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इंदिरा गाँधी -ध्रुवतारा :... सबसे प्यारी

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इंदिरा गाँधी -ध्रुवतारा :विरोधियों के कुत्सित प्रयासों के बाद भी सबसे प्यारी         जब ये शीर्षक मेरे मन में आया तो मन का एक कोना जो सम्पूर्ण विश्व में पुरुष सत्ता के अस्तित्व को महसूस करता है कह उठा कि यह उक्ति  तो किसी पुरुष विभूति को ही प्राप्त हो सकती है  किन्तु तभी आँखों के समक्ष प्रस्तुत हुआ वह व्यक्तित्व जिसने समस्त  विश्व में पुरुष वर्चस्व को अपनी दूरदर्शिता व् सूक्ष्म सूझ बूझ से चुनौती दे सिर झुकाने को विवश किया है .वंश बेल को बढ़ाने ,कुल का नाम रोशन करने आदि न जाने कितने ही अरमानों को पूरा करने के लिए पुत्र की ही कामना की जाती है किन्तु इंदिरा जी ऐसी पुत्री साबित हुई जिनसे न केवल एक परिवार बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र गौरवान्वित अनुभव करता है  और  इसी कारण मेरा मन उन्हें ध्रुवतारा की उपाधि से नवाज़ने का हो गया क्योंकि जैसे संसार के आकाश पर ध्रुवतारा सदा चमकता रहेगा वैसे ही इंदिरा प्रियदर्शिनी  ऐसा  ध्रुवतारा थी जिनकी यशोगाथा से हमारा भारतीय आकाश सदैव दैदीप्यमान  रहेगा। १९ नवम्बर १९१७ को इलाहाबाद के आनंद भवन में ...

नारी तो चुभती ही हैं .

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     नहटौर में एक चुनावी सभा में ''आप''नेता अलका लम्बा पर पत्थर से हमला ,कोई नई बात नहीं है .राजनीति के क्षेत्र में उतरने वाली महिलाएं आये दिन कभी शब्द भेदी बाणों का तो कभी पत्थरों आदि के हमलों का शिकार होती रहती हैं .ममता बनर्जी तो पश्चिमी बंगाल में इसका जीता-जागता उदाहरण हैं और देश की प्रथम महिला व् पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी तो इस क्षेत्र में किंवदंती बन चुकी हैं .ममता बनर्जी के बढ़ते वर्चस्व को देखकर वामपंथियों का ख़ौफ़ग्रस्त होना सब जानते हैं क्योंकि इसी खौफ के चलते उन्होंने अपनी सत्ता जाते देख ममता बनर्जी को मरवाने की कोशिश तक कर डाली थी और रही इंदिरा गाँधी जी की बात उन्हें देख तो उनके विपक्षियों की रूहें उनके जीते-जी भी कांपती थी ही उनके मरने के बाद भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया हैं आज भी उनके नाम से सभी विपक्षियों के शरीर में कंपकपी दौड़ जाती हैं और इसलिए आज भी कोई भी चुनाव हो या देश में कोई भी नवीन शुरुआत इंदिरा गाँधी का नाम ले विपक्षी दल उनकी नियत व् चरित्र पर हमले कर इंदिरा गाँधी को चाहने वाली जनता को उनसे तोड़ने की कोशिश करते रहते हैं जबकि आज...

बोलो जनता जिंदाबाद

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  'आस-पास ही देख रहा हूँ मिटटी का व्यापार , चुटकी भर मिटटी की कीमत जहाँ करोड़ हज़ार , और सोचता हूँ आगे तो होता हूँ हैरान बिका हुआ है कुछ मिटटी के ही हाथों इंसान .'' कविवर गोपाल दास ''नीरज '' की ये पंक्तियाँ इस वक़्त के भारतीय जनमानस की मनोदशा का अक्षरशः परिचय देने हेतु पर्याप्त हैं .हालाँकि ऐसी बातें कहनी नहीं चाहिए क्योंकि सच बोलने की सलाह सब देते हैं किन्तु उसे सुनना कोई नहीं चाहता इसीलिए गाँधी जी के लिए भी मजबूरी ''मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी ''जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि उनके जैसा बनना इस वक़्त के भारतीयों के लिए मुश्किल है जो सत्य के सबसे बड़े पुजारी थे लेकिन आज की जनता सच नहीं सह सकती और फलस्वरूप ऐसी बातें कहीं न कहीं किसी न किसी नेता के समर्थकों को कष्ट पहुंचाती हैं और यह कष्ट माहौल में उथल-पुथल का कारण बन जाता है किन्तु वह कलम ही क्या जो सच कहने से रुक जाये ,वैसे भी डॉ.शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा भी है - ''हमारे हाथ में है जो कलम वो सच ही लिखेगी , कलम के कातिलों से इस तरह करनी बगावत है ....

हर्ष फायरिंग की अनुमति है ही क्यों ?

हर्ष फायरिंग एक ऐसा शब्द जो पूरी तरह से निरर्थक कार्य कहा जा सकता है और इससे ख़ुशी जिसे मिलती हो मिलती होगी लेकिन लगभग 10 हर्ष फायरिंग १ जान तो ले ही लेती है ये अनुमान संभवतया लगाया जा सकता है .अभी हाल ही में कैराना ब्लॉक प्रमुख के चुनाव की मतगणना के बाद हुई हर्ष फायरिंग में एक बच्चे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया और  अभी ''हिसार में शादी के तैयारियों के बीच दुल्हन के दरवाजे पर हर्ष फायरिंग में गोली दूल्हे को जा लगी जिससे दूल्हा जख्मी हो गया। दूल्हे को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।'' तब  भी इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा रहा जैसे की यह कोई बहुत आवश्यक कार्य हो जैसे किसी भी पूजा से पहले गणेश जी की पूजा ज़रूरी है ,जैसे रामायण पाठ से पहले हनुमान जी का आह्वान आवश्यक है वैसे ही लगता है कि ये हर्ष फायरिंग भी ख़ुशी के इज़हार का सबसे ज़रूरी कार्य है और भले ही कितने लोग इसके कारण शोक में डूब जाएँ लेकिन इसका किया जाना प्रतिबंधित नहीं किया जायेगा आखिर क्यों ? एक ऐसा कार्य जो खुशियों को मातम में बदल दे ,एक जीते जागते इंसान को या तो मौत के द्वार तक पहुंचा दे या फिर मौत क...

क्या ये जनता भोली है ?

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     ''जवां सितारों को गर्दिश सिखा रहा था ,  कल उसके हाथ का कंगन घुमा रहा था .  उसी दिए ने जलाया मेरी हथेली को ,   जिसकी लौ को हवा से बचा रहा था .'' तनवीर गाजी का ये शेर बयां करता है वह हालात  जो रु-ब-रु कराते हैं हमें हमारे सच से ,हम वही हैं जो सदैव से अपने किये की जिम्मेदारी लेने से बचते रहे हैं ,हम वही हैं जो अपने साथ कुछ भी बुरा घटित होता है तो उसकी जिम्मेदारी दूसरों पर थोपते रहते हैं हाँ इसमें यह अपवाद अवश्य है कि यदि कुछ भी अच्छा हमारे साथ होता है तो उसका श्रेय हम किसी दूसरे को लेने नहीं देते -''वह हमारी काबिलियत है ,,वह हमारा सौभाग्य है ,हमने अपनी प्रतिभा के ,मेहनत के बल पर उसे हासिल किया है .''...ऐसे ऐसे न जाने कितने महिमा मंडन हम स्वयं के लिए करते हैं और बुरा होने पर .....यदि कहीं किसी महिला ,लड़की के साथ छेड़खानी देखते हैं तो पहले बचकर निकलते हैं फिर कहते हैं कि माहौल बहुत ख़राब है ,यदि किसी के साथ चोरी ,लूट होते देखते हैं तो आँखें बंद कर पुलिस की प्रतीक्षा करते हैं आदि  .आज जनता जिन हालात से दो चार हो रही है उसके लिए सरकार को...

सौतेली माँ की ही बुराई :सौतेले बाप का जिक्र नहीं .WHY ?

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आमतौर पर यदि हम ध्यान दें तो जहाँ देखो सौतेली माँ की ही बुराई जोरों पर होती है.किसी भी बच्चे की माँ अगर सौतेली है तो उसके साथ सभी की सहानुभूति होती है किन्तु कहीं भी सौतेले बाप का जिक्र नहीं किया जाता जबकि मेरी अपनी जानकारी में यदि मैं देखती हूँ तो हर जगह भेदभाव ही पाती हूँ.अभी हाल में ही मेरी जानकारी की एक लड़की का निधन हो गया  वह लम्बे समय से बीमार थी किन्तु कहा गया कि लम्बे इलाज के बाद भी वह ठीक नहीं हो पाई.सभी को उसके पिता से बहुत सहानुभूति थी और सभी यही कह रहे थे कि ये तो अपनी लड़की से बहुत प्यार करते थे और दुःख में इनके आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं.ये मुझे बाद में पता चला की वह लड़की अपनी माँ के साथ आयी थी अर्थात उसकी माँ की ये दूसरी शादी थी और उस लड़की के वे दूसरे पिता थे.अब कीजिये गौर इसके दूसरे पहलू पर यदि यह स्थिति किसी महिला के साथ होती तो सब क्या कहते-''सौतेली माँ थी मगरमच्छी आंसू बहा रही थी.इसीने उसकी कोई देखभाल नहीं की इसीलिए वह मर गयी.''आखिर ये हर जगह नारी और पुरुष की स्थिति में अंतर क्यों कर दिया जाता है? मेरी सहेली की बहन की जिससे श...

भारत में असहिष्णुता है .

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संविधान दिवस और धर्मनिरपेक्षता और असहिष्णुता पर संग्राम ये है आज की राजनीति का परिपक्व स्वरुप जो हर मौके को अपने लिए लाभ के सौदे में तब्दील कर लेता है .माननीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह इस मौके पर संविधान निर्माता के मन की बात बताते हैं वैसे भी इस सरकार के मुखिया ही जब मन की बात करते फिरते हैं तब तो इसके प्रत्येक सदस्य के लिए मन की बात करना जरूरी हो जाता है भले ही वह अपने मन की हो या किसी दुसरे के मन की .वे कहते हैं - ''संविधान निर्माता ने कभी भी ''धर्मनिरपेक्ष '' शब्द को संविधान में रखने के बारे में नहीं सोचा था , इसे तो १९७६ में एक संशोधन के जरिये शामिल किया गया किन्तु ये कहते समय उन्होंने संविधान की प्रस्तावना के सही शब्द पर गौर नहीं किया और बाद में अपनी बात को वजनदार बनाने के लिए सही शब्द को अपना सुझाव बता वाहवाही लूटने का काम अपनी तरफ से कर गए .जबकि अगर वे ध्यान से संविधान की प्रस्तावना पढ़ते तो अपनी बात कहने से बच सकते थे और संविधान निर्माता के मन की बात का ढोल पीटने से भी .भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है -    ''हम भारत के लोग भारत को ए...

तेजाबी हमले :सरकार सही रास्ते पर आये

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एक रुसी युवती पर तेजाबी हमला और वह भी प्रधानमंत्री जी के लोकसभा कार्यक्षेत्र में बहुत ही दुखद विषय है। समाचारों के अनुसार स्थिति ये है - The 23-year-old Russian woman who was attacked with acid in Varanasi and was undergoing treatment has been flown to Moscow with Indian government assuring her that all medical expenses will be borne by it. और उससे भी दुखद ये कि देश की विदेश मंत्री इस सम्बन्ध में अपने कर्तव्य का निर्वहन अपनी सरकार की ही कार्यप्रणाली के अनुसार कर रही हैं अर्थात सोशल मीडिया पर और इसके लिए वे ट्विटर का लगातार इस्तेमाल कर रही हैं - External Affairs Minister Sushma Swaraj has sought a report from the Uttar Pradesh government about the attack on Russian national and tweeted about her leaving for Russia today. Here's what Swaraj tweeted: Sushma Swaraj   ✔ @SushmaSwaraj Acid attack on Russian girl - A senior officer of MEA met the victim in hospital today. He also spoke to the Doctors attending on her. 9:48 PM - 15 Nov 2015 236 236 Ret...

इंदिरा गांधी :भारत का वास्तविक शक्तिपुंज और ध्रुवतारा

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जब ये शीर्षक मेरे मन में आया तो मन का एक कोना जो सम्पूर्ण विश्व में पुरुष सत्ता के अस्तित्व को महसूस करता है कह उठा कि यह उक्ति  तो किसी पुरुष विभूति को ही प्राप्त हो सकती है  किन्तु तभी आँखों के समक्ष प्रस्तुत हुआ वह व्यक्तित्व जिसने समस्त  विश्व में पुरुष वर्चस्व को अपनी दूरदर्शिता व् सूक्ष्म सूझ बूझ से चुनौती दे सिर झुकाने को विवश किया है .वंश बेल को बढ़ाने ,कुल का नाम रोशन करने आदि न जाने कितने ही अरमानों को पूरा करने के लिए पुत्र की ही कामना की जाती है किन्तु इंदिरा जी ऐसी पुत्री साबित हुई जिनसे न केवल एक परिवार बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र गौरवान्वित अनुभव करता है  और  इसी कारण मेरा मन उन्हें ध्रुवतारा की उपाधि से नवाज़ने का हो गया और मैंने इस पोस्ट का ये शीर्षक बना दिया क्योंकि जैसे संसार के आकाश पर ध्रुवतारा सदा चमकता रहेगा वैसे ही इंदिरा प्रियदर्शिनी  ऐसा  ध्रुवतारा थी जिनकी यशोगाथा से हमारा भारतीय आकाश सदैव दैदीप्यमान  रहेगा। १९ नवम्बर १९१७ को इलाहाबाद के आनंद भवन में जन्म लेने वाली इंदिरा जी के लिए श्रीमती सरोजनी नायडू जी ने एक तार ...