संस्मरण -मेरे डिग्री कॉलिज में मेरा पहला समारोह
''जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमे रसधार नहीं , वह ह्रदय नहीं है पत्थर है जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं .'' बचपन से ही राष्ट्रप्रेम से भरी ये पंक्तियाँ ह्रदय में इस कदर बसी हैं कि स्कूल कॉलिज का कोई भी समारोह अर्थात स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस मैंने कभी नहीं छोड़ा .अव्वल तो इनमे कार्यक्रम के पश्चात् बच्चों को लड्डू बांटे जातें हैं ये लालच भी मन में कम नहीं रहता किन्तु मुख्य थी वह भावना जो इस वक़्त ह्रदय में हिलोरे मरती है तो बस कभी भाषण द्वारा तो कभी अपने प्रिय फ़िल्मी देशभक्ति गीत गाकर मैं इन समारोहों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही .वैसे भी इंटरमीडिएट तक ये उपस्थिति छात्र-छात्राओं के लिए लगभग अनिवार्य ही होती है किन्तु कॉलिज लाइफ में जब आज़ादी मिलती है तब हम अपने स्वतंत्रता संग्राम को भूल जाते हैं और वहाँ जाकर ऐसे समारोहों में शामिल होना अपने समय का व्यर्थ किया जाना मानने लगते हैं इसलिए कॉलिज में इन समारोहों में विद्यार्थी वर्ग की उपस्थिति नगण्य ही रहती है .मैं इस बारे में तब इतना जानती नहीं थी ,मैं तो जैसे इंटर तक इनमे भाग लेती रही वैसे ही जब डिग्री कॉलिज में...