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पटाखों बिना क्या शादी क्या चुनाव !

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     चारो तरफ धुंआ ही धुंआ दिखाई दे रहा था आज सारे दिन और सूरज की रौशनी का कहीं नामो-निशान नहीं था .पहले तो सुबह सुबह यही लगता रहा कि या तो बादल हैं या कोहरा किन्तु जैसे जैसे दिन बढ़ा यह महसूस होने लगा कि यह न तो बादल का असर है न कोहरे का दुष्प्रभाव क्योंकि वह साफ तौर पर धुंआ नज़र आ रहा था और  कारण के लिए पिछली रात में अपने कुत्ते जॉन्टी के भौंक-भौंक कर कमरे में अंदर करने की अनुनय विनय की ओर ध्यान गया और याद आया कि कल रात भी काफी सारे पटाखे छोड़े गए थे तब धुंआ होना स्वाभाविक था और फिर रही सही कसर आज के समाचारपत्रों की रिपोर्ट ने पूरा कर दिया जिसमे नगर पालिका चुनावों में आतिशबाजी के जबरदस्त इस्तेमाल के समाचार प्रकाशित थे .        अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली-एनसीआर में दिवाली के मौके पर पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने पर काफी तीखी प्रतिक्रिया हमारे बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा व्यक्त की गयी थी चेतन भगत को मैं बुद्धिजीवी ही कहूँगी जिन्होंने महान उपन्यासकार होते हुए इस प्रतिबन्ध की आलोचना की पर उद्धव ठाकरे को मैं बुद्धिजीवी की श्रेणी में नही...