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तिरंगा /कविता शालिनी कौशिक लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तिरंगे की आह

फ़िरदौस इस वतन में फ़रहत नहीं रही , पुरवाई मुहब्बत की यहाँ अब नहीं रही . ...................................................................................... नारी का जिस्म रौंद रहे जानवर बनकर , हैवानियत में कोई कमी अब नहीं रही .  .............................................................  फरियाद करे औरत जीने दो मुझे भी , इलहाम रुनुमाई को हासिल नहीं रही . ............................................................................ अंग्रेज गए बाँट इन्हें जात-धरम में , इनमे भी अब मज़हबी मिल्लत नहीं रही .  ..........................................................  फरेब ओढ़ बैठा नाजिम ही इस ज़मीं पर , फुलवारी भी इतबार के काबिल नहीं रही .  ........................................................  लाये थे इन्कलाब कर गणतंत्र यहाँ पर , हाथों में जनता के कभी सत्ता नहीं रही .  .......................................................   वोटों में बैठे आंक रहे आदमी को वे , खुदगर्जी में कुछ करने की हिम्मत नहीं रही .  .........................