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नारी की दुनिया व सोच

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      हमारी संविधान व्यवस्था ,कानून व्यवस्था हम सबके लिए गर्व का विषय हैं और समय समय पर इनमे संशोधन कर इन्हें बदलती हुई परिस्थितयों के अनुरूप भी बनाया जाता रहा है किन्तु हमारा समाज और उसमे महिलाओं की स्थिति आरम्भ से ही शोचनीय रही है .महिलाओं को वह महत्ता समाज में कभी नहीं मिली जिसकी वे हक़दार हैं .बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक उसके लिए ऐसे पल कम ही आते हैं जब वह अपने देश के कानून व् संविधान पर गर्व कर सके इसमें देश के कानून की कोई कमी नहीं है बल्कि कमी यहाँ जागरूकता की है इस देश की आधी आबादी लगभग एक तिहाई प्रतिशत में नहीं जानती कि कानून ने उसकी स्थिति कितनी सुदृढ़ कर रखी है .          आज गर्व होता है जब हम लड़कियों को भी स्कूल जाते देखते हैं हालाँकि मैं जिस क्षेत्र की निवासी हूँ वहाँ लड़कियों के लिए डिग्री कॉलिज तक की व्यवस्था है और वह भी सरकारी इसलिए लड़के यहाँ स्नातक हों या न हों लड़कियां आराम से एम्.ए.तक पढ़ जाती हैं और संविधान में दिए गए समान शिक्षा के अधिकार के कारण आज लड़कियां तरक्की के नए पायदान चढ़ रही हैं .      ...

नारी तो चुभती ही हैं .

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     नहटौर में एक चुनावी सभा में ''आप''नेता अलका लम्बा पर पत्थर से हमला ,कोई नई बात नहीं है .राजनीति के क्षेत्र में उतरने वाली महिलाएं आये दिन कभी शब्द भेदी बाणों का तो कभी पत्थरों आदि के हमलों का शिकार होती रहती हैं .ममता बनर्जी तो पश्चिमी बंगाल में इसका जीता-जागता उदाहरण हैं और देश की प्रथम महिला व् पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी तो इस क्षेत्र में किंवदंती बन चुकी हैं .ममता बनर्जी के बढ़ते वर्चस्व को देखकर वामपंथियों का ख़ौफ़ग्रस्त होना सब जानते हैं क्योंकि इसी खौफ के चलते उन्होंने अपनी सत्ता जाते देख ममता बनर्जी को मरवाने की कोशिश तक कर डाली थी और रही इंदिरा गाँधी जी की बात उन्हें देख तो उनके विपक्षियों की रूहें उनके जीते-जी भी कांपती थी ही उनके मरने के बाद भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया हैं आज भी उनके नाम से सभी विपक्षियों के शरीर में कंपकपी दौड़ जाती हैं और इसलिए आज भी कोई भी चुनाव हो या देश में कोई भी नवीन शुरुआत इंदिरा गाँधी का नाम ले विपक्षी दल उनकी नियत व् चरित्र पर हमले कर इंदिरा गाँधी को चाहने वाली जनता को उनसे तोड़ने की कोशिश करते रहते हैं जबकि आज...

आधुनिक ससुराल में बहू

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बैठी थी इंतज़ार में सुहाग सेज़ पर मन में थी उमंग भरी अनंत मिलन को देखूंगी आज रूप मैं भी अपने राम का नाता बंधा है जिनसे मेरा जनम जनम का वो देख निहारेंगे मुझे सराहेंगे किस्मत कुदरत का आभार अभिव्यक्त करेंगे जानेंगे मुझसे रुचियाँ सब मेरी ख्वाहिशें तकलीफें खुशियां खुद की सारी साझा करेंगे व्यतीत हो रहा था समय जैसे प्रतिपल ह्रदय था डूब रहा मन टूट रहा था दरवाजा खुला ऐसे जैसे धरती हो कांपी बातों को उसकी सुनके दिल कांप रहा था सम्बन्धी था ससुराल का आया था जो करने बचने को उससे रास्ते मन खोज रहा था आवाज़ थी लगायी उसने प्राण-प्रिय को सम्बन्धी फिर भी फाड़ नज़र ताक रहा था झपटा वो जैसे बेधड़क कोमलांगी पर चाकू दिखाके छोड़ने की भीख मांग रही थी जैसे ही हरकतें बढ़ी उस रावण की अधिक चाकू को अपने पेट में वो मार रही थी जीवन की सारी ख्वाहिशें एक पल में थी ख़त्म , भारत की नारी की व्यथा बखान रही थी , सुरक्षा ससुराल में करना काम पति का , मरके भी फटी आँख वो तलाश रही थी . ...................................................... शालिनी कौशिक    (कौशल)