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मुसलमान हिन्दू से कभी अलग नहीं

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मुसलमान हिन्दू से कभी अलग नहीं  ''दिल में जब रौशनी की ख्वाहिश हो ,       शौक से मेरा घर जला लेना .''-मोहम्मद अकरम         एक दूसरे के प्रति कुर्बानी के भाव तक प्रेम में आकंठ डूबे हिन्दू-मुस्लिम समुदायों वाला यह देश चंद कट्टरपंथियों के कारण पिछले कुछ समय से जिस दौर से गुजर रहा है वह हम सभी के लिए शर्मनाक है क्योंकि - ''अब तो रह रहके जली लाशों की बू आती है ,    पहले ऐसी तो न थी मेरे चमन की खुशबू .'' भारत में हिन्दू व् मुसलमान समुदाय कभी एक दूसरे से अलग नहीं रहे .ये हमेशा एक दूसरे के दुःख में दुखी व् एक दूसरे की ख़ुशी में हर उत्सव हर जलसे में शामिल रहे हैं .जहाँ ईद मिलन के अवसर पर हिन्दू सबसे पहले अपने भाई मुसलमान की चौखट पर ईद मिलने पहुँचते हैं वहीँ दीवाली की मिठाई खाने में मुसलमान भी हिन्दू भाई से पीछे नहीं रहते .जहाँ हिन्दू बहन रानी पद्मावती के रक्षा के लिए मुग़ल बादशाह हुमायूँ भाई बन पहुँचता है वहीँ हिन्दू परिवारों के कितने ही बच्चे मुसलमान दाइयों के संरक्षण में पलते हैं .जहाँ हिन्दू विधवा बूढी महिला का कोई ...

फहमाइश देती ''शालिनी ''इन हुक्मरानों को ,

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बेचकर ईमान को ये देश खा गए . बरगला अवाम को ये दिन दिखा गए . .................................................... साहिबे आलम बने घूमे हैं वतन में , फ़र्ज़ कैसे भूलना हमको सिखा गए . ................................................... वीरान सबका आज कर अपना संवारे कल , फरेबी मेहरबान लूटकर खा गए . .................................................... ज़म्हूरियत के निगहबान जमघट के तलबगार , वादों के लचर झूले में सबको झुला गए . ....................................................... फ़ालिज जुदा हो लोकतंत्र देखे टुकुर-टुकुर , बेबसी के आंसू उसको रुला गए . .................................................... फिजायें तक जिस मुल्क की मुरौवत भरी , हवाएं भी वहां की बेरहम बना गए . .................................................. बेताबी में हथियाने को सत्ता की ये कुर्सी , फ़स्ले-बहार में हमें खिज़ा थमा गए . ....................................................... फहमाइश देती ''शालिनी ''इन हुक्मरानों को , झुलसाएगी वो आग जिसे कल लगा गए . ............................

संजय जी -कुमुद और सरस को अब तो मिलाइए.

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''सरस्वती चन्द्र '' संजय लीला भंसाली का यह धारावाहिक इस वक्त स्टार प्लस  व् दूरदर्शन पर प्रसारित हो रहा है और यह प्रसिद्द गुजराती उपन्यास सरस्वतीचंद्र पर आधारित है जो कि १९ वीं सदी में लिखा गया था . Saraswatichandra (Abridged) Front Cover of Saraswatichandra (Abridged) Author(s) Govardhanram M. Tripathi Original title Saraswatichandra Translator Vinod Meghani Country India Language Gujarati ISBN 81-260-2346-5 कुमुद सुन्दरी व् सरस्वती चन्द्र व्यास की यह प्रेम कहानी आज सभी दर्शकों को बांधे हुए है .किन्तु धारावाहिक की आरंभिक पंक्ति ''मुकम्मल मोहब्बत की अधूरी दास्तान''दिल बैठा देती है .दोनों ही चरित्र बहुत ही शालीन और भारतीय संस्कृति की मान्यताओं का सम्मान करने वाले हैं किन्तु सरस्वती चन्द्र की सौतेली माँ   गुमान की साजिशें और कुमुद की बुआ के पति की प्रतिशोध की प्रवर्ति दोनों के मिलन में बाधा उपस्थित कर देते हैं.         धारावाहिक की आरंभिक पंक्ति ने इस कदर दिल दुखाया है कि विकिपीडिया पर इसकी कहानी की खोज की जिसमे पता चला कि बहुत पहले 1968 ...

मोदी व् मीडिया -उत्तराखंड त्रासदी से भी बड़ी आपदा

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पिलाकर गिराना नहीं कोई मुश्किल , गिरे को उठाये वो कोई नहीं है . ज़माने ने हमको दिए जख्म इतने , जो मरहम लगाये वो कोई नहीं है .   हरबंस सिंह ''निर्मल'' जी के यही शब्द आज दोहराने को मन करता है .उत्तराखंड में इतनी बड़ी त्रासदी कि स्वयं मीडिया को आरम्भ में कोई सही अनुमान  नहीं था कि कितने लोग फंसे हैं या हमारे बीच में अब नहीं रहे हैं दैनिक जागरण के मुख्य पृष्ठ पर २२ जून को समाचार का शीर्षक था कि ''संकट में ६० हज़ार जिंदगियां ''और देखिये किस कदर हावी है राजनीति हमारे मीडिया पर कि ऐसे में भी उसी पृष्ठ  पर समाचार देता है ''कौंग्रेस को न बहा ले जाये उत्तराखंड सैलाब ''क्यों नहीं लिखता कि ''जागिये भारतवासियों कहीं वहां के लोगों पर गुजरती आपदा  न बहा ले जाये हमारे देश में बसा सद्भाव ''        एक तरफ जिदंगी मौत से जूझ रही थी और दूसरी तरफ दुकानदार उन्हें १० रूपए का बिस्कुट का पैकिट १०० में बेच रहे थे ,पायलट विमान में बैठने के पैसे मांग रहा था ५०००० /-और यही नहीं नेपाली लूट रहे थे जिन्दा महिलाओं के जेवर  हाथ  काट  कर . और हमारा मी...

पाखंडों का अजगर घूमे ,अपना मुख फैलाकर .

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तौबा करते धर्मस्थल में ,भक्त यूँ भीड़ बढाकर , पाप काटते रोज़ चढ़ावा ,ज्यादा खूब चढ़ाकर . >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> सारे साल है मारे बच्चे ,रखे खूब कमाकर , दाई कराये तीर्थ यात्रा बस में लोग बैठाकर . >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>. खाली हाथ ही जाना मुझको ,बोले ये चिल्लाकर , पैसे बीमे के वे खाता ,लोग जो जाएँ जमाकर . >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> देता दावत नेताओं को ,बाप का धन लुटाकर , विधवा माँ को सबके आगे ,पागल बड़ी दिखाकर . >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> इस दुनिया में जिधर भी देखो ,अपनी आँख घुमाकर, पाखंडों का अजगर घूमे ,अपना मुख फैलाकर . >>>>>>>>>>>>>>>>>...

गरजकर ऐसे आदिल ने ,हमें गुस्सा दिखाया है .

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गरजकर ऐसे आदिल ने ,हमें गुस्सा दिखाया है .   ख़ुदा ने आज़माया है ,अज़ाब हम पर आया है . किया अजहद ज़ुल्म हमने ,अदम ने ये बताया है . कस्साबी नारी सहे ,मुहं सी आदमजाद  की . इन्तहां ज़ुल्मों की उसपर ,उफान माँ का लाया है . करे खिलवाड़ कुदरत से ,आज के इन्सां बेखटके , खेल अपना दिखा रब ने ,कहकहा यूँ लगाया है . गेंहू के संग में है पिसती ,सदा घुन ही ये बेचारी , किसी की कारस्तानी का ,किसी को फल चखाया है . लूटकर बन्दों को उसके ,खजाने अपने हैं भरते , सभी को जाना है खाली ,काहे इतना जुटाया है . खबीस काम कर-करके ,खरा करने मुकद्दर को , पहुंचना रब की चौखट पर ,बवंडर ये मचाया है . कुफ्र का बढ़ना आदम में ,समझना खिलक़त से बढ़कर , चूर करने को मदहोशी ,सबक ऐसे सिखाया है . गज़ब पड़ना अजगैबी का ,हदें टूटी बर्दाश्त की , गरजकर ऐसे आदिल ने ,हमें गुस्सा दिखाया है . समझ लें आज कबीले ,सहमकर कहती ''शालिनी '', गालिबन ये हमारी ही ,करम रेखों का साया है . शब्दार्थ-अजगैबी-दैवी ,अजहद-बहुत ,आज़माना -परीक्षा लेना ,अज...

कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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   न बदल पायेगा तकदीर तेरी कोई और ,       तेरे हाथों में ही बसती है तेरी किस्मत की डोर ,    अगर चाहेगा तो पहुंचेगा तू बुलंदी पर        तेरे जीवन में भी आएगा तरक्की का एक दौर . तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने ,     दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी .  जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत ,       कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी . तकदीर बनाने के लिए सुनले मेहरबां,      दिल में जीतने का हमें जज्बा चाहिए . छूनी है अगर आगे बढ़के तुझको बुलंदी         क़दमों में तेरे जोश और उल्लास चाहिए . मायूस होके रुकने से कुछ होगा न हासिल ,     उम्मीद के चिराग दिल में जलने चाहियें . चूमेगी कामयाबी आके माथे को तेरे       बस इंतजार करने का कुछ सब्र चाहिए . क्या देखता है बार-बार हाथों को तू अपने ,    रेखाओं में नहीं बसती है तकदीर किसी की . गर करनी है हासिल तुझे जीवन में बुलंदी     मज़बूत इरादों को बना ...