गुरुवार, 9 मई 2013

जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .



बात न ये दिल्लगी की ,न खलिश की है ,
जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .



न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें ,
फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया  की है .



पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के ,
रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .



नाते नहीं होते हैं कभी पहले बाद में ,
खोया इन्हें तो रोने में आँखें तबाह की हैं.



मौत के मुहं में समाती रोज़ दुनिया देखते ,
सोचते इस पर फ़तेह  हमने हासिल की है .



जिंदगी गले लगा कर मौत से भागें सभी ,
मौके -बेमौके ''शालिनी''ने भी कोशिश ये की है .


शालिनी कौशिक
[कौशल ]



5 टिप्‍पणियां:

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

bhavpoorn prastuti .aabhar

Devdutta Prasoon ने कहा…

कौशिक जी, वैराग्य का सहज रूप दृष्टव्य है !

कालीपद प्रसाद ने कहा…

न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें ,
फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया की है .


पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के ,
रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .
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यही सच है
डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
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Bhola-Krishna ने कहा…

पूर्णतः सत्य अनुभूति ! सुंदर प्रस्तुति !
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ये देह जनित रिश्ते दो दिन को जुड़े हैं हर आत्मा की डोर परमात्मा से जुडी है !!
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आशीर्वाद -
अंकल आंटी

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जीवन का निष्कर्ष वही है, सुन्दर रचना।

.............तभी कम्बख्त ससुराली ,

थी कातिल में कहाँ हिम्मत  ,मुझे वो क़त्ल कर देता  ,         अगर  मैं  अपने  हाथों  से  ,न  खंजर  उसको  दे  देता  . .....................