सोमवार, 13 मई 2013

अख़बारों के अड्डे ही ये अश्लील हो गए हैं .





बेख़ौफ़ हो गए हैं ,बेदर्द हो गए हैं ,
हवस के जूनून में मदहोश हो गए हैं .

चल निकले अपना चैनल ,हिट हो ले वेबसाईट ,
अख़बारों के अड्डे ही ये अश्लील हो गए हैं .


पीते हैं मेल करके ,देखें ब्लू हैं फ़िल्में ,
नारी का जिस्म दारू के अब दौर हो गए हैं .

गम करते हों गलत ये ,चाहे मनाये जलसे ,
दर्द-ओ-ख़ुशी औरतों के सिर ही हो गए हैं .

उतरें हैं रैम्प पर ये बेधड़क खोल तन को ,
कुकर्म इनके मासूमों के गले हो गए हैं .

आती न शरम इनको मर्दानगी पे अपनी ,
रखवाले की जगह गारतगर हो गए हैं .

आये कभी है पूनम ,छाये कभी सनी है ,
इनके शरीर नोटों की अब रेल हो गए हैं .

कानून की नरमी ही आज़ादी बनी इनकी ,
दरिंदगी को खुले ये माहौल हो गए हैं .

मासूम को तडपालो  ,विरोध को दबा लो ,
जो जी में आये करने में ये सफल हो गए हैं .

औरत हो या मरद हो ,झुठला न सके इसको ,
दोनों ही ऐसे जुर्मों की ज़मीन हो गए हैं .

इंसानियत है फिरती अब अपना मुहं छिपाकर ,
परदे शरम के सारे तार-तार हो गए हैं .

''शालिनी'' क्या बताये अंजाम वहशतों का ,
बेबस हों रहनुमा भी अब मौन हो गए हैं .

[मौलिक व् अप्रकाशित ]

शालिनी कौशिक
  [कौशल]



13 टिप्‍पणियां:

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

sundar bhavatmak prastuti .aabhar

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

बिल्कुल सही कहा है आपने .आभार

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

जबरदस्त प्रस्तुति !!

Devdutta Prasoon ने कहा…

भाव-पक्ष, कलापक्ष पर हाबी है | मनोभाव बिलकुल स्पष्ट हो गया है ! सुधार का पूरा उद्देश्य स्पष्ट है !

Asha Saxena ने कहा…

एक कटु सत्य उजागर करती रचना |
आशा

Dr. Sarika Mukesh ने कहा…

आज के दौर पर प्रहार करती सशक्त रचना...हार्दिक बधाई!

Rajendra Kumar ने कहा…

आती न शरम इनको मर्दानगी पे अपनी ,
रखवाले की जगह गारतगर हो गए हैं

दरिंदों के पास गैरत नाम की चीज ही नही रह गयी है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (15-05-2013) के "आपके् लिंक आपके शब्द..." (चर्चा मंच-1245) पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

vishvnath ने कहा…

हर लाइन में आपने समाज को उसका असली चेरा दिखाया है ...बहुत द्रढ़ और मजबूत प्रस्तुति .

Vishvnath

कालीपद प्रसाद ने कहा…

बहुत सुंदर सटीक भावपूर्ण प्रस्तुति!
डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
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latest postअनुभूति : क्षणिकाएं

Kailash Sharma ने कहा…

एक कटु सत्य...बहुत सुन्दर..

विजय राज बली माथुर ने कहा…

यथार्थ का सजीव खाका है यह कविता।
बरेली के दौरान (भाग-2 )---विजय राजबली माथुर

Sanjay Tripathi ने कहा…

शालिनीजी मैंने आपकी गजल पढी जो सटीक प्रहार कर रही है.बहुत सुंदर!

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