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November, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रिश्तों पर कलंक :पुरुष का पलड़ा यहाँ भी भारी

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 रिश्तों पर कलंक :पुरुष का पलड़ा यहाँ भी भारी

 ''रिश्तों की ज़माने ने क्या रीत बनायी है ,
   दुश्मन है मेरी जां का लेकिन मेरा भाई है .''
पुरुष :हमेशा से यही तो शब्द है जो समाज में छाया है ,देश में छाया है और अधिक क्या कहूं पूरे संसार पर छाया है .बड़े बड़े दावे,प्रतिदावे ,गर्वोक्ति पुरुष के द्वारा की जाती है स्वयं को विश्व निर्माता और नारी को उसमे दोयम दर्ज दिया जाता है .और पुरुष के इस दावे को हाल ही की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं ने पूर्णतया साबित भी कर दिया है .हर जगह हर काम में स्वयं की श्रेष्ठता का गान गाने वाला पुरुष अपने बारे में बिलकुल सही कहता है और सही है ''हर जगह अव्वल है ''.
      २ अप्रैल २०१२ की शाम को कांधला [शामली ]में चार शिक्षिका बहनों पर तेजाबी हमला सुर्ख़ियों में था .हर ओर से इस मामले के खुलासे की मांग की जा रही थी जहाँ परिजन किसी रंजिश से इंकार कर रहे थे वहीँ पुलिस और आम जनता सभी के दिमाग में यह चल रहा था कि आखिर ऐसे ही कोई लड़कियों पर तेजाब क्यों फैंकेगा और आखिर खुलासा हो गया और ऐसा खुलासा जिसने न केवल कांधला कस्बे को शर्मसार किया बल्कि रिश्तो…

भविष्यवाणी-स्मृति छोड़ेंगी भाजपा ?

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क्या सच होगी ज्योतिषी की भविष्यवाणी, स्मृति बनेंगी राष्ट्रपति?

''दीपक तले अँधेरा ''.

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देश ने जब से नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री के रूप में पाया है तब से रोज़ नए रिकॉर्ड टूट रहे हैं कभी सबसे जबरदस्त बहुमत पाने वाली सरकार तो कभी विपक्ष के रूप में कांग्रेस की बदतर स्थिति का रिकॉर्ड और भी न जाने क्या क्या अभी बनेगा और टूटेगा किन्तु एक रिकॉर्ड जो शायद हमेशा के लिए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के साथ जुड़ा रहेगा और वह यह कि ये भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री है जिन्होंने अपनी पत्नी के नाम का इस्तेमाल किया केवल यहाँ के कानून के दबाव के कारण और पत्नी को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह देश के एक बेहद जनप्रिय और सभी जगह जनता से उसकी आकांक्षाओं को पूरा करने वाले प्रधानमंत्री की पत्नी हैं 

इंदिरा गांधी -भारत का ध्रुवतारा

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इंदिरा प्रियदर्शिनी :भारत का ध्रुवतारा
जब ये शीर्षक मेरे मन में आया तो मन का एक कोना जो सम्पूर्ण विश्व में पुरुष सत्ता के अस्तित्व को महसूस करता है कह उठा कि यह उक्ति  तो किसी पुरुष विभूति को ही प्राप्त हो सकती है  किन्तु तभी आँखों के समक्ष प्रस्तुत हुआ वह व्यक्तित्व जिसने समस्त  विश्व में पुरुष वर्चस्व को अपनी दूरदर्शिता व् सूक्ष्म सूझ बूझ से चुनौती दे सिर झुकाने को विवश किया है .वंश बेल को बढ़ाने ,कुल का नाम रोशन करने आदि न जाने कितने ही अरमानों को पूरा करने के लिए पुत्र की ही कामना की जाती है किन्तु इंदिरा जी ऐसी पुत्री साबित हुई जिनसे न केवल एक परिवार बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र गौरवान्वित अनुभव करता है  और  इसी कारण मेरा मन उन्हें ध्रुवतारा की उपाधि से नवाज़ने का हो गया और मैंने इस पोस्ट का ये शीर्षक बना दिया क्योंकि जैसे संसार के आकाश पर ध्रुवतारा सदा चमकता रहेगा वैसे ही इंदिरा प्रियदर्शिनी  ऐसा  ध्रुवतारा थी जिनकी यशोगाथा से हमारा भारतीय आकाश सदैव दैदीप्यमान  रहेगा। १९ नवम्बर १९१७ को इलाहाबाद के आनंद भवन में जन्म लेने वाली इंदिरा जी के लिए श्रीमती सरोजनी नायडू जी ने एक तार भेजकर कहा थ…

किसान और फसल क्या सूली ही चढ़ने के लिए ?

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ब्रह्मा सृष्टि का निर्माण करते हैं ,विष्णु पालन करते हैं और महेश संहार करते हैं यदि इस तथ्य की गहराई में हम जाकर देखें तो भगवान विष्णु के इस कर्तव्यपालन में हमारे कृषक बराबर की भागीदारी करते हैं और इसलिए ये हमारे अन्नदाता कहे जाते हैं .हमारे द्वित्य प्रधानममंत्री माननीय लाल बहादुर शास्त्री जी ने भी इसलिए ''जय जवान -जय किसान ''का नारा बुलंद किया था .किसान का जीवन सदैव संघर्ष सहकर भी हम सभी के लिए सुख व् आंनद की वर्षा करने वाला रहा है .जिस प्रकार फलों से लदे वृक्ष हमेशा झुके रहते हैं इसी तरह हम सबका पेट भरने को हमारे किसानों के शरीर सर्वदा सर्दी-गर्मी-बारिश में खेतों में जुते रहते हैं और इस सबके बाद भी उन्हें क्या मिलता है कभी आकाश के मालिक भगवान की तरफ से अन्याय तो कभी धरती की मालिक हमारी लोकतान्त्रिक सरकार से अत्याचार और परिणाम यह होता है कि कभी हमारे किसान ख़ुदकुशी करते हैं तो कभी उनकी मेहनत अर्थात उनकी उपजाऊ फसल सूली चढ़ती है . गन्ना मूल्य उत्तर प्रदेश में दूसरे साल भी २७५,२८० और २९० रूपये प्रति क्विंटल ही रहने की बात सामने आते ही किसानों ने उत्तर प्रदेश में गन्ने की…

हम कहाँ ले जा रहे बचपन को ?

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एक फ़िल्मी गाना इस ओर  हम सभी का ध्यान आकर्षित करने हेतु  पर्याप्त है -
''बच्चे मन के सच्चे सारे जग की आँख के तारे ,ये वो नन्हें फूल हैं जो भगवान  को लगते प्यारे ,''
लेकिन शायद हम ये नहीं मानते क्योंकि आज जो कुछ भी हम बच्चों को दे रहे हैं वह कहीं से भी ये साबित नहीं करता एक ओर सरकार बालश्रम रोकने हेतु प्रयत्नशील है तो दूसरी ओर हम बच्चों को चोरी छिपे इसमें झोंकने में जुटे हैं.आप स्वयं आये दिन देखते हैं कि बाज़ारों में दुकानों पर ईमानदारी के नाम पर बच्चों को ही नौकर लगाने में दुकानदार तरजीह देते हैं .सड़कों पर ठेलियां ठेलते ,कबाड़ का सामान खरीदने के लिए आवाज़ लगते बच्चे ही नज़र आते हैं .




वाह रे गुजराती संविधान

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भारतीय संविधान का अनुच्छेद २१ यह  उपबंधित करता है कि ''किसी व्यक्ति को उसके प्राण और दैहिक स्वाधीनता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा ,अन्यथा नहीं .''
    इस प्रकार प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार सभी अधिकारों में श्रेष्ठ है और अनुच्छेद २१ इसी अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है .
    यह अधिकार व्यक्ति को न केवल जीने का अधिकार देता है वरन मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्रदान करता है .फ्रेंसिस कोरेली बनाम भारत संघ ए.आई.आर .१९८१ एस.सी.७४६ में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनुछहद २१ के अधीन प्राण शब्द से तात्पर्य पशुवत जीवन से नहीं वरन मानव जीवन से है और इसमें मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार सम्मिलित है और इसी मानवीय गरिमा को मद्देनज़र रखते हुए उच्चतम न्यायालय ने प्रगति वर्गीज़ बनाम सिरिल जॉर्ज वर्गीज़ ए.आई.आर. १९९७ एस.सी.३४९ के मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि भारतीय तलाक अधिनियम १८६९ की धारा १० ईसाई पत्नी को ऐसे व्यक्ति के साथ रहने के लिए विवश करती है जिससे वह घृणा करती है .जिसने उसके साथ क्रूरता का व्यवहार करके उसे त्याग दिया था ऐसा जीव…

नशा -युवा पीढ़ी और हम

''मादक पदार्थों की गिरफ्त में घिरे हुए हमने भी देखा है क़र्ज़ में डूबे हुए हिंदुस्तान का , बिक चुके आत्म-सम्मान का , फलते-फूलते भ्रष्टाचार का , चार कदम गुलामी की ओर .'' शाप और अभिशाप दोनों समानार्थक होते हुए भी अपने में बड़ा अंतर छिपाए हुए हैं .शाप वस्तु विशेष ,समय विशेष आदि के लिए होता है ,जबकि अभिशाप जीवन भर घुन की भांति लगा रहता है .सुख प्राप्ति के लिए चिंताग्रस्त आज का मानव चेतना और चिंतन से बहुत दूर है .भय ,कायरता ,विषाद ,ग्लानि और असफलताएँ उसके मन और मस्तिष्क पर छायी रहती है .खिन्नता और क्लांति को मिटाने के लिए वह दोपहरी में प्यासे मृग की भांति कभी सिनेमाघर की ओर मुड़ता है तो कभी अन्य मन बहलाव के साधनों की ओर ,पर वहां भी उसकी चेतना उसे शांति से नहीं बैठने देती .वह दुखी होकर उठ खड़ा होता है -''क्या संसार में ऐसा कुछ नहीं जो कि तेरी चेतना को कुछ देर के लिए अचेतना में परिवर्तित कर दे ''-''मन मस्तिष्क से प्रश्न पूछता है और बिना कहे बिना उत्तर मिले पैर मुड़ जाते हैं मदिरालय की ओर ,जहाँ न शोक है और न दुःख ,जहाँ सदैव दीवाली मनाई जाती है और बसंत राग अल…

जनांदोलन की वास्तविकता

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