बुधवार, 22 मई 2013

कल्पना पुरुष मन की .




अधिकार 
सार्वभौमिक सत्ता 
सर्वत्र प्रभुत्व 
सदा विजय 
सबके द्वारा अनुमोदन 
मेरी अधीनता 
सब हो मात्र मेरा 

कर्तव्य 
गुलामी 
दायित्व ही दायित्व 
झुका शीश 
हो मात्र तुम्हारा 
मेरे हर अधीन का 

बस यही कल्पना 
हर पुरुष मन की .

शालिनी कौशिक 
   

11 टिप्‍पणियां:

shikha kaushik ने कहा…

YOU HAVE GIVEN RIGHT VIEW OVER MALE THINKING .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज बृहस्पतिवार (22-05-2013) के झुलस रही धरा ( चर्चा - १२५३ ) में मयंक का कोना पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सहजीवन में सबको जीवन..

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

व्यक्तियों की दो अलग अलग स्ट्रेंस का शब्द चित्र एक में शासन करने की दुर्दम्य इच्छा दूसरे में झुकाने झुकने झुकते चले जाने की विवशता .दोनों देह अभिमान से संचालित हैं मनो भाव .दृष्टा बन जीवन को देखें जियें ....ॐ शान्ति .

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

व्यक्तियों की दो अलग अलग स्ट्रेंस का शब्द चित्र एक में शासन करने की दुर्दम्य इच्छा दूसरे में झुकाने झुकने झुकते चले जाने की विवशता .दोनों देह अभिमान से संचालित हैं मनो भाव .दृष्टा बन जीवन को देखें जियें ....ॐ शान्ति .

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

कर्तव्य
गुलामी
दायित्व ही दायित्व
झुका शीश

बहुत सुंदर रचना,,,
Recent post: जनता सबक सिखायेगी...

Prashant Suhano ने कहा…

सुन्दर पंक्तियां हैं.. महत्वाकांक्षा और अहंकार को दर्शाती..

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

क्या कहूं....
बढिया।



मेरे TV स्टेशन ब्लाग पर देखें । मीडिया : सरकार के खिलाफ हल्ला बोल !
http://tvstationlive.blogspot.in/2013/05/blog-post_22.html?showComment=1369302547005#c4231955265852032842

शिवनाथ कुमार ने कहा…

अधिकार
सार्वभौमिक सत्ता
सर्वत्र प्रभुत्व
सदा विजय
सबके द्वारा अनुमोदन
मेरी अधीनता
सब हो मात्र मेरा

काफी हद तक सच ....
सुन्दर रचना
साभार !

विजय राज बली माथुर ने कहा…

ऐसा मन तो 'मननशील' होने के 'मनुष्य' के मौलिक गुणों के विपरीत है।

shyam Gupta ने कहा…

यह सिर्फ पुरुष मन की नहीं अपितु अहं-युक्त मन की कल्पना है ...वह स्त्री या पुरुष दोनों ही हो सकते हैं....हुए भी हैं इतिहास में ....
--बस पुरुष मन अधिक मुखर होता है स्त्री अंतर्मुखी.....

.............तभी कम्बख्त ससुराली ,

थी कातिल में कहाँ हिम्मत  ,मुझे वो क़त्ल कर देता  ,         अगर  मैं  अपने  हाथों  से  ,न  खंजर  उसको  दे  देता  . .....................