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शादी में पुलिस व् समाज का दखल अब ज़रूरी

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आजकल शादी-ब्याह के दिन चल रहे हैं बारातें सड़कों पर दिन-रात दिखाई दे रही हैं .कहीं बैंड बाजे का शोर है तो कहीं डी जे का धूम-धड़ाका.बारातों के आगमन पर - ''आज मेरे यार की शादी है ,यार की शादी है मेरे दिलदार की शादी है ..'' तो बहुत सी जगह सुनाई दे जाता है किन्तु बारातों की विदाई के वक़्त - ''बाबुल की दुआएं लेती जा ,जा तुझको सुखी संसार मिले ...'' सुनाई देना लगभग गौरैया चिड़िया के दिखाई देने के समान कठिन कार्य हो गया है कारण ये नहीं कि हम लोग बहुत आगे बढ़ चुके हैं बल्कि कारण ये है कि बारातों का आगमन तो आज भी समाज के अनुसार हो रहा है लेकिन दुल्हन की विदाई अब पूरी तरह से वर व् वधु पक्ष के आपसी समझौतों के ऊपर टिककर रह गयी है और यहाँ कानून भी कुछ नहीं कर सकता क्योंकि दोनों पक्ष कानून को भली भांति जानते हैं और अपने अपने तर्क व् सबूत मजबूत रखते हैं ऐसा ही साबित होता है अभी के एक समाचार से जो कहता है - [बारात दर से लौटी तो थाने जा पहुंची दुल्हन ] इस मामले में लड़की पक्ष जहाँ दहेज़ मांगने की बात कह रहा है वहीँ लड़के के पक्ष से गुब्बारे का विवाद सामने रखा गया है सच...