सोमवार, 31 जुलाई 2017

तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे .

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अवसर दिया श्रीराम ने पुरुषों को हर कदम ,
अग्नि-परीक्षा नारी की तुम लेते रहोगे ,
करती रहेगी सीता सदा मर्यादा का पालन
पर ठेकेदार मर्यादा के यहाँ तुम ही रहोगे .
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इक रात भी नारी अगर घर से रही बाहर
घर से निकाल तुम उसे बाहर ही करोगे ,
पर लौटके तुम आ रहे दस साल में भी गर
पवित्रता की मूर्ति बन सजते रहोगे .
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इज़्ज़त के नाम पे यहां नारी की खिंचाई
इज़्ज़त के वास्ते उसे तुम क़त्ल करोगे ,
हमको खबर है बहक कलियुगी सूर्पणखा से
सबकी नज़र में इज़्ज़तदार बने रहोगे .
.......................................................
कुदरत ने दिया नारी को माँ बनने का जो वर
उसको कलंक तुम ही बनाते रहोगे ,
नारी की लेके कदम-कदम अग्नि-परीक्षा
तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे .
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 शालिनी कौशिक
     [कौशल ]

बुधवार, 26 जुलाई 2017

बनोगी उसकी ही कठपुतली

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माथे ऊपर हाथ वो धरकर
बैठी पत्थर सी होकर
जीवन अब ये कैसे चलेगा
चले गए जब पिया छोड़कर
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बापू ने पैदा होते ही
झाड़ू-पोंछा हाथ थमाया
माँ ने चूल्हा-चौका दे दिया
चकला बेलन हाथ थामकर .
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पढ़ना चाहा पाठशाला में
बाबा जी से कहकर देखा
बापू ने जब आँख तरेरी
माँ ने डांट दिया धमकाकर .
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आठ बरस की होते मुझको
विदा किया बैठाकर डोली
तबसे था बस एक सहारा
मेरे पिया मेरे हमजोली .
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उनके बच्चे की माता थी
उनके घर की चौकीदार
सारा जीवन अपना देकर
मिला न एक भी खेवनहार .
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आज गए वो मुझे छोड़कर
घर-गृहस्थी कहीं और ज़माने
बच्चों का भी लगा कहीं मन
मुझको सारे बोझ ही मानें .
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व्यथा कहूं क्या इस जीवन की
जिम्मेदारी है ये खुद की
मर्द के हाथ में दी जब डोरी
बनोगी उसकी ही कठपुतली .
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शालिनी कौशिक
    [कौशल]

शनिवार, 22 जुलाई 2017

''बेटी को इंसाफ -मरने से पहले या मरने के बाद ?

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   '' वकील साहब '' कुछ करो ,हम तो लुट  गए ,पैसे-पैसे को मोहताज़ हो गए ,हमारी बेटी को मारकर वो तो बरी हो गए और हम .....तारीख दर तारीख अदालत के सामने गुहार लगाने के बावजूद कुछ नहीं कर पाए ,क्या वकील साहब अब कहीं इंसाफ नहीं है ? " रोते रोते उसने मेरे सामने अपनी बहन की दहेज़ हत्या में अदालत के निर्णय पर नाखुशी ज़ाहिर करते हुए फूट-फूटकर रोना आरम्भ कर दिया ,मैंने मामले के एक-एक बिंदु के बारे में उससे समझा-बुझाकर जानने की कोशिश की. किसी तरह उसने अपनी बहन की शादी से लेकर दहेज़-हत्या तक व् फिर अदालत में चली सारी कार्यवाही के बारे में बताया ,वो बहन के पति व् ससुर को ,पुलिस वालों को ,अपने वकील को ,निर्णय देने वाले न्यायाधीश को कुछ न कुछ कहे जा रहा था और रोये जा रहा था और मुझे गुस्सा आये जा रहा था उसकी बेबसी पर ,जो उसने खुद ओढ़ रखी थी .
             जो भी उसने बताया ,उसके अनुसार ,उसकी बहन को उसके पति व् ससुर ने कई बार प्रताड़ित कर घर से निकाल दिया था और तब ये उसे उसकी विनती पर घर ले आये थे ,फिर बार-बार पंचायतें कर उसे वापस ससुराल भेजा जाता रहा और उसका परिणाम यह रहा कि एक दिन वही हो गया जिसका सामना आज तक बहुत सी बेटियों-बहनो को करना पड़ा है और करना पड़ रहा है .
             ''दहेज़ हत्या'' कोई एक दिन में ही नहीं हो जाती उससे पहले कई दिनों,हफ्तों,महीनो तो कभी सालों की प्रताड़ना लड़की को झेलनी पड़ती है और बार बार लड़के वालों की मांगों का कटोरा उसके हाथों में दे ससुराल वालों द्वारा उसे मायके के द्वार पर टरका दिया जाता है जैसे वह कोई भिखारन हो और मायके वालों द्वारा, जिनकी गोद में वो खेल-कूदकर बड़ी हुई है ,जिनसे यदि अपना पालन-पोषण कराया है तो उनकी अपनी हिम्मत से बढ़कर सेवा-सुश्रुषा भी की है,भी कोई प्यार-स्नेह का व्यव्हार उसके साथ नहीं किया जाता ,समाज के विवाह की अनिवार्यता के नियम का पालन करते हुए जैसे-तैसे बेटी का ब्याह कर उसके अधिकांश मायके वाले उसके विवाह पर उसकी समस्त ज़िम्मेदारियों से मुक्ति मान लेते हैं और ऐसे में अगर उसके ससुराल वाले ,जो कि उन मायके वालों ने ही चुने हैं न कि उनकी बेटी ने ,अपनी कोई अनाप-शनाप ''डिमांड'' रख उनकी बेटी को ही उनके घर भेज देते हैं तो वह उनके लिए एक आपदा सामान हो जाती है और फिर वे उससे मुक्ति का नया हथियार उठाते हैं और ससुराल वालों की मांग कभी थोड़ी तो कभी पूरी मान ''कुत्ते के मुंह में खून लगाने के समान ''अपनी बेटी को फिर बलि का बकरा बनाकर वहीँ धकिया देते हैं .
               वैसे जैसे जैसे हमारा समाज विकास कर रहा है कुछ परिवर्तन तो आया है किन्तु इसका बेटी को फायदा अभी नज़र नहीं आ रहा है क्योंकि मायके वालों में थोड़ी हिम्मत तो अब आयी है .उन्होंने अब बेटी पर ससुराल में हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठानी तो अब शुरू की है जबकि पहले बेटी को उसकी ससुराल में परेशान होते हुए जानकर भी वे इसे बेटी की और घर की बदनामी के रूप में ही लेते थे और चुपचाप होंठ सीकर बेटी को ससुरालियों की प्रताड़ना सहने को मजबूर करते थे और इस तरह अनजाने में बेटी को मारने में उसके ससुरालियों का सहयोग ही करते थे ,कर तो आज भी वैसे वही रहे हैं बस आज थोड़ा बदलाव है अब लड़की वालों व् ससुरालवालों के बीच में कहीं पंचायतें हैं तो कहीं मध्यस्थ हैं और दोनों का लक्ष्य वही ....लड़की को परिस्थिति से समझौता करने को मजबूर करना और उसे उस ससुराल में मिल-जुलकर रहने को विवश करना जहाँ केवल उसका खून चूसने -निचोड़ने के लिए ही पति-सास-ससुर-ननद-देवर बैठे हैं .
               आज इसी का परिणाम है कि जो लड़की थोड़ी सी भी अपने दम पर समाज में खड़ी है वह शादी से बच रही है क्योंकि घुटने को वो,मरने को वो ,सबका करने को वो और उसको अगर कुछ हो जाये तो कोई नहीं ,न मायका उसका न ससुराल ,ससुरालियों को बहू के नाम पर केवल दौलत प्यारी और मायके वालों को बेटी के नाम पर केवल इज़्ज़त...प्यारी...ससुरालिए तो पैसे के नाम पर उसे उसके मायके धकिया देंगे और मायके वाले उसे मरने को ससुराल ,कोई उसे रखने को तैयार नहीं जबकि कहने को ''नारी हीन घर भूतों का डेरा ,यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता '' ऐसे पवित्र वाक्यों को सभी जानते हैं किन्तु केवल परीक्षाओं में लिखने व् भाषणों  में बोलने के लिए ,अपने जीवन में अपनाने के लिए नहीं .
                       बेटी को अगर ससुराल में कुछ हो जाये तो उसके मायके वाले दूसरों को ही कोसते हैं जो कि बहुत आसान है क्यों नहीं झांकते अपने गिरेबान में जो उनकी असलियत को उनके सामने एक पल में रख देगा .भला कोई बताये ,पति हो,सास हो ,ससुर हो,ननद-देवर-जेठ-पुलिस-वकील-जज कौन हैं ये आपकी बेटी के ? जब आप ही अपनी बेटी को आग में झोंक रहे हैं तो इन गैरों पर ऐसा करते क्या फर्क पड़ता है ? पहले खुद तो बेटी-बहन के प्रति इंसाफ करो तभी दूसरों से इंसाफ की दरकार करो .शादी करना अच्छी बात है लेकिन अगर बेटी की कोई गलती न होने पर भी ससुराल वाले उसके साथ अमानवीय बर्ताव करते हैं तो उसका मायका तो उससे दूर नहीं होना चाहिए ,कम से कम बेटी को ऐसा तो नहीं लगना चाहिए कि उसका इस दुनिया में कोई भी नहीं है .केवल दहेज़ हत्या हो जाने के बाद न्यायालय की शरण में जाना तो एक मजबूरी है ,कानून ने आज बेटी को बहुत से अधिकार दिए हैं लेकिन उनका साथ वो पूरे मन से तभी ले सकती है जब उसके अपने उसके साथ हो .अब ऐसे में एक बाप को ,एक भाई को ये तो सोचना ही पड़ेगा कि इन्साफ की ज़रुरत बेटी को कब है -मरने से पहले या मरने के बाद ?

शालिनी कौशिक 
      [कौशल]

शनिवार, 8 जुलाई 2017

काश ऐसी हो जाए भारतीय नारी



चली है लाठी डंडे लेकर भारतीय नारी ,
तोड़ेगी सारी बोतलें अब भारतीय नारी .
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बहुत दिनों से सहते सहते बेदम हुई पड़ी थी ,
तोड़ेगी उनकी हड्डियां आज भारतीय नारी .
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लाता नहीं है एक भी तू पैसा कमाकर ,
करता नहीं है काम घर का एक भी आकर ,
मुखिया तू होगा घर का मेरे कान खोल सुन
जब जिम्मेदारी मानेगा खुद शीश उठाकर ,
गर ऐसा करने को यहाँ तैयार नहीं है ,
मारेगी धक्के आज तेरे भारतीय नारी .
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उठती सुबह को तुझसे पहले घर को सँवारुं,
खाना बनाके देके तेरी आरती उतारूँ,
फिर लाऊँ कमाई करके सिरपे ईंट उठाकर
तब घर पे आके देख तुझे भाग्य सँवारुं .
मेरे ही नोट से पी मदिरा मुझको तू मारे,
अब मारेगी तुझको यहाँ की भारतीय नारी .
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पिटना किसी भी नारी का ही भाग्य नहीं है ,
अब पीट भी सकती है तुझे भारतीय नारी .
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जीवन लिखा है साथ तेरे मेरे करम ने ,
तू मौत नहीं मेरी कहे भारतीय नारी .
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लगाया पार दुष्टों को है देवी खडग ने ,
तुझको भी तारेगी अभी ये भारतीय नारी .
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शालिनी कौशिक
(कौशल 

रविवार, 2 जुलाई 2017

आधुनिक ससुराल में बहू


बैठी थी इंतज़ार में
सुहाग सेज़ पर
मन में थी उमंग भरी
अनंत मिलन को
देखूंगी आज रूप मैं भी
अपने राम का
नाता बंधा है जिनसे मेरा
जनम जनम का
वो देख निहारेंगे मुझे
सराहेंगे किस्मत
कुदरत का आभार
अभिव्यक्त करेंगे
जानेंगे मुझसे रुचियाँ
सब मेरी ख्वाहिशें
तकलीफें खुशियां खुद की सारी
साझा करेंगे
व्यतीत हो रहा था समय
जैसे प्रतिपल
ह्रदय था डूब रहा
मन टूट रहा था
दरवाजा खुला ऐसे जैसे
धरती हो कांपी
बातों को उसकी सुनके
दिल कांप रहा था
सम्बन्धी था ससुराल का
आया था जो करने
बचने को उससे रास्ते
मन खोज रहा था
आवाज़ थी लगायी उसने
प्राण-प्रिय को
सम्बन्धी फिर भी फाड़ नज़र
ताक रहा था
झपटा वो जैसे बेधड़क
कोमलांगी पर
चाकू दिखाके छोड़ने की
भीख मांग रही थी
जैसे ही हरकतें बढ़ी
उस रावण की अधिक
चाकू को अपने पेट में
वो मार रही थी
जीवन की सारी ख्वाहिशें एक पल में थी ख़त्म ,
भारत की नारी की व्यथा बखान रही थी ,
सुरक्षा ससुराल में करना काम पति का ,
मरके भी फटी आँख वो तलाश रही थी .
......................................................
शालिनी कौशिक
   (कौशल) 

शुक्रवार, 30 जून 2017

कभी....... न देती

न रखते हैं दुनिया में कभी जीने की हम चाहत ,
तभी तो मौत दरवाजे मेरे दस्तक नहीं देती .
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न खाते पेट भरने को जब खाने हम बैठें,
तभी तो रोटी थाली की कभी भी ख़त्म न होती .
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नहीं हम जागना चाहें जो जाके बिस्तर पे लेटें ,
तभी तो नींद पलकों से जा कोसों दूर है बैठी .
............................................................
नहीं जो चाहो दुनिया में वही हर पल यहाँ मिलता ,
जो चाहा दिल ने शिद्दत से कभी मिलने नहीं देती ..............................................................
तरसती ''शालिनी'' रहती सदा मन चाहा पाने को ,
कभी ख्वाबों को ये कुदरत हकीकत होने न देती .
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शालिनी कौशिक
(कौशल) 

सोमवार, 26 जून 2017

मीरा कुमार जी को हटाया क्यों नहीं सुषमा जी ?

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विपक्षी दलों ने जब से भाजपा के राष्ट्रपति पद के दलित उम्मीदवार श्री रामनाथ कोविंद के सामने दलित उम्मीदवार के ही रूप में मीरा कुमार जी को खड़ा किया है तब से भाजपा के नेताओं व् भाजपा के समर्थकों के पसीने छूटने लगे  हैं.कभी मीरा कुमार जी के दलित होने को लेकर सोशल मीडिया पर खील्ली उड़ाई जा रही है तो कभी उनके एक लोकसभा अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल को लेकर सुषमा स्वराज जी द्वारा व्यर्थ की बयानबाजी ट्विटर पर की जा रही है और ये सब उस घबराहट का परिणाम है जो कि अपने उम्मीदवार की हार जीत को लेकर उपजती है और जबकि सभी जानते हैं कि रामनाथ कोविंद जी की जीत तय है तब भी ये व्यर्थ की बयानबाजी ,सोशल मीडिया का दुरूपयोग ,समझ से परे है .
       मीरा कुमार जी के पति को ब्राह्मण बताकर उनके दलित होने को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है और ये सब हो रहा है उनके पति श्री मंजुल कुमार जी के नाम में शास्त्री शब्द का जुड़ा होना जबकि सभी जानते हैं कि शास्त्री एक उपाधि है जिसे कोई भी शास्त्री की शिक्षा प्राप्त करके हासिल कर सकता है .
       और रही उनके लोकसभा अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल की बात तो सबसे पहले हमें लोकसभा अध्यक्ष के सम्बन्ध में संवैधानिक स्थिति को जान लेना चाहिए -

लोकसभा अध्यक्ष

लोकसभा अध्यक्षभारतीय संसद के निम्नसदन, लोकसभाका सभापति एवं अधिष्ठाता होता है। उसकी भूमिकावेस्टमिंस्टर प्रणाली पर आधारित किसी भी अन्य शासन-व्यवस्था के वैधायिकीय सभापति के सामान होती है। उसका निर्वाचन लोकसभा चुनावों के बाद, लोकसभा की प्रथम बैठक में ही कर लिया जाता है। वह संसद के सदस्यों में से ही पाँच साल के लिए चुना जाता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह अपने राजनितिक दल से इस्तीफा दे दे, ताकि कार्यवाही में निष्पक्षता बनी रहे। वर्त्तमान लोकसभा अध्यक्षश्रीमती सुमित्रा महाजन है, जोकि अपनी पूर्वाधिकारी, मीरा कुमार के बाद, इस पद की दूसरी महिला पदाधिकारी हैं।

निर्वाचनसंपादित करें

लोकसभा अध्यक्ष का निर्वाचन लोकसभा के सदस्यों के द्वारा किया जाता है। निर्वाचन की तिथि राष्ट्रपति के द्वारा निश्चित की जाती है। राष्ट्रपति के द्वारा निश्चित की गयी तिथि की सूचना लोकसभा का महासचित सदस्यों को देता है। निर्वाचन की तिथि के एक दिन पूर्व के मध्याह्न से पहले किसी सदस्य द्वारा किसी अन्य सदस्य को अध्यक्ष चुने जाने का प्रस्ताव महासचिव को लिखित रूप में दिया जाता है। यह प्रस्ताव किसी तीसरे सदस्य द्वारा अनुमोदित होना चाहिए। इस प्रस्ताव के साथ अध्यक्ष के उम्मीदवार सदस्य का यह कथन संलग्न होता है कि वह अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए तैयार है। निर्वाचन के लिए एक या अधिक उम्मीदवारों द्वारा प्रस्ताव किये जा सकते हैं। यदि एक ही प्रस्ताव पेश किया जाता है, तो अध्यक्ष का चुनाव सर्वसम्मत होता है और यदि एक से अधिक प्रस्ताव प्रस्तुत होते हैं, तो मतदान कराया जाता है। मतदान में लोकसभा के सदस्य ही शामिल होकर अध्यक्ष का बहुमत से निर्वाचन करते हैं।

शक्तियाँ और कार्य


लोकसभा-अध्यक्ष लोकसभा के सत्रों की अध्यक्षता करता है और सदन के कामकाज का संचालन करता है। वह निर्णय करता है कि कोई विधेयकधन विधेयक है या नहीं। वह सदन का अनुशासन और मर्यादा बनाए रखता है और इसमें बाधा पहुँचाने वाले सांसदों को दंडित भी कर सकता है। वह विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव और संकल्पों, जैसे अविश्वास प्रस्तावस्थगन प्रस्तावसेंसर मोशन, को लाने की अनुमति देता है और अटेंशन नोटिस देता है। अध्यक्ष ही यह तय करता है कि सदन की बैठक में क्या एजेंडा लिया जाना है।

वेतन और भत्ते

कार्यकाल अवधि और पदमुक्तिसंपादित करें

अध्यक्ष का कार्यकाल लोकसभा विघटित होने तक होता है। कुछ स्थितियों में वह इससे पहले भी पदमुक्त हो सकता है-   इस सम्बन्ध में भारतीय संविधान का अनुच्छेद ९४ [ग] कहता है कि-वे लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित किये गए एक प्रस्ताव द्वारा अपने पद से हटाए जा सकते हैं .

लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर)संपादित करें

लोकसभा अपने निर्वाचित सदस्यों में से एक सदस्य को अपने अध्यक्ष (स्पीकर) के रूप में चुनती है, जिसे अध्यक्षकहा जाता है। कार्य संचालन में अध्यक्ष की सहायता उपाध्यक्ष द्वारा की जाती है, जिसका चुनाव भी लोक सभा के निर्वाचित सदस्य करते हैं। लोक सभा में कार्य संचालन का उत्तरदायित्व अध्यक्ष का होता है।
लोकसभा का अध्यक्ष होता है इसका चुनाव लोकसभा सदस्य अपने मध्य मे से करते है। लोकसभा अध्यक्ष के दो कार्य है-
1. लोकसभा की अध्यक्षता करना उस मे अनुसाशन गरिमा तथा प्रतिष्टा बनाये रखना इस कार्य हेतु वह किसी न्यायालय के सामने उत्तरदायी नही होता है
2. वह लोकसभा से संलग्न सचिवालय का प्रशासनिक अध्यक्ष होता है किंतु इस भूमिका के रूप मे वह न्यायालय के समक्ष उत्तरदायी होगा
स्पीकर की विशेष शक्तियाँ
1. दोनो सदनॉ का सम्मिलित सत्र बुलाने पर स्पीकर ही उसका अध्यक्ष होगा उसके अनुउपस्थित होने पर उपस्पीकर तथा उसके भी न होने पर राज्यसभा का उपसभापति अथवा सत्र द्वारा नांमाकित कोई भी सदस्य सत्र का अध्यक्ष होता है
2. धन बिल का निर्धारण स्पीकर करता है यदि धन बिल पे स्पीकर साक्ष्यांकित नही करता तो वह धन बिल ही नही माना जायेगा उसका निर्धारण अंतिम तथा बाध्यकारी होगा
3. सभी संसदीय समितियाँ उसकी अधीनता मे काम करती है उसके किसी समिति का सदस्य चुने जाने पर वह उसका पदेन अध्यक्ष होगा
4. लोकसभा के विघटन होने पर भी उसका प्रतिनिधित्व करने के लिये स्पीकर पद पर कार्य करता रहता है नवीन लोकसभा चुने जाने पर वह अपना पद छोड देता है.
     अब ऐसे में एक आम भारतीय यदि सुषमा जी के ट्वीट को लेकर उनका समर्थन करता है तो उसे उसके लिए संविधान को दरकिनार कर देना चाहिए जो कि इस देश का सर्वोच्च कानून है और जो ये कहता है कि आप लोकसभा का अध्यक्ष स्वयं चुनिए और यदि उसकी कार्यप्रणाली आपको सही प्रतीत नहीं होती है तो उसे हटा दीजिये ,उसके अनुचित बर्ताव को बर्दाश्त करने की ज़रुरत नहीं है .भारतीय संस्कृति में ''शठे शाठ्यम समाचरेत  ''की शिक्षा दी गयी है जो कि यह कहती है कि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार किया जाये और जब सुषमा जी को मीरा कुमार जी ६ मिनट में ६० बार केवल इसलिए टोकती हैं कि वे सत्ता पक्ष का काला पक्ष उजागर न कर पाएं तो सुषमा जी की ये जिम्मेदारी बनती थी कि तभी तुरंत कार्यवाही कर उन्हें उनके पद से हटवाएं किन्तु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया और देश को इतने बड़े संकट में फंसे रहने दिया .
     अब सुषमा जी ही हमें बताएं कि हम अब इस स्थिति में क्या कर सकते हैं क्योंकि अब तो उन्हें चुनना या न चुनना हमारे हाथ में है ही नहीं अब तो सब कुछ संविधान ने आपके और आप जैसे माननीयों के हाथ में दे रखा है और हमें आपकी ये ट्वीट्स बता रही हैं कि संविधान की मान्यता पर आप जैसे माननीयों द्वारा जो खतरा उत्पन्न किया जाता है उसके बचाव का कोई साधन हमें संविधान के पुनः संशोधन द्वारा ढूंढना ही होगा क्योंकि ऐसा अन्याय भारत की जनता तो बर्दाश्त नहीं करेगी. आप लोग राजनैतिक महत्वाकांक्षा को लेकर भले ही खून के घूँट पी लें पर हम इस देश को खून के घूँट नहीं पीने देंगे और आपकी तरह अन्याय को बर्दाश्त नहीं करेंगे जो कि आप संविधान द्वारा अधिकार मिलने के बावजूद मीरा कुमार जी को अधिकार दे बर्दाश्त करती रही क्योंकि कहा भी है -
''अन्याय को सहना भी अन्याय ही करना है .''

शालिनी कौशिक 
   [  कौशल ]

रविवार, 25 जून 2017

ईद मुबारक



मुबारकबाद सबको दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
महक इस मौके में भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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मुब्तला आज हर बंदा ,महफ़िल -ए -रंग ज़माने में ,
मिलनसारी यहाँ भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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मुक़द्दस दूज का महताब ,मुकम्मल हो गए रमजान ,
शमा हर रोशन अब कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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रहे मज़लूम न कोई ,न हो मज़रूह हमारे से ,
मरज़ हर दूर अब कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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ईद खुशियाँ मनाने को ,ख़ुदा का सबको है तौहफा ,
मिठास मुरौव्वत की भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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भुलाकर मज़हबी मुलम्मे ,मुहब्बत से गले मिल लें ,
मुस्तहक यारों का कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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फ़तह हो बस शराफत की ,तरक्की पाए बस नेकी ,
फरदा यूँ हरेक कर दूँ ,जुदा अंदाज़  हैं मेरे .
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फरहत बख्शे फरिश्तों को ,खुदा खुद ही यहाँ आकर ,
फलक इन नामों से भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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फ़िरासत से खुदा भर दे ,बधाई ''शालिनी ''जो दे ,
फिर उसमे फुलवारी भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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शब्दार्थ -मजलूम -अत्याचार से पीड़ित ,मजरूह-घायल ,मुरौव्वत-मानवता ,मुलम्मे-दिखावे ,मुस्तहक-अधिकारी ,फरदा -आने वाला  दिन ,फरहत-ख़ुशी ,फरिश्तों -सात्विक वृति वाला व्यक्ति। फ़िरासत -समझदारी।
एक बार फिर आप सभी को ईद मुबारक 
शालिनी कौशिक 
[कौशल ]



तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे .

अवसर दिया श्रीराम ने पुरुषों को हर कदम , अग्नि-परीक्षा नारी की तुम लेते रहोगे , करती रहेगी सीता सदा मर्यादा का पालन पर ठेकेदार मर्यादा...