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ग़ज़ल-पहेली

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  सियासत से बचो इसकी ,करीब ऐसे दिन आये , छुरी घोपे जिन हाथों से ,उन्हीं को जोड़कर आये , महारत इसको हासिल है ,क़त्ल में और खुशामद में , संभल जाओ वतन वालो ,ये नेता जब नज़र आये . ......................................................... मुशफ़िक़ है मुआ ऐसा ,जल्लाद शरम खाये , मुस्कान से ये अपनी ,मुर्दा मुझे कर जाये , मौका परस्त ऐसा ,मेराज समझ मुझको , मैयत मेरी सजाकर ,मासूम बनकर आये . ................................................. जन्मा ये जिस जमीं पर ,उसपर ही ज़ुल्म ढाये , जमहूर के गले लग ,जेबें भी क़तर जाये , करता खुशामदें है ,पाने को तख़्त आज , पाये जो गद्दी ,गरदनों पे छुरी फेर जाये . .................................. फितरत से है तकसीमी ,तंगदिल ही नज़र आये , तजवीज़ ये बड़ों की ,बिल्कुल न समझ पाये , कितने ही वार करले ,कितना ही मुंह छुपाले , नेता या आम इंसां ,करनी से बच न पाये . ....................................... तरक्की की सभी मंज़िल ,हमारा मुल्क चढ़ जाये , मगर जिसकी ये मेहनत है ,उसे ये देख न पाये , ये चाहे बांटना हमको ,हिन्दू और मुसलमाँ में , भले इसकी सियासत से ,लहू का दरिया बह जाये ....