शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

ऐसे ही सिर उठाएगा ये मुल्क शान से .



My India My Pride

फरमा रहा है फख्र से ,ये मुल्क शान से ,
कुर्बान तुझ पे खून की ,हर बूँद शान से।
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फराखी छाये देश में ,फरेब न पले ,
कटवा दिए शहीदों ने यूँ शीश शान से .
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 देने को साँस लेने के ,काबिल वो फिजायें ,
कुर्बानी की राहों पे चले ,मस्त शान से .
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आज़ादी रही माशूका जिन शूरवीरों की ,
साफ़े की जगह बाँध चले कफ़न शान से .
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कुर्बानी दे वतन को जो आज़ाद कर गए ,
शाकिर है शहादत की हर  नस्ल  शान से .
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इस मुल्क का गुरूर है वीरों की शहादत ,
फहरा रही पताका यूँ आज शान से .
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मकरूज़ ये हिन्दोस्तां शहीदों तुम्हारा ,
नवायेगा सदा ही सिर सरदर शान से .
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पैगाम आज दे रही कुर्बानियां इनकी ,
घुसने न देना फिर कभी सियार  शान से .
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करते हैं अदब दिल से अगर हम शहीदों का ,
छोड़ेंगे बखुशी सब मतभेद शान से .
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इस मुल्क की हिफाज़त दुश्मन से कर सकें ,
सलाम मादरे-वतन कहें आप  शान से .
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मुक़द्दस इस मुहीम पर कुर्बान ''शालिनी'' ,
ऐसे ही सिर उठाएगा ये मुल्क शान से .

शालिनी कौशिक 
[कौशल]

[शब्दार्थ-सरदर-सब मिलकर एक साथ ]







रविवार, 8 मई 2016

राष्ट्रीय पुरस्कार :ड्रेस कोड बनाना ही होगा .

शालीनता भारतीय नारी का सर्वश्रेष्ठ आभूषण रहा है और आजतक भारतीय नारी इस आभूषण को अपने वस्त्रों के चयन के माध्यम द्वारा पूरी दुनिया के समक्ष रख एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत  करती  रही है .देश के बहुत से समारोहों में इस परंपरा का पालन किया जाता रहा है विशेषकर राष्ट्रपति जी द्वारा प्रदत्त पुरस्कारों के अवसर पर .भले ही राष्ट्रपति स्वयं महिला हों वे भी इसी परंपरा को निभाने में ही स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती रही हैं -
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भले ही खेल के मैदान में स्कर्ट पहनने के कारण विवादों से घिरी रही हो लेकिन राष्ट्रपति जी से पुरस्कार लेते समय अपने देश की परंपरा निभाना नहीं  भूलती
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खिलाडी वर्ग खेल के वक़्त बहुत सी ऐसी वेशभूषा धारण करती हैं जो हमारे देश की संस्कृति के अनुरूप नहीं हैं किन्तु वे वेशभूषाएं खेल के लिए ज़रूरी है तब भी वे पुरस्कार लेते वक़्त एक शालीन वेशभूषा में राष्ट्रपति जी से पुरस्कार लेने के लिए उपस्थित होती हैं -
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ऐसे ही फिल्मों में दृश्य की मांग पर अभिनेत्रियों को बहुत कुछ ऐसा पहनने की छूट मिली हुई है जो भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है लेकिन वहां ये छूट उन्हें देनी पड़ती है किन्तु धीरे धीरे इस छूट का वे नाजायज फायदा उठाने में लगी हैं पहले जहाँ अभिनेत्रियां राष्ट्रीय पुरस्कार में शालीनता से उपस्थित होती थी -
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उसे अब पुरस्कार लेने आने वाली अभिनेत्री कंगना द्वारा पूरी तरह से तोड़ दिया गया -
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जिसे देखते हुए ये कहा जा सकता है कि आगे ऐसी धृष्टता न हो इसके लिए इस सम्बन्ध में ड्रेस कोड बनाना आवश्यक होना चाहिए .वर्ना एक पुराना फ़िल्मी गाना यहाँ तो पूरी तरह से फिट बैठ ही जायेगा और भारतीय संस्कृति का पूरी तरह से हो जायेगा बेडा गर्क -
''पहले तो था चोला बुरका ,
फिर कट-कटकर वो हुआ कुर्ता ,
चोले की अब चोली है हुई ,
चोली के आगे क्या होगा ?

ये प्रश्न तो हम सबको अब विचारना ही होगा .

शालिनी कौशिक 
        [कौशल ]

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

हर्ष फायरिंग की अनुमति है ही क्यों ?

हर्ष फायरिंग एक ऐसा शब्द जो पूरी तरह से निरर्थक कार्य कहा जा सकता है और इससे ख़ुशी जिसे मिलती हो मिलती होगी लेकिन लगभग 10 हर्ष फायरिंग १ जान तो ले ही लेती है ये अनुमान संभवतया लगाया जा सकता है .अभी हाल ही में कैराना ब्लॉक प्रमुख के चुनाव की मतगणना के बाद हुई हर्ष फायरिंग में एक बच्चे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया और  अभी

''हिसार में शादी के तैयारियों के बीच दुल्हन के दरवाजे पर हर्ष फायरिंग में गोली दूल्हे को जा लगी जिससे दूल्हा जख्मी हो गया। दूल्हे को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।''

तब  भी इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा रहा जैसे की यह कोई बहुत आवश्यक कार्य हो जैसे किसी भी पूजा से पहले गणेश जी की पूजा ज़रूरी है ,जैसे रामायण पाठ से पहले हनुमान जी का आह्वान आवश्यक है वैसे ही लगता है कि ये हर्ष फायरिंग भी ख़ुशी के इज़हार का सबसे ज़रूरी कार्य है और भले ही कितने लोग इसके कारण शोक में डूब जाएँ लेकिन इसका किया जाना प्रतिबंधित नहीं किया जायेगा आखिर क्यों ? एक ऐसा कार्य जो खुशियों को मातम में बदल दे ,एक जीते जागते इंसान को या तो मौत के द्वार तक पहुंचा दे या फिर मौत के घाट ही उतार दे उसे मात्र खुशियों का दिखावा करने के लिए जारी रखने की अनुमति इस देश का कानून क्यों देता है ? जब इस देश में कानून हाथ में लेना अपराध है और केवल आत्मसुरक्षा में ही हथियार उठाने की अनुमति है तब यहाँ किस कारण हथियार को हाथ में लेने की अनुमति दी जाती है ?


शालिनी कौशिक
     [कौशल ]


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

कैसे माने कमतर शक्ति ,हर महिका सम नारी की .

The Brave Women of India21-Year-Old Shreya...
भावुकता स्नेहिल ह्रदय ,दुर्बलता न नारी की ,
संतोषी मन सहनशीलता, हिम्मत है हर नारी की .
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भावुक मन से गृहस्थ धर्म की , नींव वही जमाये है ,
पत्थर दिल को कोमल करना ,नहीं है मुश्किल नारी की.
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होती है हर कली पल्लवित ,उसके आँचल के दूध से ,
ईश्वर के भी करे बराबर ,यह पदवी हर नारी की .
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जितने भी इस पुरुष धरा पर ,जन्मे उसकी कोख से ,
उनकी स्मृति दुरुस्त कराना ,कोशिश है हर नारी की .
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प्रेम प्यार की परिभाषा को ,गलत रूप में ढाल रहे ,
सही समझ दे राह दिखाना ,यही मलाहत नारी की .
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भटके न वह मुझे देखकर ,भटके न संतान मेरी ,
जीवन की हर कठिन डगर पर ,इसी में मेहनत नारी की .
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मर्यादित जीवन की चाहत ,मर्म है जिसके जीवन का ,
इसीलिए पिंजरे के पंछी से ,तुलना हर नारी की .
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बेहतर हो पुरुषों का जीवन ,मेरे से जो यहाँ जुड़े ,
यही कहानी कहती है ,यहाँ शहादत नारी की .
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अभिव्यक्त क्या करे ''शालिनी ''महिमा उसकी दिव्यता की ,
कैसे माने कमतर शक्ति ,हर महिका सम नारी की .
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                      शालिनी कौशिक 
                               [कौशल ]

शब्दार्थ -मलाहत-सौंदर्य 
                                     

सोमवार, 28 मार्च 2016

क्या ये जनता भोली है ?


   
''जवां सितारों को गर्दिश सिखा रहा था ,
 कल उसके हाथ का कंगन घुमा रहा था .
 उसी दिए ने जलाया मेरी हथेली को ,
  जिसकी लौ को हवा से बचा रहा था .''
तनवीर गाजी का ये शेर बयां करता है वह हालात  जो रु-ब-रु कराते हैं हमें हमारे सच से ,हम वही हैं जो सदैव से अपने किये की जिम्मेदारी लेने से बचते रहे हैं ,हम वही हैं जो अपने साथ कुछ भी बुरा घटित होता है तो उसकी जिम्मेदारी दूसरों पर थोपते रहते हैं हाँ इसमें यह अपवाद अवश्य है कि यदि कुछ भी अच्छा हमारे साथ होता है तो उसका श्रेय हम किसी दूसरे को लेने नहीं देते -''वह हमारी काबिलियत है ,,वह हमारा सौभाग्य है ,हमने अपनी प्रतिभा के ,मेहनत के बल पर उसे हासिल किया है .''...ऐसे ऐसे न जाने कितने महिमा मंडन हम स्वयं के लिए करते हैं और बुरा होने पर .....यदि कहीं किसी महिला ,लड़की के साथ छेड़खानी देखते हैं तो पहले बचकर निकलते हैं फिर कहते हैं कि माहौल बहुत ख़राब है ,यदि किसी के साथ चोरी ,लूट होते देखते हैं तो आँखें बंद कर पुलिस की प्रतीक्षा करते हैं आदि  .आज जनता जिन हालात से दो चार हो रही है उसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है ,एक तरह से सही भी है क्योंकि परिवार के बड़े का यह दायित्व बनता है कि वह परिवार की हर तरह की ज़रुरत को देखे और पूरी करे व् समस्याओं से भली भांति निबटे किन्तु  इससे परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती .
  *अभी हाल ही में १६ सितम्बर २०१२ को दिल्ली में दामिनी गैंगरेप कांड हुआ .जब तक बस में दामिनी व् उसका दोस्त थे किसी को जानकारी नहीं थी किन्तु जब वे सड़क पर गिरे हुए थे वस्त्र विहीन रक्त रंजित पड़े हुए थे क्या जनता में से किसी एक ने भी उनके पास जाकर मानव होने का सबूत दिया ,नहीं दिया ,बल्कि सभी गाड़ियाँ बचा-बचाकर निकल ले गए और सब कुछ पुलिस पर छोड़ दिया गया ,ये तो ,ये तो बस के भीतर कांड हो रहा था कोई नहीं जानता था कि क्या हो रहा है किन्तु २ अप्रैल २०१३ को कांधला [शामली]में चार बहनों पर तेजाब फेंका गया .एक बहन ने एक आरोपी को पकड़ा भी किन्तु जनता की व्यस्त आवाजाही की वह सड़क क्यूं नपुंसक बन गयी न तो किसी  आरोपी को तब पकड़ा और न ही बहनों की सहायता को आगे बढ़ी और वे बहनें खुद ही किसी तरह रिक्शा करके अस्पताल गयी .क्या ऐसी जनता को मदद का हक़दार कहा जा सकता है ? 
*दिनदहाड़े क़त्ल होते हैं ,लोगों के बीच में होते हैं जनता आरोपियों को पहचानती है ,आरम्भ में भावुकतावश गवाही भी देती है किन्तु बाद में होश में आये हुए की तरह अदालत में जाकर मुकर जाती है क्या कानून की सहायता जनता का कर्तव्य नहीं है ?क्या अपराधियों के इस तरह खुलेआम फिरने में जनता स्वयं मददगार नहीं है ?वीरप्पन जैसे कुख्यात अपराधी जो कानून व् प्रशासन की नाक में दम किये रहते हैं ,निर्दोषों का क़त्ल करते हैं क्या जनता की मदद  के बगैर वीरप्पन  इतने लम्बे समय तक कानून को धोखा दे सकता था ?
*खुलेआम लड़कियों के साथ छेड़खानी होती है दुष्कर्म की घटनाएँ बढ़ रही हैं और जनता धर्म,जाति व् वर्गों में ही उलझी हुई है .जिनके लड़के ऐसी वारदातें कर रहे हैं वे स्वयं दूसरे पक्ष पर दोषारोपण कर अपने लड़कों  को बचा रहे हैं  ,जनता में से ही एक वर्ग ऐसी घटनाओं का विरोध करने वालों को अंजाम भुगतने की धमकी दे रहा है ,क्या ये जनता की कारस्तानियाँ नहीं हैं ?क्या ये सभी की जानकारी में नहीं हैं ?
*खाद्य पदार्थों की बिक्री करने वाले व्यापारी अपने यहाँ असली नकली सभी तरह  का सामान रखते हैं .अनपढ़ ,सीधे साधे लोगों को यदि किसी सामान की ,क्योंकि उनके द्वारा उसकी मिलावट की जाँच किया जाना संभव नहीं होता इसलिए खुले रूप में बिक्री करते हैं और यदि पकड़ लिए जाएँ तो कहते हैं कि ''हमें अपने  बच्चे पालने हैं  ''क्या ये जनता नहीं है जिसे अपने बच्चे तभी पालने हैं  जब वह दूसरे के बच्चे मार ले .और ये तो पकडे जाने पर हाल हैं वर्ना मामला तो इससे पहले ही जाँच अधिकारी के आने की सूचना मिल जाने के कारण सामान को खुर्द बुर्द कर पहले ही रफा दफा कर दिया जाता है और व्यापारी को क्लीन चिट मिल जाती है और पकडे जाने में भी जनता की कोई निस्वार्थ कार्यवाही नहीं बल्कि एक गलत काम करने वाला अपनी प्रतिस्पर्धा के कारण अपने प्रतिद्वंदी को पकडवा देता है .क्या ये जनता भोली कही जाएगी ?
*अदालतों में काम नहीं होता इसी जनता की आम शिकायत है जबकि मुक़दमे जनता के ,वादी-प्रतिवादी जनता ,कभी वादी द्वारा अनुपस्थिति की दरख्वास्त तो कभी प्रतिवादी द्वारा ,वकील की अनुपस्थिति को तो कोर्ट कोई महत्व नहीं देती ,उस पर तारीख-पे तारीख पे तारीख का रोना भी जनता ही रोती है  ,अदालती कार्यवाही  को बेकार भी जनता ही कहती है क्या उसका ऐसी स्थिति में कोई योगदान नहीं ?
*बिजली के लिए पहले लगाये गए तारों पर कटिया डालकर बिजली आसानी से अवैध रूप से ली जा रही थी जब नए तार लगाने के लिए बिजली कर्मचारी जनता के बीच पहुँचते हैं तो उन्हें वही न्यायप्रिय जनता मार-पीटकर क्यूं भगा देती है मात्र इसलिए क्योंकि अब वे तार रबड़ के हैं और कटिया डालकर अवैध रूप से बिजली लेना संभव नहीं रहेगा .
*धूम्रपान सार्वजानिक स्थलों पर मना किन्तु जनता जब तब इस कानून का उल्लंघन करती है .गुटखा खाना मना पर कहाँ मना हुआ बिकना जनता चोरी छिपे इसका प्रयोग करती है .गाड़ियों पर काले शीशे माना किन्तु अब  भी दिखती हैं जनता की काले शीशे  की गाड़ियाँ .सिगरते १८ साल से कम उम्र के बच्चे को बेचना माना किन्तु वे खरीदते भी हैं और पीते भी हैं जनता के बीच में ही .
*कुपोषण का ठीकरा भी अब सरकार के माथे फोड़ा जा रहा है ,कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अन्न सड़ रहा है ,जनता को नहीं बांटा  जा रहा है ,सरकार की प्रतिबद्धता में कमी है किन्तु यदि सरकार इन्हें जनता में बाँटने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों में वितरित भी कर दे तो हाल क्या होगा ?जनता निश्चित दिन लेने पहुंचेगी और उसे अगले दिन ,किसी और समय कहकर टरका दिया जायेगा और जब बांटा जायेगा तब ऐसी आपाधापी में कि जनता को मात्र ऐसे पहुंचेगा जैसे ऊंट के मुहं में जीरा .
   *सरकार की योजना मिड-डे-मील ,जो अन्न आता है बच्चों में बाँटने के लिए कितने ही स्कूल उसे बाज़ार में बेच रहे हैं ऐसी सूचनाएँ सभी  जानते हैं .
  सरकार चाहे कौंग्रेस की हो या भाजपा की या जनता दल या किसी अन्य दल की ,जनता के हित  में बहुत सी योजनायें बनती हैं किन्तु पहले नेता ,फिर सरकारी अधिकारी फिर व्यापारी और फिर जनता में से हम में से ही कुछ दबंग उन्हें निष्फल बना  देते हैं .कुछ लोगों के लिए ही ये लाभकारी रहती हैं और जनता जनता का एक बड़ा वर्ग इसके लिए तरसता ही रहता है .क्यूं जनता यहाँ अपनी जिम्मेदारी से इंकार करती है जबकि इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता की ही है .
जब चुनाव का वक्त आता है ,वोट देने का नंबर आता है तब जनता गरीबी के कारण शराब ,साड़ी में बिक जाती है किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल गरीब जनता  ही बिकती है ,अमीर जनता भी बिकती है ,वह शरीफ ,योग्य ,ईमानदार प्रत्याशी के स्थान पर देखती है दबंगई ,वह देखती है कि किस प्रत्याशी में दम है कि मेरे मुक़दमे अदालत के बाहर  निबटवा दे ,मुझे अपने प्रभाव से टेंडर दिलवा दे ,दूसरे की जमीन का ये हिस्सा मुझे गुंडागर्दी से दिलवा दे ,मेरे साथ खड़ा हो तो दूसरों को भय ग्रस्त  करा दे .ऐसे में जनता सरकार को दोष देने का अधिकार ही कहाँ रखती है जबकि वह स्वयं भी इस देश को लूटकर खाने में लगी है .जब कोई कालिदास बन उसी शाख पर बैठकर उसी को काट रहा हो तो क्या उसे होने वाले नुकसान के लिए आकाश या पाताल को उत्तरदायी ठहराया जायेगा .डॉ.ओ.पी.वर्मा कहते हैं -
  ''बाग को माली जलाना चाहता है ,
 तुम नए पौधे लगाकर क्या करोगे .
लूट ली डोली कहारों ने स्वयं ही ,
सेज दुल्हन की सजाकर क्या करोगे .''
      शालिनी कौशिक  


शनिवार, 26 मार्च 2016

'' न कोशिश ये कभी करना .''


दुखाऊँ दिल किसी का मैं -न कोशिश ये कभी करना ,
बहाऊँ आंसूं उसके मैं -न कोशिश ये कभी करना.

नहीं ला सकते हो जब तुम किसी के जीवन में सुख चैन ,
करूँ महरूम फ़रहत से-न कोशिश ये कभी करना .

चाहत जब किसी की तुम नहीं पूरी हो कर सकते ,
करो सब जो कहूं तुमसे-न कोशिश ये कभी करना .

किसी के ख्वाबों को परवान नहीं हो तुम चढ़ा सकते ,
हक़ीकत इसको दिखलाऊँ-न कोशिश ये कभी करना .

ज़िस्म में मुर्दे की जब तुम सांसे ला नहीं सकते ,
बनाऊं लाश जिंदा को-न कोशिश ये कभी करना .

समझ लो ''शालिनी ''तुम ये कहे ये जिंदगी पैहम ,
तजुर्बें मेरे अपनाएं-न कोशिश ये कभी करना .
                                  शालिनी कौशिक 
                                       [कौशल]

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

तलवार अपने हाथों से माया को सौंपिये.


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बेबाक बोलना हो बेबाक बोलिये,
पर बोलने से पहले अल्फाज तोलिये.
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दावा-ए-सर कलम का करना है बहुत आसां,
अब हारने पर अपने न कौल तोडिये.
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बारगाह में हो खडे बन सदर लेना तान,
इन ताना-रीरी बातों की न मौज लीजिए.
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पाकीजा खयालात अगर जनता के लिये हैं,
मांगने से पहले हक उनका दीजिए.
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सच्चाई दिखानी है माया को स्मृति,
अपने कहे हुए से पीछे न लौटिये.
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मुश्किल अगर हो काटना, अपने ही हाथों सिर,
तलवार अपने हाथों से माया को सौंपिये.
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अब सर-कलम न मुद्दा रह गया स्मृति,
सरकार की इज्जत की ना नीलामी बोलिये.
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ये "शालिनी" दे रही है, खुल तुमको चुनौती,
कानून के मजाक की ना राह खोलिये.
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शालिनी कौशिक
कौशल