मुल्क से बढ़कर न खुद को समझें हम,
''मुख्तलिफ ख्यालात भले रखते हों ,मुल्क से बढ़कर न खुद को समझें हम, बेहतरी हो जिसमे अवाम की अपनी ,ऐसे क़दमों को बेहतर समझें हम. ......................................................................................................... है ये चाहत तरक्की की राहें आप और हम मिलके पार करें , जो सुकूँ साथ मिलके चलने में इस हकीक़त को ज़रा समझें हम . ................................................................................ कभी हम एक साथ रहते थे ,रहते हैं आज जुदा थोड़े से , अपनी आपस की गलत फहमी को थोड़ी जज़्बाती भूल समझें हम . ........................................................................................... देखकर आंगन में खड़ी दीवार...