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तलवार अपने हाथों से माया को सौंपिये.

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बेबाक बोलना हो बेबाक बोलिये, पर बोलने से पहले अल्फाज तोलिये. ..................................................... दावा-ए-सर कलम का करना है बहुत आसां, अब हारने पर अपने न कौल तोडिये. ....................................................... बारगाह में हो खडे बन सदर लेना तान, इन ताना-रीरी बातों की न मौज लीजिए. .......................................................... पाकीजा खयालात अगर जनता के लिये हैं, मांगने से पहले हक उनका दीजिए. ...................................................... सच्चाई दिखानी है माया को स्मृति, अपने कहे हुए से पीछे न लौटिये. ............................................... मुश्किल अगर हो काटना, अपने ही हाथों सिर, तलवार अपने हाथों से माया को सौंपिये. ............................................................. अब सर-कलम न मुद्दा रह गया स्मृति, सरकार की इज्जत की ना नीलामी बोलिये. ................................................................. ये "शालिनी" दे रही है, खुल तुमको चुनौती, कानून के मजाक की ना राह खोलिये. ........................................

कहे ये जिंदगी पैहम -न कोशिश ये कभी करना .

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 ................................................................. दुखाऊँ दिल किसी का मैं -न कोशिश ये कभी करना , बहाऊँ आंसूं उसके मैं -न कोशिश ये कभी करना.  .................................................................... नहीं ला सकते हो जब तुम किसी के जीवन में सुख चैन , करूँ महरूम फ़रहत से-न कोशिश ये कभी करना . ............................................................ चाहत जब किसी की तुम नहीं पूरी हो कर सकते , करो सब जो कहूं तुमसे-न कोशिश ये कभी करना . ................................................................ किसी के ख्वाबों को परवान नहीं हो तुम चढ़ा सकते , हक़ीकत इसको दिखलाऊँ-न कोशिश ये कभी करना . ............................................................ ज़िस्म में मुर्दे की जब तुम सांसे ला नहीं सकते , बनाऊं लाश जिंदा को-न कोशिश ये कभी करना . .......................................................... समझ लो '' शालिनी '' तुम ये कहे ये जिंदगी पैहम ,...

बसाने में एक बगिया ,कई जीवन लग जाते हैं .

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सरकशी बढ़ गयी देखो, बगावत को बढ़ जाते हैं , हवाओं में नफरतों के गुबार सिर चढ़ जाते हैं . ........................................................................... मुहब्बत मुरदार हो गयी,सियासी चालों में फंसकर , अब तो इंसान शतरंज की मोहरें नज़र आते हैं. .......................................................................... मुरौवत ने है मोड़ा मुंह ,करे अब क़त्ल मानव को , सियासत में उलझते आज इसके कदम जाते हैं . ........................................................................ हुई मशहूर ये नगरी ,आज जल्लाद के जैसे , मसनूई दिल्लगी से नेता, हमें फांसी चढाते हैं . .......................................................................... कभी महफूज़ थे इन्सां,यहाँ जिस सरपरस्ती में , सरकते आज उसके ही ,हमें पांव दिख जाते हैं . ............................................................................ सयानी आज की नस्लें ,नहीं मानें बुजुर्गों की , रहे जो साथ बचपन से ,वही दुश्मन बन जाते हैं . ............................................................................ जलाते फिर र...