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नारी /आलेख शालिनी कौशिक लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

संस्कृति रक्षक केवल नारी

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यूनान ,मिस्र ,रोमां सब मिट गए जहाँ से , बाकी अभी है लेकिन ,नामों निशां हमारा . कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी , सदियों रहा है दुश्मन ,दौरे ज़मां हमारा . भारतीय संस्कृति की अक्षुणता को लक्ष्य कर कवि इक़बाल ने ये ऐसी अभिव्यक्ति दी जो हमारे जागृत व् अवचेतन मन में चाहे -अनचाहे विद्यमान  रहती है  और साथ ही इसके अस्तित्व में रहता है वह गौरवशाली व्यक्तित्व जिसे प्रभु ने गढ़ा ही इसके रक्षण के लिए है और वह व्यक्तित्व विद्यमान है हम सभी के सामने नारी रूप में .दया, करूणा, ममता ,प्रेम की पवित्र मूर्ति ,समय पड़ने पर प्रचंड चंडी ,मनुष्य के जीवन की जन्मदात्री ,माता के समान हमारी रक्षा करने वाली ,मित्र और गुरु के समान हमें शुभ कार्यों  के लिए प्रेरित करने वाली ,भारतीय संस्कृति की विद्यमान मूर्ति श्रद्धामयी  नारी के विषय में ''प्रसाद''जी लिखते हैं - ''नारी तुम केवल श्रद्धा हो ,विश्वास रजत नग-पग तल में , पियूष स्रोत सी बहा करो ,जीवन के सुन्दर समतल में .'' संस्कृति और नारी एक दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं .नारी के गुण ही हमें संस्कृति के लक्षणों के रूप में...

बेटी की...... मां ?

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बेटी का जन्म पर चाहे आज से सदियों पुरानी बात हो या अभी हाल-फ़िलहाल की ,कोई ही चेहरा होता होगा जो ख़ुशी में सराबोर नज़र आता होगा ,लगभग जितने भी लोग बेटी के जन्म पर उपस्थित होते हैं सभी के चेहरे पर मुर्दनी सी ही छा जाती है.सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि बेटी का जन्म सुनकर उसे जन्म देने वाली माँ भी ख़ुशी के पल से दूर नज़र आती है और मर्दों के इस समाज द्वारा यह ठीकरा माता उर्फ़ नारी के सिर पर ही फोड़ दिया जाता है कि माँ स्वयं नारी होकर भी बेटी अर्थात नारी का जन्म नहीं चाहती इसी से यह साबित होता है कि नारी ही नारी की सबसे बड़ी दुश्मन है अब नारी नारी की दुश्मन कैसे है यह मुद्दा तो बहुत लम्बे विचार-विमर्श का है किन्तु माँ स्वयं नारी होकर बेटी अर्थात नारी का जन्म क्यों नहीं चाहती यह मुद्दा अभी की ही एक घटना प्रत्यक्ष रूप में साबित करने हेतु पर्याप्त है - [शर्मनाक: बेटी पैदा हुई तो पत्नी को निर्वस्त्र कर छत पर घुमाया-अमर उजाला से साभार ] एक तरफ केंद्र सरकार देश में बेटी बचाओ अभियान चला रही है, तो दूसरी तरफ एक मां के लिए बेटी पैदा करना अभिशाप बन गया। इसके लिए वह पिछले चार साल से प...

भावुक सहनशील नारी शक्ति स्वरूप

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 ये सर्वमान्य तथ्य है कि महिला शक्ति का स्वरुप है और वह अपनों के लिए जान की बाज़ी  लगा भी देती है और दुश्मन की जान ले भी लेती है.नारी को अबला कहा जाता है .कोई कोई तो इसे बला भी कहता है  किन्तु यदि सकारात्मक रूप से विचार करें तो नारी इस स्रष्टि की वह रचना है जो शक्ति का साक्षात् अवतार है.धेर्य ,सहनशीलता की प्रतिमा है.जिसने माँ दुर्गा के रूप में अवतार ले देवताओं को त्रास देने वाले राक्षसों का संहार किया तो माता सीता के रूप में अवतार ले भगवान राम के इस लोक में आगमन के उद्देश्य को  साकार किया और पग-पग पर बाधाओं से निबटने में छाया रूप  उनकी सहायता की.भगवान विष्णु को अमृत देवताओं को ही देने के लिए और भगवान् भोलेनाथ  को भस्मासुर से बचाने के लिए नारी के ही रूप में आना पड़ा और मोहिनी स्वरुप धारण कर उन्हें विपदा से छुड़ाना पड़ा.    हमारे संस्क...

औरत गुलाम है.

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अभी अभी एक नए जोड़े को देखा पति चैन से जा रहा था और पत्नी घूंघट में ,भले ही दिखाई दे या न दे किन्तु उसे अब ऐसे ही चलने का अभ्यास करना होगा आखिर करे भी क्यूँ न अब वह विवाहित जो है जो कि एक सामान्य धारणा के अनुसार यह है कि अब वह धरती पर बोझ नहीं है ऐसा हमारे एक परिचित हैं उनका कहना है कि ''जब तक लड़की का ब्याह न हो जाये वह धरती पर बोझ है .'' मैंने अपने ही एक पूर्व आलेख '' विवाहित स्त्री होना :दासी होने का परिचायक नहीं  '' में विवाह को दासता जैसी कुरीति से अलग बताया था किन्तु यह वह स्थिति है जिसमे विवाह संस्कार को वास्तविक रूप में होना चाहिए किन्तु ऐसा होता कहाँ है ?वास्तविक रूप में यहाँ कोई इस संस्था को रहने ही कहाँ देता है कहीं लड़के के माँ-बाप इस संस्कार का उद्देश्य मात्र लड़की वालों को लूटना -खसोटना और यदि देहाती भाषा में कहूँ तो'' मूंडना '' मान लेते हैं तो कहीं स्वयं लड़की वाले कानून के दम पर लड़के वालों को कानूनी दबाव में लेकर इसके बल पर ''कि दहेज़ में फंसाकर जेल कटवाएंगे ''उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और धन ऐंठकर ही छ...