शुक्रवार, 31 मार्च 2017

#जागो रे आम आदमी


किसी शायर ने कहा है -

''कौन कहता है आसमाँ में सुराख़ हो नहीं सकता ,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों .''

भारतवर्ष सर्वदा से ऐसी क्रांतियों की भूमि रहा है जिन्होंने हमेशा ''असतो मा सद्गमय ,तमसो मा ज्योतिर्गमय ,मृत्योर्मामृतं गमय''का ही सन्देश दिया है और क्रांति कभी स्वयं नहीं होती सदैव क्रांति का कारक भले ही कोई रहे पर दूत हमेशा आम आदमी ही होता है क्योंकि जिस तरह से लावा ज्वालामुखी के फटने पर ही उत्पन्न होता है वैसे ही क्रांति का श्रीगणेश भी आम आदमी के ह्रदय में उबलते क्रोध के फटने से ही होता है .

डेढ़ सौ वर्षों की गुलामी हमारे भारतवर्ष ने झेली और अंग्रेजों के अत्याचारों को सहा किन्तु अंग्रेजों को हमारे क्रांतिकारियों के सामने हमेशा मुंह की खानी पड़ी .हमारे देश के महान क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आजाद को गिरफ्तार करने के बावजूद वे उन्हें तोड़ नहीं पाये .उनकी वीरता अंग्रेजों के सामने भी अपने मुखर अंदाज में थी -

''पूछा उसने क्या नाम बता -आजाद ,
पिता को क्या कहते -स्वाधीन,
पिता का नाम -
और बोलो किस घर में हो रहते ?
कहते हैं जेलखाना जिसको वीरों का घर है ,
हम उसमे रहने वाले हैं ,उद्देश्य मुक्ति का संघर्ष है .''

साइमन कमीशन का भारत की जनता ने कड़ा विरोध किया और अंग्रेजों की लाठियों की मार को भी झेला-

''लाठियां पड़ी गिर पड़े जवाहर लाल वहां ,
औ पंत गिरे थे ऊपर उन्हें बचाने को .''

ये एक आम आदमी की ही ताकत थी जिसने ब्रिटिश हुकूमत को खौफ से भर दिया था .अल्फ्रेड पार्क में स्वयं की गोली से शहीद हो चुके चंद्रशेखर आजाद के मृत शरीर के पास तक जाने की हिम्मत ब्रिटिश पुलिस में नहीं थी ,कई गोलियां उनके मृत शरीर पर बरसाकर ही वह आगे बढ़ने का साहस कर पायी थी .

सत्य व अहिंसा के दम पर अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाले महात्मा गांधी को तो ब्रिटिश हुकूमत कभी भुला ही नहीं पायेगी जिन्होंने बिना किसी हथियार के हथियारों से लैस फिरंगियों को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया -

''दुनिया में लड़ी तूने अजब ढब की लड़ाई ,
दागी न कहीं तोप न बन्दूक चलाई ,
दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई
वाह रे फ़कीर खूब करामात दिखाई .
चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल.
....दुनिया में तू बेजोड़ था इंसान बेमिसाल .''
...जिस दिन तेरी चिता जली रोया था महाकाल .
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.''
. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत एक ''सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य'' बना .यहाँ राजशाही ख़त्म हुई जनता का शासन आरम्भ हुआ और आम आदमी की ताकत पर यह लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना .

२०१२ आम आदमी की ताकत के हिसाब से अगर देखा जाये तो अति महत्वपूर्ण वर्ष कहा जायेगा .जहाँ आज तक बलात्कार पीड़िता को स्वयं जनता ही अपराधी का दर्जा देती थी वही दामिनी गैंगरेप कांड में दामिनी के साथ खड़ी हो गयी .पूरा देश एक स्वर में दामिनी के लिए न्याय मांग रहा था और मांग रहा था उसके लिए जीवन की दुआएं .अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित था, कड़ाके की ठण्ड के बावजूद जनता आंदोलन रत थी और सारे देश में जैसे किसी को अन्य कोई समस्या रह ही नहीं गयी थी ,रह गयी थी तो केवल दामिनी की चिंता और उसके अपराधियों के लिए फांसी की सजा की मांग ,सरकार हिल गयी थी जनता के वे तेवर देखकर और समझ में आ गया था कि जनता को यूँ ही जनार्दन नहीं कहा जाता .

उसके बाद आम आदमी की ताकत दिखाई प्रसिद्द समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने जिन्होंने सरकार को ही अल्टीमेटम दे दिया लोकपाल के लिए और यह जनता की ही ताकत है जो लोकपाल पास हुआ है .
है .

आरोप-प्रत्यारोप आम आदमी करता है किन्तु सर्वजन हिताय व् सर्वजन सुखाय के लिए और जब वह अपनी ताकत से उस स्थिति में आता है तब काम करता है और यह साबित करता है कि ऐसा कुछ नहीं जो आम आदमी के हाथ में न हो ,उसके हाथ में सब कुछ है बस उसे उस दिशा में सोचना भर होता है क्योंकि -

''आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है ..''

आज आम आदमी न केवल परिवर्तन ला सकता है बल्कि ला रहा है .ये आम आदमी के दिमाग की ही ताकत है जो अग्नि-५ बना और उसने चीन के दिल में भारत के लिए दहशत भर दी,ये आम आदमी की ही सामूहिक शक्ति है जो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को कारगिल के बाद भारत आने को मजबूर कर पायी ,ये आम आदमी की ताकत है जो उसे सूचना का अधिकार दिलाती है जिससे सरकारी तंत्रो में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने में उसे मदद मिलती है ,ये आम आदमी की ताकत है जो माँ को पिता के साथ संतान के शैक्षिक अभिलेखों में स्थान दिलाती है और ये भी आम आदमी की ही ताकत है जो बार-बार गिरने के बावजूद ,विध्वंस के बावजूद इस देश को खड़ा करती है और आम आदमी की इसी ताकत को इस देश ने माना है और उसे महत्व दिया है .आम आदमी यहाँ अपनी ताकत को विश्व में एक आदर्श रूप में प्रस्तुत करता है और उसे नतमस्तक होने को मजबूर करता है .आम आदमी की इसी ताकत को शकील''ज़मील'' ने यूँ व्यक्त किया है -

''जो बढ़के सीना-ए-तूफ़ान पे वार करता है ,
खुदा उसी के सफीने को पार करता है .''

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 25 मार्च 2017

चर्चा कार


करते हैं बैठ चर्चा,
        खाली ये जब भी होते,
कोई काम इनको करते
         मैने कभी न देखा.
...................................................
वो उसके साथ आती,
          उसके ही साथ जाती,
गर्दन उठा घुमाकर
           बस इतना सबने देखा.
...................................................
खाते झपट-झपट कर,
           औरों के ये निवाले,
अपनी कमाई का इन्हें
           टुकड़ा न खाते देखा.
....................................................
बेचारा उसे कहते,
         जिसकी ये जेब काटें,
कुछ करने के समय पर
           मौके से भागा देखा.
.....................................................
ठेका भले का इन पर,
        मालिक ये रियाया के,
फिर भी जहन्नुमों में
         इनको है बैठे देखा.
........................................................
शालिनी कौशिक
    (कौशल)
   

रविवार, 19 मार्च 2017

क्या नारीशक्ति यथार्थ है?

UP high school result declare todaysome unknown facts of jiah's life entrepreneur-women-success

नारी सशक्त हो रही है .इंटर में लड़कियां आगे ,हाईस्कूल में लड़कियों ने लड़कों को पछाड़ा ,आसमान छूती लड़कियां ,झंडे गाडती लड़कियां जैसी अनेक युक्तियाँ ,उपाधियाँ रोज़ हमें सुनने को मिलती हैं .किन्तु क्या इन पर वास्तव में खुश हुआ जा सकता है ?क्या इसे सशक्तिकरण कहा जा सकता है ?
नहीं .................................कभी नहीं क्योंकि साथ में ये भी देखने व् सुनने को मिलता है .
*आपति जनक स्थिति में पकडे गए तीरंदाज,
*बेवफाई से निराश होकर जिया ने की आत्महत्या ,
*गीतिका ने ,
*फिजा ने और न जाने किस किस ने ऐसे कदम उठाये जो हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कलंक है .

गोपाल कांडा के कारण गीतिका ,चाँद के कारण फिजा के मामले सभी जानते हैं और ये वे मामले हैं जहाँ नारी किसी और के शोषण का शिकार नहीं हुई अपितु अपनी ही महत्वकांक्षाओं  का शिकार हुई .अपनी समर्पण की भावना के कारण ढेर हुई ये नारियां नारी के सशक्तिकरण की ध्वज की वाहक बनने जा रही थी किन्तु जिस भावना के वशीभूत हो ये इस मुकाम पर पहुंचना चाहती थी वही इनके पतन का या यूँ कहूं कि आत्महत्या का कारण बन गया ..ये समर्पण नारी को सशक्त नहीं होने देगा क्योंकि ये समर्पण जो सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ आधुनिक बनने की गरज में नारी करती है इसका खामियाजा भी वही भुगतती है क्योंकि प्रकृति ने उसे जो माँ बनने का वरदान दिया है वह उसके लिए इस स्थिति में अभिशाप बन जाता है और ऐसे में उसे मुहं छुपाने को या फिर आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ता है .पुरुष के प्रतिष्ठा या चरित्र पर इसका लेशमात्र भी असर नहीं पड़ता .नारायणदत्त तिवारी जी को लीजिये ,पता चल चुका है ,साबित हो चुका है कि वे एक नाजायज़ संतान के पिता हैं किन्तु तब भी न तो उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में कोई अंतर आया और न ही उन्हें कहीं बहिष्कृत किया गया जबकि यदि उनकी जगह कोई नारी होती तो उसे कुलटा, कुलच्छनी जैसी संज्ञाओं से विभूषित करने से कोई बाज़ नहीं आता और हद तो ये है कि ऐसी स्थिति होने पर भी नारी अपनी ऐसी भावनाओं पर कोई अंकुश नहीं लगा पाती .
ऐसे ही बड़े बड़े दावे किये जाते हैं कि लड़कियां आत्मनिर्भर हो रही हैं ,सत्य है ,डाक्टर बन रही हैं इंजीनियर बन रही हैं साथ ही बहुत बड़ी संख्या में टीचर बन रही हैं किन्तु ये ऊपरी सच है अंदरूनी हालात-
*-इंजीनियर रीमा मेरिट में स्थान बना बनती है और बेवकूफ बनती है अपने साथी लड़के से ,शादी करती है किन्तु नहीं बनती और माँ बाप कुंवारी बता उसकी दूसरी शादी करते हैं ,क्यूं बढ़ जाते हैं  उसके कदम आधुनिकता की होड़ में स्वयं को सक्षम निर्णय लेने वाला दिखाने में और अगर बढ़ जाते हैं तो क्यूं नहीं निभा पाती उस प्यार को जो उसे सामाजिक मर्यादाओं से बगावत को मजबूर करता है और फिर क्यूं लौट आती है उन्हीं मर्यादाओं के अधीन जिन्हें कभी कोरी बकवास कह छोड़ चुकी थी ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
*कस्बों में लड़कियां बारहवीं पास करते ही वहां के स्कूलों में पढ़ाने जाने लगी हैं .''जॉब ''कर रही हैं ,स्वावलंबी हो रही हैं ,कह सिर गर्व से ऊँचा किये फिरते हैं सभी फिर क्यों लुट रही हैं ,क्यों अपनी तनख्वाह नहीं बताती ,क्यों ज्यादा तनख्वाह पर साइन कर कम वेतन ख़ुशी ख़ुशी ले रही हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
*पंचायतों में ,नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित हो रहे हैं ,महिलाएं चुनी जा रही हैं ,शासन कर रही हैं सुन गर्व से भर जाती हैं महिलाएं ,फिर क्यूं पंचायतों की ,नगरपालिकाओं की बैठकों में अनुपस्थित रहती हैं ,क्यों उनकी उपस्थिति के साइन तक उनके पति ही करते हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
*बैनामे संपत्तियों के महिलाओं के नाम हो रहे हैं ,महिलाएं संपत्ति की मालिक हो रही हैं ,क्या नहीं जानते हम कि मात्र स्टाम्प ड्यूटी घटाने को ये स्वांग भी पुरुष ही रच रहे हैं ,कितनी सही तरह से संपत्ति की मालिक हो रही हैं महिलाएं स्वयं भी जानती हैं ,क्या वे अपनी मर्जी से उसका इस्तेमाल कर सकती हैं ,क्या वे स्वयं उसे बेच सकती हैं ?क्या यही है सशक्तिकरण ?
वास्तविकता यही है कि नारी कभी भी पुरुष की गुलामी से आज़ाद नहीं हो सकती क्योंकि ये गुलामी उसने स्वयं चुनी है .वह स्वयं उसके हाथों की कठपुतली बनी रहना चाहती है .पुरुष ने उसे हमेशा गहनों ,कपड़ों के लोभ में ऐसे जकड़े रखा हैं कि वह कहीं भी हो इनमे ही सिमटकर रह जाती है .पुरुष के इस बहकावे में नारी इस कदर फंसी हुई है कि बड़ी से बड़ी नाराजगी भी वह उसे कोई गहना ,कपडा देकर दूर कर देता है और वह बहकी रहती है एक उत्पाद बन कर .यही सोच है कि पढ़ी लिखी वकील होने के बावजूद फिजा चाँद के शादी व् बच्चों के बारे में जानते हुए भी उसकी पत्नी बनाने के बहकावे में आ जाती है और समाज में उस औरत का दर्ज पा जाती हैं जिसे ''रखैल''कहते हैं .यही सशक्तिकरण का ढोंग है जिसमे फिल्मो में ,मॉडलिंग में लड़कियां अपना तन उघाड़ रही हैं  ,वही स्वयं को सशक्त दिखाने की पहल में यही हवा हमारे समाज में बही जा रही है .फिल्मो में शोषण का शिकार हमारी ये हीरोइने तो इस माध्यम से नाम व् पैसा कमा रही हैं  किन्तु एक सामान्य लड़की इस राह पर चलकर स्वयं को तो अंधे कुएं में धकेल ही रही है और औरों के लिए खाई तैयार कर रही है .फिर क्यों आश्चर्य किया जाता है बलात्कार ,छेड़खानी की बढती घटनाओं पर ,ये तो उसी सशक्तिकरण की उपज है जो आज की नारी का हो रहा है और परिणाम सामने हैं
उसे केवल यही सुनता है जो पुरुष सुनाता है -
''है बनने संवरने का जब ही मज़ा ,
कोई देखने वाला आशिक भी हो .''
नहीं सुनती उसे वह करूण पुकार जो कहती है -
''दुश्मन न करे दोस्त ने जो काम किया है ,
उम्र भर का गम हमें इनाम दिया है .''
.इसी सोच के कारण अपने आकर्षण में पुरुष को बांधने के लिए वह निरंतर गिरती जा रही है और स्वयं को सशक्त दिखाने के लिए फांसी पर चढ़ती जा रही है .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]








शुक्रवार, 17 मार्च 2017

शादीशुदा दासी नहीं

 
आज जैसे जैसे महिला सशक्तिकरण की मांग जोर  पकड़ रही है वैसे ही एक धारणा और भी बलवती होती जा रही है वह यह कि विवाह करने से नारी गुलाम हो जाती है ,पति की दासी हो जाती है और इसका परिचायक है बहुत सी स्वावलंबी महिलाओं का विवाह से दूर रहना .
    यदि हम सशक्तिकरण की परिभाषा में जाते हैं तो यही पाते हैं कि ''सशक्त वही है जो स्वयं के लिए क्या सही है ,क्या गलत है का निर्णय स्वयं कर सके और अपने निर्णय को अपने जीवन में कार्य रूप में परिणित कर सके ,फिर इसका विवाहित होने या न होने से कोई मतलब ही नहीं है .हमारे देश का इतिहास इस बात का साक्षी है कि हमारे यहाँ कि महिलाएं सशक्त भी रही हैं और विवाहित भी .उन्होंने जीवन में कर्मक्षेत्र न केवल अपने परिवार को माना बल्कि संसार के रणक्षेत्र में भी पदार्पण किया और अपनी योग्यता का लोहा मनवाया .
     मानव सृष्टि का आरंभ केवल पुरुष के ही कारण नहीं हुआ बल्कि शतरूपा के सहयोग से ही मनु ये कार्य संभव कर पाए .
   वीरांगना झलकारी बाई पहले किसी फ़ौज में नहीं थी .जंगल में रहने के कारण उन्होंने अपने पिता से घुड़सवारी व् अस्त्र -शस्त्र सञ्चालन की शिक्षा ली थी .उनकी शादी महारानी लक्ष्मीबाई  तोपखाने के वीर तोपची पूरण सिंह के साथ हो गयी और यदि स्त्री का विवाहित होना ही उसकी गुलामी का परिचायक मानें तो यहाँ से झलकारी की जिंदगी मात्र  किलकारी से बंधकर रह जानी थी किन्तु नहीं ,अपने पति के माध्यम से वे महारानी की महिला फौज में भर्ती  हो गयी और शीघ्र ही वे फौज के सभी कामों में विशेष योग्यता वाली हो गयी .झाँसी के किले को अंग्रेजों ने जब घेरा तब जनरल ह्यूरोज़ ने उसे तोपची के पास खड़े गोलियां चलाते देख लिया उस पर गोलियों की वर्षा की गयी .तोप का गोला पति के लगने पर झलकारी ने मोर्चा संभाला पर उसे भी गोला लगा और वह ''जय भवानी''कहती हुई शहीद हो गयी उसका बलिदान न केवल महारानी को बचने में सफल हुआ अपितु एक महिला के विवाहित होते हुए उसकी सशक्तता का अनूठा दृष्टान्त सम्पूर्ण विश्व के समक्ष रख गया .
          भारत कोकिला  ''सरोजनी नायडू''ने गोविन्द राजलू नायडू ''से विवाह किया और महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गए १९३२ के नमक सत्याग्रह में भी भाग लिया .
        कस्तूरबा गाँधी महात्मा गाँधी जी की धर्मपत्नी भी थी और विवाह को एक संस्कार के रूप में निभाने वाली  होते हुए भी महिला सशक्तिकरण की पहचान भी .उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में महिलाओं में सत्याग्रह का शंख फूंका .
      प्रकाशवती पाल ,जिन्होंने २७ फरवरी १९३१ को चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद क्रांति संगठन की सूत्र अपने हाथ में लेकर काम किया १९३४ में दिल्ली में गिरफ्तार हुई .पहले विवाह से अरुचि रखने वाली व् देश सेवा की इच्छुक प्रकाशवती ने बरेली जेल में यशपाल से विवाह किया किन्तु इससे उनके जीवन के लक्ष्य में कोई बदलाव नहीं आया .यशपाल ने उन्हें क्रन्तिकारी बनाया और प्रकाशवती ने उन्हें एक महान लेखक .
      सुचेता कृपलानी आचार्य कृपलानी  की पत्नी थी और पहले स्वतंत्रता संग्राम से जुडी कर्तव्यनिष्ठ क्रांतिकारी और बाद में उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री .क्या यहाँ ये कहा जा सकता है कि विवाह ने कहीं भी उनके पैरों में बंधन डाले या नारी रूप में उन्हें कमजोर किया .
      प्रसिद्ध समाज सुधारक गोविन्द रानाडे की पत्नी रमाबाई रानाडे पति से पूर्ण सहयोग पाने वाली ,पूना में महिला सेवा सदन की स्थापक ,जिनकी राह में कई बार रोड़े पड़े लेकिन न तो उनके विवाह ने डाले और न पति ने डाले  बल्कि उस समय फ़ैली पर्दा  ,छुआछूत ,बाल विवाह जैसी कुरीतियों ने डाले और इन सबको जबरदस्त टक्कर देते हुए रमाबाई रानाडे ने स्त्री सशक्तिकरण की मिसाल कायम की .
        देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने फ़िरोज़ गाँधी से अंतरजातीय विवाह भी किया और दो पुत्रों राजीव व् संजय की माँ भी बनी और दिखा दिया भारत ही नहीं सारे विश्व को कि एक नव पल्लवित लोकतंत्र की कमान किस प्रकार कुशलता से संभालकर पाकिस्तान जैसे दुश्मनों के दांत खट्टे किये जाते हैं .क्या यहाँ विवाह को उनका कारागार कहा जा सकता है .पत्नी व् माँ होते हुए भी  बीबीसी की इंटरनेट  न्यूज़ सर्विस द्वारा कराये गए एक ऑनलाइन  सर्वेक्षण में उन्हें ''सहस्त्राब्दी की महानतम महिला [woman of the millennium ]घोषित   किया गया .
      भारतीय सिनेमा की  प्रथम अभिनेत्री देविका रानी पहले प्रसिद्ध  निर्माता निर्देशक हिमांशु राय की पत्नी रही और बाद में विश्विख्यात रुसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रोरिक की पत्नी बनी और उनके साथ कला ,संस्कृति तथा पेंटिंग के क्षेत्र में व्यस्त हो गयी कहीं कोई बंदिश नहीं कहीं कोई गुलामी की दशा नहीं दिखाई देती उनके  जीवन में कर्णाटक चित्रकला को उभारने में दोनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा .१९६९ में सर्वप्रथम ''दादा साहेब फाल्के '' व् १९५८ में ''पद्मश्री ''महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान रखते हैं .
     ''बुंदेलों हरबोलों के मुहं हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ''कह राष्ट्रीय आन्दोलन में नवतेज भरने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान ''कर्मवीर'' के संपादक लक्ष्मण सिंह की विवाहिता थी किन्तु साथ ही सफल राष्ट्र सेविका ,कवियत्री ,सुगृहणी व् माँ थी .स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे मध्य प्रदेश विधान सभा की सदस्य भी रही .गुलाम  भारत  की इस राष्ट्र सेविका के जीवन में हमें तो  कहीं भी गुलामी की झलक नहीं मिलती जबकि जीवन में जो जो काम समाज ने, समाज के नियंताओं ने ,भगवान् ने वेद ,पुराण में लिखें हैं वे सब से जुडी थी . 
         बुकर पुरुस्कार प्राप्त करने वाली ,रैली फॉर द वैली  का नेतृत्त्व  कर नर्मदा बचाओ आन्दोलन को सशक्त करने वाली अरुंधती राय फ़िल्मकार प्रदीप कृष्ण से विवाहित हैं .
       पुलित्ज़र पुरुस्कार प्राप्त झुम्पा लाहिड़ी विदेशी पत्रिका के उपसंपादक अल्बर्टो वर्वालियास से विवाहित हैं और अपने जीवन को अपनी मर्जी व् अपनी शर्तों पर  जीती हैं .
       वैजयन्ती माला ,सोनिया गाँधी ,सुषमा स्वराज ,शीला  दीक्षित  ,मेनका  गाँधी ,विजय राजे सिंधिया ,वनस्थली विद्या पीठ की संस्थापिका श्रीमती रतन शास्त्री ,क्रेन बेदी के नाम से मशहूर प्रथम महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी ,प्रसिद्ध समाज सेविका शालिनी ताई मोघे, प्रथम भारतीय महिला अन्तरिक्ष यात्री कल्पना चावला ,टैफे की निदेशक मल्लिका आदि आदि आदि बहुत से ऐसे नाम हैं  जो सशक्त हैं ,विवाहित हैं ,प्रेरणा हैं ,सद गृहस्थ हैं तब भी कहीं कोई बंधन नहीं ,कहीं कोई उलझन नहीं .
          अब यदि हम विवाह संस्कार की बात करते हैं तो उसकी सबसे महत्वपूर्ण रस्म है ''सप्तपदी ''जिसके  पूरे होते ही किसी दम्पति का विवाह सम्पूर्ण और पूरी तरह वैधानिक मान लिया जाता है .हिन्दू विवाह कानून के मुताबिक सप्तपदी या सात फेरे इसलिए भी ज़रूरी हैं ताकि दम्पति शादी की हर शर्त को अक्षरशः स्वीकार करें .ये इस प्रकार हैं -
 १- ॐ ईशा एकपदी भवः -हम यह पहला फेरा एक साथ लेते हुए वचन देते हैं कि हम हर काम में एक दूसरे  का ध्यान पूरे प्रेम ,समर्पण ,आदर ,सहयोग के साथ आजीवन करते रहेंगे .
  २- ॐ ऊर्जे द्विपदी भवः -इस दूसरे फेरे में हम यह निश्चय करते हैं कि हम दोनों साथ साथ आगे बढ़ेंगे .हम न केवल एक दूजे को स्वस्थ ,सुदृढ़ व् संतुलित रखने में सहयोग देंगे बल्कि मानसिक व् आत्मिक बल भी प्रदान करते हुए अपने परिवार और इस विश्व के कल्याण में अपनी उर्जा व्यय करेंगे .
 ३-ॐ रायस्पोशय  त्रिपदी भवः -तीसरा फेरा लेकर हम यह वचन देते हैं कि अपनी संपत्ति की रक्षा करते हुए सबके कल्याण के लिए समृद्धि का वातावरण बनायेंगें .हम अपने किसी काम में स्वार्थ नहीं आने देंगे ,बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानेंगें .
 4- ॐ मनोभ्याय चतुष्पदी  भवः -चौथे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि आजन्म एक दूजे के सहयोगी रहेंगे और खासतौर पर हम पति-पत्नी के बीच ख़ुशी और सामंजस्य बनाये रखेंगे .
 ५- ॐ प्रजाभ्यःपंचपदी भवः -पांचवे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि हम स्वस्थ ,दीर्घजीवी संतानों को जन्म  देंगे और इस तरह पालन-पोषण करेंगे ताकि ये परिवार ,समाज और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर साबित हो .
 ६- ॐ रितुभ्य षष्ठपदी  भवः -इस छठे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि प्रत्येक उत्तरदायित्व साथ साथ पूरा करेंगे और एक दूसरे का साथ निभाते हुए सबके प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे .
     ७-ॐ सखे सप्तपदी भवः -इस सातवें और अंतिम फेरे में हम वचन देते हैं कि हम आजीवन साथी और सहयोगी बनकर रहेंगे .
   इस प्रकार उपरोक्त ''सप्तपदी ''का ज्ञान विवाह संस्कार की वास्तविकता को हमारे ज्ञान चक्षु खोलने हेतु पर्याप्त है .
          इस प्रकार पति-पत्नी इस जीवन रुपी रथ के दो पहिये हैं जो साथ मिलकर चलें तो मंजिल तक अवश्य पहुँचते हैं और यदि इनमे से एक भी भारी पड़ जाये तो रथ चलता नहीं अपितु घिसटता है और ऐसे में जमीन पर गहरे निशान टूट फूट के रूप में दर्ज कर जाता है फिर  जब विवाहित होने पर पुरुष सशक्त हो सकता है तो नारी गुलाम कैसे ?बंधन यदि नारी के लिए पुरुष है तो पुरुष के लिए नारी मुक्ति पथ कैसे ?वह भी तो उसके लिए बंधन ही कही जाएगी .रामायण तो वैसे भी नारी को माया रूप में चित्रित  किया गया है और माया तो इस  सम्पूर्ण जगत वासियों के लिए बंधन है .
        वास्तव में दोनों एक दूसरे के लिए प्रेरणा हैं ,एक राह के हमसफ़र हैं और दुःख सुख के साथी हैं .रत्नावली ने तुलसीदास को
     ''अस्थि चर्ममय देह मम तामे ऐसी प्रीति,
           ऐसी जो श्री राम में होत न तो भव भीति . ''
       कह प्रभु श्री राम से ऐसा जोड़ा कि उन्हें विश्विख्यात कर दिया वैसे ही भारत की प्रथम महिला चिकित्सक कादम्बिनी गांगुली जो कि विवाह के समय निरक्षर थी को उनके पति ने पढ़ा लिखा कर देश समाज से वैर विरोध झेल कर विदेश भेज और भारत की प्रथम महिला चिकित्सक के रूप में प्रतिष्ठित किया .

    इसलिए हम सभी यह कह सकते हैं कि सशक्तिकरण को मुद्दा बना कर नारी को कोई भटका नहीं सकता .अपनी मर्जी से अपनी शर्तों पर जीना सशक्त होना है और विवाह इसमें कोई बाधा नहीं है बाधा है केवल वह सोच जो कभी नारी के तो कभी पुरुष के पांव में बेडी बन जाती है .
              इस धरती पर हर व्यक्ति भले ही वह पुरुष हो या नारी बहुत से रिश्तों से जुड़ा है वह उस रूप में कहीं भी नहीं होता जिसे आवारगी की स्थिति कहा जाता है और कोई उस स्थिति को चाहता भी नहीं है और ऐसे में सहयोग व् अनुशासन की स्थिति तो होती है सही और बाकी सभी स्थितियां काल्पनिक बंधन कहे जाते हैं और वे पतन की ओर ही धकेलते हैं .अन्य सब रिश्तों पर यूँ ही उँगलियाँ नहीं उठती क्योंकि वे जन्म से ही जुड़े होते हैं और क्योंकि ये विवाह का नाता ही ऐसा  है जिस हम  स्वयं जोड़ते हैं इसमें हमारी समझ बूझ ही विवादों  को जन्म देती है और इसमें गलतफहमियां इकट्ठी कर देती है .इस रिश्ते के साथ यदि हम सही निर्णय व् समझ बूझ से काम लें तो ये जीवन में कांटे नहीं बोता अपितु जीवन जीना आसान बना देता है .यह पति पत्नी के आपसी सहयोग व् समझ बूझ को बढ़ा एक और एक ग्यारह की हिम्मत लाता  है और उन्हें एक राह का राही बना मंजिल तक पहुंचाता है.  
                    शालिनी कौशिक
                             [कौशल]




मंगलवार, 14 मार्च 2017

लिव इन - भारतीय संस्कृति पर चोट

 



प्रसिद्द समाजशास्त्री आर.एन.सक्सेना कहते हैं कि-
''ज्यों ज्यों एक समाज परंपरा से आधुनिकता की ओर बढ़ता है उसमे शहरीकरण ,औद्योगीकरण ,धर्म निरपेक्ष मूल्य ,जनकल्याण की भावना और जटिलता बढ़ती जाती है ,त्यों त्यों उसमे कानूनों और सामाजिक विधानों का महत्व भी बढ़ता जाता है .''
     सक्सेना जी के विचार और मूल्यांकन सही है  किन्तु यदि हम गहराई में जाते हैं तो हम यही पाते हैं कि मानव प्रकृति जो चल रहा है ,चला आ रहा है उसे एक जाल मानकर छटपटा उठती है और भागती है उस तरफ जो उसके आस पास न होकर दूर की चीज़ है क्योंकि दूर के ढोल सुहावने तो सभी को लगते हैं .हम स्वयं यह बात अनुभव करते हैं कि आज विदेशी भारतीय संस्कृति अपनाने के पीछे पागल हैं तो भारतीय विदेशी संस्कृति अपनाने की पीछे पागल हैं ,देखा जाये तो ये क्या है ,मात्र एक छटपटाहट परिवर्तन के लिए जो कि प्रकृति का नियम है जिसके लिए कहा ही गया है कि -
   ''change is the rule of nature .''
 और यह सांस्कृतिक परिवर्तन चलता ही रहता है क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह मानव ही इसलिए है क्योंकि उसकी एक संस्कृति है ,उसके पास संस्कृति है ,संस्कृति ही वह अनुपम धरोहर है जो मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ घोषित करती है और इसी की सहायता से मानव पीढ़ी दर पीढ़ी प्रगति की ओर उन्मुख होता है .
       संस्कृति का अर्थ होता है विभिन्न संस्कारों के द्वारा सामूहिक जीवन के उद्देश्यों की प्राप्ति ,यह परिमार्जन की एक प्रक्रिया है .संस्कारों को संपन्न करके ही एक मानव सामाजिक प्राणी बनता है .
      राबर्ट बीरस्टीड लिखते हैं -''संस्कृति वह सम्पूर्ण जटिलता है जिसमे वे सभी वस्तुएं सम्मिलित हैं ,जिन पर हम विचार करते हैं ,कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं .''

      बोगार्डस के अनुसार -''संस्कृति किसी समूह के कार्य करने व् सोचने की समस्त विधियां हैं .''
और भारतीय संस्कृति जिसकी पहचान ही है मानव में मानवीय मूल्यों दया,करुणा,भाईचारा .सहृदयता ,कोमलता [संवेदनाओं से भरा हुआ मन ],आपसी सद्भाव ,ममता ,समर्पण ,सरलता ,सहजता ,सरसता जैसे सुन्दर गुणों को व्यक्तित्व में समेटे होना ,यह वह संस्कृति है जो मानव को इंसान से देवता बना देती है ,यह वह संस्कृति है जो कहती है कि -
''धन से भोजन मिलता है -भूख नहीं ,
  धन से दवा मिलती है -स्वास्थ्य नहीं ,
  धन से साथी मिलते हैं -सच्चे मित्र नहीं ,
  धन से एकांत मिलता है -शांति नहीं ,
  धन से बिस्तर प्राप्त कर सकते हैं -नींद नहीं ,
  धन से आभूषण मिलते हैं -रूप नहीं ,
  धन से  सुख मिलता है -आनंद नहीं ,
    इसलिए धनवान होने से ज्यादा चरित्रवान होना आवश्यक है .''
श्री कृष्ण गोयल कहते हैं -''मनुष्य परमात्मा का अंश है ,उसमे परमात्मा के दिव्य ज्ञान ,गुण तथा शक्तियां सुप्त अवस्था में पड़े हैं अपने मन को ध्यान तथा एकाग्रता द्वारा परमात्मा का चिंतन करके दिव्यता को ग्रहण करना तथा प्रसारित करना भारतीय संस्कृति का लक्ष्य रहा है ,इसी कारण भारतीय संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी तथा विस्तृत है .भारतीय संस्कृति आध्यात्म तथा मानवता पर आधारित है तथा चेतना के विकास द्वारा प्रेम ,समरसता  तथा मानवीय मूल्यों को सम्पूर्ण मान्यता प्रदान करती है .इसमें चरित्र तथा आंतरिक गुणों पर विशेष बल दिया गया है .मनुष्य के कर्म तथा व्यवहार में दिव्य गुण परिलक्षित होना सफल संस्कृति की ही देन है .''
    हमारी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है आपसी भाईचारा और परिवार प्रेम और यही परिवार प्रेम मानव संस्कृति के एक महत्वपूर्ण पहलू की आवश्यकता को भी सामने लाता है जिसे विवाह कहते हैं .विवाह के बारे में बोगार्डस लिखते हैं -
      ''विवाह स्त्री पुरुष के पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने की एक संस्था है .''
 इसी संबंध में प्रभु व् अल्टेकर कहते हैं -
   ''पति-पत्नी एवं बच्चों से युक्त मानव ही पूर्ण मानव है .वेदों में अविवाहित व्यक्ति को अपवित्र माना गया है .धार्मिक दृष्टि से वह अपूर्ण है और संस्कारों में भाग लेने योग्य नहीं है .''
    विदेशी विद्वान जहाँ विवाह को यौन संबंधों का नियमन मात्र ही मानते हैं वहीँ भारतीय संस्कृति इसे एक पवित्र धार्मिक संस्कार के रूप में परिभाषित करती है .
     विदेशी विद्वान डब्ल्यू .एच.आर.रिवर्स के अनुसार -
   ''जिन साधनों द्वारा मानव समाज यौन संबंधों का नियमन करता है उन्हें विवाह की संज्ञा दी जा सकती है .''
 जबकि भारतीय संस्कृति जो कि मुख्यतः आर्य मान्यताओं को मानने वाली है और जिस मान्यता को हिन्दू मान्यता का स्वरुप आज प्रमुखतः प्राप्त हो चुका है वहां विवाह एक धार्मिक संस्कार है ,गृहस्थ आश्रम स्वर्ग है ,यहाँ विवाह धार्मिक कर्तव्य की पूर्ति ,पुत्र प्राप्ति ,पारिवारिक सुख ,सामाजिक एकता पितृ ऋण से मुक्ति ,पुरुषार्थों की पूर्ति आदि उद्देश्यों से किया जाता है .डॉ.कपाड़िया ने हिन्दू विवाह को परिभाषित करते हुए कहा है कि -
 ''हिन्दू विवाह एक संस्कार है ....हिन्दू विवाह के तीन उद्देश्य हैं -धार्मिक कार्यों की पूर्ति ,संतान प्राप्ति और यौन सुख .''
 ऐसे में एक नए तरह का सम्बन्ध सामने आता है न ढोल ,न नगाड़ा ,न किसी से रायशुमारी बस सिर्फ पहचान ..एक लड़का ..एक लड़की ..आधुनिकता की ओर बढ़ती सभ्यता के समय में स्वयं साथ रहने का फैसला करते हैं ,जिसमे किसी तीसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं ,कोई स्थान नहीं ,कोई पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं ,कोई सामाजिक दायित्व नहीं ,जब तक साथ रहना संभव हो रहे ,जब सम्बन्ध असहज हो गए ..हिंसक हो गए तब अलग हो गए ...भले ही साथ रहने से कोई भावनात्मक सम्बन्ध बने हों ,शारीरिक संबंध बने हों ,कोई दायित्व नहीं ,भले ही अलग होने से सम्बन्ध के साथ दिल के भी शीशे की तरह टुकड़े-टुकड़े हो गए हों ,कोई एहसास नहीं ...सिर्फ यही एहसास कि एक प्रयोग कर रहे थे ...सफल हो जाते तो पति-पत्नी की तरह ज़िंदगी गुजार देते और असफल रहे तो जैसे सफर पूरा होने पर ट्रेन के यात्री बिछड़ जाते हैं ऐसे ही बिछड़ गए ...और आज युवा इस सोच की राह पर आगे बढ़ रहा है .फिल्म अभिनेत्री ईशा देओल भी मानती हैं कि -
  ''शादी से पहले लगभग २ साल लिव इन में रहना ज़रूरी है .''
प्रसिद्द मॉडल मेहर भसीन कहती हैं कि -
''आज के समय में लिव इन इसलिए ज़रूरी है क्योंकि तलाक का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है .विवाह टूट रहे हैं .अब वह ज़माना नहीं रहा कि लोग मजबूरी में रिश्तों को ढोहें ,इसलिए लिव इन का विकल्प लोगों को आकर्षित कर रहा है क्योंकि यहाँ रिश्तों में जबरदस्ती नहीं है .'' 
 लिव इन को लेकर युवाओं की सकारात्मक सोच ही आज इस सम्बन्ध को भारतीय संस्कृति पर चोट साबित करने हेतु पर्याप्त है .जिस सम्बन्ध को भारतीय संस्कृति मात्र दो व्यक्तियों का मिलन न मानकर दो परिवारों दो सभ्यताओं का मिलन मानती है ,जहाँ नारी और पुरुष का ये रिश्ता सामाजिक समझदारी ,पारिवारिक सहयोग से निर्मित होता है ,जिस संस्कृति का गौरव परिवार-प्रेम ,भाईचारा है ,जिसमे माता पिता को देवोभवः की उपाधि दी गयी है उस देश में जहाँ सीता जैसी आर्य पुत्री जो सर्व सक्षम हैं ,भूमि से ऋषि मुनियों के रक्त से उत्पन्न आर्य कन्या हैं ,तक श्री राम को अपने वर के रूप में पसंद करते हुए भी अपने पिता के प्रण को ऊपर रखती हैं और माता गौरी से कहती हैं -

''मोर मनोरथ जानहु नीके ,बसहु सदा उर पुर सबही के ,
कीनेउ प्रगट न कारन तेहि ,अस कही चरण गहे वैदेही .''
अर्थात मेरी मनोकामना आप भली-भांति जानती हैं ,क्योंकि आप सदैव सबही के ह्रदय मंदिर में वास करती हैं ,इसी कारण मैंने उसको प्रगट नहीं किया ,ऐसा कहकर सीता ने उमा के चरण पकड़ लिए .[बालकाण्ड ]



 और ऐसे ही श्रेष्ठ आर्यपुत्र भगवान राम के बारे में महाराजा जनक के कुलगुरु शतानन्द जी भी यही महाराजा दशरथ को बताते हैं कि धनुष यज्ञ सम्पन्न होने पर सीता से राम विवाह सम्पन्न हो गया किन्तु वे सीता का पत्नी रूप में ग्रहण पिता की आज्ञा के अनुसार ही करेंगें ,ऐसी उनकी मनोकामना है .


   ऐसे आदर्श चरित्र भारतीय संस्कृति की शोभा हैं और ऐसे ही विवाह जैसे संस्कार के समय हिन्दू धर्म में पति-पत्नी द्वारा अग्नि के समक्ष लिए जाने वाले फेरे भारतीय संस्कृति की इस संबंध के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं -जिनका विवरण कुछ यूँ है -

१- ॐ ईशा एकपदी भवः -हम यह पहला फेरा एक साथ लेते हुए वचन देते हैं कि हम हर काम में एक दूसरे  का ध्यान पूरे प्रेम ,समर्पण ,आदर ,सहयोग के साथ आजीवन करते रहेंगे .

  २- ॐ ऊर्जे द्विपदी भवः -इस दूसरे फेरे में हम यह निश्चय करते हैं कि हम दोनों साथ साथ आगे बढ़ेंगे .हम न केवल एक दूजे को स्वस्थ ,सुदृढ़ व् संतुलित रखने में सहयोग देंगे बल्कि मानसिक व् आत्मिक बल भी प्रदान करते हुए अपने परिवार और इस विश्व के कल्याण में अपनी उर्जा व्यय करेंगे .
 ३-ॐ रायस्पोशय  त्रिपदी भवः -तीसरा फेरा लेकर हम यह वचन देते हैं कि अपनी संपत्ति की रक्षा करते हुए सबके कल्याण के लिए समृद्धि का वातावरण बनायेंगें .हम अपने किसी काम में स्वार्थ नहीं आने देंगे ,बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानेंगें .
 4- ॐ मनोभ्याय चतुष्पदी  भवः -चौथे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि आजन्म एक दूजे के सहयोगी रहेंगे और खासतौर पर हम पति-पत्नी के बीच ख़ुशी और सामंजस्य बनाये रखेंगे .
 ५- ॐ प्रजाभ्यःपंचपदी भवः -पांचवे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि हम स्वस्थ ,दीर्घजीवी संतानों को जन्म  देंगे और इस तरह पालन-पोषण करेंगे ताकि ये परिवार ,समाज और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर साबित हो .
 ६- ॐ रितुभ्य षष्ठपदी  भवः -इस छठे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि प्रत्येक उत्तरदायित्व साथ साथ पूरा करेंगे और एक दूसरे का साथ निभाते हुए सबके प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे .
     ७-ॐ सखे सप्तपदी भवः -इस सातवें और अंतिम फेरे में हम वचन देते हैं कि हम आजीवन साथी और सहयोगी बनकर रहेंगे .
         और लिव इन जिसके बारे में अर्चना पूरण सिंह बड़े उत्साह से कहती हैं कि -
''हम बिना शादी साथ रहे हैं ,ऐसी कोई भी घोषणा हमने नहीं की ,एक स्त्री-पुरुष जो २४ घंटों में १० घंटे साथ बिताते हैं ;उनमे कोई ऐसा सम्बन्ध न हो ऐसा संभव नहीं है .महानगरों की यही विशेषता है कि यहाँ कोई किसी से नहीं पूछता .अपने तरह से जीवन जीने की स्वतंत्रता ,आसान और बेरोकटोक ज़िंदगी ,ये सब बातें बड़े शहरों में इन संबंधों को पनपने का मौका देती हैं ,तेज रफ़्तार ज़िंदगी में यहाँ हर संबंध आम है .जीवन साथी का चुनाव करना यहाँ कठिन है .विवाह स्त्री संबंधों की एक मंजिल है यह मंजिल सुखद हो इसके लिए लिव इन एक जरिया हो सकता है .कम से कम टूटती हुई शादियां ,बिखरते परिवारों और बिना माँ-बाप के पल रहे बच्चों से तो अच्छा है .''
    और इनकी यह उन्मुक्तता स्वयं गृहलक्ष्मी पत्रिका में सोनी चैनल के लेडीज़ सेक्शन में नीना गुप्ता से एक प्रश्न के जरिये मुंह बंद करने को विवश प्रतीत होती है .जिसमे पूछा गया है -
  ''मैं २० साल की कामकाजी महिला हूँ .मैं एक व्यक्ति के साथ 'लिव इन रिलेशनशिप' में हूँ  जो मुझसे बहुत प्यार करता है .हम लोग लिव इन रिलेशनशिप' में पिछले एक साल से हैं इस रिलेशनशिप में बंधने से पहले हम दोनों ने एक दूसरे को अच्छी तरह से जाना समझा पर पिछले कुछ समय से वह मेरी उपेक्षा कर रहा है .मैं इस बात से घबराई हूँ कि कहीं वह मुझको धोखा तो नहीं दे रहा है .मैं सचमुच उससे बहुत प्यार करती हूँ और उसके साथ रहना चाहती हूँ कहीं वह इस रिलेशनशिप को छोड़ तो नहीं देगा .?''
    यही डर  इस संबंध की नीव है और कंगूरा भी ,यही आगाज है यही अंजाम है और चाँद-फ़िज़ा ,विपाशा बासु-जॉन अब्राहम ,राजेश खन्ना-अनीता जैसे मामले इस संबंध के परिणाम स्वरुप सभी के सामने हैं .ये वह सम्बन्ध नहीं जिसे भारतीय संस्कृति में जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध कहा जाता है ,जिसमे पति पत्नी के सम्मान की खातिर राक्षसों के राजा रावण का कुल सहित विनाश करता है ,जिसमे पत्नी पति के प्राणों को यमराज से भी छीन लाती है.
      आज का युवा उन्मुक्त ज़िंदगी का आदी हो रहा है .दबाव से बचने में लगा है ,अपनी पसंद को सर्वोपरि रखता है ,हर चीज़ पैसे से खरीदना चाहता है और चिंता ,जिम्मेदारी से मुक्त ज़िंदगी का चयन करते हुए लिव इन को सकारात्मक नजरिये से देख रहा है जो निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति पर चोट है और जिसके लिए भारतीय संस्कृति भी तनवीर गाज़ी के शब्दों में बस यही कहती नज़र आती है -
    ''जवाँ सितारों को गर्दिश सीखा रहा था ,
       कल उसके हाथ का कंगन घुमा रहा था ,
    उसी दिए ने जलाया मेरी हथेली को
       जिसकी लौ को हवा से बचा रहा था .''

शालिनी कौशिक
     [कौशल] 

रविवार, 12 मार्च 2017

होली की हार्दिक शुभकामनायें


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  •     आज जब मैं बाज़ार से घर लौट रही थी तो देखा कि स्कूलों से बच्चे रंगे हुए लौट रहे हैं और वे खुश भी थे जबकि मैं उनकी यूनीफ़ॉर्म के रंग जाने के कारण ये सोच रही थी कि जब ये घर पहुंचेंगे तो इनकी मम्मी ज़रूर इन पर गुस्सा होंगी .बड़े होने पर हमारे मन में ऐसे ही भाव आ जाते हैं जबकि किसी भी त्यौहार का पूरा आनंद   बच्चे ही लेते हैं क्योंकि वे बिलकुल निश्छल भाव से भरे होते हैं और हमारे मन चिंताओं से ग्रसित हो जाते हैं किन्तु ये बड़ों का ही काम है कि वे बच्चों में ऐसी भावनाएं भरें जिससे बच्चे अच्छे ढंग से होली मनाएं.हमें चाहिए कि हम उनसे कहें कि होली आत्मीयता का त्यौहार है इसमें हम सभी को मिलजुल कर आपस में ही त्यौहार मानना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए की हमारे काम से किसी के दिल को चोट न पहुंचे.ये कह कर कि "बुरा न मानो  होली है "कहने से गलत काम को सही नहीं किया जा सकता इसलिए कोशिश करो कि हम सबको ख़ुशी पहुंचाएं .किसी उदास चेहरे पर मुस्कुराहट  लाना हमारा त्यौहार मनाने का प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए.फिर इस त्यौहार पर हम आज कुछ गलत वस्तुओं का प्रयोग कर दूसरों को परेशान करने की कोशिश करते हैं यह  भी एक गलत बात है त्यौहार पर हमें केवल प्राकृतिक रंगों से खेलना चाहिए.हम निम्न प्रकार रंग तैयार भी कर सकते हैं-
  • पिसे हुए लाल चन्दन के पाउडर को लाल रंग के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.
  • हल्दी को पीले रंग के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.
  • मेहँदी पाउडर को हरे रंग के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.
  • गुडहल के फूलों को धूप में सुखाकर लाल रंग तैयार कर सकते हैं.
साथ ही रंग छुड़ाने के लिए भी आप इन तरकीबों का इस्तेमाल कर सकते हैं-
  • जहाँ रंग लगा हो उस स्थान पर खीरे की फांक रगड़ कर रंग छुड़ा सकते हैं.
  • नीम्बूँ के रस में चीनी मिलकर व् कच्चे पपीते के गूदे को रगड़ कर भी रंग छुड़ाया जा सकता है.
इस पर्व से जुडी सबसे प्रमुख कथा भक्त प्रह्लाद की है जिसमे उन्हें मारना  के लिए होलिका उन्हें लेकर अग्नि में बैठी  और भगवन भोलेनाथ द्वारा दिया गया दुशाला ओढ़ लिया किन्तु भक्त प्रह्लाद इश्वर  के सच्चे भक्त थे दुशाला उन पर आ गया और होलिका जल कर भस्म हो गयी इसी याद में हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है और दुश्प्रवर्तियों   के शमन की कामना की जाती है.
आज आवश्यकता इसी बात की है की हम इस त्यौहार के मानाने  के कारण  पर ध्यान दें न की इसके ढंग पर .और आपस में भाईचारे को बढ़ाने  का काम करें न की नई दुश्मनिया बढ़ने का.जो ढंग इस वक़्त इस त्यौहार को मनाने का चल रहा है वह सही नहीं है.हम देखते हैं कि लगने के बाद सभी एक जैसे हो जाते हैं कोई बड़ा छोटा नहीं रह जाता .कोई अमीर  गरीब नहीं रह जाता तो हमारी भी कोशिश सभ्यता के दायरे में रहते हुए आपसी  प्रेम को बढाने की होनी चाहिए.मैं सोचती हूँ कि मेरा यह लेख इस दिशा में आपको ज़रूर प्रेरित करेगा.मैं आपको अंत में साधक गुरुशरण के शब्दों में होली मनाने के उत्तम ढंग बताते हुए होली की शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ.
"आओ खेलें ज्ञान की होली,
राग द्वेष भुलाएँ,
समता स्नेह  बढ़ा के दिल में
प्रेम का रंग लगायें."
     
            शालिनी कौशिक
                 (कौशल) 

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

आहा भारतीय अवसरवाद

भारतीय परम्पराओं के मानने वाले हैं ,ये सदियों से चली आ रही रूढ़ियों में विश्वास करते हैं और अपने को लाख परेशानी होने के बावजूद उन्हें निभाते हैं ये सब पुराने बातें हैं क्योंकि अब भारतीय तरक्की कर रहे हैं और उस तरक्की का जो असर हमारी परम्पराओं के सुन्दर स्वरुप पर पड़ रहा है वह और कहीं नहीं क्योंकि एक सच्चाई ये भी है कि अवसरवाद और स्वार्थ भी हम सबमे कूट कूटकर भरा हुआ है और हम अपने को फायदा कहाँ है बहुत जल्दी जान लेते हैं और वही करते हैं जिसमे फायदा हो .
भारत में विशेषकर हिंदुओं में हर व्यक्ति के जीवन में १६ संस्कारों को स्थान दिया गया है इसमें से और कोई संस्कार किसी का हो या न हो और लड़कियों का तो होता ही केवल एक संस्कार है वह है विवाह जो लगभग सभी का होता है तो इसमें ही मुख्य रूप से परिवर्तन हम ध्यान पूर्वक कह सकते हैं कि निरंतर अपनी सुविधा को देखते हुए लाये जा रहे हैं और ये वे परिवर्तन हैं जिन्होंने इस संस्कार का स्वरुप मूल रूप से बदलकर डाल दिया है और ये भी साफ़ है कि इस सबके पीछे हम हिंदुओं की अपनी सुविधा और स्वार्थ है .परिवर्तन अब देखिये क्या क्या हो गए हैं -
* पहले विवाह में रोज-रोज घर की औरतें कई दिनों से गीत किया करती थी आज समय के अभाव ने सब ख़त्म कर दिया है और रतजगा जो कि फिल्मों तक में प्रचलित था आज समाज से समाप्त हो चूका है नाचना गाना है पर सब कान फोडूं स्टाईल में ,एक दिन महिला संगीत का आयोजन किया जाता है और उसमे महिला तो महिला पुरुष भी भली भांति जुटे रहते हैं और ऐसा आयोजन होता है जो न केवल बहुत उत्साह दर्शाता है बल्कि पूरे मोहल्ले का चैन हराम करा जाता है और वह होता है डी.जे.आयोजन .कान फोडूं इस आयोजन ने विवाह को एक सिर फोडूं आयोजन में परिवर्तित कर दिया है .
* पहले ये था कि कंगना बांधने के बाद दूल्हा -दुल्हन बनने वाले लड़का लड़की कहीं आते जाते नहीं थे क्योंकि ये आशंका रहती थी कि कोई बुरी आत्मा उन पर असर कर जायेगी किन्तु अब तो लोगों के दिमाग बदल चुके हैं और लड़का तो लड़का लड़की भी कहीं कहीं फिरते नज़र आते हैं मुख्यतया ब्यूटी पार्लर क्योंकि कुछ भी हो पर सुन्दर तो दिखना ज़रूरी है .
*पहले लड़के के ब्याह में माँ नहीं जाती थी किन्तु समय बदला और लोगों के दिमाग भी कि आखिर माँ को इस आयोजन से क्यूँ वंचित रखा जाये जैसे वहाँ जाकर ही वह अपने लड़के की ख़ुशी में शामिल हो सकती है जबकि माँ यदि वहाँ नहीं जाती थी तो इसके पीछे एक मुख्य कारण ये था कि वह उसके पीछे कुछ अन्य रीति रिवाज़ों को यहाँ पूरा करती थी और विवाह का घर सूना रहना भी अच्छा नहीं माना जाता किन्तु अब ये भी होने लगा है .
*लड़की के ब्याह को घर की चौखट का पूजन माना जाता था किन्तु अब नहीं क्योंकि अब ये काम अधिकतर लड़की वाले लड़के वालों की इच्छा पर और स्वयं के काम भी कम करने की इच्छा पर घर से कहीं दूसरे शहर में या फिर लड़के वालों के शहर में करने लगे हैं इसलिए अब चौखट का पूजन भी समाप्त और ये भी कि फेरों के समय जो दिए जलाये जाते थे वे भी होटल या विवाह मंडप वालों द्वारा अति शीघ्र निपटान की कार्यवाही में समाप्त .
*विवाह के पश्चात् विदाई होती है और उसके बाद लड़की एक दिन बाद अपने घर आती थी इसके पीछे का उद्देशय उसके नए घर के बारे में भी जानना होता था वहाँ उसकी कुशल क्षेम के बारे में जानना होता था किन्तु अब सब ख़त्म अब विवाह के बाद विदाई का नाटक फिर तभी उसके आने का नाटक और फिर उसका अपनी ससुराल जाना और वहाँ से उसकी दिन हनीमून को प्रस्थान जिसके कारण ये सब नाटकीय आयोजन .
अब कुछ नहीं रह गया है बस नाटक नाटक और सिर्फ नाटक और ये सब किसलिए वह भी धन दौलत लूटने के लिए कहाँ तो एक तरफ वैवाहिक विज्ञापन में लड़की की सुंदरता मायने रखती है और कहाँ लड़की चाहे लूली हो लंगड़ी हो बीमार हो काली हो भैंस हो सब चलती है मात्र इसलिए कि वह दौलत से घर भर देगी .
अब जिस तरह सब टूटता जा रहा है वह दिन दूर नहीं जब लड़की बारात लाएगी और लड़का ले जायेगी और इससे बढ़कर भी हो सकता है कि विवाह की रस्मे ख़त्म ही हो जाएँ और हमारे समाज में मात्र लिव इन रिलेशन ही रह जाये .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

बुधवार, 8 मार्च 2017

..औरत ........,.... लांछित........ हैं

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व्यथित सही ,पीड़ित सही ,पर तुझको लगे ही रहना है ,
जब तक सांसें ये बची रहें ,हर पल मरते ही रहना है .
............................................................................
पिटना पतिदेव के हाथों से ,तेरी किस्मत का लेखा है ,
इस दुनिया की ये बातें ,माथे धरकर ही रहना है .
..........................................................................
औरत की चाहत का जग में ,कोई मोल नहीं है कभी नहीं ,
तू सुन ले कान खोल अपने ,तुझे नौकर बन ही रहना है .
...................................................................................
जो औरत बढे जरा आगे ,ये लांछित उसको करते हैं ,
तुझको इनकी आज्ञाओं का ,पालन करते ही रहना है .
..................................................................................
पल-पल की सच्चाई कहती ,'शालिनी' खुलकर के दिल से ,
नारी को जीवन जीने को ,बस दब-दबकर ही रहना है .

शालिनी कौशिक  
     [कौशल ]

सोमवार, 6 मार्च 2017

मासूम बच्चों से यौन अपराध - जिम्मेदारी आधुनिक नारी की?



''आंधी ने तिनका तिनका नशेमन का कर दिया ,
पलभर में एक परिंदे की मेहनत बिखर गयी .''
फखरुल आलम का यह शेर उजागर कर गया मेरे मन में उन हालातों को जिनमे गलत कुछ भी हो जिम्मेदार नारी को ठहराया जाता है जिसका सम्पूर्ण जीवन अपने परिवार के लिए त्याग और समर्पण पर आधारित रहता है .किसी भी सराहनीय काम का श्रेय लेने के नाम पर जब सम्पूर्ण समाज विशेष रूप से पुरुष वर्चस्ववादी समाज आगे बढ़ सीना तान कर खड़ा हो जाता है तो समाज में घटती अशोभनीय इन वारदातों का ठीकरा नारी के सिर क्यों फोड़ते हैं ?जबकि मासूम बच्चियां जिस यौन दुर्व्यवहार की शिकार हो रही हैं उसका कर्ता-धर्ता तो पुरुष ही है .
   आधुनिक महिलाएं आज निरंतर प्रगति पथ पर आगे बढ़ रही हैं और ये बात पुरुष सत्तात्मक समाज को फूटी आँख भी नहीं सुहाती और इसलिए सबसे अधिक उसकी वेशभूषा को ही निशाना बनाया जाता है .सबसे ज्यादा आलोचना उसके वस्त्र चयन को लेकर ही होती है .जैसे कि एक पुराने फ़िल्मी गाने में कहा गया-
''पहले तो था चोला बुरका,
   फिर कट कट के वो हुआ कुरता ,
      चोले की अब चोली है बनी
          चोली के आगे क्या होगा ?
ये फैशन यूँ ही बढ़ता गया ,
   और कपडा तन से घटता गया ,
       तो फिर उसके बाद ......''

यौन दुर्व्यवहार के लिए कपड़ों को दोषी ठहराया जा रहा है .यह धारणा भी बलवती की जा रही है कि यदि दो लड़कियां साथ जा रही हैं और उनमे से एक पूरी तरह से ढकी-छिपी हो और दूसरी आधुनिक वस्त्रों में हो तो वह आधुनिक वस्त्रों वाली ही छेड़खानी का शिकार होती है और यदि इसी धारणा पर  विश्वास किया जाये तो दिल्ली गैंगरेप कांड तो होना ही नहीं चाहिए था  क्योंकि उसमे दामिनी के भाई के अनुसार वह लम्बे गर्म ओवरकोट में थी .
    ऐसे में मासूम बच्चियों के साथ यौन दुर्व्यवहार के लिए महिलाओं के आधुनिक होने को यदि उत्तरदायी ठहराने की कोशिश की जाती है तो ये सरासर नाइंसाफी होगी समस्त नारी समुदाय के साथ, क्योंकि बच्चियों के मामले में पहले तो ये मासूम न तो कपड़ों के सम्बन्ध में कोई समझ रखती हैं और न ही यह जानती हैं कि जो व्यवहार उनके साथ किया जा रहा है वह एक गंभीर अपराध है .हम स्वयं देखते हैं कि बच्चे कैसे भी कहीं घूम फिर लेते हैं और खेलते रहते हैं वे अगर इन दुनियावी  बातों में फसेंगे तो बचपन शब्द के मायने ही क्या रह जायेंगे जो जिंदगी के औपचारिक अनौपचारिक तथ्यों से अंजान रहता है और एक शांत खुशहाल समय गुजारता है .
   ऐसे में ये सोचना कि बच्चे ये देखेंगे या महसूस करेंगे कि उनकी वेशभूषा अश्लील है या उत्तेजनात्मक ,मात्र कोरी कल्पना है साथ ही उनके बारे में सोचते हुए उनकी माँ ये सोचेगी कि मेरा बच्चा इस तरह अभद्र लग रहा है और हर वक्त घर में भी उसके कपड़ों को देखती रहेगी तो असम्भव ही कहा जायगा क्योंकि जो बच्चे इसका शिकार हो रहे हैं वे इतने छोटे हैं कि उनके बारे में उनके बड़े ये कल्पना भी नहीं कर सकते कि उनके साथ कोई ऐसा करने की सोच भी सकता है .इतनी छोटी बच्चियों के शरीर भले ही कपड़ों से ढके हो या न ढके हों कभी भी उनकी यौन प्रताड़ना का कारण नहीं होते ,उनकी यौन प्रताड़ना का एकमात्र कारण है ''उनकी मासूमियत ,जिसके कारण वे न तो उस व्यवहार को जान पाते हैं और न ही किसी को उसके बारे में बता पाने की स्थिति में होते हैं .जैसे कि मोबिन धीरज लिखते हैं -
''मुहं से निकले तो ज़माने को पता चलता है ,
घुट के रह जाये जो आवाज कोई क्या जाने .''
बिल्कुल यही कारण है कि वहशी दरिन्दे को अपनी हवस बुझाने के लिए इन बच्चियों के शरीर के रूप में एक महिला का शरीर मिलता है और उसका शिकार वह बच्ची न तो उसका प्रतिरोध ही कर सकती है और न ही उसका अपराध दुनिया के सामने उजागर .

   इसके साथ ही आधुनिक महिलाओं पर यह जिम्मेदारी डाली जा रही है तो ये नितान्त अनुचित है क्योंकि यह कृत्य इन बच्चियों के साथ या तो घर के किसी सदस्य द्वारा ,या स्कूल के किसी कर्मचारी या शिक्षक द्वारा ,या किसी पडौसी द्वारा किया जाता है और ऐसे में ये कहना कि वह उसकी वेशभूषा देख उसके साथ ऐसा कर गया ,पूर्ण रूप से गलत है यहाँ महिलाओं की आधुनिकता का तनिक भी प्रभाव नहीं कहा जा सकता .
    मासूम बच्चियों के प्रति यौन दुर्व्यवहार का पूर्ण रूप से जिम्मेदार हमारा समाज और उसकी सामंतवादी सोच है ,जिसमे पुरुषों के लिए किसी संस्कार की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती ,उनके लिए किसी नैतिक शिक्षा को ज़रूरी नहीं माना  जाता . यह सब इसी सोच का दुष्परिणाम है .ऐसे में समाज में जो थोड़ी बहुत नैतिकता बची है वह नारी समुदाय की शक्ति के फलस्वरूप है और यदि नारी को इसी तरह से दबाने की कोशिशें जारी रही तो वह भी नहीं बचेंगी और तब क्या हल होगा उनकी सहज कल्पना की जा सकती है .इसलिए नारी पर इस तरह से दोषारोपण करने वालो को ''नवाज़ देवबंदी''के इस शेर को ध्यान में रखना होगा -
''समंदर के किसी भी पार रहना ,
    मगर तूफान से होशियार रहना ,
        लगाओ तुम मेरी कीमत लगाओ
             मगर बिकने को भी तैयार रहना .''



शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

शनिवार, 4 मार्च 2017

खुदा की कुदरत.......


तमन्ना जिसमे होती है कभी अपनों से मिलने की
रूकावट लाख भी हों राहें उसको मिल ही जाती हैं ,
खिसक जाये भले धरती ,गिरे सर पे आसमाँ भी
खुदा की कुदरत मिल्लत के कभी आड़े न आती है .
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फ़िक्र जब होती अपनों की समय तब निकले कैसे भी
दिखे जब वे सलामत हाल तसल्ली दिल को आती है ,
दिखावा तब नहीं होता प्यार जब होता अपनों में
मुकाबिल कोई भी मुश्किल रोक न इनको पाती है .
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मुकद्दर साथ है उनके मुक़द्दस ख्याल रखते जो
नहीं मायूसी की छाया राह में आने पाती है ,
मुकम्मल है वही सम्बन्ध मुहब्बत नींव है जिसकी
महक ऐसे ही रिश्तों की सदा ये सदियाँ गाती हैं .
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खोलती है अपनी आँखें जनम लेते ही नन्ही जान
फ़ौज वह नातेदारों की सहमकर देखे जाती है,
गोद माँ की ही देती है सुखद एहसास वो उसको
जिसे पाकर अनजानों में सुकूँ से वो सो पाती है .
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नहीं माँ से बड़ा नाता मिला इस दुनिया में हमको
महीनों कोख में रखकर हमें दुनिया में लाती है ,
जिए औलाद की खातिर ,मरे औलाद की खातिर
मुसलसल कायनात शिद्दत से माँ के नग़मे गाती है .
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जहाँ में माँ का नाता ही बिना मतलब जो देता साथ
कभी न माँ की आँखों पर लोभ की बदली छाती है ,
भले ही दीवारें ऊँची खड़ी हों उसकी राहों में
कभी औलाद से मिलना न उसका रोक पाती हैं .
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''शालिनी ''ने यहाँ देखे तमाम नाते रिश्तेदार
बिना मतलब किसी को ना किसी की याद आती है ,
एक ये माँ ही होती है करे महसूस दर्द-ए-दिल
इधर हो मिलने की हसरत उधर हाज़िर हो जाती है .
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शालिनी कौशिक
       [कौशल ]





संभल जा रे नारी ....

''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपन...