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मई, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हस्ती ....... जिसके कदम पर ज़माना पड़ा.

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कुर्सियां,मेज और मोटर साइकिल      नजर आती हैं हर तरफ और चलती फिरती जिंदगी      मात्र भागती हुई      जमानत के लिए      निषेधाज्ञा के लिए       तारीख के लिए       मतलब हक के लिए! ये आता यहां जिंदगी का सफर, है मंदिर ये कहता न्याय का हर कोई, मगर नारी कदमों को देख यहां लगाता है लांछन बढ हर कोई.    है वर्जित मोहतरमा     मस्जिदों में सुना ,    मगर मंदिरों ने    न रोकी है नारी कभी। वजह क्या है   सिमटी है सोच यहाँ ? भला आके इसमें  क्यूँ पापन हुई ? क्या जीना न उसका ज़रूरी यहाँ ?  क्या अपने हकों को बचाना , क्या खुद से लूटा हुआ छीनना , क्या नारी के मन की न इच्छा यहाँ ? मिले जो भी नारी को हक़ हैं यहाँ   ये उसकी ही हिम्मत    उसी की बदौलत ! वो रखेगी कायम भी सत्ता यहाँ    खुद अपनी ही हिम्मत     खुदी की बदौलत ! बुरा उसको कहने की हिम्मत करें कहें चाहें कुलटा ,गिरी हुई यहाँ पलटकर जहाँ को वो मथ देगी ऐसे समुंद्रों का मंथन हो जैसे रहा ! बहुत छीना उसका      न अब छू सकोगे , है उसका ही साया     जहाँ से बड़ा। वो सबको दिखा देगी      अपनी वो हस्ती , है जिसके कदम पर      

तुम केवल वकील हो समझे ....

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''जातियां ही चुनावी घडी हो गयी ,  उलझनें इसलिए खड़ी हो गयी ,  प्रजातंत्र ने दिया है ये सिला  कुर्सियां इस देश से भी बड़ी हो गयी .''        केवल शेर नहीं है ये ,सच्चाई है जिसे हम अपने निजी जीवन में लगभग रोज ही अनुभव करते हैं.मेरठ बार एसोसिएशन के कल हुए चुनाव का समाचार देते हुए दैनिक जनवाणी लिखता है -''कि चुनाव में सभी बिरादरियों के प्रमुख नेता अपने अपने प्रत्याशियों के लिए वोट मांग रहे थे .'' समाचार पढ़ते ही दिल-दिमाग घूमकर रह गए कि आखिर कब तक हम इन जातियों बिरादरियों में उलझे रहेंगे ? धर्म के नाम पर अंग्रेज हमारा बंटवारा कर गए पर हम नहीं सुधरे ,और आज भी ये स्थिति है कि हम कभी सुधरेंगे ये हम कभी कह ही नहीं सकते .     स्वयं अधिवक्ता होने के नाते जानती हूँ कि मुवक्किल भी अपनी जाति के ही वकील पर जाते हैं और अगर उन्हें अपनी जाति  का कोई वकील न मिले तो वे अपने गांव का वकील ढूंढते हैं ,जबकि ये सभी जानते हैं कि अधिकांशतया बुरा करने वाला भी अपनी जाति का ही होता है पर क्या किया जा सकता है ,अनपढ़ -गंवार लोगों की बात तो एक तरफ छोड़ी जा सकती है किन्तु वकील जो कहने

संभल जा रे नारी ....

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''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपना नाम बताया ,अच्छा लगा ,कई वर्षों बाद अपनी सहपाठी से बात कर  रही हूँ ,पर आश्चर्य हुआ कि आखिर उसे मेरा नंबर कैसे मिला ,क्योंकि आज जो फोन नंबर की स्थिति है यह अबसे २० साल पहले नहीं थी ,२० साल पहले चिट्ठी से बात होती थी ,पत्र भेजे जाते थे किन्तु आज जिससे बात करनी है फ़ौरन नंबर दबाया और उससे कर ली बात ,खैर मैंने उससे पुछा ,''तुझे मेरा नंबर कैसे मिला ,तो उसने एकदम बताया कि लिया है किसी से ,बहुत परेशानी में हूँ ,क्या हुआ ,मेरे यह पूछते ही वह पहले रोने लगी और फिर उसने बतायी अपनी आपबीती ,जो न केवल उसकी बल्कि आज की ६०%महिलाओं की आपबीती है और महिलाएं उसे सह रही हैं और सब कुछ सहकर भी अपनी मुसीबतों के जिम्मेदार को बख्श रही हैं .                   मेरी सहपाठी के अनुसार शादी को २० वर्ष हो गए और उसका पति अब उसका व् बच्चों का कुछ नहीं करता और साथ ही यह भी कहता है कि यदि मेरे खिलाफ कुछ करोगी तो कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि अगर तुमने मुझे जेल भी भिजवाने की क

....मरे जो शादियां करके .

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दर्द गृहस्थी का ,बह रहा आँखों से छलके , ये उसके पल्लू बाँधा है ,उसी के अपनों ने बढ़के . ................................................................ पिता के आदेशों को मान ,चली थी संग जिसके वो. उसी ने सड़कों पर डाला ,उसे बच्चे पैदा करके. ................................................................ वफ़ादारी निभाई थी ,रात -दिन फाका करती थी , बदचलन कहता फिरता है ,बगल में दूसरी धरके . ........................................................... वो अपने बच्चों की रोटी,कमाकर खुद ही लाती है , उसे भी लूट लेता है ,उसी के हाथों से झटके. ......................................................... अगर अंजाम शादी का ,ऐसा ही भयानक है, कुंवारी ही जिए लड़की ,कुंवारी ही बचे मरके. ........................................................... दिखी है ''शालिनी''को अब ,दुनिया में बर्बादी है , कोई पागल ही होगा अब ,मरे जो शादियां करके . ............................................................... शालिनी कौशिक     [कौशल]

.... गर रख लो जायदाद.

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दो पल सुकून के नहीं ,गर रख लो जायदाद , पलकें झपक न पाओगे ,गर रख लो जायदाद , चुभती हैं अपने हाथों पर अपनी ही रोटियां खाना भी खा न पाओगे ,गर रख लो जायदाद . ................................................................. क्या करती बड़े घर का तू ,इंसान बेऔलाद , रहने को घर न चाहिए ,गर रख लो जायदाद . .............................................................. मुझको भी रख ले साथ में,चाहत है सभी की, अकेले रह न पायेगी ,गर रख लो जायदाद . ................................................................ ज़ालिम तू इस ज़माने से ,क्यों नहीं डर रही , डर-डर के जी सके है तू ,गर रख लो जायदाद . ............................................................. मकान हो,दुकान हो ,हैं और किसी की, अकेले हो ज़माने में ,गर रख लो जायदाद. ............................................................... पहचान ले ज़माने की ,असलियत ''शालिनी '', फुकती ही रहेगी सदा ,गर रख लो जायदाद . ...शालिनी कौशिक [कौशल ]

कांधला से कैराना -हाय रे बच्चों वाली औरतें

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   कांधला से कैराना और पानीपत ,एक ऐसी बस यात्रा जिसे भुला पाना शायद भारत के सबसे बड़े घुमक्कड़ व् यात्रा वृतांत लिखने वाले राहुल सांकृत्यायन जी के लिए भी संभव नहीं होता यदि वे इधर की कभी एक बार भी यात्रा करते .        कोई भी बात या तो किसी अच्छे अनुभव के लिए याद की जाती है या किसी बुरे अनुभव के लिए ,लेकिन ये यात्रा एक ऐसी यात्रा है जिसे याद किया जायेगा एकमात्र इसलिए कि इसमें महिलाओं की और वह भी ऐसी महिलाओं की बहुतायत है जिसके पास देश की जनसँख्या को बढ़ाने वाले बच्चे बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध हैं और सारा देश भले ही नारी सशक्तिकरण के लिए तरस रहा हो किन्तु इस सफर में नारी की सशक्तता देखते ही बनती है और पुरुष सशक्त होने के लिए तड़पता दिखाई देता है .        कांधला से कैराना जाने वालों में एक बड़ी संख्या उस वर्ग की है जिन्हें कैराना पहुंचकर डग्गामार की सवारी द्वारा पानीपत जाना होता है ,डग्गामार वे वाहन हैं जो वैन या जीप में सीट से अधिक ही क्या बहुत अधिक संख्या में यात्रियों को बैठाकर या कहूं ठूसकर पानीपत ले जाते हैं और ठीक यही स्थिति कांधला से कैराना यात्रामार्ग की है जिसमे लगभग एक सीट

मेरी माँ

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वो चेहरा जो         शक्ति था मेरी , वो आवाज़ जो       थी भरती ऊर्जा मुझमें , वो ऊँगली जो      बढ़ी थी थाम आगे मैं , वो कदम जो     साथ रहते थे हरदम, वो आँखें जो    दिखाती रोशनी मुझको , वो चेहरा    ख़ुशी में मेरी हँसता था , वो चेहरा    दुखों में मेरे रोता था , वो आवाज़    सही बातें  ही बतलाती , वो आवाज़    गलत करने पर धमकाती , वो ऊँगली    बढाती कर्तव्य-पथ पर , वो ऊँगली   भटकने से थी बचाती , वो कदम    निष्कंटक राह बनाते , वो कदम    साथ मेरे बढ़ते जाते , वो आँखें    सदा थी नेह बरसाती , वो आँखें    सदा हित ही मेरा चाहती , मेरे जीवन के हर पहलू    संवारें जिसने बढ़ चढ़कर , चुनौती झेलने का गुर      सिखाया उससे खुद लड़कर , संभलना जीवन में हरदम      उन्होंने मुझको सिखलाया , सभी के काम तुम आना     मदद कर खुद था दिखलाया , वो मेरे सुख थे जो सारे    सभी से नाता गया है छूट , वो मेरी बगिया की माली    जननी गयी हैं मुझसे रूठ , गुणों की खान माँ को मैं     भला कैसे दूं श्रद्धांजली , ह्रदय की वेदना में बंध     कलम आगे न अब चली .            शालिनी कौशिक                 [कौशल ]

क्या योगी सरकार को कैराना से प्यार है?

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     योगी सरकार का प्रदेश में सत्तारूढ होना प्रदेश के लिए लगभग सभी मायनों में प्रदेश के लिए लाभकारी दिखाई दे रहा है. योगी सरकार ने अपनी छठी कैबिनेट बैठक में लिये गये इन फैसलों से कैराना के अधिवक्ताओं में पुन:उममीद की किरण जगा दी वे फैसलै हैं - -फैजाबाद व अयोध्या को मिलाकर अयोध्या नगर निगम बनाया जाएगा। - बैठक में मथुरा-वृंदावन नगर निगम बनाने को भी दी मंजूरी। अब योगी सरकार से मेरा निवेदन जिस मांग को लेकर है वह यह है शामली 28 सितम्बर २०११ को मुज़फ्फरनगर से अलग करके एक जिले के रूप में स्थापित किया गया .जिला बनने से पूर्व शामली तहसील रहा है और यहाँ तहसील सम्बन्धी कार्य ही निबटाये जाते रहे हैं. न्यायिक कार्य दीवानी ,फौजदारी आदि के मामले शामली से कैराना और मुज़फ्फरनगर जाते रहे हैं और जिला बनने से लेकर आज तक शामली तरस रहा है एक जिले की तरह की स्थिति पाने के लिए क्योंकि सरकार द्वारा अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए जिलों की स्थापना की घोषणा तो कर दी जाती है किन्तु सही वस्तुस्थिति जो क़ि एक जिले के लिए चाहिए उसके बारे में उसे न तो कोई जानकारी चाहिए न उसके लिए कोई प्रयास ही सरकार द्वारा क