रविवार, 29 मार्च 2015

मानव आज भी पशु है



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''आदमी '' प्रकृति की सर्वोत्कृष्ट कृति है .आदमी को इंसान भी कहते हैं , मानव भी कहते हैं ,इसी कारण आदमी में इंसानियत , मानवता जैसे भाव प्रचुर मात्र में भरे हैं ,ऐसा कहा जाता है किन्तु आदमी का एक दूसरा पहलु भी है और वह है इसका अन्याय अत्याचार जैसी बुराइयों से गहरा नाता होना .कहते हैं सृष्टि के आरम्भ में आदमी वानर था , वानर अर्थात पशु , सभी ने ये फ़िल्मी गाना सुना ही होगा -
'' आदमी है क्या बोलो आदमी है क्या -आदमी है बन्दर -जूते उठाके भागे कपडे चुराके भागे .....''
और धीरे धीरे सभ्यता विकसित हुई और वह पशु से आदमी बनता गया किन्तु जैसे कि एक पंजाबी कहावत है -
'' वदादिया सुजादडिया जप शरीर नाल .''
अर्थात बचपन की लगी आदतें शरीर के साथ-साथ जाती हैं ,ठीक वैसे ही जो ये सभ्यता का आरम्भकाल मानव जीवन का आरम्भकाल है अर्थात बचपन के समान है ,उसमे पशु होने के कारण वह आज तक भी उस प्रवृति अर्थात पशु प्रवृति से मुक्त नहीं होने पाया है और पशु प्रवृति के लिए ही कहा गया है -
''यही पशु प्रवृति है कि आप आप ही चरे .''
और इसी प्रवृति के अधीन मनुष्य भी केवल अपने अपने लिए ही जीता नज़र आता है .
हम सभी जानते हैं कि आदमी में दिमाग होता है ..दिमाग वैसे सभी में होता है, देवी सप्तशती भी यही कहती है किन्तु आदमी के अनुसार केवल आदमी में दिमाग होता है और यह मानना भी पड़ता है क्योंकि सृष्टि में मौजूद प्रत्येक वस्तु,जीव -जंतु ,जड़ी-बूटी आदि सभी व्यर्थ हैं यदि आदमी अपने दिमाग का इस्तेमाल कर इन्हें सही दिशा में प्रयोग न करे और वह इनका प्रयोग करता है किन्तु जहाँ तक दिशा की बात है अपने अपने दिमाग के अनुसार वह इनका सही व् गलत दिशा में इस्तेमाल करता है ,सही व् गलत तरह से इस्तेमाल करता है .
आमतौर पर देखा जाता है कि कस्बों व् गावों में आज तक भी यांत्रिक सुविधाओं की आधुनिक प्रणाली का इस्तेमाल न के बराबर है .यहाँ आज तक भी ढोहा-ढाही के लिए झोटा-बुग्गी का इस्तेमाल किया जाता है .आज सुबह की ही बात है घर के सामने से एक झोटा बुग्गी में ईंटें लादकर ले जाई जा रही थी कि अचानक सड़क पर झोटा गिर पड़ा [भैंस के नर को झोटा कहते हैं ] उसके गिरने से ईंटें भी गिर पड़ी तो शोरगुल सुनकर हमारा ध्यान उधर गया ,देखा मिलजुलकर लोगों ने उसे उठाया और ईंटें भरकर पुनः चलने की तैयारी की ,वह एक ही कदम आगे बढ़ा होगा कि पुनः गिर गया ,आते जाते एक महोदय ने कहा भी कि इस झोटे में दम ही कहाँ है हड्डी-हड्डी चमक रही है पर इन पैसों के अंधों को न दिखता है न सुनता है .साफ दिखाई दे रहा था कि झोटा कमजोर है उसका एक पैर जमीन पर ठीक नहीं रखा जा रहा है तब भी उन्होंने पुनः उसे खड़ा किया ईंटें लादी और फिर चलने की कोशिश की , वह लड़खड़ा ही रहा था कि किसी तरह लोगों ने संभाला और फिर उसे निकालकर , बुग्गी खड़ीकर उसे कहीं ले गए .ये है इंसानियत जो तब जागी जब बार बार ईंटों के गिरने के कारण अपने पेट पर ही लात लगने की सम्भावना बन आई .
ऐसे ही एक और इंसान हैं जिनके पास गाड़ी है और जिनका कहना है कि मेरी गाड़ी के आगे आकर आज तक कोई कुत्ता नहीं बचा क्योंकि भाईसाहब !अगर इन्हें बचाऊंगा तो मैं नहीं मर जाऊंगा क्या ? ये है मानवता जो निरीह जीव-जंतु को कुचल डालने पर कांपती नहीं .
लोग कबूतर को पिंजरे में कैद रखते हैं और उन्हें ऐसा कर कैदी समान बनाते हैं कि बस एक निश्चित दूरी तक उड़कर वापस वे उनके पिंजरों में बैठ जाते हैं ये क्या है ? मात्र एक शौक उन्हें कैदी बनाने का .आज गाय काटकर मारी जा रही है .गाय की बछिया उससे चुराकर मारी जा रही है या बेचीं जा रही है .खतरनाक से खतरनाक जानवर को सर्कस में खिलौनों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और यह सब करने के बावजूद इंसान अपने को प्रकृति की सर्वोत्कृष्ट कृति होने का दम भर रहा है जबकि वास्तविकता यह है कि जहाँ भी इंसान की चल रही है वहां अन्याय , अत्याचार की तस्वीरें दिखाई पड़ रही हैं .भले ही वह नर रूप में नारी पर अन्याय कर रहा हो या मानव बनकर पशुओं पर ,अपनी taraf से वह अन्याय अत्याचार की हदें पर ही कर रहा है जो सभ्यता के आरम्भ से आज तक पशुवत कर्म ही कहे जा सकते हैं फिर वह इंसान बना कहाँ वह तो आज भी पशु ही है -
''नर बनकर यह नारी का कर रहा काम तमाम ,
इंसान बनकर पशुओं को दे वीभत्स अंजाम ,
क्रूरता की सीमायें पार कर रहा सारी
इसके कर्म से मानव जाति हो रही है बदनाम .''

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

गुरुवार, 26 मार्च 2015

जय माता दी !

Maa Durga
शीश नवायेंगें मैया को  ;दर  पर चलकर जायेंगे ,
मैया तेरे आशीषों से खुशियाँ खुलकर पायेंगें .
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लाल चुनरिया ओढ़ के मैया भक्तों पर मुस्काएंगी ,
हलवा पूरी भोग मिलेगा तो मेरे घर आएँगी ,
अपने घर पर रोज़ बुला मैया का दर्शन पाएंगे ,
मैया तेरे आशीषों से खुशियाँ खुलकर पायेंगें .
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सिंह सवारी करने वाली माँ की बात निराली है ,
कभी वो दुर्गा कभी भवानी कभी शारदा काली है ,
इन रूपों का ध्यान धरेंगे भय को दूर भगाएंगे ,
मैया तेरे आशीषों से खुशियाँ खुलकर पायेंगें .
.....................................................................................................
माँ की महिमा गा -गाकर हम संकट दूर भगाते हैं ,
माँ की मूरत मन में धरकर सफल यहाँ हो पाते हैं ,
माँ को ही अपने जीवन में प्रेरक तत्व बनायेंगें ,
मैया तेरे आशीषों से खुशियाँ खुलकर पायेंगें .
........................................................
हर  बेटी में रूप है माँ का इसीलिए पूजे मिलकर ;
सफल सभ्यता तभी हमारी बेटी रहेगी जब खिलकर ;
हम बेटी को जीवन देकर माँ का क़र्ज़ चुकायेंगे .
मैया तेरे आशीषों से खुशियाँ खुलकर पायेंगें .
                                                     जय माता दी !
                                              शालिनी कौशिक 
                                          [कौशल ]

सोमवार, 23 मार्च 2015

शशि कपूर जी को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

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प्रसिद्ध  अभिनेता शशि कपूर को २०१४ का दादा साहेब फाल्के दिए जाने के समाचार ने शशि कपूर जी को तो जो प्रसन्नता का एहसास कराया होगा उसका तो अनुमान लगाना मुश्किल है ही उससे भी ज्यादा कठिन शशि कपूर जी के प्रशंसकों की ख़ुशी का एहसास है। १९९१ से लगभग नेपथ्य में चल रहे शशि कपूर एक बार फिर अपने प्रशंसकों से इस पुरुस्कार को ग्रहण करने के माध्यम से रु-ब-रु होंगे ये एहसास ही उनके प्रशंसकों में उत्साह भर देने के लिए पर्याप्त है। १९४८ में एक बाल कलाकार के रूप में बॉलीवुड में पदार्पण करने वाले शशि जी ने अपने बेहतरीन अभिनय से न केवल अपने कपूर खानदान का नाम रोशन किया अपितु अभिनय के क्षेत्र में उत्कृष्टता के नए कीर्तिमान स्थापित किये। जब जब फूल खिले का भोला-भोला कश्मीरी युवक हो या दीवार फिल्म का कर्तव्यनिष्ठ पुलिस वाला अपने हर पात्र को पूरी जीवंतता से निभाने वाले शशि कपूर बहुत पहले ही इस पुरुस्कार के हक़दार थे फिर भी वह तो हमारे भारत वर्ष में राजनीतिज्ञों के हाथों में गए हर पुरुस्कार का जो हाल है बही यहाँ भी है जहाँ किसी की भी योग्यता से ऊपर सत्तानशीनों की पसंद रहती है और सत्तानशीनों की पसंद या कहें तो मजबूरी वोट बैंक होने के कारण योग्यता अपने सही सम्मान को तरसती रहती है ऐसे में शशि जी को इस पुरुस्कार के मिलने की घोषणा पर यही कहा जा सकता है कि समय रहते ही सही निर्णय ले लिया गया है और इसके लिए शशि कपूर जी के समस्त प्रशंसक ह्रदय से आभार व्यक्त करते है। शशि कपूर जी को दादा साहेब फाल्के मिलने की घोषणा के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं। 
शालिनी कौशिक
   [कौशल ]

बुधवार, 18 मार्च 2015

सभी धर्म एक हैं



''बाद तारीफ़ में एक और बढ़ाने के लिए,
वक़्त तो चाहिए रू-दाद सुनाने के लिए.
मैं दिया करती हूँ हर रोज़ मोहब्बत का सबक़,
नफ़रतो-बुग्ज़ो-हसद दिल से मिटाने के लिए.''

हमारा भारत वर्ष संविधान  द्वारा धर्म निरपेक्ष घोषित किया गया है कारण आप और हम सभी जानते हैं किन्तु स्वीकारना नहीं चाहते,कारण वही है यहाँ विभिन्न धर्मों का वास होना और धर्म आपस में तकरार की वजह न बन जाएँ इसीलिए संविधान ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया ,किन्तु जैसी कि आशंका भारत के स्वतंत्र होने पर संविधान निर्माताओं को थी अब वही घटित हो रहा है और सभी धर्मों के द्वारा अपने अनुयायियों  को अच्छी शिक्षा देने के बावजूद आज लगभग सभी धर्मों के अनुयायियों में छतीस का आंकड़ा तैयार हो चुका है.
  सभी धर्मो  के प्रवर्तकों ने अपने अपने ढंग से मानव जीवन सम्बन्धी आचरणों को पवित्र बनाने के लिए अनेक उपदेश दिए हैं लेकिन यदि हम ध्यान पूर्वक देखें तो हमें पता चलेगा कि सभी धर्मों की मूल भावना एक है और सभी धर्मों का अंतिम लक्ष्य मानव जाति को मोक्ष प्राप्ति की और अग्रसर करना है .संक्षेप में सभी धर्मों की मौलिक एकता के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-
[१]-सभी धर्म एक ही ईश्वर की सत्ता को मानते हैं . 
[२]-सभी धर्म मानव प्रेम ,सदाचार,धार्मिक सहिष्णुता और मानवीय गुणों के विकास पर बल देते हैं .
[३]-सभी धर्म विश्व बंधुत्व की धारणा को स्वीकार करते हैं  .
[४]-सभी धर्मों का जन्म मानव समाज व् धर्म में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए ही हुआ है .
[५]- सभी मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना मानते हैं.
      उपरलिखित पर यदि हम यकीन करें तो हमें सभी धर्म एक से ही दिखाई देते हैं .एक बार हम यदि अपने भारत देश के प्रमुख धर्मों के सिद्धांतों पर विचार करें तो हम यही पाएंगे की सभी का एक ही लक्ष्य है और वह वही अपने अनुयायियों के जीवन का कल्याण.अब हम हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई धर्मों के प्रमुख  सिद्धांतों पर एक दृष्टि डालकर देखते है कि वास्तविकता क्या है-
हिन्दू धर्म के प्रमुख सिद्धांत -
१-यह धर्म एक ही ईश्वर कि सर्वोच्चता में यकीन करता है.साथ ही बहुदेववाद में भी इसकी अटूट आस्था है.
२-हिन्दू धर्म आत्मा की अमरता में आस्था रखता है.
३-परोपकार ,त्याग की भावना,सच्चरित्रता  तथा सदाचरण हिन्दू धर्म के प्रमुख अंग हैं.
इस्लाम धर्म के प्रमुख सिद्धांत-
१-ईश्वर एक है .
२-सभी मनुष्य एक ही ईश्वर के बन्दे हैं अतः उनमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए.
३-आत्मा अजर और अमर है.
४-प्रत्येक मुस्लमान के पांच अनिवार्य कर्त्तव्य हैं  
-१-कलमा पढना.
२-पांचों समय नमाज पढना ,
३-गरीबों व् असहायों को दान देना .
४-रमज़ान के महीने में रोज़ा रखना और 
५-जीवन  में एक बार मक्का व मदीने की यात्रा [हज] करना.
ईसाई धर्म के प्रमुख सिद्धांत -
१-एक ईश्वर में विश्वास.
२-सद्गुण से चारित्रिक विकास .
३-जन सेवा और जन कल्याण को महत्व.
सिख धर्म के  प्रमुख सिद्धांत-
१-ईश्वर एक है .वह निराकार और अमर है ,उसी की पूजा करनी चाहिए.
२-सभी व्यक्तियों को धर्म और सदाचार का पालन करना चाहिए.
३-प्रत्येक मनुष्य को श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए.
४-आत्मा के परमात्मा से मिलने पर ही मोक्ष प्राप्त होता है.
५-जाति-पाति के भेदभाव से दूर रहना चाहिए.सभी को धर्म पालन करने का समान अधिकार है.
 तो अब यदि हम इन बातों पर विचार करें तो हमें इस समय धर्म को लेकर जो देश में जगह जगह जंग छिड़ी है उसमे कोई सार नज़र नहीं आएगा.हमें इन शिक्षाओं को देखते हुए आपस के मनमुटाव को भुँलाना होगा और इन पंक्तियों को ही अपनाना होगा जो प्रह्लाद ''आतिश '' ने कहे हैं-
''बीज गर नफरत के बोये जायेंगे,
      फल मोहब्बत के कहाँ से लायेंगे.''
             शालिनी कौशिक 
                     

शब्दार्थ
रू-दाद=दास्तान,व्यथा-कथा 
नफ़रतो-बुग्ज़ो-हसद=घृणा-ईर्ष्या  

सोमवार, 16 मार्च 2015

मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती,






मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती,
बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.

जी लेता है इन्सान गर्दिशी हज़ार पल,
एक पल भी हमको साँस ये लेने नहीं देती.

भूली हुई यादों के सहारे रहें गर हम,
ये जिंदगी राहत से गुजरने नहीं देती.

जीने के लिए चाहियें दो प्यार भरे दिल,
दीवार बनके ये उन्हें मिलने नहीं देती.

बैठे हैं इंतजार में वो मौत के अगर,
आगोश में लेती उन्हें बचने नहीं देती.

                      शालिनी कौशिक 

शनिवार, 14 मार्च 2015

संस्कृति रक्षण में महिला सहभागिता


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यूनान ,मिस्र ,रोमां सब मिट गए जहाँ से ,
बाकी अभी है लेकिन ,नामों निशां हमारा .
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ,
सदियों रहा है दुश्मन ,दौरे ज़मां हमारा .
भारतीय संस्कृति की अक्षुणता को लक्ष्य कर कवि इक़बाल ने ये ऐसी अभिव्यक्ति दी जो हमारे जागृत व् अवचेतन मन में चाहे -अनचाहे विद्यमान  रहती है  और साथ ही इसके अस्तित्व में रहता है वह गौरवशाली व्यक्तित्व जिसे प्रभु ने गढ़ा ही इसके रक्षण के लिए है और वह व्यक्तित्व विद्यमान है हम सभी के सामने नारी रूप में .दया, करूणा, ममता ,प्रेम की पवित्र मूर्ति ,समय पड़ने पर प्रचंड चंडी ,मनुष्य के जीवन की जन्मदात्री ,माता के समान हमारी रक्षा करने वाली ,मित्र और गुरु के समान हमें शुभ कार्यों  के लिए प्रेरित करने वाली ,भारतीय संस्कृति की विद्यमान मूर्ति श्रद्धामयी  नारी के विषय में ''प्रसाद''जी लिखते हैं -
''नारी तुम केवल श्रद्धा हो ,विश्वास रजत नग-पग तल में ,
पियूष स्रोत सी बहा करो ,जीवन के सुन्दर समतल में .''
संस्कृति और नारी एक दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं .नारी के गुण ही हमें संस्कृति के लक्षणों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं .जैसे भारतीय नारी में ये गुण है  कि वह सभी को अपनाते हुए गैरों को भी अपना बना लेती है वैसे ही भारतीय संस्कृति में विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से आई संस्कृतियाँ समाहित होती गयी और वह तब भी आज अपना अस्तित्व कायम रखे हुए है और यह गुण उसने नारी से ही ग्रहण किया है .
   संस्कृति मनुष्य की विभिन्न साधनाओं की अंतिम परिणति है .संस्कृति उस अवधारणा को कहते हैं जिसके आधार पर कोई समुदाय जीवन की समस्याओं पर दृष्टि निक्षेप करता है .''आचार्य हजारी प्रसाद द्वैदी  ''के शब्दों में ,-
''नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं कलात्मक प्रयत्नों और भक्ति तथा योगमूलक अनुभूतियों के भीतर मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक और परिपूर्ण रूप को क्रमशः  प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम ''संस्कृति''शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं .''
    इस प्रकार किसी समुदाय की अनुभूतियों के संस्कारों के अनुरूप ही सांस्कृतिक अवधारणा का स्वरुप निर्धारित होता है .संस्कृति किसी समुदाय,जाति अथवा देश का प्राण या आत्मा होती है ,संस्कृति द्वारा उस जाति ,राष्ट्र अथवा समुदाय के उन समस्त संस्कारों का बोध होता है जिनके सहारे वह अपने आदर्शों ,जीवन मूल्यों आदि का निर्धारण करता है और ये समस्त संस्कार जीवन के समस्त क्षेत्रों में नारी अपने हाथों  से प्रवाहित  करती  है .जीवन के आरम्भ  से लेकर अंत तक नारी की भूमिका संस्कृति के रक्षण में अमूल्य है .
    भारतीय संस्कृति का मूल तत्व ''वसुधैव कुटुम्बकम ''है .सारी वसुधा को अपना घर मानने वाली संस्कृति का ये गुण नारी के व्यव्हार में स्पष्ट दृष्टि गोचर होता है .पूरे परिवार को साथ लेकर चलने वाली नारी होती है .बाप से बेटे में पीढ़ी  दर पीढ़ी संस्कार भले ही न दिखाई दें किन्तु सास से बहू तक किसी भी खानदान के रीति-रिवाज़ व् परम्पराएँ हस्तांतरित होते सभी देखते हैं .
    ''जियो और जीने दो''की परंपरा को मुख्य सूत्र के रूप में अपनाने वाली हमारी संस्कृति अपना ये गुण भी नारी के माध्यम  से जीवित रखते दिखाई देती है .हमारे नाखून जो हमारे शरीर पर मृत कोशिकाओं के रूप में होते हैं किन्तु नित्य प्रति उनका बढ़ना जारी रहता है ..हमारी मम्मी ने ही हमें बताया था कि उनकी दादी ने ही उनको बताया था -''कि नाखून काटने के बाद इधर-उधर नहीं फेंकने चाहियें बल्कि नाली में बहा देना चाहिए .''हमारे द्वारा ऐसा करने का कारण पूछने पर मम्मी ने बताया -''कि यदि ये नाखून कोई चिड़िया खाले तो वह बाँझ हो सकती है और इस प्रकार हम अनजाने में चिड़ियों की प्रजाति के खात्मे के उत्तरदायी हो सकते हैं .''
         इन्सान जितना पैसे बचाने के लिए प्रयत्नशील रहता है शायद किसी अन्य कार्य के लिए रहता हो .हमारी मम्मी ने ही हमें बताया -''कि जब पानी भर जाये तो टंकी बंद कर देनी चाहिए क्योंकि पानी यदि व्यर्थ में बहता है तो पैसा भी व्यर्थ में बहता है अर्थात खर्च होता है व्यर्थ में .
     घरों में आम तौर पर सफाई के लिए प्रयोग होने वाली झाड़ू के सम्बन्ध में दादी ,नानी ,मम्मी सभी से ये धारणा हम तक आई है कि झाड़ू लक्ष्मी स्वरुप होती है इसे पैर नहीं लगाना चाहिए और यदि गलती से लग भी जाये तो इससे क्षमा मांग लेनी चाहिए . और ये भावना नारी की ही हो सकती है कि एक छोटी सी वस्तु का भी तिरस्कार न हो . हमारी संस्कृति कहती है कि ''जैसा व्यवहार आप दूसरों से स्वयं के लिए चाहते हो वही दूसरों के साथ करो .''अब चूंकि सभी अपने लिए सम्मान चाहते हैं ऐसे में नारी द्वारा झाड़ू जैसी छोटी वस्तु को भी लक्ष्मी का दर्जा दिया जाना संस्कृति की इसी भावना का पोषण है वैसे भी ये मर्म एक नारी ही समझ सकती है कि यदि झाड़ू न हो तो घर की सफाई कितनी मुश्किल है और गंदे घर से लक्ष्मी वैसे भी दूर ही रहती हैं .
    हमारी संस्कृति कहती है -
   ''यही पशु प्रवर्ति है कि आप आप ही चरे ,
    मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे .''
भूखे को भोजन खिला उसकी भूख शांत करना हमारी संस्कृति में मुख्य कार्य के रूप में सिखाया गया है और इसका अनुसरण करते हुए ही हमारी मम्मी ने हमें सिखाया -''कि तुम दूसरे को खिलाओ ,वह तुम्हे मुहं से दुआएँ दे या न दे आत्मा से ज़रूर देगा .''
      भारतीय संस्कृति की दूसरों की सेवा सहायता की भावना ने विदेशी महिलाओं को भी प्रेरित किया .मदर टेरेसा ने यहाँ आकर इसी भावना से प्रेरित होकर अपना सम्पूर्ण जीवन इसी संस्कृति के रक्षण में अर्पित कर दिया .आरम्भ से लेकर आज तक नर्स की भूमिका नारी ही निभाती आ रही है क्योंकि स्नेह व् प्रेम का जो स्पर्श मनुष्य को जीवन देने के काम आता है वह प्रकृति ने नारी के ही हाथों में दिया है .
    हमारी ये महान संस्कृति परोपकार के लिए ही बनी है और इसके कण कण में ये भावना व्याप्त है .संस्कृत का एक श्लोक कहता  है -
  ''पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः ,
  स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः.
  नादन्ति शस्याम खलु वारिवाहा ,
  परोपकाराय  सताम विभूतयः ."    
    और नारी अपने फ़र्ज़ के लिए अपना सारा जीवन कुर्बान कर देती है .अपना या अपने प्रिय से प्रिय का भी बलिदान देने से वह नहीं हिचकती है .जैसे इस संस्कृति में पेड़ छाया दे शीतलता पहुंचाते हैं नदियाँ प्यास बुझाने के लिए जल धारण करती हैं .माँ ''गंगा ''का अवतरण भी इस धरती पर जन जन की प्यास बुझाने व् मृत आत्माओं की शांति व् मुक्ति के लिए हुआ वैसे ही नारी जीवन भी त्याग बलिदान की अपूर्व गाथाओं से भरा है इसी भावना से भर पन्ना धाय ने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दे कुंवर उदय सिंह की रक्षा की .महारानी सुमित्रा ने इसी संस्कृति का अनुसरण करते हुए बड़े भाइयों की सेवा में अपने दोनों पुत्र लगा दिए .देवी सीता ने इस संस्कृति के अनुरूप ही अपने पति चरणों की सेवा में अपना जीवन अर्पित कर दिया .उर्मिला ने लक्ष्मण की आज्ञा पालन के कारण अपने नयनों से अश्रुओं को बहुत दूर कर दिया ..
      नारी का संस्कृति रक्षण में सहभाग ऐसी अनेकों कहानियों को अपने में संजोये है इससे हमारा इतिहास भरा है वर्तमान जगमगा रहा है और भविष्य भी निश्चित रूप में सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगा .

                              शालिनी कौशिक 
                        [   कौशल ]
                             

कानून पर कामुकता हावी

१६ दिसंबर २०१२ ,दामिनी गैंगरेप कांड ने हिला दिया था सियासत और समाज को ,चारो तरफ चीत्कार मची थी एक युवती के साथ हुई दरिंदगी को लेकर ,आंदोल...