सोमवार, 22 मई 2017

संभल जा रे नारी ....

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''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपना नाम बताया ,अच्छा लगा ,कई वर्षों बाद अपनी सहपाठी से बात कर  रही हूँ ,पर आश्चर्य हुआ कि आखिर उसे मेरा नंबर कैसे मिला ,क्योंकि आज जो फोन नंबर की स्थिति है यह अबसे २० साल पहले नहीं थी ,२० साल पहले चिट्ठी से बात होती थी ,पत्र भेजे जाते थे किन्तु आज जिससे बात करनी है फ़ौरन नंबर दबाया और उससे कर ली बात ,खैर मैंने उससे पुछा ,''तुझे मेरा नंबर कैसे मिला ,तो उसने एकदम बताया कि लिया है किसी से ,बहुत परेशानी में हूँ ,क्या हुआ ,मेरे यह पूछते ही वह पहले रोने लगी और फिर उसने बतायी अपनी आपबीती ,जो न केवल उसकी बल्कि आज की ६०%महिलाओं की आपबीती है और महिलाएं उसे सह रही हैं और सब कुछ सहकर भी अपनी मुसीबतों के जिम्मेदार को बख्श रही हैं .
           
      मेरी सहपाठी के अनुसार शादी को २० वर्ष हो गए और उसका पति अब उसका व् बच्चों का कुछ नहीं करता और साथ ही यह भी कहता है कि यदि मेरे खिलाफ कुछ करोगी तो कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि अगर तुमने मुझे जेल भी भिजवाने की कोशिश की तो देख लेना मैं अगले दिन ही घर आ जाऊंगा .ऐसे में एक अधिवक्ता होने के नाते जो उपाय उसके पति का दिमाग ठीक करने के लिए मैं बता सकती थी मैंने बताये पर देखो इस भारतीय नारी का अपने पति के लिए और वो भी ऐसे पति के लिए जो पति होने का कोई फ़र्ज़ निभाने को तैयार नहीं ,उसने वह उपाय मानने से इंकार कर दिया क्योंकि उसे केवल पति से भरण-पोषण चाहिए था और उसके लिए वह कोर्ट के धक्के खाने को भी तैयार नहीं थी ,नहीं जानती जिसे कि जो पति इस स्थिति में तुझे घर से निकल सकता है, अपने बच्चों को घर से बाहर धकिया सकता है ,२० साल साथ रहने पर भी तेरे चरित्र पर ऊँगली उठा सकता है ,सरकारी नौकर नहीं है ,ज़मीन जायदाद वाला नहीं है ,कोर्ट ने भरण पोषण का खर्चा उस पर डाल भी दिया तो वह क्या देगा ? उसके लिए तुझे फिर भरण-पोषण के खर्चे के निष्पादन के लिए फिर कोर्ट जाना पड़ेगा और जिसे जेल जाने से बचाने का तू प्रयास कर रही है उसे उसके कर्मो के हिसाब से फिर जेल जाने का ही कदम उठाने का प्रयास करना पड़ेगा ,क्योंकि वह अगर उसे भरण-पोषण देने के ही मूड में होता तो २० साल की शादी को ऐसे नहीं तोड़ता ,अपनी जिम्मेदारी से ऐसे पल्ला नहीं झाड़ता ,और रही कोर्ट की बात तो ३-४ साल तो हे भारतीय नारी इस पर अमल भूल जा क्योंकि भारत के न्यायालय की कार्यवाही बहुत सुस्त है ,ऐसे में वह कुछ जवाब न देते हुए सोचने को मजबूर हो गयी .
 
  ये है भारतीय नारी जो आदमी के ज़ुल्म सह-सहकर भी उसके भले की ही सोचती रहती है .अगर ऐसे में मैं एक और माननीय भारतीय नारी की बात करूँ तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि इसकी तो नस्ल ही ऐसी है ,जिसे अपनी दो-दो लड़कियों को ले ससुराल से माँ के घर इसलिए आना पड़ गया कि पति नालायक व् नाकारा था और स्वयं की सारी कोशिशों से उन बच्चियों का पालन-पोषण करना पड़ा वह भी अपने पति के आगे अपने घुटने टेकने से स्वयं को नहीं रोक सकी  और उसके दबाव में आकर एक और संतान को जन्म दे दिया जबकि उसकी सारी कॉलोनी उसके साथ थी ,जिस बाप ने बच्चियों के पालन -पोषण में कोई योगदान न दिया , अपनी ज़मीन जायदाद भी उठाकर बेटा होते हुए भतीजे को दे दी ,बेटी के ब्याह में भी न आया उस तक को उन बच्चों की माँ ने बख्श दिया .कैसे सुधर सकता है ये समाज ? और कैसे कहा जा सकता है इस नारी को नारीशक्ति ,जो अन्यायी को अन्याय का प्रतिकार अपने आंसुओं के रूप में दे ,अपने बच्चों को निराश्रितता के रूप में दे .
   
नारी शक्ति है ,वह संसार की सभी शक्तियों से लड़कर अपना एक मुकाम बना सकती है ,वह अपने बच्चों को अपने दम पर इस जगत में खड़ा कर सकती है ,वह आतताई शक्तियों को ठेंगा दिखा सकती है ,उनका मुंह तोड़ सकती है और उसने यह सब किया भी है ,ऐसे में इस एक भावनात्मक रिश्ते की डोर नारी को कब तक कमजोर बनाती रहेगी ? उसे इस रिश्ते की डोर से स्वयं को ऐसी परिस्थितियों में आज़ाद करना ही होगा और जैसे को तैसा की प्रवर्ति अपनाते हुए अपने व् अपने से जुड़े हर शख्स ,चाहे वह नारी की माता -पिता व् संतान कोई भी क्यों 'न हो ,को मजबूती का स्तम्भ बनकर दिखाना ही होगा तभी वह यह कहती हुई शोभायमान होगी -

  ''अभी तक सो रहे हैं जो ,उन्हें आवाज़ तो दे दूँ ,
    बिलखते बादलों को मैं कड़कती गाज तो दे दूँ .
    जनम भर जो गए जोते,जनम भर जो गए पीसे
    उन्हें मैं तख़्त तो दे दूँ ,उन्हें मैं ताज़ तो दे दूँ ''

शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

रविवार, 21 मई 2017

....मरे जो शादियां करके .


दर्द गृहस्थी का ,बह रहा आँखों से छलके ,
ये उसके पल्लू बाँधा है ,उसी के अपनों ने बढ़के .
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पिता के आदेशों को मान ,चली थी संग जिसके वो.
उसी ने सड़कों पर डाला ,उसे बच्चे पैदा करके.
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वफ़ादारी निभाई थी ,रात -दिन फाका करती थी ,
बदचलन कहता फिरता है ,बगल में दूसरी धरके .
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वो अपने बच्चों की रोटी,कमाकर खुद ही लाती है ,
उसे भी लूट लेता है ,उसी के हाथों से झटके.
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अगर अंजाम शादी का ,ऐसा ही भयानक है,
कुंवारी ही जिए लड़की ,कुंवारी ही बचे मरके.
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दिखी है ''शालिनी''को अब ,दुनिया में बर्बादी है ,
कोई पागल ही होगा अब ,मरे जो शादियां करके .
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शालिनी कौशिक
    [कौशल]

शुक्रवार, 19 मई 2017

.... गर रख लो जायदाद.

दो पल सुकून के नहीं ,गर रख लो जायदाद ,
पलकें झपक न पाओगे ,गर रख लो जायदाद ,
चुभती हैं अपने हाथों पर अपनी ही रोटियां
खाना भी खा न पाओगे ,गर रख लो जायदाद .
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क्या करती बड़े घर का तू ,इंसान बेऔलाद ,
रहने को घर न चाहिए ,गर रख लो जायदाद .
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मुझको भी रख ले साथ में,चाहत है सभी की,
अकेले रह न पायेगी ,गर रख लो जायदाद .
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ज़ालिम तू इस ज़माने से ,क्यों नहीं डर रही ,
डर-डर के जी सके है तू ,गर रख लो जायदाद .
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मकान हो,दुकान हो ,हैं और किसी की,
अकेले हो ज़माने में ,गर रख लो जायदाद.
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पहचान ले ज़माने की ,असलियत ''शालिनी '',
फुकती ही रहेगी सदा ,गर रख लो जायदाद .

...शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बुधवार, 17 मई 2017

कांधला से कैराना -हाय रे बच्चों वाली औरतें





   कांधला से कैराना और पानीपत ,एक ऐसी बस यात्रा जिसे भुला पाना शायद भारत के सबसे बड़े घुमक्कड़ व् यात्रा वृतांत लिखने वाले राहुल सांकृत्यायन जी के लिए भी संभव नहीं होता यदि वे इधर की कभी एक बार भी यात्रा करते .
       कोई भी बात या तो किसी अच्छे अनुभव के लिए याद की जाती है या किसी बुरे अनुभव के लिए ,लेकिन ये यात्रा एक ऐसी यात्रा है जिसे याद किया जायेगा एकमात्र इसलिए कि इसमें महिलाओं की और वह भी ऐसी महिलाओं की बहुतायत है जिसके पास देश की जनसँख्या को बढ़ाने वाले बच्चे बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध हैं और सारा देश भले ही नारी सशक्तिकरण के लिए तरस रहा हो किन्तु इस सफर में नारी की सशक्तता देखते ही बनती है और पुरुष सशक्त होने के लिए तड़पता दिखाई देता है .
       कांधला से कैराना जाने वालों में एक बड़ी संख्या उस वर्ग की है जिन्हें कैराना पहुंचकर डग्गामार की सवारी द्वारा पानीपत जाना होता है ,डग्गामार वे वाहन हैं जो वैन या जीप में सीट से अधिक ही क्या बहुत अधिक संख्या में यात्रियों को बैठाकर या कहूं ठूसकर पानीपत ले जाते हैं और ठीक यही स्थिति कांधला से कैराना यात्रामार्ग की है जिसमे लगभग एक सीट के हिसाब से चार या पांच लोग भर लिए जाते हैं और उन्हें जैसे तैसे कैराना पहुंचना होता है और कैराना पहुंचकर डग्गामार की सवारी द्वारा पानीपत जाना होता है और यही एक सबसे दुखद परिस्थिति है जिसमे कैराना आना कांधले के सामान्य जन के लिए ,अधिवक्ताओं के लिए ,वादकारियों के लिए जी का जंजाल बन जाता है . बस में बच्चे लिए हुए लगभग १०-१२ महिलाएं उसमे रोज चढ़ेंगी और वे चाहे कांधला से कैराना तक पड़ने वाले किसी भी अड्डे चाहे गढ़ी कौर, चाहे असदपुर जिद्दाना ,चाहे आल्दी या चाहे ऊँचा गांव हो ,बस में पहले से सीट ग्रहण किये आदमी से खड़े होने की इच्छा लिए ही बस में चढ़ती हैं और बस में चढ़ते ही यही कहती नज़र आने लगती हैं कि ''हमारे आदमी तो बस में कोई भी औरत चढ़े उसके लिए फ़ौरन सीट छोड़ देते हैं .''
       ऐसा नहीं है कि आदमी इतना सीधा-सादा है कि औरत के लिए एकदम सीट छोड़ दे लेकिन क्या करें आदमियों को उनकी ही जात-बिरादरी के अन्य लोग जिन्हे इन अबलाओं के कारण सीट नहीं मिली वे दया-धर्म के नाम पर अपनी सीट छोड़ने को मजबूर कर देते हैं और तब ये बेचारी अबला उस सीट पर आसानी से विराजमान हो जाती हैं उस आदमी के अपने से उम्र में बहुत बड़ा होने पर या बीमार कमजोर होने पर भी उसके द्वारा सीट छोड़ने पर कोई दुःख भी जताना इन सशक्त होने की चाह रखने वाली या कहूं देश में समानता के अधिकार की चाह रखने वाली यहाँ असमानता की सोच को अपने पर हावी नहीं होने देती .ऐसे में कभी कभी तो ऐसी स्थिति भी देखी जाती है कि बेचारा आदमी ये सोचकर कि अब ये औरतें उतर गयी हैं जैसे ही सीट पर बैठता है तभी पता नहीं कहाँ से एक अन्य और अबला वहां प्रकट हो जाती है और उस बेचारे की बैठने की इच्छा सारे रास्ते मन ही मन में धरी रह जाती है .
         अब ऐसे में बेचारे आदमियों का क्या किया जाये जिन्हे इस देश में समानता के अधिकार की बात कह-कहकर बार-बार हाशिये पर धकेल दिया जाता है .अब या तो प्रशासन यहाँ ज्यादा बसें चलवायें ,पर उससे भी पूरा फायदा इस क्षेत्र को होने वाला नहीं है क्योंकि तब भी जितना आवागमन इस रुट पर है उसे देखते हुए ये बसें कम रह जाएँगी ऐसे में अच्छा ये है कि बच्चों वाली औरतों के लिए अलग बसों का इंतज़ाम किया जाये जिससे किसी को किसी के लिए सीट छोड़ने की आवश्यकता ही नहीं पड़े ,या फिर आदमियों के लिए अलग बसों का इंतज़ाम किया जाये .
      अब कहने को तो सब कुछ आदमियों के हाथ में है किन्तु ये रुट ऐसा है जहाँ लगाम औरतों के हाथ में नज़र आती है और आदमी बेचारा नज़र आता है .बसों के ऐसे हाल देखते हुए बेचारे आदमियों का अनुभव हमें तो बस ऐसा ही नज़र आता है -
''बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले ,
 बहुत निकले मेरे अरमान ,लेकिन फिर भी कम निकले .''

शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

शनिवार, 13 मई 2017

मेरी माँ


वो चेहरा जो
        शक्ति था मेरी ,
वो आवाज़ जो
      थी भरती ऊर्जा मुझमें ,
वो ऊँगली जो
     बढ़ी थी थाम आगे मैं ,

वो कदम जो
    साथ रहते थे हरदम,
वो आँखें जो
   दिखाती रोशनी मुझको ,
वो चेहरा
   ख़ुशी में मेरी हँसता था ,
वो चेहरा
   दुखों में मेरे रोता था ,
वो आवाज़
   सही बातें  ही बतलाती ,
वो आवाज़
   गलत करने पर धमकाती ,

वो ऊँगली
   बढाती कर्तव्य-पथ पर ,
वो ऊँगली
  भटकने से थी बचाती ,
वो कदम
   निष्कंटक राह बनाते ,
वो कदम
   साथ मेरे बढ़ते जाते ,
वो आँखें
   सदा थी नेह बरसाती ,
वो आँखें
   सदा हित ही मेरा चाहती ,
मेरे जीवन के हर पहलू
   संवारें जिसने बढ़ चढ़कर ,
चुनौती झेलने का गुर
     सिखाया उससे खुद लड़कर ,
संभलना जीवन में हरदम
     उन्होंने मुझको सिखलाया ,
सभी के काम तुम आना
    मदद कर खुद था दिखलाया ,

वो मेरे सुख थे जो सारे
   सभी से नाता गया है छूट ,
वो मेरी बगिया की माली
   जननी गयी हैं मुझसे रूठ ,
गुणों की खान माँ को मैं
    भला कैसे दूं श्रद्धांजली ,
ह्रदय की वेदना में बंध
    कलम आगे न अब चली .
           शालिनी कौशिक
                [कौशल ]

बुधवार, 10 मई 2017

क्या योगी सरकार को कैराना से प्यार है?

 
   योगी सरकार का प्रदेश में सत्तारूढ होना प्रदेश के लिए लगभग सभी मायनों में प्रदेश के लिए लाभकारी दिखाई दे रहा है. योगी सरकार ने अपनी छठी कैबिनेट बैठक में लिये गये इन फैसलों से कैराना के अधिवक्ताओं में पुन:उममीद की किरण जगा दी वे फैसलै हैं -

-फैजाबाद व अयोध्या को मिलाकर अयोध्या नगर निगम बनाया जाएगा।

- बैठक में मथुरा-वृंदावन नगर निगम बनाने को भी दी मंजूरी।

अब योगी सरकार से मेरा निवेदन जिस मांग को लेकर है वह यह है

शामली 28 सितम्बर २०११ को मुज़फ्फरनगर से अलग करके एक जिले के रूप में स्थापित किया गया .जिला बनने से पूर्व शामली तहसील रहा है और यहाँ तहसील सम्बन्धी कार्य ही निबटाये जाते रहे हैं. न्यायिक कार्य दीवानी ,फौजदारी आदि के मामले शामली से कैराना और मुज़फ्फरनगर जाते रहे हैं और जिला बनने से लेकर आज तक शामली तरस रहा है एक जिले की तरह की स्थिति पाने के लिए क्योंकि सरकार द्वारा अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए जिलों की स्थापना की घोषणा तो कर दी जाती है किन्तु सही वस्तुस्थिति जो क़ि एक जिले के लिए चाहिए उसके बारे में उसे न तो कोई जानकारी चाहिए न उसके लिए कोई प्रयास ही सरकार द्वारा किया जाता है .पूर्व में उत्तर प्रदेश सरकार ऐसा बड़ौत क्षेत्र के साथ भी कर चुकी है जिले की सारी आवश्यक योग्यता रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बागपत को जिला बना दिया गया . आज शामली जो क़ि न्यायिक व्यवस्था में बिलकुल पिछड़ा हुआ है उसके न्यायालयों को जिले के न्यायालय का दर्जा  देने की कोशिश की जा रही है उसके लिए शामली के अधिवक्ता भवन स्थापना के लिए शामली में अस्थायी भवनों की तलाश करते रहे हैं और कैराना जो क़ि इस संबंध में बहुत अग्रणी स्थान  उसे महत्वपूर्ण दर्जा से दूर रखा जा रहा है जबकि शामली वह जगह है जहाँ आज तक सिविल जज जूनियर डिवीज़न तक की कोर्ट नहीं है और कैराना के बारे में आप जान सकते हैं क़ि वहां न्यायिक व्यस्था अपने सम्पूर्ण स्वरुप में है -

''आज कैराना न्यायिक व्यवस्था के मामले में उत्तरप्रदेश में एक सुदृढ़ स्थिति रखता है कैराना में न्यायिक व्यवस्था की पृष्ठभूमि के बारे में बार एसोसिएशन कैराना के पूर्व अध्यक्ष ''श्री कौशल प्रसाद एडवोकेट ''जी बताते थे-



'' '' सन १८५७ में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के द्वारा ऐतिहासिक क्रांति का बिगुल बजने के बाद मची उथल-पुथल से घबराये ब्रिटिश शासन के अंतर्गत संयुक्त प्रान्त [वर्तमान में उत्तर प्रदेश ] ने तहसील शामली को सन 1887 में महाभारत काल के राजा कर्ण की राजधानी कैराना में स्थानांतरित कर दिया तथा तहसील स्थानांतरण के दो वर्ष पश्चात् सन १८८९ में मुंसिफ शामली के न्यायालय को भी कैराना में स्थानांतरित कर दिया .ब्रिटिश शासन काल की संयुक्त प्रान्त सरकार द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश [तत्कालीन संयुक्त प्रान्त ]में स्थापित होने वाले चार मुंसिफ न्यायालयों -गाजियाबाद ,नगीना ,देवबंद व् कैराना है.मुंसिफ कैराना के क्षेत्राधिकार में पुरानी तहसील कैराना व् तहसील बुढ़ाना का  
ऐसे में राजनीतिक फैसले के कारण शामली को भले ही जिले का दर्जा मिल गया हो किन्तु न्यायिक व्यवस्था के सम्बन्ध में अभी शामली बहुत पीछे है .शामली में अभी कलेक्ट्रेट के लिए भूमि चयन का मामला भी पूरी तरह से तय नहीं हो पाया है जबकि कैराना में पूर्व अध्यक्ष महोदय के अनुसार तहसील भवन के नए भवन में स्थानांतरित होने के कारण ,जहाँ १८८७ से २०११ तक तहसील कार्य किया गया वह समस्त क्षेत्र इस समय रिक्त है और वहां जनपद न्यायाधीश के

न्यायालय के लिए उत्तम भवन का निर्माण हो सकता है .साथ ही कैराना कचहरी में भी ऐसे भवन हैं जहाँ अभी हाल-फ़िलहाल में भी जनपद न्यायाधीश बैठ सकते हैं और इस सम्बन्ध में किसी विशेष आयोजन की आवश्यकता नहीं है.फिर कैराना कचहरी शामली मुख्यालय से मात्र १० किलोमीटर दूरी पर है .जबकि जिस जगह का चयन शामली जिले के लिए जिला जज के न्यायालय के निर्माण की तैयारी चल रही है वह शामली मुखयालय से  12 किलोमीटर दूर है.

ऐसे में क्या ये ज़रूरी नहीं है क़ि सरकार सही स्थिति को देखते हुए शामली को कैराना के साथ मिलकर जिला घोषित करे जिससे इस व्यवस्था के करने में वह पैसा जो जनता की गाढ़ी कमाई से सरकार को मिलता है व्यर्थ में व्यय न हो और सरकार का काम भी सरल हो जाये और फिर ये कहाँ का न्याय है क़ि एक जगह जो पहले से ही न्याय के क्षेत्र में उचाइयां हासिल कर चुकी है उसे उसके मुकाबले निचले दर्जे पर रखा जाये जो उसके सामने अभी बहुत निचले स्थान पर है .उत्तर प्रदेश सरकार को इस पर विचार करते हुए शामली कैराना को संयुक्त रूप से जिला घोषित करना ही चाहिए .

शालिनी कौशिक

[कौशल ]

संभल जा रे नारी ....

''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपन...