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KAVITA SHALINI KAUSHIK लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

.............तभी कम्बख्त ससुराली ,

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थी कातिल में कहाँ हिम्मत  ,मुझे वो क़त्ल कर देता  ,         अगर  मैं  अपने  हाथों  से  ,न  खंजर  उसको  दे  देता  . ............................................................................... वो  बढ़  जाए  भले  आगे  ,लिए  तलवार  हाथों  में  , मिले  न  जिस्म  मेरा  ये  ,क़त्ल  वो  किसको  कर  लेता  . ................................................................................. बढ़ाते  हैं  हमीं  साहस  ,जुर्म  करने  का  मुजरिम  में  , क्या  नटवर  लाल  सबके  घर...

कैसे माने कमतर शक्ति ,हर महिका सम नारी की .

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भावुकता स्नेहिल ह्रदय ,दुर्बलता न नारी की , संतोषी मन सहनशीलता, हिम्मत है हर नारी की . ....................................................................... भावुक मन से गृहस्थ धर्म की , नींव वही जमाये है , पत्थर दिल को कोमल करना ,नहीं है मुश्किल नारी की. .................................................................................. होती है हर कली पल्लवित ,उसके आँचल के दूध से , ईश्वर के भी करे बराबर ,यह पदवी हर नारी की . ................................................................................... जितने भी इस पुरुष धरा पर ,जन्मे उसकी कोख से , उनकी स्मृति दुरुस्त कराना ,कोशिश है हर नारी की . ......................................................................... प्रेम प्यार की परिभाषा को ,गलत रूप में ढाल रहे , सही समझ दे राह दिखाना ,यही मलाहत नारी की . ............................................................................... भटके न वह मुझे देखकर ,भटके न संतान मेरी , जीवन की हर कठिन डगर पर ,इसी में मेहनत नारी की . .......................................