संदेश

बाल मजदूरी - कविता शालिनी कौशिक लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हम मजबूरों की एक और मजबूरी - बाल मजदूरी

चित्र
”बचपन आज देखो किस कदर है खो रहा खुद को , उठे न बोझ खुद का भी उठाये रोड़ी ,सीमेंट को .” ........................................................................ ”लोहा ,प्लास्टिक ,रद्दी आकर बेच लो हमको , हमारे देश के सपने कबाड़ी कहते हैं खुद को .” ....................................................................... ”खड़े हैं सुनते आवाज़ें ,कहें जो मालिक ले आएं , दुकानों पर इन्हीं हाथों ने थामा बढ़के ग्राहक को .” ........................................................................... ”होना चाहिए बस्ता किताबों,कापियों का जिनके हाथों में , ठेली खींचकर ले जा रहे वे बांधकर खुद को .” ....................................................................... ”सुनहरे ख्वाबों की खातिर ये आँखें देखें सबकी ओर , समर्थन ‘शालिनी ‘ का कर इन्हीं से जोड़ें अब खुद को .” ................................................................ शालिनी कौशिक [कौशल ] COPY CODE SNIPPET