रविवार, 21 जून 2015

बसाने में एक बगिया ,कई जीवन लग जाते हैं .


सरकशी बढ़ गयी देखो, बगावत को बढ़ जाते हैं ,
हवाओं में नफरतों के गुबार सिर चढ़ जाते हैं .
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मुहब्बत मुरदार हो गयी,सियासी चालों में फंसकर ,
अब तो इंसान शतरंज की मोहरें नज़र आते हैं.
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मुरौवत ने है मोड़ा मुंह ,करे अब क़त्ल मानव को ,
सियासत में उलझते आज इसके कदम जाते हैं .
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हुई मशहूर ये नगरी ,आज जल्लाद के जैसे ,
मसनूई दिल्लगी से नेता, हमें फांसी चढाते हैं .
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कभी महफूज़ थे इन्सां,यहाँ जिस सरपरस्ती में ,
सरकते आज उसके ही ,हमें पांव दिख जाते हैं .
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सयानी आज की नस्लें ,नहीं मानें बुजुर्गों की ,
रहे जो साथ बचपन से ,वही दुश्मन बन जाते हैं .
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जलाते फिर रहे ये आशियाँ ,अपने गुलिस्तां में ,
बसाने में एक बगिया ,कई जीवन लग जाते हैं .
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उभारी नफरतें बढ़कर ,सियासत ने जिन हाथों से ,
उन्हीं को सिर पर रखकर ,हमें हिम्मत बंधाते हैं .
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लगे थे जिस जुगत में ''शालिनी''के ये सभी दुश्मन ,
फतह अपने इरादों में ,हमारे दम पर पाते हैं .
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शब्दार्थ-मुरदार -मरा हुआ ,बेजान ,
मसनूई -बनावटी ,दिल्लगी-प्रेम ,सरकशी-उद्दंडता ,सरपरस्ती -सहायता .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]
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2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, नारी शक्ति - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Jitendra tayal ने कहा…

सुन्दर सृजन
वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह