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नारी अधिक मजबूत

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गुलामी नारी की नियति..कभी न मिल सकती मुक्ति .

बढ़ रही हैं गगन छू रही हैं लोहा ले रही हैं पुरुष वर्चस्व से कल्पना कपोल कल्पना कोरी कल्पना मात्र सत्य स्थापित स्तम्भ के समान प्रतिष्ठित मात्र बस ये विवशता कुछ न कहने की दुर्बलता अधीन बने रहने की हिम्मत सभी दुःख सहने की कटिबद्धता मात्र आंसू बहने की . न बोल सकती बात मन की है यहाँ बढ़कर न खोल सकती है आँख अपनी खुद की इच्छा पर अकेले न वह रह सकती अकेले आ ना जा सकती खड़ी है आज भी देखो पैर होकर बैसाखी पर . सब सभ्यता की बेड़ियाँ पैरों में नारी के सब भावनाओं के पत्थर ह्रदय पर नारी के मर्यादा की दीवारें सदा नारी को ही घेरें बलि पर चढ़ते हैं केवल यहाँ सपने हर नारी के . कुशलता से करे सब काम कमाये हर जगह वह नाम भले ही खास भले ही आम लगे पर सिर पर ये इल्ज़ाम . कमज़ोर है हर बोझ को तू सह नहीं सकती दिमाग में पुरुषों से कम समझ तू कुछ नहीं सकती तेरे सिर इज्ज़त की दौलत वारी है खुद इस सृष्टि ने तुझे आज़ाद रहने की इज़ाज़त मिल नहीं सकती . सहे हर ज़ुल्म पुरुषों का क्या कोई बोझ है बढ़कर करे है राज़ दुनिया पर क्यूं शक करते हो बुद्धि पर नकेल कसके जो रखे वासन...

लखनऊ की निर्भया की कहानी, पिता की जुबानी;ये है उत्तर प्रदेश की हवा सुहानी

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ल खनऊ की निर्भया की कहानी, पिता की जुबानी विवेक त्रिपाठी शनिवार, 19 जुलाई 2014 अमर उजाला, लखनऊ Updated @ 11:44 AM IST मोहनलालगंज कोतवाली में बैठे उस दुबले-पतले शख्स का शरीर कांप रहा था। चेहरा दर्द, चिंता, उलझनों और अबूझ सवालों से बोझिल हो चुका था। मन कहीं खोया हुआ था। रह-रहकर आंखें भीग जाती थीं। रुलाई रोकने की कोशिश में कई बार चेहरा दोनों हथेलियों से ढक लिया। डीआईजी नवनीत सिकेरा ने उनसे बातचीत शुरू की तो आंखों से आंसुओं का सैलाब निकल गया। बोले, ‘ऐसा क्यों हो गया?’ यह शख्स बलसिंहखेड़ा प्राथमिक विद्यालय में दरिंदगी की शिकार युवती के पिता हैं। उन्होंने बताया कि बेटी हिम्मत हारने वाली नहीं थी। छह साल पहले पति की मौत के बाद से वह अकेले ही बच्चों को संभाल रही थी। बोले-ससुरालवालों ने भी मुंह मोड़ लिया। बेटी के लिए जिंदगी का एक-एक दिन बड़ा मुश्किल था। फोन पर वह अपनी तकलीफों का जिक्र करती तो कलेजा मुंह में आ जाता। अक्सर वह बेटी से सबकुछ छोड़कर घर आने की बात कहते थे, तो बेटी उनसे सिर्फ जमाने से लड़ने का हौसला और आशीर्वाद मांगती थी। कहती थी, ‘कुछ सपने ...

मेक-अप से बिगाड़ करती महिलाएं

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  कवि शायर कह कह कर मर गए- ''इस सादगी पे कौन न मर जाये ए-खुदा,'' ''न कजरे की धार,न मोतियों के हार, न कोई किया सिंगार फिर भी कितनी सुन्दर हो,तुम कितनी सुन्दर हो.'' पर क्या करें आज की महिलाओं  के दिमाग का जो बाहरी सुन्दरता  को ही सबसे ज्यादा महत्व देता रहा है और अपने शरीर का नुकसान तो करता ही है साथ ही घर का बजट  भी बिगाड़ता है.लन्दन में किये गए एक सर्वे के मुताबिक ''एक महिला अपने पूरे जीवन में औसतन एक लाख पौंड यानी तकरीबन ७२ लाख रूपए का मेकअप बिल का भुगतान कर देती है  .इसके मुताबिक १६ से ६५ वर्ष तक की उम्र की महिला ४० पौंड यानी लगभग तीन हज़ार रूपए प्रति सप...

नारी तू है ही क्या .

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  कई बार पहले भी देख चुकी 'चक दे इंडिया' को फिर एक बार देख रही थी .बार बार कटु शब्दों से भारतीय नारी का अपमान किया गया किन्तु एक वाकया जिसने वाकई सोचने को मजबूर कर दिया और भारतीय नारी की वास्तविक स्थिति को सामने लाकर खड़ा कर दिया वह वाक्य कहा था फ़िल्म में क्रिकेट खिलाडी अभिमन्यु सिंह ने चंडीगढ़ की हॉकी खिलाडी प्रीति से , ''हार जाओगी तो मेरी बीवी बनोगी ,जीत जाओगी तो भी मेरी बीवी बनोगी ऐसा तो नहीं है कि वर्ल्ड कप से से आओगी तो सारा हिंदुस्तान तुम्हारा नाम जप रहा होगा .'' कितना बड़ा सच कहा अभिमन्यु ने और इससे हटकर भारतीय नारी की स्थिति और है भी क्या ,फ़िल्म में काम करती है तो हीरो के बराबर मेहनत किन्तु मेहनताना कम ,खेल में खेलने में बराबर मेहनत किन्तु पुरुष खिलाडी के मुकाबले कम मैच फीस .खेलों में क्रिकेट में पुरुष टीम भी और महिला टीम भी किन्तु पुरुष टीम के पीछे पूरा भारत पागल और महिला टीम के प्रति स्वयं महिला भी नहीं .पुरुष टीम वर्ल्ड कप जीत लाये इसके लिए एक महिला [पूनम पांडे ] निर्वस्त्र तक होने को तैयार जबकि पुरुषों में महिला टीम के प्रदर्शन तक को लेकर कोई क्रेज़ ...

नारी :हमेशा बेघर ,बेचारी

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निकल जाओ मेरे घर से एक पुरुष का ये कहना अपनी पत्नी से आसान बहुत आसान किन्तु क्या घर बनाना उसे बसाना सीखा कभी पुरुष ने पैसा कमाना घर में लाना क्या मात्र पैसे से बनता है घर नहीं जानता घर ईंट सीमेंट रेत का नाम नहीं बल्कि ये वह पौधा जो नारी के त्याग, समर्पण ,बलिदान से होता है पोषित उसकी कोमल भावनाओं से होता पल्लवित पुरुष अकेला केवल बना सकता है मकान जिसमे कड़ियाँ ,सरिये ही रहते सिर पर सवार घर बनाती है नारी उसे सजाती -सँवारती है नारी उसके आँचल की छाया देती वह संरक्षण जिसे जीवन की तप्त धूप भी जला नहीं पाती है और नारी पहले पिता का फिर पति का घर बसाती जाती है किन्तु न पिता का घर और न पति का घर उसे अपना पाता पिता अपने कंधे से बोझ उतारकर पति के गले में डाल देता और पति अपनी गर्दन झुकते देख उसे बाहर फेंक देता और नारी रह जाती हमेशा बेघर कही जाती बेचारी जिसे न मिले जगह उस बगीचे में जिसकी बना आती वो क्यारी- क्यारी . शालिनी कौशिक [कौशल ]