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बच्चे बदले क्यूँ न जब चाचा बदले ?

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     बचपन जीवन का स्वर्णिम समय होता है .न कोई फ़िक्र न कोई परवाह ,अपनी मस्ती में बचपन के दिन बीतते रहते हैं .ये समय ऐसा होता है जब मन पर न तो किसी के लिए कोई निन्दित भाव होता है और न ही बहुत ज्यादा प्यार का भाव ,किसी का जरा सा प्यार अगर बच्चे को उसके करीब ला देता है तो जरा सी फटकार बच्चे को उससे कोसो मील दूर बैठा देती है .इसीलिए ही पढाई का सबसे बेहतरीन समय बचपन माना जाता है क्योंकि इसमें बालमन उस स्लेट की तरह होता है जो कोरी होती है जिस पर कुछ लिखा नहीं होता और जिस पर वही लिखा जाता है जो उसका गुरु लिख देता है . ऐसी ही बालमन की दशा को लेकर कबीरदास जी कह गए हैं - ''गुरु कुम्हार सिष कुम्भ है ,गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट , अंतर हाथ सहार दे ,बाहर बाहे चोट .''         अर्थात गुरु कुम्हार है और सिष कुम्भ के समान है जो कुम्हार की तरह अपने सिष कुम्भ के खोट दूर करता है ,वह उसके अंतर अर्थात ह्रदय को सहारता है अर्थात सराहता है  और बाहर से चोट करता है अर्थात उसे मजबूत करता है .         ऐसी कोमल मनोवृति जो सब कुछ अपने में समा लेती है वह बच्चो क...