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ये भाजपाई बौराये हुए क्यों हैं ?

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[मनोहर प‌र्रिकर ने गुरुवार को रक्षा मामलों से जुड़ी एक पत्रिका के विमोचन समारोह में कहा कि कुछ प्रधानमंत्रियों ने देश की सुरक्षा से संबंधी संवेदनशील मसलों पर समझौता किया। उन्होंने कहा, 'सुरक्षा के ‌लिहाज से 'डीप एसेट्स' (खुफिया सूत्र) जरूरी होते हैं। उन्हें बनाने में कम से कम 20 से 30 साल का वक्त लगता है। लेकिन कुछ प्रधानमंत्रियों ने 'डीप एसेट्स' को लेकर समझौते किए।' ] भाजपा और भाजपा के विभिन्न मंत्री जब भी सत्ता का स्वाद चखते हैं बौरा जाते हैं जैसे यह कोई धतूरा हो .वैसे देखा जाये तो यह धतूरे से भी खतरनाक होता है किन्तु जितना असर यह भाजपाइयों पर करता है इतना किसी और पर नहीं .ख़ुफ़िया सूत्रों को लेकर हमारे रक्षा मंत्री जी ने हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों को अपना निशाना बनाया है और क्योंकि उन्होंने इसके बनाने में २० से ३० साल के वक्त के लगने की बात कही है तो सीधे सीधे इसमें ७० से आगे रहने वाले प्रधानमंत्री निशाने पर हैं जो कि यदि हम क्रमानुसार देखें तो इंदिरा गांधी ,राजीव गांधी ,विश्वनाथ प्रताप सिंह ,नरसिम्हा राव ,एच.डी .देवगौड़ा ,अटल बिहारी वाजपेयी जी आदि को...

रंगदारी का धंधा :पुलिस की लापरवाही

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मुज़फ्फरनगर उत्तर प्रदेश का सबसे ज्यादा आपराधिक इतिहास वाला जिला रहा है और इस तथ्य को बी.बी.सी.ने भी एक समय स्वीकार किया था .आज भी यह जिला और किसी क्षेत्र में नाम कमाए न कमाए किन्तु इस क्षेत्र में अपना नाम गंवाने की गलती पर नहीं है .गुजरात में रहकर कपडे का कारोबार करने वाले मुज़फ्फरनगर के एक व्यापारी से दो करोड़ की रंगदारी मांगी गयी है और इसलिए गुजरात पुलिस ने पिछले दिनों यहाँ दबिश दी और ऐसा तब हो रहा है जबकि लगभग ३-४ महीने से इधर का इलाका रंगदारी के कई मामले और उनमे यहाँ के व्यापारियों की हत्या जैसी कुत्सित वारदात भी झेल चूका है .एक समय मुज़फ्फरनगर जिले में ही रहे कैराना में अभी हाल ही में दो व्यापारी भाइयों की हत्या रंगदारी प्रकरण में ही कर दी गयी थीऔर इसी के चलते इधर का व्यापारी ख़ौफ़ज़दा है और जैसे भी करके इस इलाके से पलायन को विवश हो तैयार हो रहा है और ऐसा होना स्वाभाविक भी है .व्यापार के लिए सबसे जरूरी जान-माल की सुरक्षा होती है और वही इधर की तरफ नहीं है .रंगदारी की चिट्ठी मिलने पर सतर्कतावश और सुरक्षा के मद्देनज़र पुलिस व्यापारी के प्रतिष्ठान व् घर पर बैठा दी जाती है किन्तु ...

मुसीबत गले पड़ी है

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''शादी करके फंस गया यार , अच्छा खासा था कुंवारा .'' भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उस व्यथा का चित्रण करने को पर्याप्त हैं जो उसे शादी के बाद मिलती है .आज तक सभी शादी के बाद नारी के ही दुखों का रोना रोते आये हैं किन्तु क्या कभी गौर किया उस विपदा का जो आदमी के गले शादी के बाद पड़ती है .माँ और पत्नी के बीच फंसा पुरुष न रो सकता है और  न हंस सकता है .एक तरफ माँ होती है जो अपने हाथ से अपने बेटे की नकेल निकलने देना नहीं चाहती और एक तरफ पत्नी होती है जो अपने पति पर अपना एक छत्र राज्य चाहती है . आम तौर पर भी यह देखने में आया है कि लड़के की शादी को तब तक के लिए टाल दिया जाता है जब तक उसकी बहनों का ब्याह न हो जाये क्योंकि एक धारणा यह भी प्रबल है कि लड़का शादी के बाद पत्नी के काबू में हो जाता है और फिर वह घर का कुछ नहीं करता जबकि जब अपनी लड़की को ब्याहते हैं तो ये चाहते हैं कि लड़का अपनी पत्नी का मतलब उनकी बेटी का हर तरह से ख्याल रखे और उसे कोई भी कष्ट न होने दे ,किन्तु बहु के मामले में उनकी सोच दूसरे की बेटी होने के कारण परिवर्तित हो जाती है क...

नारी देह मात्र बच्चा पैदा करने के लिए नहीं .

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  जागरण ब्यूरो, कोलकाता। विकास के एजेंडे पर चल रही केंद्र सरकार की राह में भाजपा नेताओं के बेतुके बयान रोड़ा बन रहे हैं। हिंदुओं से चार बच्चे पैदा करने की अपील करने वाले भाजपा सांसद को पार्टी ने नोटिस भेजा ही था कि मंगलवार को पश्चिम बंगाल में भी एक भाजपा नेता ने ऐसा ही विवादित बयान दे डाला। बीरभूम के जिला स्तर के नेता समीर गोस्वामी ने कहा कि हिंदू महिलाओं को चार नहीं पांच बच्चे पैदा करने चाहिए। इससे पहले उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले से भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने कहा था कि हर हिंदू को चार बच्चे पैदा करने चाहिए। उनके इस बयान पर उठे विवाद के बाद सोमवार रात खबर आई कि भाजपा ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजा है। हिन्दू महिलाओं को कितने बच्चे पैदा करने चाहियें इसे लेकर भाजपा जैसी हिंदूवादी पार्टी के नेताओं के रोज़ नए नए सुझाव आ रहे हैं और ये वे नेता हैं जो महिलाओं को केवल इसी काम के योग्य समझ उनका आह्वान कर रहे हैं क्योंकि ऐसे ही धर्माचार्य नेताओं ने महिलाओं के पूजा पाठ पर लगभग प्रतिबन्ध सा ही आरोपित कर रखा है .इन्हीं के कारण  आज महिलाएं धर्म-अध्यात्म के कार्यों...

क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं .

नहीं वे जानते मुझको,  दुश्मनी करके बैठे हैं , मेरे कुछ मिलने वाले भी,  उन्हीं से मिलके बैठे हैं , समझकर वे मुझे कायर,  बहुत खुश हो रहे नादाँ क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं . ........................................................... गिला वे कर रहे आकर , हमारे गुमसुम रहने का , गुलूबंद को जो कानों से , लपेटे अपने बैठे हैं . .................................................................. हमें गुस्ताख़ कहते हैं , गुनाह ऊँगली पे गिनवाएं , सवेरे से जो रातों तक , गालियाँ दे के बैठे हैं . ........................................................... नतीजा उनसे मिलने का , आज है सामने आया , पड़े हम जेल में आकर , वे घर हुक्का ले बैठे हैं . .................................................................. रखे जो रंजिशें दिल में , कभी न वो बदलता है , भले ही अपने होठों पर , तबस्सुम ले के बैठे है . ........................................................ नज़ीर ''शालिनी '' की ये , नज़रअंदाज़ मत करना , कहीं न कहना पड़ जाये , मियां तो लुट के बैठे ह...

वाह रे भाजपा और भाजपाइयों

न्यायिक क्षेत्राधिकार मिले लखनऊ को : भाजपा ,आज के समाचारपत्रों में भाजपा के उत्तर प्रदेश में विधान मंडल दल के नेता सुरेश कुमार खन्ना तथा विधान परिषद में पार्टी के नेता ह्रदय नारायण दीक्षित के कथन को स्थान दिया गया और यह स्थान देना ही भाजपा की मतलब परस्त व् अवसरवादी राजनीति का चेहरा सामने लाने को पर्याप्त था .उत्तर प्रदेश में भाजपा स्वयं सत्ता में नहीं है और इसलिए यहाँ अपनी जनता के हितों के बारे में सोच व् प्रतिबद्धता दिखाने को लखनऊ जनपद के जो जिले नजदीक होने के कारण क्षेत्राधिकार में इलाहाबाद के अंतर्गत आते हैं और उस कारण वादकारियों को जो समय व् पैसे के अपव्यय की असुविधा होती है उसे लेकर भाजपा के ये नेता ,क्योंकि यहाँ सपा की सरकार है इसलिए बढ़-चढ़कर उन जिलो का क्षेत्राधिकार लखनऊ को दिलाने की बात करते हैं और जहाँ के लिए वे स्वयं कुछ कर सकते हैं वहां अपना न तो सकारात्मक रवैया रखते हैं और न ही उस सम्बन्ध में कोई कदम उठाते हैं सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि इससे उनके पूर्वी उत्तर प्रदेश के वोट बैंक पर प्रभाव पड़ने की सम्भावना है और इसलिए तो रविशंकर प्रसाद जी पत्र भेजकर बेंच के संबंध में विचार ...

''बेंच दो या हटो सरकारों ''

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  बेंच को लेकर वकीलों की तालाबंदी,कचहरी गेट पर दिया धरना ,इलाहाबाद बार का पुतला फूंका ,वकीलों से झड़पें ऐसी सुर्खियां समाचारपत्रों की १९७९ से बनती रही हैं और अभी आगे भी बनते रहने की सम्भावना स्वयं हमारी अच्छे दिन लाने वाली सरकार ने स्पष्ट कर दी है क्योंकि केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के पत्र पर बेंच गठन के लिए बनी कमेटी को ही भंग कर दिया गया है .    पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच हमेशा से राजनैतिक कुचक्र का शिकार बनती रही है और किसी भी दल की सरकार आ जाये इस मुद्दे पर अपने वोट बैंक को बनाये रखने के लिए इसे ठन्डे बस्ते में डालती रही है और इसका शिकार बनती रही है यहाँ की जनता ,जिसे या तो अपने मुक़दमे को लड़ने के लिए अपने सारे कामकाज छोड़कर अपने घर से इतनी दूर कई दिनों के लिए जाना पड़ता है या फिर अपना मुकदमा लड़ने के विचार ही छोड़ देना पड़ता है .   वकील इस मुद्दे को लेकर जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं और जनता इस बात से अभी तक या तो अनभिज्ञ है या कहें कि वह अपनी अनभिज्ञता  को छोड़ना ही नहीं चाहती जबकि यह हड़ताल उन्हें हर तरह से नुकसान पहुंचा रही है और वे रोज़ न्याय...