शनिवार, 31 जनवरी 2015

क्या राहुल सोनिया के कहने पर कुँए में कूदेंगी जयंती ?


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नईम अहमद ' नईम ' ने कहा है -
'' हथेली जल रही है फिर भी हिम्मत कर रहा हूँ मैं ,
  हवाओं से चिरागों की हिफाज़त कर रहा हूँ मैं .''
बिलकुल यही अंदाज़ दिखाते हुए पूर्व पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने शुक्रवार ३० जनवरी २०१५ को कांग्रेस पार्टी छोड़ दी .राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्होंने जो किया उसके सम्बन्ध में तो उन्हें सही कहना गलत होगा किन्तु ये अवश्य कहना होगा कि ये करते हुए उन्होंने राष्ट्रपिता के ' सत्य ' के सिद्धांत का अवश्य पालन किया और वह यह कहते हुए कि ' मैंने कुछ गलत नहीं किया ' सही कह रही हैं जयंती नटराजन ,उन्होंने गलत नहीं किया और इसलिए अपने पिछले कर्मो के सम्बन्ध में जो उन्होंने राहुल गांधी के कहने पर किये उनके लिए तो उन्हें जेल जाने या फांसी चढ़ने का डर अपने मन से निकाल ही देना चाहिए और अब ये तो वक्त के ऊपर निर्भर है कि वह दिखाए कि वे सच की हिफाजत कर रही थी या स्वयं की .
   जयंती ने कहा कि उन्होंने परियोजनाओं को मंजूरी देने में कांग्रेस उपाध्यक्ष के निर्देश का पालन किया .नटराजन के मुताबिक राहुल के निर्देश पर उन्होंने वेदांत के प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं दी और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके रुख को सही बताया .ऐसे ही अदाणी परियोजना रोकने के मामले में भी जयंती नटराजन ने माना कि इस बारे में भी स्थानीय एन.जी.ओ.और लोगों की शिकायत राहुल गांधी के जरिये उनके पास पहुंचाई गयी थी और ये सब स्वयं स्वीकार कर जयंती स्वयं ही राहुल गांधी को सही साबित कर रही हैं .सुप्रीम कोर्ट द्वारा इनके उस रुख को सही बताना और जनता की शिकायतों का राहुल गांधी द्वारा इनके पास पहुँचाना निश्चित रूप में इनके लिए अपने कार्यों को सही साबित करने हेतु आवश्यक है और जब ये सही है तो सही काम कराने के लिए राहुल गांधी गलत कैसे हुए ?
    ऐसे ही ये कहती हैं कि उन्होंने परियोजनाओं को मंजूरी देने में कांग्रेस उपाध्यक्ष के निर्देश का पालन किया लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी उपेक्षा ,तिरस्कार व् अपमान किया .जल्दबाजी में बुलाये गए एक संवाददाता सम्मलेन में उन्होंने कहा कि मैंने सभी पर्यावरण मुद्दों पर केवल पार्टी लाइन और नियम पुस्तिका का पालन किया जबकि संविधान के अनुच्छेद ७५ के खंड [४] में प्रत्येक मंत्री संविधान की तीसरी अनुसूची के प्रारूप १ में राष्ट्रपति द्वारा जो शपथ ग्रहण करता है उसमे वह शपथ लेते हुए कहता है -
   '' मैं ,अमुक ईश्वर की शपथ लेता हूँ /सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ ,कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा ,मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा ,मैं संघ के मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात ,अनुराग या द्वेष के बिना ,सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा। ''
    इसके साथ ही संघ का मंत्री तीसरी अनुसूची के प्रारूप २ में गोपनीयता की शपथ भी ग्रहण करता है ,जिसमे वह कहता है -
   ''मैं ,अमुक ,ईश्वर की शपथ लेता हूँ /सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ ,कि जो विषय संघ के मंत्री के रूप में मेरे विचार के लिए लाया जायेगा अथवा मुझे ज्ञात होगा ,उसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को ,तब के सिवाय जबकि मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों के सम्यक निर्वहन के लिए ऐसा करना अपेक्षित हो ,मैं प्रत्यक्ष अथवा  अप्रत्यक्ष रूप से संसूचित या प्रकट नहीं करूँगा। ''
     ऐसे में जब जयंती मानती  हैं कि राहुल गांधी के निर्देशों को मानने में केबिनेट के भीतर और बाहर उनकी काफी आलोचना हुई थी तो उन्होंने संविधान में ली गयी शपथ को दरकिनार करते हुए वह कार्य क्यों किया जबकि वे केंद्र में जिम्मेदार मंत्री थी और मंत्री होने के कारण वे अपनी इन दोनों शपथ से बंधी हुई थी जिसके अनुसार उन्हें संविधान का पालन करना होता है न कि पार्टी लाइन या नियम पुस्तिका का और सोनिया गांधी या राहुल गांधी उनकी पार्टी के हाईकमान श्रेणी में थे संविधान की नहीं और वे कोई नौसिखिया मंत्री नहीं थी बल्कि अनुभवी खांटी श्रेणी की राजनीतिज्ञ व् अधिवक्ता हैं और सविधान को भली भांति जानती व् समझती हैं , इसलिए ऐसे में संविधान को दरकिनार कर वे अपनी पार्टी लाइन पर चल रही थी तो कैसे कह सकती हैं कि मैंने कुछ गलत नहीं किया ,अब कोई आपसे यह कहे कि कुँए में कूद जा तो क्या आप कूद जाओगे या किसी के कहने पर आप बैल के सामने खड़े होकर उससे कहने लग जाओगे कि आ बैल मुझे मार ,नहीं न फिर ऐसे में उनके कहने पर राहुल गांधी या सोनिया गांधी दोषी कैसे ? हाँ इतना अवश्य है कि वे ये कहकर कांग्रेस को एक सही पार्टी ही साबित कर रही हैं और सोनिया गांधी को श्रेष्ठ हाईकमान ,क्योंकि वे स्वयं ये मान रही हैं कि राहुल के निर्देशों का पालन करने पर भी सोनिया गांधी ने उनकी उपेक्षा ,तिरस्कार और अपमान किया ,इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से जयंती नटराजन ने सोनिया गांधी की भारतीय संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा ही साबित की है जो जयंती द्वारा राहुल के निर्देश मानने पर उनकी संविधान के प्रति ली गयी शपथ को दरकिनार करने में सोनिया की नाराजगी से प्रकट होती है और जयंती ने जिस पार्टी लाइन के लिए संविधान की शपथ को दरकिनार किया आज उसे छोड़ने का मन बना लिया वह भी तब जब पार्टी सत्ता से बाहर है और अपने दुर्दिन देख रही है और जयंती को पार्टी का माहौल घुटन भरा दिखा वह भी इस वक्त जब पार्टी सत्ता में नहीं है और उन्होंने इस्तीफा भी पार्टी से तब दिया उस वक्त के कार्यों के लिए जो सत्ता में रहते हुए किये थे और जिसके कारण सत्ता में पार्टी के रहते हुए ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था और तब से लेकर अब तक उन्हें पार्टी में घुटन नहीं हुई थी .ऐसे में उनके लिए अपनी कार्यप्रणाली और बयानबाजी को नकारते हुए पार्टी के माहौल को घुटन भरा कहना उनके अवसरवादी राजनीतिज्ञ होने का ही प्रमाण देता है जो सत्ता से पार्टी की दूरी को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति का मोड़ दे रहा है .
    अपनी इस तरह की बयानबाजी से वे भले ही ऊपरी तौर पर सोनिया राहुल पर दोषारोपण कर रही हैं किन्तु भीतरी तौर  पर खुद को ही दोषी साबित कर रही हैं क्योंकि अगर कहीं भी कुछ गलत है तो वह जयंती की कार्यप्रणाली है जो संविधान के प्रति श्रद्धा निष्ठा की शपथ लेकर भी उसका पालन नहीं करती और अपने भय,पक्षपात ,अनुराग या द्वेष को अपने साथ रखते हुए अपनी पार्टी हाईकमान व् उपाध्यक्ष को दोषी दिखाने का यत्न करती है जिन दोनों का ही कृत्य स्वयं उनकी बयानबाजी से ही किसी दोष के घेरे में नहीं आता बल्कि उन्हें संविधान का सम्मान करने वाला और न्याय व् जनता के हित का हितेषी ही साबित करता है .ऐसे में सलीम अहमद ' सलीम' के शब्द इनके प्रलाप को अनर्गल साबित करने हेतु खरे साबित होते हैं ,जो कहते हैं -
 ''आग उगलते हुए सूरज से बगावत की है ,
  मोम के पुतलों ने कैसी यह हिमाकत की है .''

शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

...आखिर न्याय पर पुरुषों का भी हक़ है .






दैनिक जनवाणी से साभार 

[False dowry case? Man kills self
Express news service Posted: Feb 07, 2008 at 0321 hrs
Lucknow, February 6 A 30-year-old man, Pushkar Singh, committed suicide by hanging himself from a ceiling fan at his home in Jankipuram area of Vikas Nagar, on Wednesday.In a suicide note, addressed to the Allahabad High Court, Singh alleges that he was framed in a dowry case by his wife Vinita and her relatives, due to which he had to spend time in judicial custody for four months.
The Vikas Nagar police registered a case later in the day.
“During the investigation, if we find it necessary to question Vinita, we will definitely record her statement,” said BP Singh, Station Officer, Vikas Nagar.
Pleading innocence and holding his wife responsible for the extreme step he was taking, Singh’s note states: “I was sent to jail after a false dowry case was lodged against me by Vinita and her family, who had demanded Rs 14 lakh as a compensation. Neither my father nor I had seen such a big amount in our lives. We even sold our house to contest the case.”
According to reports, Singh married Vinita about two years ago and lived in Allahabad since.
Early last year, his wife left him and started living with her family.
A case under Sections 323 (voluntarily causing hurt), 498 (A) (cruelty by husband or relatives of husband) and 504 (intentional insult) was lodged by Vinita and her relatives before she left him.
In the note, Singh wrote he was in the Naini Central Jail from “September 29 to December 24, 2007”.
Shishupal Singh, Singh's brother-in-law, said he was disturbed ever since he released from jail. The court case constantly haunted him.
“After he was bailed out, he was living with his mother, younger sister and a physically-challenged brother in a rented house in Jankipuram.” The family had their own house in Indira Nagar, which was recently sold to meet the legal expenses, he added.
“While he searched for a job, he drove a three-wheeler for a living. A few days ago, he received a notice from the court and since then, he stopped stepping out of the house,” he said.
In the note, Singh further wrote: “I would also like to request Vinita not to harass my family in future. It was my mistake to marry her and I am repenting it by sacrificing my life.”]

''मुझे दहेज़ कानून की धारा ४९८-ए,३२३ और ५०४ के तहत जेल जाना पड़ा ,मेरी पत्नी विनीता ने शादी के 2 साल बाद हमारे परिवार के खिलाफ दहेज़ के रूप में 14 लाख रुपये मांगने का झूठा मुकदमा लिखाया था .इतनी रकम कभी मेरे पिता ने नहीं कमाई ,मैं इतना पैसा मांगने के बारे में कभी सोच भी नहीं सकता था ,मेरी भी बहने हैं ,इस मुक़दमे के चलते मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया है ,हम आर्थिक तंगी के शिकार हो गए ,मकान बिक गया ,अब मैं ज़िंदा नहीं रहना चाहता हूँ ख़ुदकुशी करना चाहता हूँ ,मेरी मौत के लिए मेरी ससुराल के लोग जिम्मेदार होंगे .''
       ये था उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के जानकीपुरम सेक्टर -सी में रहने वाले पुष्कर सिंह का ख़ुदकुशी से पहले लिखा गया पत्र ,जिसे लिखने के बाद ६ फरवरी २००८ को पुष्कर ने फांसी का फंदा गले में डाल कर ख़ुदकुशी कर ली .
       
     ये दोनों ही मामले ऐसे हैं जो संविधान द्वारा दिए गए प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के मूल अधिकार से एक हद तक पुरुष जाति को वंचित करते हैं .पुरुषों ने महिलाओं पर अत्याचार किये हैं ,उनके साथ बर्बर व्यवहार किये हैं किन्तु ये आंकड़ा अधिकांशतया होते हुए भी पूर्णतया के दायरे में नहीं आता .अधिकांश पुरुषों ने अधिकांश महिलाओं के जीवन को कष्ट पहुँचाया है किन्तु इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि सभी पुरुषों ने महिलाओं को कष्ट पहुँचाया है .अधिकांश महिलाएं पुरुषों के द्वारा पीड़ित रही हैं किन्तु इस बात से ये तो नहीं कहा जा सकता कि सभी महिलाएं पुरुषों के द्वारा पीड़ित रही हैं और इसीलिए अधिकांश के किये की सजा अगर सभी को दी जाती है तो ये कैसे कहा जा सकता है कि संविधान द्वारा सभी को जीने का अधिकार दिया जा रहा है .जीने का अधिकार भी वह जिसके बारे में स्वयं संविधान के संरक्षक उच्चतम न्यायालय ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९७८ एस.सी.५९७ में कहा है -
''प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुए जीने का अधिकार है .''
 फ्रेंसिसी कोरेली बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९८१ एस.सी. ७४६ में इसी निर्णय का अनुसरण करते हुए उच्चतम न्यायालय  ने कहा -''अनुच्छेद २१ के अधीन प्राण शब्द से तात्पर्य पशुवत जीवन से नहीं वरन मानव जीवन से है इसका भौतिक अस्तित्व ही नहीं वरन आध्यात्मिक अस्तित्व है .प्राण का अधिकार शरीर के अंगों की संरक्षा तक ही सीमित नहीं है जिससे जीवन का आनंद मिलता है या आत्मा वही जीवन से संपर्क स्थापित करती है वरन इसमें मानव गरिमा के साथ  जीने का अधिकार भी सम्मिलित है जो मानव जीवन को पूर्ण बनाने के लिए आवश्यक है .''
     और ऐसे मामले जहाँ कानून से मिली छूट के आधार पर शादी के सात साल के अंदर के विवाह को दहेज़ से जोड़ देना और नारी के द्वारा स्वयं ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने पर पुरुष से धिक्कार पाने पर उसे बलात्कार के प्रयास का रूप दे दिया जाना सीधे तौर पर पुरुष की गरिमा पर ,जीने के अधिकार पर हमले कहें जायेंगें क्योंकि इन मामलों में नारी का पक्ष न्यायालय के सामने मजबूत रहता है और एक यह पक्ष भी न्यायालय के सामने रहता है कि नारी ऐसे मामलों में शिकायत की पहल नहीं करती है और इसका खामियाजा पुरुषों को भुगतना पड़ता है .ऐसे मामलों में सबूतों ,गवाहों की कमी यदि महिलाओं को रहती है तो पुरुषों को भी इसका सामना करना पड़ता है और अपने मामलों को साबित करना दोनों के लिए ही कठिन हो जाता है किन्तु महिला के लिए न्यायालय का कोमल रुख यहाँ पुरुषों के लिए और भी बड़ी कठिनाई बन कर उभरता है .यूँ तो अधिकांशतया नारियों पर ही अत्याचार होते हैं किन्तु जहाँ एक तरफ ख़राब चरित्र के पुरुष हैं वहीँ ख़राब चरित्र की नारियां भी हैं और इसका फायदा वे ले जाती हैं क्योंकि ख़राब चरित्र का पुरुष ऐसे जाल में नहीं फंसता वह पहले से ही अपने बचाव के उपाय किये रहता है जबकि अच्छे चरित्र का पुरुष उन बातों के बारे में सोच भी नहीं पाता जो इस तरह की तिकड़मबाज नारियां सोचे रहती हैं और अमल में लाती हैं .
       जैसे कि हमारे ही एक परिचित के लड़के से ब्याही लड़की विवाह के कुछ समय तो अपनी ससुराल में रही और बाद में अपने मायके चली गयी और वहां से ये बात पक्की करके ही ससुराल में आई कि लड़का ससुराल से अलग घर लेकर रहेगा .लड़के के अलग रहने पर वह आई और कुछ समय रही और बाद में एक दिन जब लड़का कहीं बाहर गया था तो घर से अपना सामान उठाकर अपने भाइयों के साथ चली गयी और अपने घर जाकर अपने पति पर दहेज़ का मुकदमा दायर कर दिया ,सबसे अलग रहने के बावजूद घर के अन्य सभी को भी पति के साथ ४९८-ए के अंतर्गत क्रूरता के घेरे में ले लिया .स्थिति ये आ गयी कि लड़के के मुंह से यह निकल गया -''कि बस अब तो ऊपर जाने का मन करता है .''वह तो बस भगवान की कृपा कही जाएगी या फिर उसके घरवालों का साथ कि अपनी कोई जमीन बेचकर उन्होंने लड़की वालों को १० लाख रूपये दिए और लड़के को ख़ुदकुशी और खुद को जेल जाने से बचाया किन्तु अफ़सोस यही रहा कि कानून कहीं भी साथ में खड़ा नज़र नहीं आया .
        ऐसे ही ये बलात्कार या बलात्कार का प्रयास का आरोप है जिसमे या तो लम्बी कानूनी कार्यवाही या लम्बी जेल और या फिर ख़ुदकुशी ही बहुत सी बार निर्दोष चरित्रवान पुरुषों का भाग्य बनती है .हमारी जानकारी के ही एक महोदय का अपनी संपत्ति को लेकर एक महिला से दीवानी मुकदमा चल रहा है और वह महिला जब अपने सारे हथकंडे आज़मा कर भी उन्हें मुक़दमे में पीछे न हटा पायी तो उसने वह हथकंडा चला जिसे सभ्य समाज की कोई भी महिला कभी भी नहीं आज़माएगी .उसने इन महोदय के एकमात्र पुत्र पर जो कि उससे लगभग १५ साल छोटा होगा ,पर यह आरोप लगा दिया कि उसने मेरे घर में घुसकर मेरे साथ 'बलात्कार का प्रयास 'किया .वह तो इन महोदय का साथ समाज के लोगों ने दिया और कुछ राजनीतिक रिश्तेदारी ने जो इनका एकमात्र पुत्र जेल जाने से बच गया और उसका जीवन तबाह होने से बच गया किन्तु कानून के नारी के प्रति कोमल रुख ने इस नारी के हौसलों को ,जितने दिन भी वह इन्हें इस तरह परेशान रख सकी से इतने बुलंद कर दिए कि वह आये दिन जिस किसी से भी उसका कोई विवाद होता है उसे बलात्कार का प्रयास का आरोप लगाने की ही धमकी देती है और कानून कहीं भी उसके खिलाफ खड़ा नहीं होता बल्कि उसे और भी ज्यादा छूट देता है .भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा १४६[३] में अधिनियम संख्या ४ सं २००३ द्वारा परन्तुक अंतःस्थापित कर कानून ने ऐसी ही छूट दी है .जिसमे कहा गया है -
   [बशर्ते कि बलात्कार या बलात्कार करने के प्रयास के अभियोजन में अभियोक्त्री से प्रतिपरीक्षा में उसके सामान्य अनैतिक चरित्र के विषय में प्रश्नों को करने की  अनुज्ञा नहीं होगी .]
        क्या यही है कानून कि एक निर्दोष चरित्रवान मात्र इसलिए अपमानित हो ,जेल काटे कि वह एक पुरुष है .अगर बाद में कानूनी दांवपेंच के जरिये वह अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्ति पा भी लेता है तब भी क्या कानून उसके उस टुकड़े-टुकड़े हुए आत्मसम्मान की भरपाई कर पाता है जो उसे इस तरह के निराधार आरोपों से भुगतनी पड़ती है ?क्या ज़रूरी नहीं है ऐसे में गिरफ़्तारी से पहले उन मेडिकल परीक्षण ,सबूत ,गवाह आदि का लिया जाना जिससे ये साबित होता हो कि पीड़िता के साथ यदि कुछ भी गलत हुआ है तो वह उसी ने किया है जिस पर वह आरोप लगा रही है .ऐसे ही दहेज़ के मामले ,क्रूरता के मामले जिस तरह एकतरफा होकर महिला का पक्ष लेते हैं क्या ये कानून के अंतर्गत सही कहा जायेगा कि निर्दोष सजा पाये और दोषी खुला घूमता रहे .आज कितने ही मामलों में महिलाएं ही पहले घर वालों के द्वारा की गयी जबरदस्ती में शादी कर लेती हैं और बाद में उस विवाह को न निभा कर वापस आ जाती हैं और दहेज़ कानून का दुरूपयोग करती हैं .आज दिल्ली की एक अदालत ने इस बात को समझा है और इस दिशा में सही कदम उठाते हुए महिला के खिलाफ शिकायत दर्ज किये जाने की टिप्पणी की है.अपराध के इस पक्ष को सभी न्यायालयों और न्यायविदों को समझना होगा और सभी की भलाई व् सभी के लिए न्याय के लिए कानून को तैयार करना होगा, आखिर न्याय पर पुरुषों का भी हक़ है।  कानून को गंभीरता से इन मुद्दों को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों के लिए सही व्यवस्था करनी ही होगी अन्यथा इस देश में मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार पुरुषों को भी है यह बात भूलनी ही होगी .

शालिनी कौशिक 
  [कानूनी ज्ञान ]

बुधवार, 28 जनवरी 2015

लोकनिर्माण विभाग -एक सिरदर्द


आजकल सभी और अफरातफरी का माहौल है आप सभी को पता भी होगा  और कितने ही होंगे जो इस विपदा को झेल भी रहे होंगे .चलिए पहले कुछ चित्र ही देख कर समझ लें- 
अमर उजाला व् हिंदुस्तान दैनिक से साभार 
देखा आपने यही हाल है बरसात के इस मौसम में 

जानते हैं  मैं  क्या कहना चाह रही हूँ यही  कि उत्तर प्रदेश का लोक निर्माण विभाग सड़कों का निर्माण कुछ इस प्रकार कर रहा है कि जो घर सड़क से काफी ऊँचे बनाये गए थे वे धीरे धीरे सड़क पर ही आते जा रहे हैं.कहने का मतलब ये है कि जब वे घर बनाये गए थे तो सड़क से इतने ऊँचे बनाये गए थे कि बारिश का पानी उन में नहीं घुस सकता था किन्तु अब स्थिति ये है कि जरा सी बारिश होते ही बारिश का पानी घरों में घुस जाता है और स्थिति यही होती है जो ऊपर के चित्रों में दिखाई दे रही है.सड़कें जब भी बनाई जा रही हैं तब ही हर बार वे ऊँची उठ जाती हैं.हाल ये है कि एक समय जो चबूतरे दीखते थे आज वे सड़क का भाग ही दिखाई दे रहे हैं.
  इसके साथ ही सड़कों पर पहले जो नालियां बनती थी वे ऐसी बनती थी कि उन पर कोई चैनल न लगा होने पर भी वे सही रहती थी और बरसात में उनमे इतनी जल्दी भराव की स्थिति नहीं आती थी और आज ये कहा जा रहा है कि नई तकनीक आ गयी है और ये नई तकनीक ऐसी है जिसके कारण हर  ओर परेशानी का आलम है.बारिश में ही क्या बिन बारिश भी सड़कों पर नाली से बाहर पानी बहता रहता है .आज लोक निर्माण विभाग की नौकरी को बहुत आमदनी वाली नौकरी माना जाता है हो सकता है कि ऐसे बढ़िया कार्यों से उनकी कुछ ज्यादा ही आमदनी हो जाती हो.पर जन साधारण के लिए तो ये लोक निर्माण विभाग एक सिरदर्द ही बनता जा रहा है. 
 शालिनी कौशिक 
    [कौशल ] 

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

भारतीय संविधान अपने उद्देश्य में असफल :प्रधानमंत्री जी एक मन की बात इस विषय पर भी


न्यायाधिपति श्री सुब्बाराव के शब्दों में -''उद्देशिका किसी अधिनियम के मुख्य आदर्शों एवं आकांक्षाओं का उल्लेख करती है .'' इन री बेरुबारी यूनियन ,ए. आई.आर. १९६०, एस. सी. ८४५ में उच्चतम न्यायालय के अनुसार ,'' उद्देशिका संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी है .'' संविधान की रचना के समय निर्माताओं का क्या उद्देश्य था या वे किन उच्चादर्शों की स्थापना भारतीय संविधान में करना चाहते थे ,इन सबको जानने का माध्यम उद्देशिका ही होती है .हमारे संविधान की उद्देशिका इस प्रकार है -
    '' हम भारत के लोग , भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न ,समाजवादी ,पंथ निरपेक्ष ,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को -सामाजिक ,आर्थिक और राजनैतिक न्याय,विचार,अभिव्यक्ति ,विश्वास ,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता ,प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख २६ नवम्बर १९४९ को एतत्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत ,अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं .''
    और केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य [1973] में उच्चतम न्यायालय ने कहा -''कि उद्देशिका संविधान का एक भाग है .किसी साधारण अधिनियम में उद्देशिका को उतना महत्व नहीं दिया जाता है जितना कि संविधान में . मुख्य न्यायमूर्ति श्री सीकरी ने कहा -''कि हमारे संविधान की उद्देशिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और संविधान को उनमे निहित उद्दात आदर्शों के अनुरूप निर्वचन किया जाना चाहिए .''
       हमारे संविधान की उद्देशिका और उसके सम्बन्ध में केशवानंद भारती मामले में संविधान के संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय से और वर्तमान में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले ३ महीने से जारी अधिवक्ताओं की हड़ताल से उसके उद्देश्यों को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता और स्वयं संविधान द्वारा स्थापित आदर्शों में से एक आदर्श संदेह के घेरे में आ जाते हैं .उद्देशिका के अनुसार संविधान के मुख्य उद्देश्यों में से एक उद्देश्य है -
    ''न्याय -जो कि सामाजिक ,आर्थिक व् राजनैतिक सभी क्षेत्रों में मिले .''

किन्तु यदि हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हाईकोर्ट बेंच के सम्बन्ध में संविधान द्वारा निर्धारित इस उद्देश्य की गहनता से जाँच-पड़ताल करते हैं तो यह हमें कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता .
     सर्वप्रथम हम इसे सामाजिक दृष्टि से देखें तो इसके लिए हमें समाज की प्रमुख इकाई अर्थात व्यक्ति को देखना होगा और व्यक्ति अर्थात आम आदमी  ही वह पीड़ित है जो इस व्यवस्था का सर्वाधिक शिकार है .कुछ समय पूर्व प्रसिद्द दैनिक अमर उजाला ने इस सम्बन्ध में कुछ मुकदमों का ब्यौरा दिया था जो इस दुखद स्थिति को स्पष्ट करने हेतु पर्याप्त है -
* केस-१ बागपत के बिजरौल गाँव के ८० वर्षीय किसान सरजीत दो साल से हाईकोर्ट के चक्कर काट रहे हैं पुलिस ने केस में फाइनल रिपोर्ट लगा दी तो सरजीत ने इंसाफ के लिए उच्च न्यायालय में अपील की तब से उन्हें हर तारीख पर इलाहाबाद जाना पड़ता है .
* केस-२ ढिकौली गाँव के सुदेश फौजी की कहानी भी इसी तरह की है उन्होंने गाँव के दो युवकों के खिलाफ जानलेवा हमले का मुकदमा दर्ज कराया जो २००९ में  हाईकोर्ट पहुँच गया तभी से सुदेश को हाईकोर्ट के चक्कर काटने को मजबूर है .

* केस ३ रमला के नरेंद्र ने दिल्ली के चंद्रभूषण के खिलाफ २००८ में चेक बाऊन्स का मामला दर्ज कराया था .यह केस भी अपील में हाईकोर्ट पहुँच गया .नरेंद्र को हर तारीख पर सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़ता है .
   ये मामले तो महज बानगी भर हैं हकीकत तो यह है कि पश्चिमी यूपी के हर जनपद में ऐसे हजारों लोग हैं जो इंसाफ के लिए हाईकोर्ट के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं और अपना काफी कुछ गंवाकर लुट-पिट चुके हैं यहीं आ जाती है संविधान द्वारा दी गयी आर्थिक न्याय की अवधारणा संदेह की परिधि में .यहाँ की जनता से हाईकोर्ट बहुत दूर है और स्थिति ये है कि यहाँ के लोगों के लिए उच्चतम न्यायालय में न्याय के लिए जाना आसान है और उच्च न्यायालय में जाना मुश्किल और यदि हम किमी० के अनुसार आकलन करें तो -
  -बागपत से ६४० किमी ०
  -मेरठ से ६०७ किमी ०
  -बिजनौर से ६९२ किमी ०
  -मुजफ्फरनगर से ६६० किमी ०
  -सहारनपुर से ७५० किमी ०
  - गाजियाबाद से ६३० किमी ०
  -गौतमबुद्ध नगर से ६५० किमी ०
  -बुलंशहर से ५६० किमी ०
     और ऐसा नहीं है कि यहाँ बेंच की मांग मात्र दूरी के कारण होने वाली थकान से बचने के लिए की जा रही हो

बल्कि आने जाने का किराया तो ऊपर से मुकदमेबाज पर पड़ता ही है उसे आने जाने के कारण अपनी दुकान बंद करनी पड़ती है ,नौकरी से छुट्टी लेनी पड़ती है उसके कारण होने वाला आर्थिक नुकसान और वहां जाने पर आने जाने के किराये के साथ ही वहां ठहरने के लिए होटल का किराया आदि की मार भी झेलनी पड़ती है जो कि उसके साथ होने वाले आर्थिक अन्याय को बताने के लिए पर्याप्त हैं .
   अब यदि हम राजनीतिक न्याय की बात करें तो वह भी इधर की जनता को नहीं मिला .सत्तारूढ़ दल अपने सत्ता में रहते इस मुद्दे को ठन्डे बस्ते में ही डालते रहे .१९५४ में यूपी के सी.एम .सम्पूर्णानन्द जी ने पश्चिमी यूपी में बेंच के लिए केंद्र को लिखा भी किन्तु उनकी नहीं सुनी गयी .१९७९ से शुरू हुआ यह आंदोलन पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के समर्थन व् प्रसिद्द किसान नेता चौधरी चरण सिंह जी के समर्थन को पाकर भी आज तक खिंच रहा है .अब २२ नवम्बर से जारी यह हड़ताल २००० में भी ६ महीने से ऊपर चली थी किन्तु राजनीतिक दांव-पेंच इस पर हमेशा भरी पड़ते रहे हैं और यह मांग उनकी बलि चढ़ती रही है .सत्तारूढ़ दल कभी भी इसके सम्बन्ध में कदम आगे नहीं बढ़ाता जबकि सत्तारूढ़ दल के नेता भी इसके पक्ष में बोलते रहे हैं .इस बार केंद्र में भाजपा की सरकार है और इसी के एक केंद्रीय मंत्री डॉ,संजीव बालियान को भी इसके पक्ष में बोलते देखा गया है .वे स्वयं इसे ज़रूरी मानते हैं और मानते हैं कि पश्चिमी यूपी वालों के लिए तो पडोसी मुल्क पाकिस्तान की लाहौर हाईकोर्ट पास है और अपनी इलाहाबाद हाईकोर्ट दूर .
भाजपा के ही उत्तर प्रदेश में सरधना विधायक संगीत सोम ने भी २२ जनवरी २०१५ को मेरठ कचहरी स्थित नानक चंद सभागार में कहा -''कि बेंच आंदोलन का तन-मन-धन से साथ दूंगा .'' शीघ्र ही सहयोग राशि की देने की भी उन्होंने घोषणा की .आश्चर्य तो यही है कि जिनके हाथ में इसके सम्बन्ध में करने को कुछ नहीं होता वे पक्ष में बोलते हैं और जिनके हाथ में कुछ होता है वे चुप हो जाते हैं .केंद्र इस संबंध में सक्षम है तो वह इसकी गेंद उठाकर यूपी सरकार व्के इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के  पाले में डाल देता है और यूपी सरकार भी यहाँ के मुख्य न्यायाधीश के ऊपर बात डाल चुप बैठ जाती है और मुख्य न्यायाधीश जो कभी भी यहाँ के मूल निवासी नहीं होते ऊपरी तौर से देखकर और यहाँ की जनता के साथ हो रहे अन्याय को दरकिनार कर संविधान की मूल भावना सभी के साथ न्याय को न मानकर मात्र अनुच्छेद २१४ के आधार पर एक हाईकोर्ट की बात कह  इसे संविधान के खिलाफ बता वेस्ट यूपी में हाईकोर्ट बेंच से इंकार कर देते हैं .

ऐसे में यह कहना कि हमारा संविधान अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में सफल है ,बहुत कठिन है .जिस देश में अपनी सरकार होते हुए ,जायज मांग की पूर्ति के लिए जनता व् वकीलों को इस तरह भटकना पड़े वहां का संविधान अपनी स्थापना के ६६ वर्ष होने के बावजूद सफल नहीं कहा जा सकता .सफलता के लिए तो उसे अभी मीलों चलना होगा .
शालिनी कौशिक
    [कौशल ]





शनिवार, 24 जनवरी 2015

मुस्तकिल पाए बुलंदी फ़लक पर आज फहराए -तिरंगा शान है अपनी



तिरंगा शान है अपनी ,फ़लक पर आज फहराए ,
फतह की ये है निशानी ,फ़लक पर आज फहराए .
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रहे महफूज़ अपना देश ,साये में सदा इसके ,
मुस्तकिल पाए बुलंदी फ़लक पर आज फहराए .
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मिली जो आज़ादी हमको ,शरीक़ उसमे है ये भी,
शाकिर हम सभी इसके फ़लक पर आज फहराए .
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क़सम खाई तले इसके ,भगा देंगे फिरंगी को ,
इरादों को दी मज़बूती फ़लक पर आज फहराए .
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शाहिद ये गुलामी का ,शाहिद ये फ़राखी का ,
हमसफ़र फिल हकीक़त में ,फ़लक पर आज फहराए .
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वज़ूद मुल्क का अपने ,हशमत है ये हम सबका ,
पायतख्त की ये लताफत फ़लक पर आज फहराए .
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दुनिया सिर झुकाती है रसूख देख कर इसका ,
ख्वाहिश ''शालिनी''की ये फ़लक पर आज फहराए .
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शालिनी कौशिक
[कौशल]

कानून पर कामुकता हावी

१६ दिसंबर २०१२ ,दामिनी गैंगरेप कांड ने हिला दिया था सियासत और समाज को ,चारो तरफ चीत्कार मची थी एक युवती के साथ हुई दरिंदगी को लेकर ,आंदोल...