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गौतम से पहले मुनेश को सलाम

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''दरों दीवार पे हसरत से नज़र रखते हैं , खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं .''     कह एलम का नौजवान गौतम पंवार भी अपने  देश पर शहीद हो गया और नाम रोशन कर गया न केवल अपने छोटे से कसबे एलम का बल्कि पूरे प्रदेश का जहाँ से कोई भी अब ये नहीं कह सकता कि यहाँ की मिटटी में केवल नेता ही जन्म लेते हैं .गौतम की निपुणता के मुरीद थे अफसर .एक युवा ,बहादुर नौजवान का इस तरह चले जाना बहुत दुखद है और सबसे ज्यादा उस माँ के लिए जो अपना जीवन अपने बच्चों के लिए ही कुर्बान कर देती है .       जानती हूँ मेरी पोस्ट का  शीर्षक सबको अजीब लगेगा और कुछ को तो गुस्सा भी आ जायेगा किन्तु मैं यहाँ गौतम से भी ज्यादा बड़ी शहादत देख रही हूँ मुनेश की जो सौभाग्य से गौतम के ही कहूँगी ,माँ है ,समाचारपत्र से ही पता लगा कि मुनेश देवी के पति तो नौकरी के कारण घर से बाहर ही रहते थे और मुनेश देवी ने ही अपने तीनों बच्चों में वो प्रेरणा उत्पन्न की कि वे देश सेवा के योग्य बन सके .       माँ का रिश्ता होता ही ऐसा है जो अपने बारे में कुछ नहीं सोचता ,उसके मन में चौबीस घंटे अपने ब...