ये ''कामवालियां''
लड़ती हैं खूब झगड़ती हैं चाहे जितना भी दो उनको संतुष्ट कभी नहीं दिखती हैं खुद खाओ या तुम न खाओ अपने लिए भले रसोईघर बंद रहे पर वे आ जाएँगी लेने दिन का खाना और रात का भी मेहमानों के बर्तन झूठे धोने से हम सब बचते हैं मैला घर के ही लोगों का देख के नाक सिकोड़ते हैं वे करती हैं ये सारे काम सफाई भेंट में हमको दें और हम उन्हीं को 'गन्दी 'कह अभिमान करें हैं अपने पे माता का दर्जा है इनका लक्ष्मी से इनके काम-काज ये ''कामवालियां'' ही हमको रानी की तरह करवाएं राज़ . ..................... शालिनी कौशिक [कौशल ]