शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.


रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.


     ग़ज़ल 
तू ही खल्लाक ,तू ही रज्ज़ाक,तू ही मोहसिन है हमारा.
रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.

एक आशियाँ बसाया हमने चैनो -अमन  का   ,
नाकाबिले-तकसीम यहाँ प्यार हमारा.

कुदरत के नज़ारे बसे हैं इसमें जा-ब-जा,
ये करता तज़्किरा है संसार हमारा.

मेहमान पर लुटाते हैं हम जान ये अपनी ,
है नूर बाज़ार-ए-जहाँ ये मुल्क  हमारा.

आगोश में इसके ही समां जाये ''शालिनी''
इस पर ही फ़ना हो जाये जीवन ये हमारा.

कुछ शब्द अर्थ-
खल्लाक-पैदा करने वाला,रज्ज़ाक-रोज़ी देने वाला
मोहसिन-अहसान करने वाला,सब्ज़ाजार-हरा-भरा
महरे आलमताब -सूरज,नाकाबिले-तकसीम--अविभाज्य
तज़्किरा-चर्चा,बाज़ार-ए-जहाँ--दुनिया का  बाज़ार
आगोश-गोद या बाँहों में,जा-ब-जा--जगह-जगह
शालिनी कौशिक

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2011

न छोड़ते हैं साथ कभी सच्चे मददगार.



आंसू ही उमरे-रफ्ता के होते हैं मददगार,
न छोड़ते हैं साथ कभी सच्चे मददगार.

मिलने पर मसर्रत भले दुःख याद न आये,
आते हैं नयनों से निकल जरखेज़ मददगार.

बादल ग़मों के छाते हैं इन्सान के मुख पर ,
आकर करें मादूम उन्हें ये निगराँ मददगार.

अपनों का साथ देने को आरास्ता हर पल,
ले आते आलमे-फरेफ्तगी ये मददगार.

आंसू की एहसानमंद है तबसे ''शालिनी''
जब से हैं मय्यसर उसे कमज़र्फ मददगार.


कुछ शब्द-अर्थ:
उमरे-रफ्ता--गुज़रती हुई जिंदगी,
जरखेज़-कीमती,
मादूम-नष्ट-समाप्त,
आलमे-फरेफ्तगी--दीवानगी का आलम.

शालिनी कौशिक
http://shalinikaushik2.blogspot.com

सोमवार, 5 सितंबर 2011

शिक्षक दिवस की बधाइयाँ






शिक्षक दिवस एक ऐसा दिवस जिसकी नीव ही हमारे दूसरे राष्ट्रपति श्रद्धेय पुरुष डॉ.राधा कृष्णन जी के जनम दिवस पर पड़ी .डॉ.राधा कृष्णन जी को श्रृद्धा सुमन अर्पित करने हेतु ही देश प्रतिवर्ष ५ सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है .सर्वप्रथम डॉ.राधाकृष्णन जी को जन्मदिन पर मैं उन्हें ह्रदय से नमन करती हूँ.
.मैं जब बी.ए. में थी तो आगे के लिए करियर चुनने को मुझसे जब कहा एम्.ए.संस्कृत व् आगे पीएच डी.कर शिक्षण क्षेत्र को अपनाने का सुझाव दिया गया तो मैंने साफ इंकार कर दिया क्योंकि मैं अपने में वह योग्यता नहीं देख रही थी जो एक शिक्षक में होती है मेरी मम्मी जिन्होंने हमें हमारे विद्यालय की अपेक्षा उत्तम शैक्षिक वातावरण घर में ही दिया वे शिक्षक बनने के योग्य होने के बावजूद घर के  कामों में ऐसी रमी की उसमे ही उलझ कर रह गयी और कितने ही छात्र छात्राएं जो उनसे स्तरीय शिक्षा प्राप्त कर सकते थे वंचित रह गए..परिवार को प्रथम पाठशाला  और माता को प्रथम शिक्षिका कहा जाता है इसलिए मैंने सबसे पहले  अपनी शिक्षिका अपनी मम्मी को ही इस अवसर पर याद किया है ये उनका ही प्रभाव है कि हमें कभी ट्यूशन के ज़रुरत नहीं पड़ी जबकि हमारे साथ की अन्य छात्राएं लगभग २-३ विषयों के ट्यूशन सारे साल पढ़ती थी और आजकल की आधुनिक मम्मी जब ये कहती हैं कि हमारे बच्चे हमसे नहीं  पढ़ते तब हमारा मन ये मानने को तैयार ही नहीं होता क्योंकि हमारी मम्मी ने मारने की जगह मारकर और समझाने की जगह समझाकर हमें उत्तम शिक्षा प्रदान की है . 
आज शिक्षक विवादों के घेरे में हैं छात्र नेताओं से परेशां चौधरी चरण सिंह विश्व विद्यालय  के कुलपति महोदय त्याग पत्र दे रहे हैं .विश्वविद्यालय में पी.ए.सी.की नियुक्ति चाह रहे हैं और भी जगह शिक्षक गुटबाजी कर रहे हैं छात्रों को विद्यालय में अपने गुट में जोड़कर प्रधानाध्यापक पर दबाव डाल रहे हैं .इसके साथ ही विद्यालय में छात्रों पर दबाव डाला जाता है की वे सम्बंधित विषय के अध्यापक का ट्यूशन लगायें और छात्र अधिक नंबरों के फेर में ऐसा करने को मजबूर हैं हमें ये सब शिक्षक दिवस पर कहना अच्छा नहीं लग रहा है किन्तु ह्रदय की व्यथा तभी सामने आती है जब उसी विषय पर बात की जाती है जिसने ह्रदय को पीड़ित किया है .जहाँ एक ओर हमने अपने विद्यालय में शिक्षिकाओं का पक्षपात पूर्ण रवैया देखा वहीँ हमारी एक शिक्षिका ने वास्तव में अपने आदर्श को हमारे ह्रदय में स्थापित किया और ये बताया कि वास्तव में शिक्षक कैसे होने चाहिए ?
बचपन से लेकर अभी तक के जीवन में हमें अपनी श्रीमती सुरेश बाला गुप्ता दीदी  [यही  कहती थी उस वक़्त छात्राएं अपनी मैडम को] ने हमारा एक अच्छी शिक्षिका के इतरह मार्गदर्शन किया और एक अच्छे हमदर्द की भांति साथ निभाया .वे हमसे गलतियाँ  होने पर मारती भी थी और अच्छा काम करने पर खुलकर सराहना भी करती थी .उनकी ये बात हम बच्चों में बहुत सराही गयी थी कि विद्यालय में एक सुन्दर कुशल  न्रित्यांगना छात्रा को उन्होंने हमारे कार्यक्रम में से केवल इसलिए अलग कर दिया था कि वह विध्यालय के और बहुत से कार्यक्रमों में भाग ले रही थी उनका  कहना था कि इसे तो सब ले लेंगे अपने कार्यक्रम में मैं तो अपने इन्ही बच्चों को लूंगी 
जब एल एल .बी के बाद पी.सी.एस.[जे] के लिए मुझे उर्दू सीखने की आवशयकता थी तब उन्होंने विद्यालय में नव नियुक्त होकर आये उर्दू अध्यापक से हमारी पहचान करायी और उनसे हमें उर्दू सिखाने का आग्रह किया साथ ही मैं आभार व्यक्त करती हूँ उर्दू अध्यापक श्री मुनव्वर हुसैन जी का जिन्होंने हमसे कोई जानकारी न होते हुए भी हमें उर्दू सिखाई और हमसे इसका कोई पारिश्रमिक भी नहीं लिया .
         शिक्षक दिवस पर मैं अपने जीवन के इन सभी श्रेष्ठ अध्यापकों को दिल से नमन करती हूँ.
                                     शालिनी कौशिक 

रविवार, 4 सितंबर 2011

समाज के लिए अभिशाप बनता नशा‏


 खुशबु(इन्द्री)
नशा जिसे हम एक सामाजिक बुराई कहते हैं,के कारण आज के युवा विनाश की गर्त में जा रहे हैं। आज समाज में नशाखोरी कंी प्रवृति इस कद्र अपना साम्राज्य फै ला चुकी है कि युवा इसके कारण मौत के आगोश में समा रहे हैं। आये दिन नशे की ओवरडोज के कारण  किसी न किसी घर का चिराग बुझता रहता है। नशाखोरी के कारण समाज में अनुशासनहीनता बढ़ रही है। गांव की न्याय व्यवस्था चरमरा रही है तथा परिवार के परिवार उजड़ रहे हैं। लोगों की मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक हालत बिगड़ रही है।  
नई पीढ़ी में तो नशाखोरी की प्रवृत्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। नशे के कारण तो नई युवा पीढ़ी शिक्षा प्राप्ति के मार्ग से विमुख हो रही है। व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब, युवा हो या वृद्ध, महिला हो या पुरूष कोई भी वर्ग इस नशे की प्रवृति से अछूता नहीं है । घर हो या दफ्तर, स्कूल हो या कालेज, गांव हो या शहर,सडक़ हो या नुक्कड़ सभी स्थानों पर नशाखोरों की जमात दिखाई देती है । 
नशाखोरी क्या है? एक बीमारी या एक प्रवृति जिसके चलते इंसान अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठता है। यह केवल एक बीमारी नहीं है बल्कि यह अनेक रोगों की जननी भी है। इसी प्रवृत्ति के चलते मनुष्य का मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक पतन तेजी से हो रहा है। सामाजिक मर्यादाए भंग हो रही है । नैतिक मूल्यों का तेजी से हृास हो रहा है । समाज में बढ़ रही आपराधिक प्रवृति के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार किसी को माना जा सकता है तो वह नशाखोरी ही है । शराब के नशे मे चूर व्यक्ति असामान्य हालात में वो भी कर जाता है जो उसे नहीं करना चाहिए। समाचार पत्रों में ाआये दिन नशाखोरों की कोई न कोई हरकत सुनने व पढऩे को मिलती ही रहती हैं। नशाखोरी से न केवल अपराध बढ़ रहें है बल्कि इससे दुघर्टनाएं भी तेजी से बढ़ रही है । आधे से अधिक सडक़ दुर्घटनाओं के लिए नशाखोरी को ही जिम्मेदार माना गया है । कभी यात्री बस पलट जाती है तो कभी बारातियों से भरा वाहन दुर्घटना ग्रस्त हो जाता है। पर परवाह नहीं क्योंकि नशा इंसान पर इस कद्र हावी हो जाता है कि उसे किसी की जिंदगी की परवाह ही नहीं रहती।
आजकल तो नशा करना ऐश्वर्य प्रदर्शन का एक माध्यम बन गया है । अनेक लोग इसे विलासिता की वस्तु मान कर इस्तेमाल करते है । अपनी तथाकथित प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने के लिए महंगी से महंगी शराब पीना आज फैशन हो गया है । तीज त्योहार हो या मांगलिक कार्य पीनेवालों को तो केवल बहाना ही चाहिए । नशे के लिए आज इंसान घर परिवार एवं जमीन जायदाद सबकुछ त्यागने को तैयार हो जाता है।  रिश्ते-नाते तक छोड़ देता है। 
युवा तो युवा युवतियां भी नशे की प्रवृति से अछूती नहीं रही हैं। हर युग में चर्चा और आकर्षण का केंद्र बिंदु रहने वाली नारी आज पल-पल बदलते परिवेश में जिस प्रकार पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रगति की ओर अग्रसर हो रही है, वह प्रारंभ से रूढि़वादी परम्पराओं और प्रथाओं से घिरे भारतीय नारी समाज के लिए सुखद बात है। लेकिन, दूसरी ओर आधुनिक बनने के चक्कर में पश्चिमी सभ्यता व संस्कृति को अपना कर नशाखोरी जहरीले रास्ते पर भी चल पड़ी है। आज भारत देश में नवयुवतियों पर नशाखोरी का भूत किस तरह सवार है, इसका पता हमें ‘इंडियन कांउसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ द्वारा किए गए सर्वेक्षण से लगता है। इस सर्वक्षण में यह बात सामने आई है कि दिल्ली, इलाहाबाद में युवकों से अधिक नशाखोरी का शिकार नवयुवतियां है। मद्रास, दिल्ली और जयपुर यूनिवर्सिटी में लड़कियां एक से ज्यादा बार खतरनाक मीठे जहर चरस, गांजा, अफीम, गर्भ निरोधक दवाएं, कोकीन आदि दवाइयों का इस्तेमाल कर चुकी हैं। नशाखोरी के शौकीनों की तादाद उन कॉलेजों में ज्यादा है, जहां को-एजुकेशन है। कॉलेजों-विश्वविद्यालयों के हॉस्टल तो आज नशाखोरी के अड्डे बन गये हैं। इस हॉस्टलों में रहने वाले 19 से 26 साल के बीच की उम्र के लडक़े और लड़कियां हॉस्टलों में रहकर पढ़ाई करने के नाम पर अपने मां-बाप की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। ये खुलासा किया है एसोचैम यानि एसोसिएटेड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री इन इंडिया की रिपोर्ट ने। रिपोर्ट के मुताबिक घर से दूर हॉस्टल में रहने वाले बच्चों में नशे की लत बढ़ती जा रही है। पिछले सात से आठ साल के भीतर शराब और सिगरेट पीने वाले बच्चों की संख्या 60 फीसदी बढ़ चुकी है। साल 2001 के मुकाबले आज 60 प्रतिशत ज्यादा छात्र नशे का सेवन करते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक हॉस्टल में रहने वाले दस में से आठ छात्र-छात्राएं अत्यधिक शराब का सेवन करते हैं। ये लोग अपने परिवार से छुपकर शराब पीते हैं। हर महीने ये छात्र-छात्राएं हजार से 12 सौ रुपये सिगरेट और शराब पर बर्बाद करते हैं। इस सर्वे के मुताबिक नशा करने वाले छात्रों में दिल्ली और गुडग़ांव के हॉस्टलों में रहने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है। आज हमारी चिंता का सबसे बड़ा विषय भी छात्रों में तेज़ी से बढ़ती नशाखोरी की प्रवृत्ति ही है। आज हम किसी भी सरकारी स्कूल के बाहर यह नज़ारा खुले-आम देख सकते हैं कि छठी से लेकर बारहवीं कक्षा तक के बच्चे मजे से,बेखटके सिगरेट के छल्ले उड़ा रहे हैं,पान-मसाला चबा रहे हैं और मदिरालय के आस-पास मंडरा रहे हैं। यही काम पब्लिक स्कूलों के बच्चे भी करते हैं ,पर लुक -छुपकर।
समाज में बढ़ती नशाखोरी पर ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ द्वारा कराये गये एक सर्वे के अनुसार, भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों की लगभग साठ प्रतिशत लड़कियां धूम्रपान की शौकीन पाई गई हैं और कॉलेजों व पब्लिक स्कूलों के होस्टलों में रहने वाले लडक़े-लड़कियां भी नशीली दवाइयों के शिकार हैं। इन सर्वे रिपोर्टों के अलावा भी एक तथ्य से सर्वविदित है कि देह व्यापार में लिप्त अधिकतर महिलाएं और नवयुवतियां शराब पीने के बाद ही अपने पुरुष ग्राहकों से शारिरिक संबंध स्थापित करती हैं, जो एड्स जैसे महारोग की भयावहता को और बढ़ाता है। बहरहाल वैसे हमारे लिए अभी भी सुखद बात यह है कि देश में ड्रग्स व धूम्रपान की शौकीन नवयुवतियों की तादाद केवल कुछ महानगरों तक ही सिमटी हुई हैं। छोटे शहरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं अभी भी इन कुप्रवृत्तियों से दूर हैं, इसलिए इस समय इन आदतों से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार व समाजसेवी संस्थाए जो कार्यक्रम चला रही हैं, उसे और तेजी प्रदान की जाए, तो संभव है कि नवयुवतियों को नशाखोरी के गर्त में जाने से बचाया जा सकता है, क्योंकि ये ऐसा रोग नहीं है कि जिससे छुटकारा नहीं पाया जा सकता। आवश्यकता केवल अपने आप में दृढ़ इच्छाशक्ति पैदा करने की है और उस वातावरण से बचने की हैं, जहां नशाखोरी का प्रचलन हो। साथ ही, मन-मस्तिष्क से इस गलतफहमी को भी निकालना होगा कि गम भूलने और अपने-आपको आधुनिक बताने के लिए नशाखोरी को अपनाना आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान समय में नशे के प्रति बने इस भ्रम के कारण ही अच्छे-खासे लडक़े-लड़कियां इस अंधी गली में घुस जाते हैं, जहां उन्हें मिलता क्या है? एक पीड़ादायक, रोगों से ग्रस्त जीवन और घर परिवार व समाज में अपमान। 
अब सवाल यह पैदा होता है कि आखिर वे कौन से कारण है, जिससे प्रभावित होकर नवयुवतियां नशाखोरी जैसी कुप्रवृत्तियों का शिकार होती जा रही हैं। इस संबंध में सर्वे रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में अधिकतर नवयुवतियां व छात्राएं परीक्षा में फेल होने, मनचाही कामयाबी न मिलने, मोहब्बत में नाकाम होने पर गम को भुलाने के लिए नशीली दवाइयों के सेवन करने की तरह मुड़ जाती है, जहां उन्हें सुकून की जगह मिलता है घातक शारिरिक रोगों का जहरीला तोहफा, जो जीते-जी जिंदगी को दोजख में धकेल देता है।
रिपोर्ट में ये भी स्पष्ट किया गया कि भारत में अभी नशा करने वाली शादीशुदा औरतों की तादाद बहुत कम है। नशाखेरी की कुप्रवत्ति कॉलेज में पढऩे वाली लड़कियों में ज्यादा है, जिस कारण उनका विवाहित जीवन कई तरह की परेशानियों से घिर जाता है। दरअसल, हमारे यहां युवा लड़कियों में नशाखोरी की शुरुआत धूम्रपान से होती है। धुम्रपान कर वह अपने आपको दुनिया के सामने फैशनेबल व आधुनिक युवती बताने का प्रयास करती हैं। शायद यही कारण था कि आज से तीन-चार वर्ष पूर्व देश की एक सबसे बड़ी सिगरेट कम्पनी गोल्डन टोबैको ने ‘मैस’ नाम से महिलाओं के लिए एक सिगरेट बाजार में ऐसे उतारी, जैसे वह भारतीय नारी समाज पर कोई बड़ा अहसान कर रही हो। लेकिन, जब स्वयं महिला संगठनों ने इसका खुलकर विरोध किया, तो कंपनी ‘गोवा’ गुअखा की तरह सिगरेट का प्रचार-प्रसार विज्ञापन बोर्ड और होर्डिंगों पर नहीं कर पाई। वैसे भी हमारे देश में नशाखोरी या धूम्रपान करने वाली महिलाओं व नवयुवतियों की तादाद बड़े शहरों में ही अधिक है। शर्म की बात तो ये है कि इन कुप्रवृत्तियों का शिकार वह शिक्षित तबका है, जो इसके दुष्परिणामों को भली-भांति जानता है, फिर भी वह ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए नशाखोरी की अंधी गलियों में घुसते जा रहा है। इससे बड़ी हास्यास्पद स्थिति और क्या हो सकती है कि जिस तम्बाकू की पत्तियों को बैल व गधे तक नहीं खाते, उसका सेवन समझदार मनुष्य बड़े शौक और ठसक से करते हैं। सिगरेट में भरी जाने वाली तम्बाकू, जो ‘निकोटियन’ नामक पौधों की सूखी पत्तियां है, जब धुएं या खाली खाने के साथ शरीर में जाती है, तो इसका प्रभाव शरीर पर धीमे जहर के रूप में होता है। इसके दुष्प्रभाव से गर्भवती महिला को गर्भपात, मृत गर्भ या कम वजन का बच्चा पैदा होता है। निकोटिन के कारण बच्चे को जन्म देने वाली महिला में कम दूध बनता है और मुंह गले व स्तन कैंसर, फेफड़ों के रोग पैदा होते हैं। इसके बावजूद पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में फंस चुकी नवयुवतियां धूम्रपान जैसे विषैले प्रभाव को जानने के बाद भी इस शौक की तरफ बढ़ी जा रही है, जबकि अफीम, गांजा, भांग, चरस, ब्राउन शुगर, मार्फिन, एलएसडी जैसे ड्रग्स के विषैले प्रभाव की कम्पना करने से ही कलेजा कांप उठता है।
नशाखोरी की बढ़ती प्रवृति के लिए हमारी कार्यपालिका यानी सरकार ही मुख्य रूप से दोषी मानी जाएगी। नैतिक शिक्षा का पाठ तो बच्चे कब का भूल चुके हैं क्योंकि उन्हें हमने विरासत में अश्लील टी.वी. सीरियल,लपलपाती महत्वाकांक्षाएं व पश्चिम की भोंड़ी नकल दी है। इसके लिए सरकार द्वारा सरकारी राजस्व अर्जित करने की आड़ में चलायी जा रही शराब की फै कट्रियां और नशीली वस्तुएं बनाने वाल कंपनियां भी जिम्मेवार हैं जिनसे सरकार को करोड़ों रूपये की आय होती है लेकिन समाज को मिलता है विनाश। 
नशे के  निर्माता व वितरक तो हरे भरे हो ही रहें है । लोगों के जीवन की हरियाली को भी बंजर बनाया जा रहा है । प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों जिन्दगियों को तबाह करने का लाइसेंस मुटठी़भर लोगों के दे दिया जाता है। देश में भौतिक विकास के नाम पर प्रति वर्ष अरबों रूपये खर्च कर दिये जाते हैं लेकिन समझ में नहीं आता कि यह विकास किसके लिए? नशे की गर्त में समा चुके लोगों के लिए जबकि किसी भी समाज के भौतिक विकास के साथ साथ उसका नैतिक विकास भी जरूरी है। 
देश का मानव संसाधन कितना स्वस्थ, पुष्ट एवं मर्यादित है यह देश की सरकार को ही देखना होगा। क्योंकि देश के मानव संसाधन के समुचित दोहन से ही राष्ट्र्र विकसित हो सकता । जरूरत है देश के मौजूद मानव संसाधन को रचनात्मक विकास की दिशा मे लगाने की। कोई भी देश या समाज अपने मानव संसाधन को निरीह, नि:शक्त या निर्बल बनाकर खुद शक्तिशाली नहीं बन सकता है ?  
यह नशाखोरी का ही दुष्परिणाम है कि आज का मानव कमजोर, आलसी व लापरवाह होता जा रहा है । आज समाज का नैतिक पतन हो रहा है। हमें नशाखोरी की बढ़ती प्रवृति को रोकना होगा । लोगों के हाथों में दारू की बोतल नहीं बल्कि काम करने वाले औजार होने चाहिए । कौन देगा उन्हें ऐसी प्रेरणा ? इस बुरी लत को सरकार के किसी कानून से खत्म नहीं किया जा सकता । इसके लिए समाज में जागरूकता लानी होगी । बेहतर होगा कि इंसान अपनी कीमती जिंदगी से प्यार करते हुए इस दलदल में फंस से बचे और औरों को भी बचाये। संकल्प शक्ति के समक्ष इस कुप्रवृत्ति की शक्ति बहुत तुच्छ है क्योंकि किसी ने सही कहा है- आज बस में जिसके है आदमी, आज छाई है मौत बनकर, जो कर ही है बरबाद जिदंगी, है उस मौत का दूसरा नाम है नशा। नई पीढ़ी को इस नशे के दुष्परिणामों का बोध कराना होगा । समाजसेवियों एवं समाज के कर्णधारों को बिना वक्त गवायें अब इस दिशा में आगे बढऩे की जरूरत है क्योकि हमें शांति ,सदभाव व भाईचारे का वातावरण निर्मित कर स्वस्थ समाज का निर्माण करना है 
आलेख -खुशबु गोयल 
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.



गूगल से साभार
तू ही खल्लाक ,तू ही रज्ज़ाक,तू ही मोहसिन है हमारा.
रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.

एक आशियाँ बसाया हमने चैनो -अमन  का   ,
नाकाबिले-तकसीम यहाँ प्यार हमारा.

कुदरत के नज़ारे बसे हैं इसमें जा-ब-जा,
ये करता तज़्किरा है संसार हमारा.

मेहमान पर लुटाते हैं हम जान ये अपनी ,
है नूर बाज़ार-ए-जहाँ ये मुल्क  हमारा.

आगोश में इसके ही समां जाये ''शालिनी''
इस पर ही फ़ना हो जाये जीवन ये हमारा.

कुछ शब्द अर्थ-
खल्लाक-पैदा करने वाला,रज्ज़ाक-रोज़ी देने वाला
मोहसिन-अहसान करने वाला,सब्ज़ाजार-हरा-भरा
महरे आलमताब -सूरज,नाकाबिले-तकसीम--अविभाज्य
तज़्किरा-चर्चा,बाज़ार-ए-जहाँ--दुनिया का  बाज़ार
आगोश-गोद या बाँहों में,जा-ब-जा--जगह-जगह
शालिनी कौशिक

बुधवार, 31 अगस्त 2011

सांसदों के चुनाव के लिए स्नातक होना अनिवर्य करे‏

हमारे सांसद कानून में सक्षम होने के लिए भले ही अन्ना समर्थकों के निशाने पर हों, लेकिन सच्चाई यह है कि लोकसभा में 80 फीसदी से ज्यादा सांसद स्नातक हैं, जबकि 30 फीसदी के पास परास्नातक और डॉक्टरेट की डिग्री है।

लोकसभा से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि संविधान में चुनाव लड़ने के लिए कोई औपचारिक योग्यता की बात नहीं है, लेकिन हमारा अनुभव है कि उचित शिक्षा के स्तर के बिना बहुत कम लोग हैं या देश की विधायिका में ऐसे लोग लगभग नहीं हैं। पिछले हफ्ते अभिनेता ओम पुरी ने रामलीला मैदान में हजारे के आंदोलन का समर्थन करते हुए हमारे सांसदों की शिक्षा के स्तर के मामले को फिर भड़का दिया।

बहरहाल आंकड़ों से पता चलता है कि 15वें लोकसभा में कोई भी अनपढ़ नहीं है। करीब 50 फीसदी सांसद या तो स्नातक हैं या फिर उनके पास परास्नातक डिग्री है। संपूर्ण रूप से 80.74 सदस्यों के पास स्नातक या इससे बड़ी डिग्री है। करीब 24 सांसदों के पास डॉक्टरेट की डिग्री है।केवल 20 सांसदों की शिक्षा मैट्रिक से कम हुई है और 32 मैट्रिक पास हैं। निचले सदन में 291 सांसद पहली बार चुनकर आए हैं, जबकि 184 फिर से निर्वाचित होकर आए हैं। फिर्भी अब चुनाव सुधारो का भी वकत आगया हे!अब सांसदों विधायको के लिए स्नातक तथा पंचय्तो नगर पलिकाध्यक्शो के लिए हायर सेकेंद्री पास होना अनिवार्य किया जाए!अनाप शनाप चुनाव ख्रचो को भी कम किया जाए! ताकि चुनाव में लिए गए चंदे के बदले जनप्रतिनिधियो को भ्रश्ताचार करके अहसान चुकाने कि नोबत ना आए! प्रधान मंत्री या राश्त्र्पति का चुनाव सीधे जंता के वोटों से हो ताकि वे संयुक्त सरर्कार कि मज्बूरियो से मुक्त होकर कार्य कर सके! सांसद निधी खतम करे ताकि सर्कारी पेसा जंता कि वास्तविक जरुरतो पर सरकार के माध्यम से खर्च हो! वरना अभी तो यह सांसद निधी चुनावी वोटों के गणित से खार्च होकर भ्रशताचार के नेये रास्ते खोल रही हे!

 khushbu.go​yal16@gmail​.com
आलेख -ख़ुशी गोयल 
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

आया खुशियों का पैगाम -ईद मुबारक



आज ही क्या पिछले कई दिनों से बाज़ार हमारे मुसलमान भाई-बहनों से
भरे पड़े हैं और हों  भी क्यों न साल भर में एक बार आने वाली ईद-उल-फितर इस्लाम धर्मावलम्बियों के लिए खास महत्व रखती है.बचपन से हम देखते हैं कि सभी रोज़ेदार इस कोशिश में लगे रहते हैं कि दूज का चाँद दिखाई दे जाये और   
२९ दिन के रोज़े रखने के बाद ही ईद हो जाये हम कहते ऐसा क्यों ?बाद में हमें हमारे पापा के एक मित्र से ये  पता लगा ''कि भले ही इस समय हम एक रोज़े के करने से बच जाएँ किन्तु   बाद में हमें ये रोज़ा रखना होता है.इस्लाम धर्म में ईद एक तोहफे का सामान है ये कहना है आज के हिंदुस्तान  दैनिक में प्रकाशित एक आलेख के लेखक''फ़िरोज़ बख्त अहमद''जी का .वे कहते हैं-
''ईद की शुरुआत तो ईद से एक रोज़ पहले मगरिब की नमाज़ के बाद चाँद देखने के साथ ही हो जाती है.ईद का यह चाँद महीन होने के साथ ही थोड़ी ही देर के लिए दिखाई देता है. ईद का चाँद देखते ही मुस्लिम लोग खुदा से अमन-शान्ति की दुआ करते  हैं.''
फ़िरोज़  जी आगे कहते हैं कि ईद का अर्थ समझें तो अरबी में किसी भी चीज़ के बार-बार आने को ''ऊद''कहा जाता है इसका अर्थ है कि जिसने रोज़े रखें हैं उसके लिए ईद बार-बार आएगी.
फ़िरोज़ जी ही बताते हैं कि इस पर्व का नाम ईद-उल-फितर क्यों पड़ा ?ईद के दिन ईद की नमाज़ से पूर्व सभी मुसलमान फितरा अदा करते हैं . फितरा  का अर्थ है कि दान-दीन धर्म-भावना के तहत सुबह सवेरे निर्धन एवं फ़कीर लोगों को पैसे की शक्ल में फितरे की रकम देना.''
ईद को फिरोज जी एक और तरह से भी समझाते हैं .वे कहते हैं हमें पैगम्बर हज़रत मुहम्मद  [सल.]इसका तत्त्व  समझना  चाहिए -''हज़रत मुहम्मद बहुत सादगी के साथ ईद मनाया करते थे .एक बार हज़रत मुहम्मद ईद के दिन सुबह सवेरे फज्र की नमाज़ के बाद बाज़ार गए .रास्ते में आपको एक छोटा सा यतीम बच्चा रोता हुआ दिखाई दिया हज़रत मुहम्मद पास गए और कारण पूछा बच्चे ने बताया कि आज ईद का दिन है और उसके पास नए कपडे ,जूते और पैसे नहीं हैं .हज़रत मुहम्मद ने उसे पुचकारा और घर ले आये .बच्चे से कहा -''उनकी पत्नी हज़रत आयशा उस बच्चे की माँ हैं ,बेटी फातिमा उसकी बहन है और हसनैन उसके भाई हैं इस अनाथ बच्चे को नए कपडे पहनाये गए उसे पकवान पेश किये गए ताकि उसे अपने अकेलेपन का आभास न हो इस सबसे बच्चा इतना प्रभावित हुआ कि वह मक्का की गलियों में गीत गाता रहा -आज ईद का दिन है और वह अत्यंत प्रसन्न है .आयशा उसकी माँ है और फातिमा उसकी बहन है और हसनैन उसका भाई है .ईद की वास्तविक भावना यही होती है .ईद के बारे में एक शायर ने कहा है -''एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद-ओ -आयाज़
न कोई बन्दा रहा न बन्दा-नवाज़.''
यही हम अपने आस पास बरसों से देखते आ रहे हैं और खुदा करे कि यही देखते रहें .ईद सामूहिक प्रसन्नता का दिवस है इस दिन गले मिलना लोगों से सलाम  दुआ करने का ही चलन हमने देखा है और दुआ करते है कि यही चलन रहे.किसी ने खूब कहा है-   
''हिलाल-ए-ईद जो देखा तो ये ख्याल हुआ,
उन्हें गले लगाये  एक साल हुआ.''
  ईद की आप सभी को बहुत बहुत मुबारकबाद.

              शालिनी कौशिक



सोमवार, 29 अगस्त 2011

न छोड़ते हैं साथ कभी सच्चे मददगार.


आंसू ही उमरे-रफ्ता के होते हैं मददगार,
न छोड़ते हैं साथ कभी सच्चे मददगार.

मिलने पर मसर्रत भले दुःख याद न आये,
आते हैं नयनों से निकल जरखेज़ मददगार.

बादल ग़मों के छाते हैं इन्सान के मुख पर ,
आकर करें मादूम उन्हें ये निगराँ मददगार.

अपनों का साथ देने को आरास्ता हर पल,
ले आते आलमे-फरेफ्तगी ये मददगार.

आंसू की एहसानमंद है तबसे ''शालिनी''
जब से हैं मय्यसर उसे कमज़र्फ मददगार.


कुछ शब्द-अर्थ:
उमरे-रफ्ता--गुज़रती हुई जिंदगी,
जरखेज़-कीमती,
मादूम-नष्ट-समाप्त,
आलमे-फरेफ्तगी--दीवानगी का आलम.

शालिनी कौशिक
http://shalinikaushik2.blogspot.com

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

फ़ोर्ब्स की सूची :कृपया सही करें आकलन

आज के समाचार पत्रों का एक मुख्य समाचार-''सोनिया सातवीं शक्तिशाली महिला''/सबसे शक्तिशाली महिलाओं में  सोनिया''
     अभी कल ही फ़ोर्ब्स मैगजीन  ने विश्व की सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची जारी की और   उसमे सोनिया गाँधी जी को विश्व में  सातवाँ स्थान दिया गया है.सूची में भले ही महिलाओं की विश्व में शक्ति  और योग्यता के अनुसार  आकलन किया गया हो किन्तु यह कहना कि यह सूची सही है मैं नहीं कह सकती क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं को एक जगह   जोड़ कर आकलन करना  सही प्रतीत नहीं होता  क्योंकि सभी क्षेत्रों के विकास और शक्ति के अलग अलग आकलन होते हैं .अब राजनीतिक क्षेत्र ,आर्थिक क्षेत्र ,मीडिया का यदि हम एक जगह   आकलन  करने  बैठ जाएँ तो हम किसी सही निर्णय  पर नहीं पहुँच पाएंगे.
   इन्द्र नूयी पेप्सिको की सी.ई.ओ. हैं, शेरिल सेंद्बर्ग फेसबुक की सी.ई.ओ. हैं ,मेलिंडा गेट्स बिल एंड मेलिंडा गेट्स फ़ाऊउन्देशन   की सह संस्थापक हैं और इनका कार्य क्षेत्र राजनीति के क्षेत्र से बिलकुल पृथक है और दूसरी बात सोनिया जी से ऊपर जिन राजनीति के क्षेत्र की महिलाओं को भी रखा है वे भी उनके समकक्ष कहीं नहीं ठहरती क्योंकि वे जो भी हैं अपने देश में हैं जबकि सोनिया   जी ने अपना जो अस्तित्व बनाया है वह एक ऐसे देश में बनाया है जहाँ उनके विदेशी होने  का सर्वाधिक विरोध है और  जहाँ उन्होंने अपना स्थान सभी का विरोध झेल कर अपनी योग्यता से बनाया है.
इसलिए मेरे अनुसार सोनिया जी का स्थान विश्व में शक्तिशाली महिलाओं में सबसे ऊपर है और अपने शानदार कार्यों को लेकर वे ही  विश्व में इस पद की अधिकारी हैं .
                    शालिनी कौशिक

सोमवार, 22 अगस्त 2011

एक बार फिर विचार करे सुप्रीम कोर्ट




एक बार फिर विचार करे सुप्रीम कोर्ट .कहना पड़ रहा है किन्तु क्या कहें ये  ज़रूरी है कि एक बार सुप्रीम कोर्ट अपने आज अमर उजाला के पृष्ठ ११ पर प्रकाशित  निर्णय पर विचार करे निर्णय का शीर्षक है ''जन्मपत्री मान्य ,पर एक कमज़ोर सबूत:सुप्रीम कोर्ट ''इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी शख्स की जन्मतिथि साबित करने के लिए उसकी जन्मपत्री को सबूत तौर पर स्वीकार तो  किया   जा   सकता है लेकिन यह ज्यादा विश्वसनीय नहीं होती है .जस्टिस मुकुंदम  शर्मा  और और जस्टिस अनिल आर दवे ने यह फैसला  मद्रास के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से निचली अदालत के एक जज एम्.मनिक्कम के खिलाफ दायर याचिका पर सुनाया .जज मनिक्कम १९९३ से अपनी जन्मतिथि २४ नवम्बर १९५० से बदलवाकर १९ मार्च १९४७ करवाने के लिए प्रयासरत हैं .बेंच ने कहा कि इस अदालत की ओर से पूर्व में दिए गए फैसलों के मुताबिक हम दोबारा यह कह रहे हैं कि जन्मपत्री एक कमज़ोर सबूत है ओर इसे पेश करने वाले व्यक्ति के पास इसे साबित करने की बड़ी जिम्मेदारी होती है.''
   यूँ तो  यहाँ तक देखने तक उच्चतम न्यायालय का निर्णय सही प्रतीत होता है किन्तु जैसे कि मैं व्यक्तिगत तौर पर जानती हूँ कि कितने ही लोग अपने बच्चों के विवाह के लिए उनकी जन्मपत्री में हेरफेर कराते हैं ऐसे में जन्मपत्री की विश्वसनीयता संदेह  के घेरे में आ जाती है  और फिर जब कोई मामला पड़ता है पद प्रतिष्ठा  का तो फिर जन्मपत्री की विश्वसनीयता कैसे स्वीकार की जा सकती है. ऐसे में मेरा सुप्रीम कोर्ट से केवल यही कहना है कि जन्मपत्री को सबूतों की श्रेणी से निकाल दिया जाना चाहिए क्योंकि यह  बनाना पंडित वर्ग के हाथ में है और साथ ही इसे बनाने के लिए किसी स्टाम्प पेपर की भी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती इसे किसी पंडित से जब चाहे बनवा लिया  जाये और इसके लिए किसी गवाह के हस्ताक्षर भी नहीं चाहिए इसलिए इसका तो अस्तित्व कोर्ट को केवल व्यक्ति के निजी जीवन के क्रिया कलाप के लिए ही छोड़ देना चाहिए .यहाँ यह बात भी गौर करने के लायक है कि जहाँ आज भारत के नगर नगर में लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ उमड़ रहे हैं वहीँ लोगों की निजी जिंदगी बहुत कुछ ऐसे भ्रष्टाचरण अपने में समेटे है कि कहते हुए भी शर्म आती है कि अपने बच्चों के विवाह जैसे पुनीत कार्य की नीव भी झूठ पर रखते नहीं हिचकिचाते.सारी कुंडली ही पलट देते हैं जहाँ विवाह में मंगली  की मंगली  से शादी का विधान उनके ही हित में बताया जाता है कुंडली की नवीन स्थापना करा कर उसमे परिवर्तन कर देते हैं और चाहे बाद में यह परिवर्तन उनके बच्चे के लिए घातक ही क्यों न रहे. हम एक अधिवक्ता है और कितने ही बच्चों के शपथपत्र में उनकी मनमानी आयु तो हम ही निर्धारित  कर देते हैं और इस पर कोई किसी की रोक भी नहीं और इसके लिए किसी सबूत की भी ज़रुरत नहीं फिर एक पंडित के द्वारा बनायीं जन्मपत्री पर सबूत के तौर पर विश्वास करने का कोई मान्य आधार न हम मानते हैं न सुप्रीम कोर्ट को मानना चाहिए.
                         शालिनी कौशिक

शनिवार, 20 अगस्त 2011

आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनायें

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''श्री कृष्ण-जन्माष्टमी ''एक ऐसा पर्व जो सारे भारतवर्ष में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है .अभी कुछ वर्षों से ये दो  दिन मनाया जाने लगा है .पंडितों ने इसे ''स्मार्त '' और ''वैष्णव ''में बाँट दिया है.अर्थात स्मार्त से तात्पर्य गृहस्थ जानो द्वारा और वैष्णवों से तात्पर्य कंठी माला धारण करने वाले साधू संतों द्वारा .

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''जो गृहस्थ जीवन  बिताते  हैं वे स्मार्त होते हैं अर्थात जो व्यक्ति जनेऊ धारण करते हैं गायत्री की उपासना करते हैं और वेद पुराण  ,धर्म शास्त्र ,समृत्ति को मानने वाले पञ्च वेदोंपासक हैं सभी स्मार्त हैं.
वैष्णव वे लोग होते हैं जिन लोगों ने वैष्णव गुरु से तप्त मुद्रा द्वारा अपनी भुजा  पर शंख चक्र अंकित करवाएं हैं या किसी धर्माचार्य से  विधिपूर्वक दीक्षा लेकर कंठी और तुलसी की माला धारण की हुई है .वे ही वैष्णव कहला सकते हैं अर्थात वैष्णव को सीधे शब्दों में कहें तो गृहस्थ से दूर रहने वाले लोग.

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सामान्य जन इसे मथुरा  और गोकुल में बाँट देते हैं अर्थात एक दिन मथुरा में कृष्ण के पैदा होने की ख़ुशी में मनाई  जाती  है और एक दिन गोकुल में कृष्ण के आगमन की ख़ुशी में मनाई जाती है.वैसे बहुत से स्थानों पर यह पर्व कई दिन चलता है और कृष्ण की छठी मनाकर ही इसे सम्पन्न किया जाता है.
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बचपन से ही इस पर्व से हमारी बहुत सी यादें जुडी हैं हमें कहीं कृष्ण जी बना दिया जाता तो एक समय तक तो हम इस लालच में खड़े रहते कि सभी आकर हमारी जय बोल  रहे हैं और हमारे चरण छू रहे हैं  किन्तु जब हम खड़े खड़े थक जाते तो एक समय आने पर   हम झांकियां देखने को अपना स्थान त्याग भाग जाते और जगह जगह कृष्ण  जन्माष्टमी की झांकियों का आनंद लेते .


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भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी बुधवार को रोहिणी नक्षत्र में अर्धरात्रि  के समय वृष के चंद्रमा में हुआ था .आज देखा जाये तो कृष्ण के अनुयायी बहुत बड़ी संख्या में हैं .राम व् कृष्ण दोनों भगवान विष्णु के अवतार हैं और दोनों की लीलाएं अद्भुत हैं किन्तु एक मत यह भी प्रचलित है कि जहाँ राम की लीला थम जाती है कृष्ण लीला वहीँ से आरम्भ होती है राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो कृष्ण चंचल नटखट हैं और हर वह कार्य करने वाले हैं जिसे असंभव समझा  जाये.पूतना का वध जरा से बालक द्वारा ,कालिया नाग का मर्दन नन्हे से बालक द्वारा ऐसे कई कार्य हैं जो श्री कृष्ण ने किये और जिनके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता.
आज और कल पूरे भारत वर्ष में हर्षोल्लास से कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जायेगा और यही वह अखंड आनंद है जिससे हमारा मन ओत-प्रोत हो उठता  है.
आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनायें
              शालिनी कौशिक

एक नमन राजीव जी को

एक  नमन  राजीव  जी  को  आज उनके जन्मदिन के शुभ अवसर पर.राजीव जी बचपन से हमारे प्रिय नेता रहे आज भी याद है कि इंदिरा जी के निधन के समय हम सभी कैसे चाह रहे थे कि राजीव जी आयें और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाएँ क्योंकि ये बच्चों की समझ थी कि जो जल्दी से आकर कुर्सी पर बैठ जायेगा वही प्रधानमंत्री हो जायेगा.तब हमारे दिमाग की क्या कहें वह तो उनके व्यक्तित्व पर ही मोहित था जो एक शायर के शब्दों में यूँ था-
''लताफत राजीव गाँधी,नफासत राजीव गाँधी ,
         थे सिर से कदम तक एक शराफत राजीव गाँधी ,
नज़र आते थे कितने खूबसूरत राजीव गाँधी.''
राजीव जी का  जन्म २० अगस्त १९४४ को हुआ था और राजनीति से कोसों दूर रहने वाले राजीव जी अपनी माता श्रीमती इंदिरा जी के  कारण राजनीति में  आये और देश को पंचायत राज और युवा मताधिकार जैसे उपहार उन्होंने दिए .आज उनके जन्मदिन के अवसर पर मैं उन्हें याद करने से स्वयं को नही रोक पाई किन्तु जानती हूँ कि राजीव जी भी राजनीति में आने के कारण बोफोर्स जैसे मुद्दे में बदनामी अपने माथे पर लगाये २१ मई १९९१  को एक आत्मघाती हमले का शिकार होकर हम सभी को छोड़ गए आज भी याद है वह रात जब १०.२० मिनट पर पापा कहीं बाहर से आकर खाना खा रहे थे और  हम कैरम खेल रहे थे कि विविध भारती  का  कार्यक्रम छाया गीत बीच में  बंद हुआ और जैसे ही एक उद्घोषक ने कहा ,''अखिल भारतीय कॉंग्रेस कमेटी के अध्यक्ष....''और इससे पहले कि वह कुछ बोलता कि पापा बोले कि राजीव गाँधी की हत्या हो गयी हम चीख कर पापा से क्या लड़ते क्योंकि अगले पल ही यह समाचार उद्घोषक बोल रहा था और हमारा राजनीति  से सम्बन्ध तोड़ रहा था राजीव जी के साथ हमने राजनीति में रूचि को भी खो दिया बस रह गयी उनकी यादें जो हम आज यहाँ आप सभी से शेयर  कर रहे हैं हालाँकि जानते हैं कि ब्लॉग जगत में अधिकांश उनके खिलाफ हैं किन्तु हम जिनसे आज तक  जुड़े हैं वे राजीव जी ही थे और वे ही रहेंगे.
श्रीमती मुमताज़ मिर्ज़ा के शब्दों में -
''रहबर गया,रफीक गया,हमसफ़र गया,
राजीव पूरी कौम को मगमून कर गया.
सदियाँ भुला सकेंगी न उसके कमाल को,
राजीव चंद सालों में वो काम कर गया.''


शालिनी कौशिक
                      

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

स्वास्थ्य सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा बदहाल‏

 




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जन्म से एक साल तक के बच्चों की मौत के मामले में देश के 284 सबसे पिछड़े जिलों में उत्तर प्रदेश का श्रावस्ती सबसे ऊपर है। इसी तरह प्रसव के दौरान गर्भवती महिलाओं की होने वाली मौत के मामले में भी यूपी का फैजाबाद मंडल सबसे पिछड़ा साबित हुआ है। यहां तक कि परिवार नियोजन के मामले में भी यहां सबसे कम दिलचस्पी दिखाई गई है, जबकि इसी से अलग हुए उत्तराखंड ने अधिकांश मामलों में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। यही नहीं यूपी में मृत्यु दर, नवजात शिशुओं और बच्चों की मृत्यु दर सबसे ज्यादा है, तथा यहां के 70 में से 34 जिलों में मातृ मृत्यु अनुपात और लिंगानुपात भी बहुत ज्यादा है। देश के नौ सबसे पिछड़े राज्यों में पहली बार जिला स्तर पर हुए स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नतीजे बुधवार को सार्वजनिक किए गए। पैदा होने के बाद से एक साल की उम्र के दौरान मृत्यु का शिकार हो जाने वाले बच्चों (नवजात शिशु मृत्यु दर) के मामले में उत्तराखंड का रुद्रप्रयाग जिला प्रति हजार जन्म में 19 मौत के अनुपात के साथ सबसे अच्छी स्थिति में रहा, जबकि इस मामले में श्रावस्ती 103 मौत के साथ सबसे बुरी स्थिति में पाया गया। वर्ष 2015 तक नवजात शिशु मृत्यु दर को राष्ट्रीय स्तर पर 28 तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। झारखंड के पूर्वी सिंहभूमि और धनबाद व उत्तराखंड के चमौली, रुद्रप्रयाग, पिथौड़ागढ़ और अल्मौड़ा जिलों ने यह लक्ष्य हासिल कर लिया है। प्रसव के दौरान माताओं की मौत के मामलों में इन राज्यों में जिले की बजाय मंडल स्तर पर अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि उत्तराखंड में जहां प्रति लाख प्रसव में 183 महिलाओं की मौत वहीं यूपी के फैजाबाद मंडल में यह सबसे ज्यादा 451 महिलाओं की मौत होती है। प्रति हजार लड़कों के मुकाबले पैदा होने वाली लड़कियों (जन्म के समय लिंगानुपात) के मामले में यूपी का मुरादाबाद अध्ययन में शामिल पिछड़े जिलों में सबसे बेहतर स्थिति में रहा। यहां प्रत्येक हजार लड़कों के मुकाबले 1030 लड़कियां पैदा हुई जबकि सबसे पीछे उत्तराखंड का पिथौरागढ़ जिला है, जहां हजार लड़कों के मुकाबले सिर्फ 764 लड़कियां पैदा हुई। इस चरण में शामिल किए गए राज्य हैं बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और असम। इसी तरह परिवार नियोजन के उपायों का सबसे कम असर यूपी में दिखा। झारखंड में प्रति हजार आबादी के अनुपात में सबसे कम जन्म हो रहे हैं। जिलेवार देखा जाए तो उत्तराखंड का बागेश्वर जिला सबसे कम जन्म दर वाला जिला साबित हुआ, जबकि श्रावस्ती 40.9 के साथ सबसे ज्यादा जन्म दर वाला जिला रहा।
ये    आलेख   मुझे   खुशी  जी ने  भेजा  है आप यदि इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं देना चाहें तो आप उनके इस इ-मेल आई.डी. पर प्रेषित कर सकते हैं
आलेख-खुशी गोयल
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक  


मंगलवार, 16 अगस्त 2011

वह दिन खुदा करे कि तुझे आजमायें हम.''



''ए दोस्त  हमें तूने बहुत आजमा लिया ,
वह दिन खुदा करे कि तुझे आजमायें हम.''

आज ही क्या हमेशा से महिलाओं के वस्त्र पुरुष सत्तात्मक समाज में विवादों का विषय रहें हैं और जब तब इन्हें लेकर कोई न कोई टीका टिपण्णी चलती ही रहती है .आज सल्ट वाल्क को लेकर विवाद खड़े किये जा रहे हैं कहा जा रहा है कि ये कुछ सिरफिरी युवतियों का कार्य है और साथ ही इसे हिन्दुस्तानी सभ्यता संस्कृति से जोड़कर और  भी गुमराह करने के प्रयास किये जा रहे हैं .कहीं लखनऊ की तहजीब का हवाला दिया जा रहा है और कहा जा रहा है कि ये वो शहर है जहाँ एक समय तवायफें भी सिर ढक कर निकलती थी पर ये कहते हुए भी ये नहीं सोचा जा रहा है कि एक   ऐसी पहल जो बरसों से जुल्म सह रही नारी जाति को वर्तमान में दबाये जा रहे प्राचीन पुरुष  सत्तात्मक समाज में सही स्थान दिलाये जाने के लिए की जा रही है उसे कितनी कुत्सित टिप्पणियों से नवाज़ा जा रहा है .सलीम खान जनाब लखनऊ शहर की तवायफों की सर ढके होने की बात कह इस शहर को  तहजीब वाला कहते हैं पर ये भी तो विचारयोग्य है कि एक शहर सभ्यता में कितना पतनशील कहा जायेगा जहाँ नारी को अपने पेट को भरने के लिए तवायफ बनना पड़े और यहाँ क्या केवल नारी को ही सभ्यता से जोड़ा जायेगा क्या तवायफ वहां रह सकती हैं जहाँ उनके कद्रदान न हों और ये भी साफ है कि तवायफ के कद्रदान में कोई नारी तो नहीं आएगी इसके लिए वहां के पुरुष ही कद्रदान में गिने जायेंगे और ऐसे में वहां की तहजीब पर तो खुद सलीम खान जी ही ग्रहण लगा रहे हैं .
    आरम्भ से लेकर आज तक पुरुष ने नारी को अपनी संपत्ति माना है और उस पर  अपनी इच्छा लादने का प्रयत्न किया है ऐसे में नारी भी काफी कुछ पुरुषवादी सोच में ढल चुकी है और उसके अनुसार रहने को ही अपनी नियति मान चुकी है .नारी समस्याओं की प्रमुख लेखिका श्रीमती प्रेमकुमारी दिवाकर का कथन है -''आधनिक नारी ने निस्संदेह बहुत कुछ प्राप्त किया है पर सब कुछ पाकर भी उसके भीतर का परंपरा से चला आया हुआ कुसंस्कार नहीं बदल रहा है .वह चाहती है कि रंगीनियों से सज जाये और पुरुष उसे रंगीन खिलौना समझकर उससे खेले ,वह अभी भी अपने को एक रंगीन तितली बनाये रखना चाहती है .'' और ऐसी ही स्त्री जाति के रहने के आदि पुरुष समाज द्वारा उसके इस पुरुष आश्रित प्राणी के खोल से बाहर निकलना पुरुष को न कभी सुहाया है न सुहाएगा.स्वतंत्र भारत की नारियों में आज नव चेतना है और वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं वे सही गलत का अंतर कर सकती हैं और विभिन्न अनुभवों ने उन्हें ये सोच बनाने को विवश कर दिया है कि नारी के प्रति होने वाले कोई भी अपराध हों उनमे नारी की गलती का होना हमेशा ज़रूरी नहीं है अपवाद यहाँ सम्मिलित नहीं हैं .नारी को चाहे वह पिता हो ,पति हो ,पुत्र हो या भले ही कोई एक तरफ़ा प्यार में डूबा कोई प्रेमी हो अपने अनुसार चलाना चाहता है और उसके अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल करने  पर वह तिलमिला उठता है.यदि कपडे ही नारी के साथ होने वाले दुष्कर्मों  के लिए उत्तरदायी हैं तो कोई बताये कि खेत में काम  करने वाली महिलाएं जो सिर से लेके पाँव तक ढकी रहती हैं  वे क्यों इसका शिकार बनती हैं .ऐसे बहुत से उदाहरण हैं और ये भी कि बड़े शहरों में ही ये घटनाएँ नहीं हैं ये घटनाएँ छोटे गाँव कस्बों में भी हैं और वहां जहाँ तक अभी का समाज है युवतियां साधारण वस्त्रों में ही दिखाई देती हैं.
   अभी दिल्ली में ये सल्ट वाक हुआ और ये ही बात सामने आई कि जो भी युवतियां इसमें सम्मिलित हुई उन्होंने वे ही कपडे पहने जो साधारणतया वे पहनती हैं और पश्चिमी देशो का कोई अनुसरण यहाँ नहीं दिखाई दिया  ऐसे में इस सल्ट वाक को निंदा का विषय न बनाकर सभी को चाहिए कि इसे प्रोत्साहित करें और अपराध को जड़ से समाप्त करने के अपनी सोच में परिवर्तन लायें और देखें कि ये अपराध जो हमारी नारी जाति को अपनी चपेट में ले रहा है और उसके उज्जवल भविष्य में बाधा बन रहा है इसे मिलजुल कर ख़त्म कर अपने समाज को स्वच्छ वायु दें और इन्हें साँस लेने के लिए सुरक्षित आकाश .इनकी इस मुहीम की सफलता के लिए मैं तो बस यही कहूँगी-
''कदम चूम लेती है खुद आके मंजिल ,
मुसाफिर अगर अपनी हिम्मत न हारे.''
         शालिनी कौशिक

सोमवार, 15 अगस्त 2011

साक्षर भारत मिशन को लेकर उदासीन हैं राज्य‏

खुशबु(इन्द्री)

 कागजों में भले ही बहुत कुछ हो, लेकिन प्रौढ़ अनपढ़ों को साक्षर बनाने का मन शायद राज्य सरकारों का भी नहीं करता। केंद्र ने करीब दो साल पहले साक्षर भारत मिशन शुरू किया था, लेकिन राज्यों ने उसे जरूरी तवज्जो नहीं दी। नतीजा यह है कि कोई भी राज्य ऐसा नहीं, जहां इस मिशन का काम लटका न पड़ा हो। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्य भी इस मामले में कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं। सरकार खुद मानती है कि राज्यों के उदासीन रवैए के चलते निरक्षरता मिटाने के अभियान में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। सूत्रों के मुताबिक पूर्व की समीक्षा बैठक में सहमति जताने के बावजूद बिहार का कामकाज काफी पीछे है। सभी जिला व ब्लाकों पर समन्वयक नहीं नियुक्त हो पाए हैं। बेगूसराय, भोजपुर एवं खगडि़या जिलों में हजारों प्रौढ़ शिक्षा केंद्र अब भी नहीं शुरू हो पाए हैं। सरकार ने 2009-10 में मिशन में शामिल तीन जिलों में धन खर्च की रिपोर्ट भी केंद्र को देने में कोताही की। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का कुछ ऐसा ही हाल है। साक्षर भारत मिशन के पहले चरण (2009-10) में प्रदेश के 26 जिलों को शामिल किया गया था जबकि 66 जिले मिशन में शामिल करने की श्रेणी में आते थे। शेष बचे जिलों को इस साल शामिल किया जाना है। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश ने भी पहले चरण में न सिर्फ धन खर्च में उदासीनता दिखाई, बल्कि स्वयंसेवक शिक्षकों (वालंटियर टीचर) के इंतजाम में कोताही की जबकि उसे लगभग चार लाख ऐसे वालंटियर्स की व्यवस्था करनी थी। प्रौढ़ निरक्षरों को साक्षर बनाने में कुछ इसी से मिलती-जुलती अनदेखी पश्चिम बंगाल, पंजाब और हरियाणा जैसे दूसरे राज्यों में भी सामने आई है। केंद्र की नजर में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र समेत चार प्रदेश की सरकारों ने अपने राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण को जरूरी तवज्जो नहीं दी। मालूम हो कि 2001 में देश में लगभग 30 करोड़ लोग निरक्षर थे। सरकार मानकर चल रही थी कि मिशन कामयाब हुआ तो 2012 तक इसमें 10 से 11 करोड़ की कमी हो जाएगी, लेकिन राज्यों के रुख को देख नहीं लगता कि यह हो पाएगा। सरकार ने 15 से 35 आयु वर्ग के प्रौढ़ निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिए सितंबर, 2009 में साक्षरता भारत मिशन की शुरुआत की थी
ये आलेख ख़ुशी जी ने मुझे इ-मेल से भेजा है आप यदि उन्हें अपने विचार प्रेषित करना चाहें तो इस मेल पर भेज सकते हैं.
khushbu.go​yal16@gmail​.कॉम
लेखिका-ख़ुशी गोयल 
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

रविवार, 14 अगस्त 2011

स्वतंत्रता दिवस भ्रष्टाचार और आज की पीढ़ी




स्वतंत्रता दिवस  की ६५ वीं वर्षगांठ मनाने को लेकर जहाँ सरकारी क्षेत्र में हलचल मची है वहीँ जनता में असमंजस है कि हम क्या करें क्योंकि जनता को आज कहीं भी ऐसी स्थिति नहीं दिखती  जिसे लेकर आजादी की खुशियाँ मनाई जा सकें .अमर उजाला ने अपने रविवार के संस्करण में  ''आजादी,अन्ना और सितारों की तमन्ना ''शीर्षक युक्त आलेख में जो कि सुमंत मिश्र ने लिखा है में आजादी को लेकर हमारे कुछ प्रसिद्द फ़िल्मी कलाकारों के विचार प्रस्तुत किये हैं .जो निम्नलिखित हैं-
  • सुष्मिता सेन के अनुसार-''हमें अनुशासित होने की ज़रुरत है....अन्ना की आवाज़ से आम लोगों की उम्मीदें  आ जुडी हैं.''
  • अनुपम खेर कहते   हैं पिछले ६० सालों से आम लोगों को देश के नेता  बेवकूफ बना रहे हैं लेकिन अन्ना हजारे आम आदमी की आवाज़ बनकर आगे आयें हैं.''
  • फ़िल्मकार गुलज़ार का कहना है ,''अन्ना हजारे नहीं हजारों हैं.........देश को सुरक्षित रखने की मुहिम में जुटे.....अन्ना के समर्थन में युवाओं की फ़ौज उसी तरह आ कड़ी हुई है जिस तरह जय प्रकाश आन्दोलन के समय आ खड़ी हुई थी .''
  • अभिनेता   शत्रुघ्न सिन्हा कहते हैं-''आज  से ६४ साल पहले आजादी जिन आदर्शों पर मिली थी आज न उस तरह के आदर्श हैं न उस तरह के चरित्र वाले नेता.....भ्रष्टाचार  से देश की हवा बदबूदार हो गयी है .अन्ना हजारे देश में एक ताज़ा हवा का झोंका लेकर आयेंगे.
  • ये तो थे आज के स्वतंत्रता दिवस पर भ्रष्टाचार के खात्मे को प्रयासरत अन्ना को लेकर और आज की पीढ़ी के विचार जो    कि अमर उजाला ने प्रस्तुत किये अब यदि हम हिंदुस्तान दैनिक के द्वारा प्रस्तुत इस सम्बन्ध में स्वाधीनता सेनानियों के विचार जाने तो वे कुछ यूँ हैं-
  • ३२ साल की उम्र में जंग-ए-आजादी में कूदने वाले गंगाराम सहाय  आज के हालातों से दुखी हैं .उनका कहना है कि सभी राजनीतिक पार्टियाँ स्वार्थ से जुड़कर काम कर रही हैं भ्रष्टाचार की बेड़ियों में देश जकड़ता जा रहा है.
  • नेताजी सुभाष चंद बोस की आजाद हिंद फ़ौज में शामिल हो पञ्च साल तक अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले ८७ वर्षीय ओम प्रकाश सत्ताधारी नेताओं से पूरी तरह नाराज हैं उनका कहना है कि जब तक भ्रष्टाचार को नहीं मिटाया जायेगा  तब  तक सत्ताधारी नेता भी अपने आचरण को नहीं सुधार सकेंगे  .
  • १६ वर्ष की उम्र में स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले ८६ वर्षीय श्याम सिंह भी  आज के हालात  से दुखी हैं उनका कहना है कि देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए एक जन आन्दोलन की आवश्यकता  है .
  • ज्योति प्रसाद  त्यागी १९४२ के भारत छोडो आन्दोलन में गिरफ्तार हुए चौदह महीने  की जेल हो  गयी के मन में भी एक टीस उभरती है क्या यही वह भारत है जिसका सपना अमर शहीदों व् मेरे जैसे जंग-ए-आजादी के सिपाहियों ने देखा था.
''नावें डगमगा  रही कांप  रहे मस्तूल,
मांझी फिर भी कह रहे मौसम है अनुकूल.''
आज की स्थितियां न केवल फ़िल्मी सितारों और स्वाधीनता संग्राम में अपना जीवन  लगाने वाले इन लोगों को उद्द्वेलित कर रही हैं बल्कि आम आदमी भी इसे लेकर नाराज है किन्तु उसकी ये नाराजगी मात्र भ्रष्टाचार को लेकर है  स्वतंत्रता दिवस को मनाने को लेकर उसमे कोई उत्साह नज़र नहीं आता है.साल में ये दो दिन जो कि हम भारतीयों के लिए अति महत्वपूर्ण माने जाने चाहियें -''गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता   दिवस ''दोनों मात्र अवकाश के दिन के तौर पर याद रखे जाते हैं .नवीन जिंदल जी  ने जो घर घर पर तिरंगा झंडा फहराने का अधिकार हम भारतीयों को दिलाया है उसे लेकर कोई खास उत्साह हम भारतीयों में नहीं दीखता उससे ज्यादा उत्साह तो क्षेत्र में एक अभिनेता या अभिनेत्री के आगमन पर दिख जाता है .बच्चे अपने देश के इन महत्वपूर्ण दिवसों को मात्र स्कूल कोलेज के समारोह के रूप में लेते हैं और उससे ज्यादा न वे जानते हैं न जानना चाहते हैं. 
आज भ्रष्टाचार को लेकर  लोग जाग रहे हैं वो भी यूँ कि उन्हें जगाया जा  रहा है अन्ना द्वारा .भला ये भी कोई बात हुई कि बार बार इन सोते लोगों को जगाया जाये .क्या देश के वीरों द्वारा अपने प्राण न्योछावर कर जो आजादी हमें दिलाई गई उसे लेकर हमारी कोई जिम्मेदारी नही बनती  क्या ये हमारी जिम्मेदारी नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी में इस दिन के महत्व के बारे में जागरूकता लायें  और उसे देश से भावनात्मक रूप से जोड़ें.
आज हमें चाहिए कि हम पूरे जोश-ओ-खरोश से स्वयं भी अपने शहीदों को याद करें और अपनी पीढ़ी  को भी उनके बलिदान का महत्व समझा कर उन्हें भी इसे पूरे उत्साह से मनाने को प्रेरित करें.
''स्वतंत्रता दिवस की सभी भारतीयों को बहुत बहुत शुभकामनायें,
सभी असमंजस छोड़ पूरे उत्साह से  मिल कर इसे मनाएं.''
                               शालिनी कौशिक

शनिवार, 13 अगस्त 2011

बहन हो तो ऐसी -जैसी शिखा कौशिक

बहन हो तो ऐसी -जैसी  शिखा  कौशिक  
                               
''आदमी  वो  नहीं  हालत  बदल  दें  जिनको ,  
आदमी वो  हैं जो  हालत  बदल  देते  हैं.''
              पूरी  तरह से खरी उतरती हैं ये पंक्तियाँ मेरी  छोटी  किन्तु  मुझसे विचारों और सिद्धांतों  में  बहुत  बड़ी  मेरी बहन ''शिखा कौशिक पर .
          कोई नहीं सोचता था  कि  ये  छोटी सी लड़की इतने  महान विचारों की धनी होगी और इतनी मेहनती.जब छोटी सी थी तो कहती थी भगवान्  के पास रहते थे उन्होंने हमारा घर दिखाया और उससे यहाँ रहने  के बारे में पूछा  और उसके हाँ करने पर उसे यहाँ छोड़ गए .सारे घर में सभी को वह परम प्रिय थी और सभी बच्चे उसके साथ खेलने  को उसेअपने साथ करने को पागल रहते किन्तु हमेशा उसने मेरा मान   बढाया  और मेरा साथ दिया .
          छोटी थी तो कोई नहीं सोचता  था कि ये लड़की नेट परीक्षा पास करेगी या डबल एम्.ए. और पी.एच.डी.करेगी  .कोई भी परीक्षा पास कर घर आती तो सभी से कहती फर्स्ट आई हूँ सातवाँ आठवां नंबर है.छुट्टियों में   बाबाजी से कहती क्या बाबाजी जरा से पेपर और सारे साल पढाई.सारे समय गुड्डे गुड़ियों से खेलने में  लगी रहने वाली ये लड़की कब पढाई में  जुट गयी पता ही नहीं चला और आज ये हाल हैं कि कोई भी वक़्त जब वह खाली  हो उसके हाथों में कोई न कोई किताब मिल जाएगी.

मैं अपने विचारों में उसमे जो खूबियाँ पाई  हैं वे मैं आज आप सभी से शेयर कर रही हूँ.            
    स्वाभिमान मेरी बहन में कूट कूट कर भरा है ये हमारे स्नातक कॉलेज की बात है जब उसका एडमिशन हुआ तभी मैं समझ गयी थी कि कॉलेज वाले हम दोनों बहनों को ''बेस्ट'' का अवार्ड देने से रहे और इसी कारण मैंने दोनों के सालभर के सभी पुरुस्कारों की सूची तैयार कर ली थी और जब साल के अंत में आया पुरुस्कारों का नंबर तो मेरा विचार सही साबित हुआ और मुझे तीन साल की बेस्ट का अवार्ड देते हुए उन्होंने मेरी बहन का एक साल की बेस्ट का अवार्ड उसके कुछ अवार्ड काटते हुए एक और लडकी को देने का प्रयत्न किया जो मेरे लिए सहन करने की सीमा से बाहर था क्योंकि मेरे कहने पर ही उसने इतनी प्रतियोगिताओं में  पक्षपात सहते हुए भी भाग लिया था  और इस तरह मेरे आक्षेप पर उन्होंने मेरे अवार्ड को भी काटा और आरम्भ हुआ न्यायिक कार्यवाही का सिलसिला और साथ ही मेरी बहन को नीचा दिखाने का सिलसिला [मुझे क्या दिखाते मैं तो बी. ए. के बाद दूसरेकॉलेज में चली गयी थी]और यही वजह थी कि कॉलेज की हर प्रतियोगिता में भाग लेने योग्य होते हुए भी मेरी बहन जो वहां लगातार तीन साल तक कैरम चैम्पियन  रही थी ,कहानी कविता लिखना जिसकी उलटे हाथ का काम था ने एम्.ए. में  किसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया क्योंकि अपने स्वाभिमान पर कोई चोट वह बर्दाश्त नहीं कर सकती थी.       
 बाहर से कठोर दिखने वाली मेरी ये बहन अन्दर से कितनी कोमल ह्रदय है ये मैं ही जानती हूँ.मेरी जरा सी तबियत ख़राब हुई नहीं कि उसके माथे पर चिंता की रेखाएं उभर आती हैं .मेरे बेहोश होने पर वह बेहोश तक हो जाती है जबकि कहने को हमारे में कोई जुड़वाँ वाला सम्बन्ध नहीं है.और जब तक मुझे ठीक नहीं कर लेती तब तक चैन की एक साँस तक वह नहीं लेती.
         माता-पिता के हर कार्य को पूर्ण करने में वह सदा  तत्पर  रहती है और जहाँ तक हो सके ये काम वह अपने हाथ में ही रखती है और उनकी सेवा करने में दिन रात का कोई ख्याल  उसके मन में कभी नहीं आता है.    
       हम जहाँ रहते हैं वहां पर जब नेट परीक्षा की बात आई तो  कहीं से कोई जानकारी हमें उपलब्ध नहीं हुई पर ये उसकी ही दृढ इच्छा थी कि उसने स्वयं न केवल जानकारी हासिल की बल्कि बिना किसी कोचिंग की मदद के पहले ही प्रयास में हिंदी विषय में नेट परीक्षा पास कर दिखाई. 
             आज भाई भतीजावाद का युग है और ऐसे में हम सभी अपने अपने को बढ़ाने में लगे हैं किन्तु जहाँ तक उसकी बात है वह इस सब के खिलाफ है और इसका एक जीता जगता उदहारण ये है कि आज 13 अगस्त को मैं   यह  पोस्ट लिखने की आज्ञा शिखा से ले पाई हूँ और पहले इसे इसी कारण अपने ब्लॉग पर डाल रही हूँ कि कहीं कोई और पोस्ट उसके भारतीय नारी ब्लॉग पर आ जाये और उसका विचार पलट जाये.
   मैं उसकी इन भावनाओं का दिल से सम्मान करती हूँ क्योंकि आज कोई तो है जो मुझे सही राह दिखा सके.उसके विचार मुझे बहुत कुछ ''कलीम   देहलवी  ''के  इन विचारों से मिलते लगते हैं-
''हमारा फ़र्ज़ है रोशन करें चरागे वफ़ा,
हमारे अपने मवाफिक हवा मिले न मिले.''
             शालिनी कौशिक

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...