संदेश

नारी /kavita shalini kaushik लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बेघर बेचारी नारी

चित्र
निकल जाओ मेरे घर से एक पुरुष का ये कहना अपनी पत्नी से आसान बहुत आसान किन्तु क्या घर बनाना उसे बसाना सीखा कभी पुरुष ने पैसा कमाना घर में लाना क्या मात्र पैसे से बनता है घर नहीं जानता घर ईंट सीमेंट रेत का नाम नहीं बल्कि ये वह पौधा जो नारी के त्याग, समर्पण ,बलिदान से होता है पोषित उसकी कोमल भावनाओं से होता पल्लवित पुरुष अकेला केवल बना सकता है मकान जिसमे कड़ियाँ ,सरिये ही रहते सिर पर सवार घर बनाती है नारी उसे सजाती -सँवारती है नारी उसके आँचल की छाया देती वह संरक्षण जिसे जीवन की तप्त धूप भी जला नहीं पाती है और नारी पहले पिता का फिर पति का घर बसाती जाती है किन्तु न पिता का घर और न पति का घर उसे अपना पाता पिता अपने कंधे से बोझ उतारकर पति के गले में डाल देता और पति अपनी गर्दन झुकते देख उसे बाहर फेंक देता और नारी रह जाती हमेशा बेघर कही जाती बेचारी जिसे न मिले जगह उस बगीचे में जिसकी बना आती वो क्यारी- क्यारी . शालिनी कौशिक [कौशल ]