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क्या हैदराबाद आतंकी हमला भारत की पक्षपात भरी नीति का परिणाम है ?नहीं ये ईर्ष्या की कार्यवाही .

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21 फरवरी 2013 हैदराबाद में आतंकी हमले ने न केवल दहलाया बल्कि पोल खोलकर रख दी हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था की जिसमे ये कहा जाता है कि ''यह संघात्मक व् एकात्मक का सम्मिश्रण है ''अर्थात सामान्यतया इसका रूप संघात्मक बना रहता है किन्तु संकटकाल में राष्ट्रीय एकता व् सुरक्षा के दृष्टिकोण से ऐसे उपबंधों का समावेश किया गया है जो संघात्मक ढांचे को एकात्मक ढांचे में परिणित कर देते हैं .''          केंद्र व् राज्य दोनों ही इन हमलों की ख़ुफ़िया सूचना के प्रति बरती गयी लापरवाही की जिम्मेदारी एक दूसरे पर डाल रहे हैं .एक ओर जहाँ केंद्रीय ख़ुफ़िया एजेंसी यह कह रही है कि हैदराबाद समेत चार शहरों को आतंकी हमले की आशंका को लेकर खास एलर्ट भेजा गया था वहीँ आंध्र के सी.एम्.किरण रेड्डी का कहना है कि एलर्ट में आतंकी हमले के बारे में कोई सूचना नहीं थी वह सामान्य एलर्ट था रेड्डी ने कहा कि इस तरह के एलर्ट केंद्र से मिलते रहते हैं ..अब दोनों तरफ के वक्तव्य कितने सही तथ्य पर आधारित हैं ये तो वे ही जाने किन्तु जब दोनों जगह एक ही दल की सरकार हो तब ऐसे मामलों में लापरवाही की उम्मीद बेमानी है किन

अरे भई मेरा पीछा छोडो .

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     कविवर गोपाल दास ''नीरज''ने कहा है -   ''जितनी देखी दुनिया सबकी दुल्हन देखी ताले में    कोई कैद पड़ा मस्जिद में ,कोई बंद शिवाले में ,     किसको अपना हाथ थमा दूं किसको अपना मन दे दूँ ,    कोई लूटे अंधियारे में ,कोई ठगे उजाले में .'' धर्म के   ये ही दो रूप हमें भी दृष्टिगोचर होते हैं .कोई धर्म के पीछे अँधा है तो किसी के लिए धर्म मात्र दिखावा बनकर रह गया है .धर्म के नाम पर सम्मेलनों की ,विवादों की ,शोर-शराबे की संख्या तो दिन-प्रतिदिन तेजी से बढती जा रही है लेकिन जो धर्म का मर्म है उसे एक ओर रख दिया गया है .आज जहाँ देखिये कथा वाचक कहीं भगवतगीता ,कहीं रामायण बांचते नज़र आयेंगे ,महिलाओं के सत्संगी संगठन नज़र आएंगे .विभिन्न समितियां कथा समिति आदि नज़र आएँगी लेकिन यदि आप इन धार्मिक समारोहों में कथित सौभाग्य से  सम्मिलित होते हैं तो ये आपको पुरुषों का  बड़े अधिकारियों, नेताओं से जुड़ने का बहाना ,महिलाओं का एक दूसरे की चुगली करने का बहाना  ही नज़र आएगा .      दो धर्म विशेष ऐसे जिनमे एक में संगीत पर पाबन्दी है तो गौर फरमाएं तो सर्वाधिक कव्वाली,ग़ज़ल गायक

अकलमंद ऐसे दुनिया में तबाही करते हैं .

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  तबस्सुम चेहरे पर लाकर हलाक़ करते हैं , अकलमंद ऐसे दुनिया में तबाही करते हैं . बरकंदाज़ी करते ये फरीकबंदी की , इबादत गैरों की अपनों से फरक करते हैं . फ़रेफ्ता अपना ही होना फलसफा इनके जीवन का , फर्जी फरजानगी की शख्सियत ये रखते हैं . मुनहसिर जिस सियासत के मुश्तरक उसमे सब हो लें , यूँ ही मौके-बेमौके फसाद करते हैं . समझते खुद को फरज़ाना मुकाबिल हैं न ये उनके, जो अँधेरे में भी भेदों पे नज़र रखते हैं . तखैयुल पहले करते हैं शिकार करते बाद में , गुप्तचर मुजरिम को कुछ यूँ तलाश करते हैं . हुआ जो सावन में अँधा दिखे है सब हरा उसको , ऐसे रोगी जहाँ में क्यूं यूँ खुले फिरते हैं .  रश्क अपनों से रखते ये वफ़ादारी करें उनकी , मिटाने को जो मानवता उडान भरते हैं . हकीकत कहने से पीछे कभी न हटती ''शालिनी'' मौजूं  हालात आकर उसमे ये दम भरते हैं . शब्दार्थ-तखैयुल -कल्पना ,फसाद-लड़ाई-झगडा ,फरज़ाना -बुद्धिमान ,मुनहसिर-आश्रित ,बरकंदाज़ी -चौकीदारी ,रश्क-जलन ,फरक-भेदभाव . शालिनी कौशिक        [कौशल ]

सही आज़ादी की इनमे थोड़ी अक्ल भर दे .

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  या खुदा नादानी इनकी दूर कर दे , शहादत-ए-बारीकी से दो -चार कर दे . शहीद कहते हैं किसको नहीं इनको खबर है , वही जो मुल्क की खातिर ये जां कुर्बान कर दे . शहादत देना क्या जाने ऐसा फरेबी , परवरिश करने वाले का ही देखो क़त्ल कर दे . खुदा की राह में बलिदान पाता वह कदर है , फ़ना खुद को जो खातिर दूसरों की कर दे . न केवल नाम से अफज़ल बनो कश्मीर वालों , दिखाओ हिन्द के बनकर ,जो इसमें असर दे . खुदा का शुक्र मनाओ मिले तुम हिन्द में आकर , होगे नाशाद तुम्हीं गर ये तुम्हे बाहर ही कर दे . दुआ मांगूं खुदा से लाये इनको रास्ते पर , सही आज़ादी की इनमे थोड़ी अक्ल भर दे . हुकूमत कर रहा मज़हब इनके दिलों पर , कलेजे में वतन का इश्क भर दे . जियें ये देश की खातिर मरें ये मुल्क पर अपने , धडकनें रूहों में इनकी इसी कुदरत की भर दे . सफल समझेगी ''शालिनी''सभी प्रयास ये अपने , वतन से प्रेम की शमां अगर रोशन वो कर दे . शब्दार्थ -बारीकी-सूक्ष्मता ,अफज़ल-श्रेष्ठ ,नाशाद-बदनसीब ,       शालिनी कौशिक                 [कौशल ]

दामिनी गैंगरेप कांड :एक राजनीतिक साजिश ?

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दामिनी गैंगरेप कांड :एक राजनीतिक साजिश ?    भारतीय राजनीति साजिशें रचती रही है और साजिशों का शिकार होती रही है किन्तु एक और तथ्य इसके साथ उल्लेखनीय है कि यहाँ जो दिग्गज बैठे हैं उन्हें साजिशें रचने में रुचि है उन्हें खोलने में नहीं .इन साजिशों का कुप्रभाव उनके विरोधी दिग्गज पर पड़ता है किन्तु बर्बाद हमेशा जनता होती है .सत्ता के लिए रची जाने वाले ये साजिशें जनता के लिए बर्बादी ही लाती हैं इन राजनीतिज्ञों के लिए नहीं क्योंकि ये तो जोड़ तोड़ जानते हैं और अपने को सभी तरह की परिस्थितियों में ढाल लेते हैं .      यूँ तो सत्ता का तख्ता पलटने को साजिशें निरंतर चलती रहती हैं किन्तु ये साजिशें तब और अधिक बढ़ जाती हैं जब किसी भी जगह चुनाव की घडी निकट आ जाती है .पहले हमारे नेतागण अपने कार्यों द्वारा जनसेवा कर जनता का समर्थन हासिल करते थे पर अब स्थिति पलट चुकी है और जनता के दिमाग को प्रभावित करने के लिए सेवा दबंगई में परिवर्तित हो चुकी है .गुनाहों की दलदल में गहराई तक धंस चुकी हमारी राजनीति की इस सच्चाई को हम सभी जानते हैं किन्तु हमें इस बारे में एक बार फिर सोचने को विवश किया है सुप्रीम कोर्ट के पू

बद्दुवायें ये हैं उस माँ की खोयी है जिसने दामिनी ,

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शोभना ब्लॉग रत्न सम्मान प्रविष्टि संख्या -6   मेरी  मासूम बेटी ने बिगाड़ा क्या था कमबख्तों , उसे क्यूँ इस तरह रौंदा ,ज़रा मुहं खोलो कमबख्तों . बने फिरते हो तुम इन्सां क्या था ये काम तुम्हारा , नोच डाली कली  मेरी, मरो तुम डूब कमबख्तों . मिटाने को हवस अपनी मेरी बेटी मिली तुमको , भिड़ते शेरनी से गर, तड़पते खूब कमबख्तों . दिखाया मेरी बच्ची ने तुम्हें है दामिनी बनकर ,  झेलकर ज़ुल्म तुम्हारे, जगाया देश कमबख्तों . किया तुमने जो संग उसके मिले फरजाम अब तुमको , देश का बच्चा बच्चा अब, देगा दुत्कार कमबख्तों . कभी एक बेटी थी मेरी करोड़ों बेटियां हैं अब , बचाऊंगी सभी को मैं ,सजा दिलवाकर कमबख्तों . मिला ये जन्म आदम का न इसकी कीमत तुम समझे , जो करना था तुम्हें ऐसा ,होते कुत्तों तुम कमबख्तों . गुजारो जेल में जीवन कीड़े देह में भर जाएँ , तुम्हारा हश्र देखकर, न फिर हो ऐसा कमबख्तों . बद्दुवायें ये हैं उस माँ की खोयी  है जिसने दामिनी , दुआ देती है ''शालिनी'',पड़ें तुम पर ये कमबख्तों .                     शालिनी कौशिक                         [कौशल ]

कैग [विनोद राय ] व् मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन ]की समझ व् संवैधानिक स्थिति का कोई मुकाबला नहीं .

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   एक बहस सी छिड़ी हुई है इस मुद्दे पर कि कैग विनोद राय ने जो किया सही था या नहीं ?अधिकांश यही मानते हैं कि विनोद राय ने जो किया सही किया .आखिर  टी.एन.शेषन से पहले भी कौन जनता था चुनाव आयुक्तों को ?और यह केवल इसलिए क्योंकि एक लम्बे समय से कॉंग्रेस   नेतृत्व से जनता उकता चुकी है और इस कारण जो बात भी कॉंग्रेस सरकार के खिलाफ जाती है उसका समर्थन करने में यह जनता जुट जाती है और दरकिनार कर देती है उस संविधान को भी जो हमारा सर्वोच्च कानून है और हमारे द्वारा समर्थित व् आत्मार्पित है .   हमारे संविधान के अनुच्छेद १४९ के अनुसार -नियंत्रक महालेखा परीक्षक उन कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संसद निर्मित विधि के द्वारा या उसके अधीन विहित किये जाएँ .जब तक संसद ऐसी कोई विधि पारित नहीं कर देती है तब तक वह ऐसे कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संविधान लागू होने के पूर्व भारत के महालेखा परीक्षक को प्राप्त थे .     इस प्रकार उसके दो प्रमुख कर्तव्य हैं -प्रथम ,एकाउंटेंट के रूप में वह भारत की संचित निधि में से निकली जाने वाली सभी रकमों पर नियंत्रण रखता है

नारी खड़ी बाज़ार में -बेच रही है देह !

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 अभी अभी  जब मैं चाय बनाने चली तो पहले उसके लिए मुझे चाय के डिब्बे में भरने को चाय का पैकिट खोलना पड़ा वह तो मैंने खोल लिया और जैसे ही मैं डिब्बे में चाय भरने लगी कि क्या देखती हूँ पैकिट के पीछे चाय पीने को प्रेरित करती एक मॉडल का फोटो जिसे  देखकर मन ने कहा क्या ज़रुरत थी इसके लिए ऐसे विज्ञापन की  यही नहीं आज से कुछ दिन पहले समाचार पत्र की मैगजीन में भी एक ऐसा ही विज्ञापन था जिसके लिए उस अंगप्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं थी जो उसके लिए किया गया था .                                               ये तो मात्र ज़रा सी झलक है आज की महिला सशक्तिकरण और उसके आधुनिकता में ढलने की जिसे आज के कथित आधुनिक लोगों का समर्थन भी मिल रहा है और ये कहकर की सुविधा की दृष्टि से ये सब हो रहा है मात्र चप्पल बेचने को ,चाय बेचने को ही नहीं बाज़ार की बहुत सी अन्य चीज़ों को बेचने के लिए नारी देह का इस्तेमाल किया जा रहा है जैसे कि अगर नारी ने कपडे कम नहीं पहने  तो चाय तो बिकेगी ही नहीं या भारत में चाय बिकनी ही बंद हो जाएगी वैसे ही चप्पल जो कि पैरों में पहनी जाती है यदि वह कैटरिना कैफ ने न पहनी और पहनते वक़्त उनके

मीडियाई वेलेंटाइन तेजाबी गुलाब

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मीडियाई वेलेंटाइन तेजाबी गुलाब                                 १४ फरवरी अधिकांशतया वसंत ऋतू के  आरम्भ का समय है .वसंत वह ऋतू जब प्रकृति  नव स्वरुप ग्रहण करती है ,पेड़ पौधों पर नव कोपल विकसित होती हैं ,विद्या की देवी माँ सरस्वती का जन्मदिन भी धरती वासी वसंत पंचमी को ही मनाते हैं .इस दिन विद्यार्थियों के लिए विद्या प्राप्ति के क्षेत्र में पदार्पण शुभ माना जाता  है.ये सब वसंत के आगमन से या फरवरी के महीने से सम्बन्ध ऐसे श्रृंगार हैं जिनसे हमारा हिंदुस्तान उसी प्रकार सुशोभित है जिस प्रकार विभिन्न धर्मों ,संस्कारों ,वीरों ,विद्वानों से अलंकृत है .यहाँ की शोभा के विषय में कवि लिखते हैं -     ''गूंजे कहीं शंख कहीं पे अजान है ,   बाइबिल है ,ग्रन्थ साहब है,गीता का ज्ञान है , दुनिया में कहीं और ये मंजर नहीं नसीब ,   दिखलाओ ज़माने को ये हिंदुस्तान है .''  ऐसे हिंदुस्तान में जहाँ आने वाली  पीढ़ी के लिए आदर्शों की स्थापना और प्रेरणा यहाँ के मीडिया का पुनीत उद्देश्य हुआ करता था .स्वतंत्रता संग्राम के समय मीडिया के माध्यम से ही हमारे क्रांतिकारियों ने देश की जनता में क्रांति का

अफज़ल गुरु आतंकवादी था कश्मीरी या कोई और नहीं .....

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अफज़ल गुरु आतंकवादी था कश्मीरी या कोई और नहीं ..... मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ, मैं गद्दारों को धरती में जिंदा गड्वाने निकला हूँ , वो घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर , जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर .'' वीर रस के प्रसिद्द कवि माननीय हरिओम पंवार जी की ये पंक्तियाँ  आज अफज़ल गुरु की फाँसी पर जो सियासत विपक्षी दलों द्वारा व् अफज़ल गुरु के समर्थकों द्वारा की जा रही है ,पर एकाएक मेरी डायरी की पन्नों से निकल आई और मेरे आगे बहुत से चेहरों की असलियत को सामने रख गयी .कश्मीर और कश्मीरी अलगाववादी भारत के लिए हमेशा से सिरदर्द रहे हैं .पाकिस्तान से बचने के लिए कश्मीर भारत से जुड़ तो गया किन्तु उसके एक विशेष वर्ग की तमन्ना पाकिस्तान ही रहा और उससे ही जुड़ने को वो जब तब भारत को ऐसे जख्म देने में व्यस्त रहा जिन जख्मों के घाव कभी भी सूखने की स्थिति ही नहीं आ पाती .इस जुडाव के फलस्वरूप कश्मीरी हिन्दुओं को अपने घर छोड़ छोड़कर भागना पड़ा और आज तक भी वे विस्थापित की जिंदगी जी रहे हैं और उसपर वे अलगाववादी आज़ादी के लिए संघर्ष रत हैं वो आज़ादी जो किसी गुलामी से नहीं अ

अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं .

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अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं . खत्म कर जिंदगी देखो मन ही मन मुस्कुराते हैं , मिली देह इंसान की इनको भेड़िये नज़र आते हैं . तबाह कर बेगुनाहों को करें आबाद ये खुद को , फितरतन इंसानियत के ये रक़ीब बनते जाते हैं . फराखी इनको न भाए  ताज़िर    हैं ये दहशत के , मादूम ऐतबार को कर फ़ज़ीहत ये कर जाते हैं . न मज़हब इनका है कोई ईमान दूर है इनसे , तबाही में मुरौवत की सुकून दिल में पाते हैं . इरादे खौफनाक रखकर आमादा हैं ये शोरिश को , रन्जीदा कर जिंदगी को मसर्रत उसमे पाते हैं . अज़ाब पैदा ये करते मचाते अफरातफरी ये , अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं . शब्दार्थ :-फराखी -खुशहाली ,ताजिर-बिजनेसमैन ,               मादूम-ख़त्म ,फ़ज़ीहत -दुर्दशा ,मुरौवत -मानवता ,            शोरिश -खलबली ,रंजीदा -ग़मगीन ,मसर्रत-ख़ुशी ,            अज़ाब -पीड़ा-परेशानी .                              शालिनी कौशिक                                      [कौशल ]

संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें कैग

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 संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें कैग     आज उथल-पुथल का दौर है ,जो जहाँ है वह वहीँ से इस कार्य में संलग्न है सरकार ने महंगाई से ,भ्रष्टाचार से देश व् देशवासियों के जीवन में उथल-पुथल मचा दी है ,तो विपक्ष ने कभी कटाक्षों के तीर चलाकर ,कभी राहों में कांटे बिछाकर सरकार की नींद हराम कर दी है कभी जनता लोकपाल मुद्दे पर तो कभी दामिनी मुद्दे पर हमारे लोकतंत्र को आईना दिखा रही है तो कभी मीडिया बाल की खाल निकालकर तो कभी गड़े मुर्दे उखाड़कर हमारे नेताओं की असलियत सामने ला रही है.इसी क्रम में अब आगे आये हैं कैग ''अर्थात नियंत्रक -महालेखा -परीक्षक श्री विनोद राय ,इनके कार्य पर कुछ भी कहने से पहले जानते हैं संविधान में कैग की स्थिति .     कैग अर्थात नियंत्रक-महालेखा-परीक्षक की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद १४८ के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है .अनुच्छेद 149 में नियंत्रक-महालेखा-परीक्षक के कर्तव्य व् शक्तियां बताएं गए हैं -अनुच्छेद १४९-नियंत्रक महालेखा परीक्षक उन कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संसद निर्मित विधि के द्वारा या उसके अधीन विहित किये जाएँ .जब

ये क्या कर रहे हैं दामिनी के पिता जी ?

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ये क्या कर रहे हैं  दामिनी के पिता जी ? दामिनी गैंगरेप कांड अब न्यायालय में  विचाराधीन है और न्यायालय अपनी प्रक्रिया के तहत इसके विचारण व् निर्णय में त्वरित कार्यवाही के लिए प्रयत्न शील हैं .१६ दिसंबर २०१२ की रात को बर्बरता की हदें लांघने वाला ये मामला जैसे ही जनता के संज्ञान में आया वैसे ही सोयी जनता एक ओर तो दामिनी के दर्द से कराह उठी और दूसरी ओर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की सुरक्षा के लिए व्याकुल हो उठी और चल पड़ी सोये व् अत्याचारी ,लापरवाह व् निरंकुश सरकार व् प्रशासन को जगाने .न केवल दिल्ली बल्कि सम्पूर्ण देश -पूरी दुनिया ने इस मामले का संज्ञान लिया और हिला कर रख दिया आज के राजनीतिज्ञों के रवैय्ये को जिसके परिणाम स्वरुप सरकार के बड़े बड़े चेहरे कभी जनता के बीच आकर, कभी दामिनी के घर जाकर हमदर्दों की सूची में जुड़ने की कोशिश करने लगे लेकिन जनता ने केवल उनको इस दुर्दांत घटना के लिए जिम्मेदार माना और उन्हें किसी  तरह का कोई स्थान अपनी भावनाओं के बीच नहीं लेने दिया .जो विरोध प्रदर्शन दामिनी के साथ हुई बर्बरता से आरम्भ हुए थे वे उसकी दुर्दांत मृत्यु के पश्चात् भी चलते रहे थे और चलते रह

राजनीतिक सोच :भुनाती दामिनी की मौत

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राजनीतिक सोच :भुनाती दामिनी की मौत ''आस -पास ही देख रहा हूँ मिट्टी  का व्यापार , चुटकी भर मिट्टी की कीमत जहाँ करोड़ हज़ार और सोचता हूँ आगे तो होता हूँ हैरान , बिका हुआ है  मिट्टी के ही हाथों इंसान .''     कविवर गोपाल दास ''नीरज ''की ये पंक्तियाँ आज एकाएक याद आ गयी जैसे ही समाचार पत्रों में ये समाचार आँखों के सामने आया ''कि दामिनी के परिवार को मिलेगा दिल्ली में फ्लैट ''समाचार अपने शीर्षक में ही समेटे था आज के राजनीतिक दलों की सोच को जो इंसानी जज्बातों की कीमत लगा रही है .      दामिनी के साथ १६ दिसंबर २०१२ को जो दरिंदगी हुई उसके बाद भड़के जनाक्रोश ने सत्तारूढ़ दल  की नींद तोड़ी और सरकार को इस सम्बन्ध में कठोर कदम उठाने को धकेला[जिस तरह से सो सो कर सरकारी  मशीनरी ने इस दरिंदगी को ध्यान में रख काम किया उसके लिए धकेला शब्द ही इस्तेमाल किया जायेगा क्योंकि जो इच्छा शक्ति और अपने कर्तव्य के लिए सरकारी मशीनरी के सही कदम थे वे कहीं पूर्व में उठते नहीं दिखाई दिए  थे ]इस दरिंदगी का एक प्रमुख कारण प्रशासनिक विफलता थी जो अगर न होती तो ऐसी दुर्दांत घ

बेटी न जन्म ले यहाँ कहना ही पड़ गया .

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  पैदा हुई है बेटी खबर माँ-बाप ने सुनी , खुशियों का बवंडर पल भर में थम गया . चाहत थी बेटा आकर इस वंश को बढ़ाये , रखवाई का ही काम उल्टा सिर पे पड़ गया . बेटा जने जो माता ये है पिता का पौरुष , बेटी जनम का पत्थर माँ के सिर पे बंध गया . गर्मी चढ़ी थी आकर घर में सभी सिरों पर , बेडा गर्क ही जैसे उनके कुल का हो गया . गर्दिश के दिन थे आये ऐसे उमड़-घुमड़ कर , बेटी का गर्द माँ को गर्दाबाद कर गया . बेठी है मायके में ले बेटी को है रोटी , झेला जो माँ ने मुझको भी वो सहना पड़ गया . न मायका है अपना ससुराल भी न अपनी , बेटी के भाग्य में प्रभु कांटे ही भर गया . न करता कदर कोई ,न इच्छा है किसी की , बेटी का आना माँ को ही लो महंगा पड़ गया . सदियाँ गुजर गयी हैं ज़माना बदल गया , बेटी का सुख रुढियों की बलि चढ़ गया .  सच्चाई ये जहाँ की देखे है ''शालिनी '' बेटी न जन्म ले यहाँ कहना ही पड़ गया .       शालिनी कौशिक            [कौशल] शब्दार्थ-गर्दाबाद-उजाड़ ,विनाश