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मार्च, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सुप्रीम कोर्ट से टक्कर लेती खाप पंचायतें

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                    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को खाप पंचायत को लेकर बड़ा फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने खाप पंचायतों को झटका देते हुए कहा कि शादी को लेकर खाप पंचायतों के फरमान गैरकानूनी हैं। अगर दो बालिग अपनी मर्जी से शादी कर रहे हैं तो कोई भी इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे यह भी कहा है कि जब तक केंद्र सरकार इस मसले पर कानून नहीं लाती तब तक यह आदेश प्रभावी रहेगा किन्तु लगता है खाप पंचायतें भी सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ कमर कसकर बैठी हैं ,             सुप्रीम कोर्ट के अनुसार दो बालिगों की अपनी मर्जी की शादी में किसी को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है किन्तु गठवाला खाप के बहावड़ी थांबेदार चौधरी बाबा श्याम सिंह का कहना है -''सगोत्रीय विवाह मंजूर नहीं होगा क्योंकि इससे संस्कृति को खतरा है अपने गोत्र को बचाकर कहीं भी शादी की जा सकती है ,''            सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया वह हिन्दू विवाह अधिनियम १९५५ की रौशनी में दिया जिसमे सगोत्रीय व् सप्रवर विबाह मान्य हैं किन्तु खाप जिस रौशनी में काम करती हैं वे प्राचीन हिन्दू धर्मशास्त्रों में रहा उनका वि

जीना है तो जल बचा -ओ ! इंसान

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बहुत पहले एक फिल्म आयी थी ,''रोटी ,कपड़ा और मकान '' तब हम बहुत छोटे  थे ,घरवालों व् आसपास वालों की बातों को फिल्म के बारे में सुनता तो लगता कि यही ज़िंदगी की सबसे बड़ी ज़रुरत हैं किन्तु जैसे जैसे बड़े हुए जीवन की सच्चाई सामने आने लगी और तब एहसास हुआ कि जीवन की सबसे बड़ी ज़रुरत ''पानी '' है ,एक बार को आदमी रोटी के बगैर रह लेगा [हमारे साधु -संत रहते ही हैं ] ,कपडे के बगैर रह लेगा [जैन धर्म के दिगंबर मतावलम्बी साधु व् हमारे नागा साधु कपडे के बगैर ही रहते हैं ], मकान के बगैर रह लेगा [फुटपाथ पर रहने वाले रहते ही हैं ],किन्तु ऐसा कोई उदाहरण नहीं जो पानी के बगैर रह सके ,कहने को बहुत से कहेंगे कि निर्जला एकादशी का व्रत रखने वाले व् मुस्लिम धर्म में रोज़ा रखने वाले पानी के बगैर ही रहते हैं किन्तु अगर हम गहराई में अवलोकन करें तो एक निश्चित समयावधि व् अनिश्चित समयावधि का अंतर यहाँ मायने रखता है और कोई भी अनिश्चित समयावधि तक पानी के बगैर नहीं रह सकता ,             अभी हाल ही में  विश्व जल दिवस  २२ मार्च को मनाया गया । इसका उद्देश्य विश्व के सभी विकसित देशों  में स्वच्छ ए

शामली अधिवक्ता अनैतिक धरना-प्रदर्शन की राह पर

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शामली के अधिवक्ता अनैतिक धरना-प्रदर्शन की राह पर चल पड़े हैं ,जहाँ कैराना में जिला न्यायाधीश की कोर्ट की स्थापना के लिए हाईकोर्ट व् सरकार के कदम बढ़ते हैं तभी शामली के अधिवक्ता अपना काम-काज ठप्प कर धरना प्रदर्शन करने बैठ जाते हैं ,            2011 में प्रदेश सरकार ने शामली को जिला बनाया किन्तु वहां एक  तो स्थान का अभाव है दूसरे वहां अभी तक केवल तहसील स्तर तक के ही न्यायालय काम कर रहे हैं ऐसे में वहां जनपद न्यायालय की कोर्ट की स्थापना से पहले की सारी कोर्ट्स की स्थापना ज़रूरी है  जिसमे अभी लगभग 8 से 10 साल लगने संभव हैं दूसरी और शामली जिले की ही  तहसील कैराना में एडीजे कोर्ट तक के न्यायालय स्थापित हैं और वहां कई ऐसे भवन भी हैं जहाँ जनपद न्यायाधीश आनन्-फानन में बैठ सकते है ,          इतनी अच्छी व्यवस्था अपने जनपद में ही होते हुए भी जब तक शामली जिले का जनपद न्यायाधीश का कार्य मुज़फ्फरनगर से चलता रहता है तब तक शामली के अधिवक्ताओं के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती और जैसे  कैराना में जनपद न्यायाधीश के बैठने की बात सामने आती है वे मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं ,केवल इसलिए कि उन्हें मुज़फ्फर

उड़ती खुशखबरी -जनपद न्यायाधीश कैराना बैठेंगे

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जिला न्यायालय के लिए शामली के अधिवक्ताओं ने पहले भी  इस सत्य को परे रखकर  न्यायालय के कार्य  को ठप्प किया और अब भी जब से कैराना में जनपद न्यायाधीश के बैठने की सम्भावना बनी है तबसे फिर उनके द्वारा काम ठप्प किये जाने ,आंदोलन किये जाने की धमकियाँ दी जा रही हैं  जबकि सभी के साथ शामली इस प्रयोजन हेतु कितना उपयुक्त है वे स्वयं जानते हैं.               शामली  28 सितम्बर २०११ को मुज़फ्फरनगर से अलग करके   एक जिले के रूप में स्थापित किया गया .जिला बनने से पूर्व   शामली तहसील रहा है और यहाँ तहसील सम्बन्धी कार्य ही निबटाये जाते रहे हैं. न्यायिक कार्य दीवानी ,फौजदारी आदि के मामले शामली से कैराना और मुज़फ्फरनगर जाते रहे हैं .     आज कैराना न्यायिक  व्यवस्था  के मामले में उत्तरप्रदेश में एक सुदृढ़ स्थिति रखता है     कैराना में न्यायिक व्यवस्था की पृष्ठभूमि के बारे में बार एसोसिएशन कैराना के पूर्व अध्यक्ष ''श्री कौशल प्रसाद एडवोकेट ''जी ने बताया था -                                      '' सन १८५७ में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रथम  स्वतंत्रता संग्राम के द्वारा  ऐति

प्रकृति से पवित्र है नारी

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                राजनीति का सुनहरा आकाश हो या बिजनेस का चमकीला गगन ,अंतरिक्ष का वैज्ञानिक सफर हो या खेत -खलिहान का हरा-भरा आँगन ,हर जगह आज की नारी अपनी चमक बिखेर रही है ,अपनी सफलता का परचम लहरा रही है .आज घर की दहलीज को पार कर बाहर निकल अपनी काबिलियत का लोहा मनवाने वाली महिलाओं की संख्या में दिन-दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है .पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ती हुई महिलाएं आज हर क्षेत्र में घुसपैठ कर चुकी हैं और यह घुसपैठ मात्र पाला छूने भर की घुसपैठ नहीं है वरन कब्ज़ा ज़माने की मजबूत दावेदारी है और इसीलिए पुरुषों की तिलमिलाहट स्वाभाविक है .सदियों से जिस स्थान पर पुरुष जमे हुए थे और नारी को अपने पैरों तले रखने की कालजयी महत्वाकांक्षा पाले हुए थे आज वहां की धरती खिसक चुकी है . भारत एक धर्म-प्रधान देश है और यहाँ हिन्दू-धर्मावलम्बी बहुतायत में हैं .धर्म यहाँ लोगों की जीवन शैली पर सर्वप्रमुख रूप में राज करता है और धर्म के ठेकेदारों ने यहाँ पुरुष वर्चस्व को कायम रखते हुए धर्म के संरक्षक ,पालनकर्ता आदि  प्रमुख पदों पर पुरुषों को ही रखा और पुरुषों की सोच को ही महत्व दिया .यहाँ नारी को अप

श्रीदेवी तिरंगे की हक़दार

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 श्रीदेवी एक ऐसी अदाकारा ,जो सभी की चहेती थी ,सभी के दिलों में निवास करती थी ,अचानक इस दुनिया से सब कुछ छोड़ सभी की तरह हमें अकेले छोड़ गयी ,नहीं बर्दाश्त हुआ सभी को उनका जाना ,आज भले ही वे फ़िल्मी दुनिया से दूर थी किन्तु इस दुनिया में हैं ,ये सभी के लिए तसल्ली की बात थी कोई नहीं चाहता था कि वे इस दुनिया से जाएँ किन्तु जो सृष्टि का नियम है सभी पर लागू होता है श्रीदेवी पर भी हुआ और वे चली गयी नहीं बर्दाश्त हुआ उनका जाना और वह भी तिरंगे में ,वह भी एक महिला ,वह भी एक अदाकारा तरह तरह की बातें बनायीं गयी व्हाट्सप्प पर मेसेज साझा किये गए फेसबुक पर आपत्तियां दर्ज की गयी  कि तुषार ने लिखा, ''श्रीदेवी के शव को तिरंगे में क्यों लपेटा गया है? क्या उन्होंने देश के लिए बलिदान दिया है?'' ''क्या किसी फ़िल्मी सितारे के निधन की तुलना सरहद पर मारे जाने वाले सैनिक से की जा सकती है? क्या बॉलीवुड में काम करना देश की सेवा करने के बराबर है?'' तहसीन पूनावाला ने लिखा, ''श्रीदेवी का पूरा सम्मान है लेकिन क्या उनके शव को तिरंगे में लपेटा गया है? अगर हां, तो क्या उन्हे