अरे घर तो छोड़ दो
''सियासत को लहू पीने की लत है , वर्ना मुल्क में सब खैरियत है .'' महज शेर नहीं है ये ,असलियत है हमारी सियासत की ,जिसे दुनिया के किसी भी कोने में हो ,लहू पीने की ऐसी बुरी लत है कि उसके लिए यह सड़कों से लेकर चौराहों तक, राजमहलों से लेकर साधारण घरों तक भी दौड़ जाती है .उत्तर प्रदेश में इस वक्त नगरपालिका चुनावों की धूम मची है और हर तरफ उम्मीदवारों की लाइन लगी हुई हैं .लगें भी क्यों न आखिर पांच साल में एक बार ही तो ये मौका हाथ लगता है और राजनीति में उतरे हुए लोगों के क्या वारे-न्यारे होते हैं ये तो सभी जानते हैं ,आखिर जिस सरकारी नौकरी के लिए एक आम आदमी कहाँ-कहाँ की ठोकर खाता फिरता है उसे छोड़कर सेवा का नाम लेकर सोने के पालने में झूलने यूँ ही तो बड़े-बड़े तीसमारखाँ यहाँ नहीं आ रहे . नगरपालिका चुनाव एक तरह से एक जगह पर रहने वाले लोगों के बीच का ही चुनाव होता है इसमें किसी भी बाहरी व्यक्ति का कोई दखल नहीं होता ,पर अब लगता है कि कानून में फेरबदल हो ही जाना चाहिए क्यूंकि राजनीतिक दल विशेष रूप से राष्ट्रीय स्तर के दल भी इस...