिये गायब हो चुके हैं तकियों चादर का स्थान अब टेबिल-चेयर ने ले लिया है .बाजार में किसी उत्पाद के अभिकर्ता आयें या दुकानों पर उपभोक्ता अब कहाँ उनका स्वागत लस्सी या शरबत से होता है हर जगह चाय ,कॉफ़ी ,या फिर कोल्ड ड्रिंक ही इस्तेमाल होते हैं ..

दूसरी ओर ये कहना कि यह गरीबों अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गयी है तो ये भी गलत क्योंकि आज के गरीब अनपढ़ भी हिंदी बोलकर नीचा नहीं दिखना चाहते ,वे भी अंग्रेजी बोलते हैं और उसी में शान महसूस करते हैं .कमजोरी न कह ''वीक्नेक्स'' बोलते हैं ''वीकनेस ''का अपभ्रंश .भले ही गलत बोल रहे हों किन्तु बोल तो अंग्रेजी रहे हैं इसका सुकून उनके चेहरे पर साफ देखा जा सकता है .अस्पताल की जगह हॉस्पिटल सबकी जबान पर चढ़ा है गवर्नमेंट कहने से सिर ऊँचा होता है सरकार कौन जानता है .और फिर मिसकॉल जनलोकप्रिय शब्द का स्थान ले चूका है कौन कहेगा इसे ''छूटी हुई पुकार ''

और क्या क्या कहें व् कहाँ कहाँ झांके ,हिंदी को तहखाने में मुहं बंद कर डाल चुकी अंग्रेजी अब उसी के घर में चाट पकौड़ी खा रही है और सभी को वही मालकिन नज़र आ रही है .



3-
क्या हिंदी सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्यधारा में लाई जा सकती है ........अफ़सोस ये कि नहीं .....



भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने कहा था -

''निज भाषा उन्नति अहै ,सब उन्नति को मूल ,

बिनु निज भाषा ज्ञान के ,मिटे न हिय को शूल ''

महात्मा गाँधी जी ने हिंदी को स्वराज्य वाहिका माना था .हमारे प्रत्येक नेता ने यथावसर हिंदी को भारत की जनता की भाषा कहा है .देश के राजनेताओं के लिए हिंदी का महत्व यहाँ से पता चलता है कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की ''डाइनिंग टेबिल ''का नियम था कि वहां बैठने पर सभी हिंदी में ही बात करेंगे और यहाँ की जनता से जुड़ने के लिए इटली निवासी होने पर भी भारतीय बहू बनने पर सोनिया गाँधी जी ने हिंदी सीखी और आज जनसभाओं में गर्व से वे हिंदी भाषा में ही जनता को संबोधित करती हैं .

हमारे संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया गया क्योंकि हिंदी का स्थान निर्विवाद रूप से राष्ट्रभाषा का है .आज से नहीं कई सदियों से ,महा प्रभु वल्लभाचार्य तथा संत कवियों ,भक्त कवियों से लेकर स्वामी दयानंद सरस्वती ,महात्मा गाँधी ,नेहरु जी तक प्रत्येक लोकनायक एवं लोकसेवक ने जनता की भाषा के रूप में ,राष्ट की बोली के रूप में हिंदी को अपनाया .संत कबीर ने कहा -

''संस्कीरत जल कूप है ,भाषा बहता नीर .''

गोस्वामी तुलसीदास ने भी भारत के कोने कोने तक श्री राम कथा का सन्देश पहुँचाने के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग करना आवश्यक समझा .

इस तरह हिंदी की मान्यता के अनगिनत उदाहरण हो सकते हैं किन्तु फिर भी अफ़सोस और वह भी इसलिए कि हिंदी एक सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्यधारा में नहीं लाई जा सकती ,कारण सबके समक्ष है -

सर्वप्रथम तो संविधान निर्माण के समय ही हिंदी को १५ वर्ष का वनवास दे दिया गया .हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा कभी न बन सके इसके लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने दो राजभाषा अधिनियम बनाये हैं .राजभाषा अधिनियम ३४३/१ के अधीन हिंदी के साथ अंग्रेजी को सहभाषा के रूप में प्रचलित रखने का प्रावधान किया गया इसके फलस्वरूप यह स्थिति बनी कि हिंदी के साथ अंग्रेजी को प्रचलित रखने की अवधि १५ वर्ष निश्चित कर दी गयी परन्तु अब यह अवधि अनिश्चित कालीन कर दी गयी है .राजभाषा अधिनियम की धरा ३/१ में यह जोड़ दिया गया है कि जब तक भारत के एक भी राज्य की सरकार हिंदी को अपने राज्य की राजभाषा स्वीकार करने में संकोच करेगी तब तक हिंदी पूरे संघ की राजभाषा नहीं हो सकेगी .स्पष्ट है कि इस प्रावधान द्वारा हिंदी के संघ की राजभाषा बनने की सम्भावना को सदा सर्वदा के लिए नकार दिया गया .तमिलनाडु जैसे राज्य तो हिंदी के कदीमी विरोधी थे ही नागालैंड जैसा छोटा राज्य भी अंग्रेजी को राजभाषा स्वीकार कर चुका है अतःकई ऐसे राज्य हैं जिनसे हिंदी के पक्ष में अर्थात राष्ट्रभाषा के पक्ष में निर्णय की आशा नहीं की जा सकती .

फिर जब स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जनता पर एकाधिकार से प्रभुत्व रखने वाले पंडित जवाहर लाल नेहरु ये कह सकते हैं -

''हिंदी तथा अहिन्दी भाषियों को दो भागों में बाँट देने से देश का भारी अहित होगा .हिंदी को रजामंदी से आगे ले जाना है ,अगर हिंदी वाले जबरदस्ती करेंगे तो दूसरे लोग ऐंठ जायेंगे इससे ऐसी खाई पैदा हो जाएगी जो हिंदी के लिए नहीं वरन पूरे देश के लिए घातक सिद्ध होगी .हिंदी को और ताकत मिलेगी यदि हिंदी के साथ अंग्रेजी को सहायक भाषा रहने दिया जाये ,क्योंकि अंग्रेजी के जरिये नए नए विचार आते रहेंगे .''

साथ ही ,अपनी सादगी भरी जीवन शैली व् उच्च विचारों वाले तत्कालीन गृहमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी यह कह सकते हैं-

''जब तक हिंदी विकसित नहीं हो जाती और जब तक लोग उसे अच्छी तरह सीख नहीं लेते ,तब तक अंग्रेजी को बनाये रखना ही पड़ेगा .''

फिर आज के किसी नेता से तो इस सम्बन्ध में प्रभावशाली पहल की आशा करना ही व्यर्थ है क्योंकि आज के नेता तो इन नेताओं के महान चरित्र व् त्यागमयी भावनाओं के पास भी नहीं फटकते .ऐसे मे वे हिंदी के लिए सम्मानजनक स्थान बनाने की ओर बढ़ भी सकेंगे ,ये हम सोच भी नहीं सकते क्योंकि पहले के नेता नेता न होकर देश पर मरने मिटने वाले होते थे और आज के नेता देश को ही अपने पर लुटाने वाले होते हैं और ये तथ्य सभी जानते हैं .

और सबसे बढ़कर इस दिशा में हम स्वयं को पायेंगें जिन्हें भले ही टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलनी पड़े किन्तु वह अपनी समृद्ध हिंदी के समक्ष अपने शीश को गर्व से उठाने के लिए आवश्यक जान पड़ती है .आज अहिन्दी भाषियों की तो क्या कहें हिंदी भाषी क्षेत्रों के परिवार अपने बच्चों को 'कॉवेन्ट 'में पढ़ाने की इच्छा रखते हैं भले ही उधार लेकर पढाना पड़े .प्राचीन गुरुकुल मान्यता अब समाप्त हो चुकी है क्योंकि भारतीय जनता जमीन पर बैठकर भोजन करने की नहीं अपितु चेयर -टेबिल पर बैठ लंच ,डिनर की आदि हो चुकी है .

इसलिए अफ़सोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि हिंदी कभी भी सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्य धारा में नहीं लाई जा सकती क्योंकि मुख्य धारा ही अब अंग्रेजी के रंग में रंगीली हो चुकी है .

शालिनी कौशिक

[कौशल ]

शनिवार, 6 सितंबर 2014

दुष्कर्म :नारी नहीं है बेचारी

दुष्कर्म :नारी नहीं है बेचारी
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       दुष्कर्म आज ही नहीं सदियों से नारी जीवन के लिए त्रासदी रहा है .कभी इक्का-दुक्का ही सुनाई पड़ने वाली ये घटनाएँ आज सूचना-संचार क्रांति के कारण एक सुनामी की तरह नज़र आ रही हैं और नारी जीवन पर बरपाये कहर का वास्तविक परिदृश्य दिखा रही हैं .
भारतीय दंड सहिंता में दुष्कर्म ये है -
भारतीय दंड संहिता १८६० का अध्याय १६ का उप-अध्याय ''यौन अपराध ''से सम्बंधित है जिसमे धारा ३७५ कहती है-
Central Government Act
Section 375 in The Indian Penal Code, 1860
375. Rape.-- A man is said to commit" rape" who, except in the case hereinafter excepted, has sexual intercourse with a woman under circumstances falling under any of the six following descriptions:-
First.- Against her will.
Secondly.- Without her consent.
Thirdly.- With her consent, when her consent has been obtained by putting her or any person in whom she is interested in fear of death or of hurt.
Fourthly.- With her consent, when the man knows that he is not her husband, and that her consent is given because she believes that he is another man to whom she is or believes herself to be lawfully married.
Fifthly.- With her consent, when, at the time of giving such consent, by reason of unsoundness of mind or intoxication or the administration by him personally or through another of any stupefying or unwholesome substance, she is unable to understand the nature and consequences of that to which she gives consent.
Sixthly.- With or without her consent, when she is under sixteen years of age.
Explanation.- Penetration is sufficient to constitute the sexual intercourse necessary to the offence of rape.
Exception.- Sexual intercourse by a man with his own wife, the wife not being under fifteen years of age, is not rape.
      ये आंकड़े इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आज ये घटनाएँ किस कदर नारी जीवन को गहरे अंधकार में धकेल रही हैं -
     अश्लीलता का असर -
राज्य                २०१२              २०१३
आंध्र प्रदेश          २८                  २३४
केरल                 १४७                १७७
उत्तर प्रदेश         २६                  १५९
महाराष्ट्र            ७६                  १२२
असम                ०                    १११
भारत               ५८९                  १२०३
      -सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम के तहत दर्ज मामले [पोर्नोग्राफी के चलते जहाँ महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा बढ़ रही है वहीं मासूम भी इसके दुष्प्रभाव से बचे हुए नहीं हैं .आंकड़े लोकसभा ]


       और ये हैं कुछ गंभीर मामले -
१- दामिनी गैंगरेप केस -१६ दिसंबर २०१२
२-ग्वालियर में महिला जज द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जज पर यौन उत्पीड़न का आरोप
३- विशाखापट्नम में नौसेना में महिला अफसर [सब लेफ्टिनेंट महिला अफसर ]द्वारा कमांडर रैंक के अफसर पर   यौन प्रताड़ना का आरोप
४- शामली जिले में ९० वर्षीय महिला से रिश्ते के पौत्र द्वारा रेप
५- बदायूं  में दो बहनों के साथ बलात्कार के बाद हत्या
६- बंगलुरु में शहर के एक नामी गिरामी स्कूल में एक छह साल की बच्ची के साथ बलात्कार
७- बंगलुरु में आर्मी एविएशन कॉर्प्स में तैनात एक महिला अधिकारी की इज़्ज़त लूटने का प्रयास .
         ये तो चंद घटनाएँ हैं मात्र उदाहरण उस अभिशाप का जो नारी जीवन को मर्मान्तक ,ह्रदय विदारक चोट देता है किन्तु ये समाज और ये पुरुष जाति इस घटना को मात्र संवाद सहानुभूति तक ही सीमित कर देती है .गावों में जहाँ दुष्कर्मी को कभी पांच जूते मारकर व् कभी गधे पर मुंह काला करके गावं में घुमाने तो कभी कुछ रुपयों का जुर्माने की सजा दी जाकर बरी कर दिया जाता है वहीँ इस तरह की घटना पर रक्षा मंत्री /वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली जी द्वारा 'एक छोटी सी घटना ''जैसी संवेदना हीन प्रतिक्रिया दी जाती है .
      किन्तु जैसे कि सहानुभूति कुछ देर के लिए दर्द को भुला तो सकती है खत्म नहीं कर सकती वैसे ही ऐसे में यदि इस घटना पर नारी को सहानुभूति मिल भी जाये तो उसकी अंतहीन पीड़ा का खात्मा नहीं हो सकता उसे इस सम्बन्ध में स्वयं को मजबूत करना होगा और इस ज़ुल्म के खिलाफ खड़ा होना ही होगा .


नारी नहीं है बेचारी 
     साक्षी नाम की १५ वर्षीय लड़की और उत्तर प्रदेश का सी.ओ.स्तर का अधिकारी अमरजीत शाही ,कोई सोच भी नहीं सकता था कि एक १५ वर्षीय नाजुक कोमल सी लड़की उसका मुकाबला कर पायेगी पर उसने किया और अपना नाम तक नहीं बदला क्योंकि उसका मानना है कि मुजरिम वह नहीं उसका उत्पीड़न करने वाला  है और उसी की हिम्मत का परिणाम है कि १४ अगस्त को शाही को अपहरण ,बलात्कार और आतंकित करने के जुर्म में दोषी पाया गया और तीन दिन बाद उसे १० साल की सख्त कारावास और ६५,००० रूपये का अर्थ दंड भरने की  सजा सुनाई गयी.
    शामली में ९० वर्षीय वृद्धा ने कोर्ट में रेप की दास्तान बयान की और उसके दुष्कर्मी को १० साल का कारावास मिला .
        बंगलुरु में महिला अधिकारी की इज़्ज़त लूटने के प्रयास में जवान बर्खास्त .
   कंकरखेड़ा मेरठ की आशा कहती हैं कि महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को रोकने के लिए सिर्फ कानून से काम चलने वाला नहीं .कानून की कमी नहीं पर इसके लिए समाज को भूमिका निभानी होगी .लाडलो पर अंकुश लगाना होगा .
  नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में २०१३ में दर्ज किये गए रेप के मामले में प्रत्येक १०० मामलों में ९५ दोषी व्यक्ति पीड़िताओं के परिचित ही थे .अभी हाल ही में घटित लखनऊ निर्भया गैंगरेप में भी दोषी मृतका का परिचित ही था .इसलिए ऐसे में महिलाओं की जिम्मेदारी  बनती है कि वे सतर्क रहे और संबंधों को एक सीमा में ही रखें .
      बच्चों की शिकायतों पर गौर करें और ज़रूरी कदम उठायें संबंधों को मात्र संबंध ही रहने  दें न कि अपने ऊपर बोझ बांयें  .
       सामाजिक रूप से बच्चों की और अपनी दोस्ती को घर के बाहर ही निभाने पर जोर दें और बच्चों से उनके दोस्तों के बारे में जानकारी  लेती रहें .
        यही  नहीं कानून ने भी इस संबंध में नारी का साथ निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है और भले ही यह अपराध उन्हें   तोड़ने की लाख कोशिश करे किन्तु वे टूटें नहीं बल्कि इसका डटकर मुकाबला करें .

   आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है .
कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं करती हैं और इसके लिए विधि बनाने में काफी समय लगेगा ;अतः जब तक विधान मंडल समुचित विधि नहीं बनाता है न्यायालय द्वारा विहित मार्गदर्शक सिद्धांत को लागू किया जायेगा .

न्यायालय ने ये भी निर्णय दिया कि ''प्रत्येक नियोक्ता या अन्य व्यक्तियों का यह कि काम के स्थान या अन्य स्थानों में चाहे प्राईवेट हो या पब्लिक ,श्रमजीवी महिलाओं के यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित उपाय करे .इस मामले में महिलाओं के अनु.१४,१९ और २१ में प्रदत्त मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विशाखा नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने लोकहित वाद न्यायालय में फाईल किया था .याचिका फाईल करने का तत्कालीन कारण राजस्थान राज्य में एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना थी .न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये-
[१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं - सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींटाकशी करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम [१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शारीरिक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी  छींटाकशी करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम या विनियमों में यौन उत्पीडन रोकने सम्बन्धी नियम शामिल किये जाने चाहिए और ऐसे नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए समुचित दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए .
[स] प्राईवेट क्षेत्र के नियोक्ताओं के सम्बन्ध में औद्योगिक नियोजन [standing order  ]अधिनियम १९४६ के अधीन ऐसे निषेधों को शामिल किया जाना चाहिए.
[द] महिलाओं को काम,आराम,स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञानं के सम्बन्ध में समुचित परिस्थितियों का प्रावधान होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया  जाना चाहिए  कि महिलाओं को काम के स्थान में कोई विद्वेष पूर्ण वातावरण न हो उनके मन में ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि वे नियोजन आदि के मामले में अलाभकारी स्थिति में हैं .
[२] जहाँ ऐसा आचरण भारतीय दंड सहिंता या किसी अन्य विधि के अधीन विशिष्ट अपराध होता हो तो नियोक्ता को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को शिकायत करके समुचित कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए .
[३]यौन उत्पीडन की शिकार महिला को अपना या उत्पीडनकर्ता  का स्थानांतरण करवाने का विकल्प होना चाहिए.
न्यायालय ने कहा कि ''किसी वृत्ति ,व्यापर या पेशा के चलाने के लिए सुरक्षित काम का वातावरण होना चाहिए .''प्राण के अधिकार का तात्पर्य मानव गरिमा से जीवन जीना है ऐसी सुरक्षा और गरिमा की सुरक्षा को समुचित कानून द्वारा सुनिश्चित कराने तथा लागू करने का प्रमुख दायित्व विधान मंडल और कार्यपालिका का है किन्तु जब कभी न्यायालय के समक्ष अनु.३२ के अधीन महिलाओं के यौन उत्पीडन का मामला लाया जाता है तो उनके मूल अधिकारों की संरक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना ,जब तक कि  समुचित विधान नहीं बनाये जाते उच्चतम न्यायालय का संविधानिक कर्त्तव्य है.
- -इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने  दिल्ली डेमोक्रेटिक वर्किंग विमेंस फोरम बनाम भारत संघ [१९९५] एस.सी.१४ में पुलिस स्टेशन पर पीड़िता को विधिक सहायता की उपलब्धता की जानकारी दिया जाना ,पीड़ित व्यक्ति की पहचान गुप्त रखा जाना और आपराधिक क्षति प्रतिकर बोर्ड के गठन का प्रस्ताव रखा है .
-भारतीय दंड सहिंता की धारा ३७६ में विभिन्न प्रकार के बलात्कार के लिए कठोर कारावास जिसकी अवधि १० वर्ष से काम नहीं होगी किन्तु जो आजीवन तक हो सकेगी और जुर्माने का प्रावधान भी रखा गया है .
-महिलाओं की मदद के लिए विभिन्न तरह के और भी उपाय हैं -
-आज की  सबसे लोकप्रिय वेबसाइट फेसबुक पर महिलाओं की मदद के लिए पेज है -
helpnarishakti@yahoo.com
-राष्ट्रीय महिला आयोग से भी महिलाएं इस सम्बन्ध में संपर्क कर सकती हैं उसका नंबर है -
  011-23237166,23236988
-राष्ट्रीय महिला आयोग को शिकायत इस नंबर पर की जा सकती है -
 23219750
-दिल्ली निवासी महिलाएं दिल्ली राज्य महिला आयोग से इस नंबर पर संपर्क कर सकती हैं -
011 -23379150  ,23378044
-उत्तर प्रदेश की महिलाएं अपने राज्य के महिला आयोग से इस नंबर पर संपर्क कर सकती हैं -
0522 -2305870 और ईमेल आई डी है -up.mahilaayog@yahoo.com
     आज सरकार भी नारी सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है और उसकी यह प्रतिबद्धता दिखती है अब दुष्कर्म पीड़िताओं की मदद के लिए निर्भया केंद्र खुलेंगे जिसमे पीड़िताओं को २४ घंटे चिकित्सीय सहायता मिलेगी और जहाँ डाक्टर ,नर्स के अलावा वकील भी केन्द्रों पर मौजूद रहेंगे .यही नहीं अब सरकार गावों में खुले में शौच को भी इस समस्या से जोड़ रही है और मोदी जी ने स्वतंत्रता दिवस पर इस सम्बन्ध में त्वरित प्रबंध किये जाने के प्रति अपना दृढ संकल्प दिखाया है .
   अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने क्लिंटन फाउंडेशन के कार्यक्रम में कहा कि महिलाओं और लड़कियों में आर्थिक व् सामाजिक रूप से आगे बढ़ने की असीमित क्षमता है इसके लिए ज़रूरी है कि वे अपने निर्णय खुद लें और आज उन्हें दिखाना ही होगा कि ये कहर भी झेलकर वे आगे बढ़ती रहेंगी और इसका डटकर मुकाबला करती रहेंगी .

शालिनी कौशिक  
  [कौशल ]

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

हुए सहाय्य ये ही सबके आगे कदम बढ़ाने में .

Sarvepalli Radhakrishnan


अर्पण करते स्व-जीवन शिक्षा की अलख जगाने में ,
रत रहते प्रतिपल-प्रतिदिन  शिक्षा की राह बनाने में .
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आओ मिलकर करें स्मरण नमन करें इनको मिलकर ,
जिनका जीवन हुआ सहायक हमको सफल बनाने में .
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जीवन-पथ पर आगे बढ़ना इनसे ही हमने सीखा ,
ये ही निभाएं मुख्य भूमिका हमको राह दिखाने में  .
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खड़ी बुराई जब मुहं खोले हमको खाने को तत्पर ,
रक्षक बनकर आगे बढ़कर ये ही लगे बचाने में .
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मात-पिता ये नहीं हैं होते मात-पिता से भी बढ़कर ,
गलत सही का भेद बताकर लगे हमें समझाने में .
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पुष्प समान खिले जब शिष्य प्रफुल्लित मन हो इनका ,
करें अनुभव गर्व यहाँ ये उसको श्रेय दिलाने में .
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शीश झुकाती आज ''शालिनी ''अहर्नीय के चरणों में ,
हुए सहाय्य ये ही सबके आगे कदम बढ़ाने में .
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               शालिनी कौशिक 
                   [कौशल ]

समीक्षा - "ये तो मोहब्बत नहीं" - समीक्षक शालिनी कौशिक

समीक्षा -  '' ये तो मोहब्बत नहीं ''-समीक्षक शालिनी कौशिक उत्कर्ष प्रकाशन ,मेरठ द्वारा प्रकाशित डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन...