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पीछे से वार करते हैं वे जनाब आली....

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झुंझलाके क़त्ल करते हैं वे जनाब आली .   नुमाइंदगी करते हैं वे जनाब आली , जजमान बने फिरते हैं वे जनाब आली . ............................................................... देते हैं जख्म हमें रुख बदल-बदल , छिड़कते फिर नमक हैं वे जनाब आली . .................................................................... मुखालिफों को हक़ नहीं मुहं खोलने का है , जटल काफिये उड़ाते हैं वे जनाब आली . ................................................................ ज़म्हूर को कहते जो जनावर जूनून में , फिर बात से पलटते हैं वे जनाब आली . .................................................................. फरेब लिए मुहं से मिलें हाथ जोड़कर , पीछे से वार करते हैं वे जनाब आली . ........................................................................ मैदान-ए-जंग में आते हैं ऐयार बनके ये , ठोकर बड़ों के मारते हैं वे जनाब आली . ...................................................................... जम्हूरियत है दागदार इनसे ही ''शालिनी '' झुंझलाके क़त्ल करते ...

क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं .

नहीं वे जानते मुझको,  दुश्मनी करके बैठे हैं , मेरे कुछ मिलने वाले भी,  उन्हीं से मिलके बैठे हैं , समझकर वे मुझे कायर,  बहुत खुश हो रहे नादाँ क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं . ........................................................... गिला वे कर रहे आकर , हमारे गुमसुम रहने का , गुलूबंद को जो कानों से , लपेटे अपने बैठे हैं . .................................................................. हमें गुस्ताख़ कहते हैं , गुनाह ऊँगली पे गिनवाएं , सवेरे से जो रातों तक , गालियाँ दे के बैठे हैं . ........................................................... नतीजा उनसे मिलने का , आज है सामने आया , पड़े हम जेल में आकर , वे घर हुक्का ले बैठे हैं . .................................................................. रखे जो रंजिशें दिल में , कभी न वो बदलता है , भले ही अपने होठों पर , तबस्सुम ले के बैठे है . ........................................................ नज़ीर ''शालिनी '' की ये , नज़रअंदाज़ मत करना , कहीं न कहना पड़ जाये , मियां तो लुट के बैठे ह...