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मई, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

संस्कृति रक्षण में महिला सहभाग

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स्मारिका- संस्कृति रक्षण में महिला सहभाग यूनान ,मिस्र ,रोमां सब मिट गए जहाँ से , बाकी अभी है लेकिन ,नामों निशां हमारा . कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी , सदियों रहा है दुश्मन ,दौरे ज़मां हमारा . भारतीय संस्कृति की अक्षुणता को लक्ष्य कर कवि इक़बाल ने ये ऐसी अभिव्यक्ति दी जो हमारे जागृत व् अवचेतन मन में चाहे -अनचाहे विद्यमान  रहती है  और साथ ही इसके अस्तित्व में रहता है वह गौरवशाली व्यक्तित्व जिसे प्रभु ने गढ़ा ही इसके रक्षण के लिए है और वह व्यक्तित्व विद्यमान है हम सभी के सामने नारी रूप में .दया, करूणा, ममता ,प्रेम की पवित्र मूर्ति ,समय पड़ने पर प्रचंड चंडी ,मनुष्य के जीवन की जन्मदात्री ,माता के समान हमारी रक्षा करने वाली ,मित्र और गुरु के समान हमें शुभ कार्यों  के लिए प्रेरित करने वाली ,भारतीय संस्कृति की विद्यमान मूर्ति श्रद्धामयी  नारी के विषय में ''प्रसाद''जी लिखते हैं - ''नारी तुम केवल श्रद्धा हो ,विश्वास रजत नग-पग तल में , पियूष स्रोत सी बहा करो ,जीवन के सुन्दर समतल में .'' संस्कृति और नारी एक दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं .नारी के गुण

छत्तीसगढ़ नक्सली हमला -एक तीर से कई निशाने

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छत्तीसगढ़ नक्सली हमला -एक तीर से कई निशाने  छतीसगढ़ स्थित सुकमा जिले के दर्भा घाटी क्षेत्र में कॉंग्रेसी नेताओं के काफिले पर हुए नृशंस हमले को ऊपरी तौर पर एक नक्सली हमले के रूप में देखा जा रहा है किन्तु जैसे जैसे समाचार पत्रों में ये समाचार प्रकाशित हो रहा है और भुग्तभोगियों व् घटनाक्रम में बचे लोगों के बयान आ रहे हैं उससे यह साफ होता जा रहा है कि यह मात्र नक्सली हमला नहीं था वरन सोची समझी राजनितिक साजिश भी था .      महेन्द्र कर्मा की हत्या का जहाँ तक सवाल है तो ये नक्सलियों की हिट लिस्ट में थे और नक्सलियों द्वारा उन पर पहले भी कई हमले किये जा चुके थे किन्तु नन्द कुमार पटेल ,प्रदेश अध्यक्ष की मौत को नक्सली हमले के परिणाम रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता है और यदि यह परिवर्तन यात्रा नक्सली क्षेत्र से निकालने पर पटेल को बात न मानने की सजा नक्सलियों ने दीभी तो उनके बेटे को किस कृत्या की सजा दी जबकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें नक्सलियों ने आसानी से जाने दिया जिनमे कोंटा के विधायक कवासी लकमा भी शामिल हैं . नक्सली हमला: पटेल, उनके बेटे का शव बरामद    एक तरफ दो-दो घंटे तक गोलीबारी होत

तेरे हर सितम से मुझको नए हौसले मिले हैं .''

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प्रवीण शुक्ल कहते हैं - ''तुम्हें इस दौर के हालात का मंज़र बताऊँ क्या ,  हुई है आँख मेरी आंसुओं से तर बताऊँ क्या , मैं अपने दुश्मनों से खुलके दो-दो हाथ कर लेता , उठा है दोस्तों के हाथ में पत्थर बताऊँ क्या .'' १९६७ में जन्मी एक विचारधारा जिसका उद्देश्य जनांदोलन के माध्यम से एक वर्गविहीन समाज की स्थापना करना था आज जिस उद्देश्य पर काम कर रहा है वह उसकी हाल की बहुत सी गतिविधियों से साफ़ हो गया है और वह महान उद्देश्य है ''एक व्यक्ति विहीन समाज की स्थापना .''   वह आन्दोलन जो १९६७ में माकपा से विभाजित हुआ ,उग्रवादी धड़े का विचार था ,जिसमे चारू मजूमदार ,कानू सान्याल और सरोज दत्त थे जिन्होंने माओवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक होने के कारण भारतीय कमुनिस्ट पार्टी [मार्क्सवादी -लेनिनवादी ]बनाई और पश्चिमी बंगाल के दार्जिलिंग जिले के अत्यंत पिछड़े गाँव नक्सलबाड़ी में मई १९६७ में शोषक ज़मींदारों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर जिस सशस्त्र आन्दोलन की नीव रखी थी उसे ही नक्सलवाद के नाम से जाना गया और तब से लेकर आज तक किये जाने वाले इस आन्दोलन के नीति परिवर्तन ने इसे वर्ग विह

कुपोषण और आमिर खान -बाँट रहे अधूरा ज्ञान

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कुपोषण और आमिर खान - बाँट रहे अधूरा ज्ञान  Bollywood Aamir Khan to spread awareness against malnutrition       ''भोज्य तत्वों के गुण और परिमाण में अपर्याप्त तथा आवश्यकता से अधिक उपभोग द्वारा जो हानिकारक प्रभाव शरीर में उत्पन्न हो जाते हैं ,वे 'कुपोषण' ही हैं .''     ''भोज्य तत्व ''गुण और परिमाण में शारीरिक आवश्यकतानुसार लेने चाहियें वर्ना इसके परिणाम बड़े भयानक निकलते हैं .     इस प्रकार  अपोषण +आवश्यकता से अधिक पोषण =कुपोषण      होता है और महान बालीवुड नायक आमिर खान कुपोषण के हटाने के लिए जिस मुहीम पर काम कर रहे हैं वे भारत में माँ और गर्भस्थ शिशु दोनों को इसी राह पर आगे बढ़ा रहे हैं  .वे कह रहे हैं कि छह माह तक बच्चे को केवल माँ का दूध ही दिया जाना चाहिए और कुछ नहीं मतलब कि वे माँ और बच्चा दोनों के लिए न चाहते हुए भी कुपोषण की राह खोल रहे हैं .      माँ का दूध बच्चे के लिए प्रकृति प्रदत्त पोषाहार प्रदान करता है जो बच्चे को सहज ग्राह्य होने के साथ साथ शुद्ध एवं बाहरी आक्रमण से मुक्त रखता है .विश्व स्वास्थ्य संगठन ,कृषि एवं

कल्पना पुरुष मन की .

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अधिकार  सार्वभौमिक सत्ता  सर्वत्र प्रभुत्व  सदा विजय  सबके द्वारा अनुमोदन  मेरी अधीनता  सब हो मात्र मेरा  कर्तव्य  गुलामी  दायित्व ही दायित्व  झुका शीश  हो मात्र तुम्हारा  मेरे हर अधीन का  बस यही कल्पना  हर पुरुष मन की . शालिनी कौशिक     

बाबूजी शुभ स्वप्न किसी से कहियो मत ...[..एक लघु कथा ]

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  ''मनोज सुन ''नरेन् ने आवाज़ लगाई ,हाँ ,क्या है ? ''फ्री है ?हाँ अभी तो एक घंटा फ्री ही हूँ ,तू बता न क्या कह रहा है ,पता है मनोज! मैंने आज सुबह सूर्योदय में एक खास सपना देखा है कि मैं राष्ट्रपति भवन में प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहा हूँ और पता है ये सपना मैंने सुबह सुबह देखा है ,नरेन् का चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था ,चल नरेन् तेरे तो मजे आ गए .कहते हैं सूर्योदय के समय देखे गए सपने तो १ से २ हफ्ते में फलदायी होते हैं ,फिर तो तेरे पास टाइम रहेगा नहीं चल मिठाई अभी खिला दे ,ये कह मनोज व् नरेन् रूम से बाहर निकलने ही वाले थे  कि गेट पर खड़े कन्हैय्या ने उन्हें रोकते हुए कहा ,''बाबूजी ! एक बात कहूँ ,देखिये बुरा मत मानियेगा ,कहूँ क्या ? हाँ ,हाँ ,कहो आज हमारा मूड बहुत अच्छा है बुरा मानने का तो सवाल ही नहीं उठता ,कहो जल्दी टाइम नहीं है ,मिठाई लेने जाना है ,व्यग्रता से नरेन् ने कन्हैय्या से से कहा ,''पता है बाबूजी ,मैंने भी आपकी ही तरह आज से दस साल पहले सुबह सुबह एक सपना देखा था कि मैं इस कॉलेज का प्रबंधक हो गया हूँ और मैंने ख़ुशी ख़ुशी अपना यह सपना सारे 

हर अँधेरे को मिटाकर बढ़ चलो ए जिंदगी

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   हर अँधेरे को मिटाकर बढ़ चलो ए जिंदगी आगे बढ़कर ही तुम्हारा पूर्ण स्वप्न हो पायेगा. गर उलझकर ही रहोगी उलझनों में इस कदर, डूब जाओगी भंवर में कुछ न फिर हो पायेगा. आगे बढ़ने से तुम्हारे चल पड़ेंगे काफिले, कोई अवरोध तुमको रोक नहीं पायेगा. तुमसे मिलकर बढ़ चलेंगे संग सबके होसले, जीना तुमको इस तरह से सहज कुछ हो पायेगा. संग लेकर जब चलोगी सबको अपने साथ तुम, चाह कर भी कोई तुमसे  दूर ना हो पायेगा. जुड़ सकेंगे पंख उसमे आशा और विश्वास के , ''शालिनी'' का नाम भी पहचान नयी पायेगा.

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 26-मेरी प्रविष्टि दो दोहे

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  "ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 26 दो दोहे- व्याकुल मन माँ वसुंधरा ,करें करुण पुकार , पर्यावरण के शोषण का ,बंद कर दो व्यापार . निसर्ग नियम पर ध्यान दे ,निसंशय मिले निस्तार , मेरा जीवन ही मनुज ,तेरा जग आधार .       शालिनी कौशिक 

मेरी किस्मत ही ऐसी है .

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     न होगा मुझको कुछ हासिल ,मेरी किस्मत ही ऐसी है , न फतह के होंगी काबिल ,मेरी किस्मत ही ऐसी है . मयस्सर थी मुझे खुशियाँ ,अगर कुछ करके दिखलाती , नहीं कर पाई मैं कुछ भी , मेरी किस्मत ही ऐसी है . खड़े हैं साथ में अपने ,न मानूं हूँ किसी की मैं , समझती खुद को बादशाह ,मेरी किस्मत ही ऐसी है . नहीं चाहा था जो मैंने ,बिना मांगे ही मिल गया , जो चाहा न मिला मुझको ,मेरी किस्मत ही ऐसी है . न पड़ना फेर में इसके ,यही कहती है ''शालिनी'' कहलवा देगी तुमको ये ,मेरी किस्मत ही ऐसी है .                 शालिनी कौशिक                [कौशल ]

ये गाँधी के सपनों का भारत नहीं .

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ये गाँधी के सपनों का भारत नहीं .   के .एन .कौल कहते हैं - ''खुद रह गया खुदा भूल गया ,    भूलना किसको था क्या भूल गया .       याद हैं मुझको तेरी बातें लेकिन ,          तू ही कुछ अपना कहा भूल गया .'' देश के संविधान का संरक्षक उच्चतम न्यायालय स्वयं नियम बनाता है और तोड़ता है .वक़्त का परिवर्तन उसे इसके लिए विवश करता है किन्तु जब सुधार की ओर बढ़ते कदम रोक दिए जाते हैं तो विवाद उठने स्वाभाविक हैं . मो. गयासुद्दीन बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी.ए.आई.आर.१९७७ अस.सी. १९२६ ,१९२९ में उच्चतम न्यायालय कहता है - ''अपराध एक व्याधिकृत [PATHOLOGICAL ] पथ भ्रष्टता [ABERRATION ]है ,अपराधी का साधारणतया उद्धार किया जा सकता है .राज्य को प्रतिशोध की बजाय पुनर्वास [REHABILITATE  ] करना है निम्न मनः संस्कृति [sub -culture  ] जो समाज विरोधी आचरण की ओर ले जाती है ,का निराकरण असम्यक निर्दयता से नहीं अपितु पुनः संस्कृतिकरण से किया जाना है .इसलिए दंड शास्त्र में दिलचस्पी का केंद्र बिंदु व्यक्ति है और उद्देश्य समाज के लिए उसका उद्धार करना है .कठोर और बर्बर दंड देना भूतकाल और प्रतिगा

कायरता की ओर बढ़ रहा आदमी .

दरिंदा है मनोज, अपनी पत्नी से भी किया था रेप    'गुड़िया' खतरे से बाहर, आरोपी ने कबूला गुनाह    झुलसाई ज़िन्दगी ही तेजाब फैंककर ,      acp slapped girl in delhi '' कायर होता जा रहा है आदमी '' दिल्ली में एक पञ्च वर्षीय बालिका से गैंगरेप , शामली में चार सगी बहनों पर तेजाब उडेला , मायके गयी पत्नी तो जल मरा , महिला से छेड़खानी मारपीट , रामपुर में अज़ीम नगर थाना क्षेत्र में सामूहिक दुष्कर्म के बदले सामूहिक दुष्कर्म , मोदीनगर में कैथवादी में पानी भरने गयी छात्रा से छेड़छाड़ कपडे फाड़े आदि आदि आदि दिल दहल जाता है मन क्षुब्ध हो जाता है रोज रोज ये समाचार देखकर पढ़कर किन्तु नहीं रुक रहे हैं ये और नहीं मिल पा रहा है कोई समाधान  इन्हें रोकने का .पुरुष जो नारी को अपने से दोयम दर्जा समाज में ,इस सृष्टि में प्रदान करता है और उसके संरक्षण का दायित्व अपने ऊपर लेता है .वही पुरुष आज बात बात पर स्त्री पर हमले कभी यौनाचार ,कभी तेजाब उडेलना कभी मारपीट करना आदि के रूप में करने लगा है और वह भी उस देश में जहाँ नारी की पूजा की जाती है ,जहाँ कहा जाता है - ''

अख़बारों के अड्डे ही ये अश्लील हो गए हैं .

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बेख़ौफ़ हो गए हैं ,बेदर्द हो गए हैं , हवस के जूनून में मदहोश हो गए हैं . चल निकले अपना चैनल ,हिट हो ले वेबसाईट , अख़बारों के अड्डे ही ये अश्लील हो गए हैं . पीते हैं मेल करके ,देखें ब्लू हैं फ़िल्में , नारी का जिस्म दारू के अब दौर हो गए हैं . गम करते हों गलत ये ,चाहे मनाये जलसे , दर्द-ओ-ख़ुशी औरतों के सिर ही हो गए हैं . उतरें हैं रैम्प पर ये बेधड़क खोल तन को , कुकर्म इनके मासूमों के गले हो गए हैं . आती न शरम इनको मर्दानगी पे अपनी , रखवाले की जगह गारतगर हो गए हैं . आये कभी है पूनम ,छाये कभी सनी है , इनके शरीर नोटों की अब रेल हो गए हैं . कानून की नरमी ही आज़ादी बनी इनकी , दरिंदगी को खुले ये माहौल हो गए हैं . मासूम को तडपालो  ,विरोध को दबा लो , जो जी में आये करने में ये सफल हो गए हैं . औरत हो या मरद हो ,झुठला न सके इसको , दोनों ही ऐसे जुर्मों की ज़मीन हो गए हैं . इंसानियत है फिरती अब अपना मुहं छिपाकर , परदे शरम के सारे तार-तार हो गए हैं . ''शालिनी'' क्या बताये अंजाम वहशतों का , बेबस हों रहनुमा भी अब मौन हो गए हैं . [मौलिक व् अप्रकाश

मिला जिससे हमें जीवन उसे एक दिन में बंधवाती .-HAPPY MOTHER'S DAY

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  तरक्की इस जहाँ में है तमाशे खूब करवाती , मिला जिससे हमें जीवन उसे एक दिन में बंधवाती . महीनों गर्भ में रखती ,जनम दे करती रखवाली , उसे औलाद के हाथों है कुछ सौगात दिलवाती . सिरहाने बैठ माँ के एक पल भी दे नहीं सकते , दिखावे में उन्हीं से होटलों में मंच सजवाती . कहे माँ लाने को ऐनक ,नहीं दिखता बिना उसके , कुबेरों के खजाने में ठन-गोपाल बजवाती . बढ़ाये आगे जीवन में दिलाती कामयाबी है , उसी मैय्या को औलादें, हैं रोटी को भी तरसाती . महज एक दिन की चांदनी ,न चाहत है किसी माँ की , मुबारक उसका हर पल तब ,दिखे औलाद मुस्काती . याद करना ढूंढकर दिन ,सभ्यता नहीं हमारी है , हमारी मर्यादा ही रोज़ माँ के पैर पुजवाती . किया जाता याद उनको जिन्हें हम भूल जाते हैं , है धड़कन माँ ही जब अपनी कहाँ है उसकी सुध जाती . वजूद माँ से है अपना ,शरीर क्या बिना उसके , उसी की सांसों की ज्वाला हमारा जीवन चलवाती . शब्दों में नहीं बंधती ,भावों में नहीं बहती , कड़क चट्टान की मानिंद हौसले हममे भर जाती . करे कुर्बान खुद को माँ,सदा औलाद की खातिर , क्या चौबीस घंटे में एक पल भी माँ है भारी पड़ ज

औरत की नज़र में हर मर्द है बेकार .

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   फरमाबरदार बनूँ औलाद या शौहर वफादार , औरत की नज़र में हर मर्द है बेकार . करता अदा हर फ़र्ज़ हूँ मक़बूलियत  के साथ , माँ की करूँ सेवा टहल ,बेगम को दे पगार . मनसबी रखी रहे बाहर मेरे घर से , चौखट पे कदम रखते ही इनकी करो मनुहार . फैयाज़ी मेरे खून में ,फरहत है फैमिली , फरमाइशें पूरी करूँ ,ये फिर भी हैं बेजार . हमको नवाज़ी ख़ुदा ने मकसूम शख्सियत , नादानी करें औरतें ,देती हमें दुत्कार . माँ का करूँ तो बीवी को बर्दाश्त नहीं है , मिलती हैं लानतें अगर बेगम से करूँ प्यार . बन्दर बना हूँ ''शालिनी ''इन बिल्लियों के बीच , फ़रजानगी फंसने में नहीं ,यूँ होता हूँ फरार .      शालिनी कौशिक            [ WOMAN ABOUT MAN ]   शब्दार्थ :फरमाबरदार -आज्ञाकारी ,बेजार-नाराज ,मक़बूलियत -कबूल किये जाने का भाव ,मनुहार-खुशामद,मनसबी-औह्देदारी ,फरहत-ख़ुशी ,फैयाजी-उदारता मकसूम -बंटा हुआ .फर्ज़ंगी -बुद्धिमानी .

जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .

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बात न ये दिल्लगी की ,न खलिश की है , जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है . न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें , फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया  की है . पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के , रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है . नाते नहीं होते हैं कभी पहले बाद में , खोया इन्हें तो रोने में आँखें तबाह की हैं. मौत के मुहं में समाती रोज़ दुनिया देखते , सोचते इस पर फ़तेह  हमने हासिल की है . जिंदगी गले लगा कर मौत से भागें सभी , मौके -बेमौके ''शालिनी''ने भी कोशिश ये की है . शालिनी कौशिक [कौशल ]