तिरंगे की आह
फ़िरदौस इस वतन में फ़रहत नहीं रही , पुरवाई मुहब्बत की यहाँ अब नहीं रही . ...................................................................................... नारी का जिस्म रौंद रहे जानवर बनकर , हैवानियत में कोई कमी अब नहीं रही . ............................................................. फरियाद करे औरत जीने दो मुझे भी , इलहाम रुनुमाई को हासिल नहीं रही . ............................................................................ अंग्रेज गए बाँट इन्हें जात-धरम में , इनमे भी अब मज़हबी मिल्लत नहीं रही . .......................................................... फरेब ओढ़ बैठा नाजिम ही इस ज़मीं पर , फुलवारी भी इतबार के काबिल नहीं रही . ........................................................ लाये थे इन्कलाब कर गणतंत्र यहाँ पर , हाथों में जनता के कभी सत्ता नहीं रही . ....................................................... वोटों में बैठे आंक रहे आदमी को वे , खुदगर्जी में कुछ करने की हिम्मत नहीं रही . .........................