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सितंबर, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कृतज्ञ दुनिया २ अक्टूबर की

एक की लाठी सत्य अहिंसा एक मूर्ति सादगी की, दोनों ने ही अलख जगाई देश की खातिर मरने की . .......................................................................... जेल में जाते बापू बढ़कर सहते मार अहिंसा में , आखिर में आवाज़ बुलंद की कुछ करने या मरने की . ............................................................................. लाल बहादुर सेनानी थे गाँधी जी से थे प्रेरित , देश प्रेम में छोड़ के शिक्षा थामी डोर आज़ादी की . ................................................................................... सत्य अहिंसा की लाठी ले फिरंगियों को भगा दिया , बापू ने अपनी लाठी से नीव जमाई भारत की . ........................................................................... आज़ादी के लिए लड़े वे देश का नव निर्माण किया , सर्व सम्मति से ही संभाली कुर्सी प्रधानमंत्री की . ................................................................... मिटे गुलामी देश की अपने बढ़ें सभी मिलकर आगे , स्व-प्रयत्नों से दी है बढ़कर साँस हमें आज़ादी की . .........................

चिंता - चिता सम मानव की खातिर ,

 मिटा देती है जीवन का        समस्त अस्तित्व चिंताएं , ये आ जाती हरेक मन में      बिना हम सबके बुलाये , सुकून का कोई भी पल      ये हम पर रहने न देती , तड़पने की टीस भरकर       ये हमको तोहफे हैं देती , नहीं बच सकते हम इनसे     नहीं कर सकते इनको दूर , ये तोड़ें स्वाभिमान सबका     ये सबकी खुशियां करती दूर , कही जाती है ये चिंता      चिता सम मानव की खातिर , घिरा जैसे कोई इनसे          हुआ शमशान में हाज़िर . शालिनी कौशिक        [कौशल ]

मुल्क से बढ़कर न खुद को समझें हम,

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                      ''मुख्तलिफ   ख्यालात  भले  रखते हों ,मुल्क से बढ़कर न खुद  को समझें हम, बेहतरी हो जिसमे अवाम की अपनी ,ऐसे क़दमों को  बेहतर   समझें हम. ......................................................................................................... है ये  चाहत  तरक्की की राहें आप और हम  मिलके पार करें , जो सुकूँ साथ मिलके चलने में इस हकीक़त को ज़रा समझें हम . ................................................................................ कभी हम एक साथ रहते थे ,रहते हैं आज जुदा थोड़े से , अपनी आपस की  गलत फहमी  को  थोड़ी जज़्बाती   भूल  समझें हम .   ...........................................................................................                                  देखकर  आंगन  में खड़ी दीवारें आयेंगें तोड़ने हमें दुश्मन , ऐसे दुश्मन की गहरी चालों को अपने  हक  में कभी न  समझें हम . ................................................................................................. न कभी अपने हैं न अपने कभी हो सकते , पडोसी मुल्को

गुलामी नारी की नियति..कभी न मिल सकती मुक्ति .

बढ़ रही हैं गगन छू रही हैं लोहा ले रही हैं पुरुष वर्चस्व से कल्पना कपोल कल्पना कोरी कल्पना मात्र सत्य स्थापित स्तम्भ के समान प्रतिष्ठित मात्र बस ये विवशता कुछ न कहने की दुर्बलता अधीन बने रहने की हिम्मत सभी दुःख सहने की कटिबद्धता मात्र आंसू बहने की . न बोल सकती बात मन की है यहाँ बढ़कर न खोल सकती है आँख अपनी खुद की इच्छा पर अकेले न वह रह सकती अकेले आ ना जा सकती खड़ी है आज भी देखो पैर होकर बैसाखी पर . सब सभ्यता की बेड़ियाँ पैरों में नारी के सब भावनाओं के पत्थर ह्रदय पर नारी के मर्यादा की दीवारें सदा नारी को ही घेरें बलि पर चढ़ते हैं केवल यहाँ सपने हर नारी के . कुशलता से करे सब काम कमाये हर जगह वह नाम भले ही खास भले ही आम लगे पर सिर पर ये इल्ज़ाम . कमज़ोर है हर बोझ को तू सह नहीं सकती दिमाग में पुरुषों से कम समझ तू कुछ नहीं सकती तेरे सिर इज्ज़त की दौलत वारी है खुद इस सृष्टि ने तुझे आज़ाद रहने की इज़ाज़त मिल नहीं सकती . सहे हर ज़ुल्म पुरुषों का क्या कोई बोझ है बढ़कर करे है राज़ दुनिया पर क्यूं शक करते हो बुद्धि पर नकेल कसके जो रखे वासन

हिंदी के विभिन्न मुद्दों पर मेरी अभिव्यक्ति -क्या आप सहमत हैं

1-हिंदी ब्लॉगिंग हिंदी को मान दिलाने में समर्थ हो सकती है - हिंदी ब्लॉग्गिंग आज लोकप्रियता के नए नए पायदान चढ़ने में व्यस्त है .विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं की तानाशाही आज टूट रही है क्योंकि उनके द्वारा अपने कुछ चयनित रचनाकारों को ही वरीयता देना अनेकों नवोदित कवियों ,रचनाकारों आदि को हतोत्साहित करना होता था और अनेकों को गुमनामी के अंधेरों में धकेल देता था किन्तु आज ब्लॉगिंग के जरिये वे अपने समाज ,क्षेत्र और देश-विदेश से जुड़ रहे हैं और अपनी भाषा ,संस्कृति ,समस्याएं सबके सामने ला रहे हैं . ब्लॉगिंग के क्षेत्र में आज सर्वाधिक हिंदी क्षेत्रों के चिट्ठाकार जुड़े हैं और.अंग्रेजी शुदा इस ज़माने में हिंदी के निरन्तर कुचले हुए स्वरुप को देख आहत हैं किन्तु हिंदी को उसका सही स्थान दिलाने में जुटे हैं और इस पुनीत कार्य में ज़माने से जुड़े रहने को अंग्रेजी से २४ घंटे जुड़े रहने वाले भी हिंदी में ब्लॉग लेखन में व्यस्त हैं . हम सभी जानते हैं कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं मातृभाषा भी है और दिल की गहराइयों से जो अभिव्यक्ति हमारी ही कही जा सकती है वह हिंदी में ही हो सकती है क्योंकि अं

दुष्कर्म :नारी नहीं है बेचारी

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दुष्कर्म :नारी नहीं है बेचारी        दुष्कर्म आज ही नहीं सदियों से नारी जीवन के लिए त्रासदी रहा है .कभी इक्का-दुक्का ही सुनाई पड़ने वाली ये घटनाएँ आज सूचना-संचार क्रांति के कारण एक सुनामी की तरह नज़र आ रही हैं और नारी जीवन पर बरपाये कहर का वास्तविक परिदृश्य दिखा रही हैं . भारतीय दंड सहिंता में दुष्कर्म ये है - भारतीय दंड संहिता १८६० का अध्याय १६ का उप-अध्याय ''यौन अपराध ''से सम्बंधित है जिसमे धारा ३७५ कहती है- [ I.P.C. ] Central Government Act Section 375 in The Indian Penal Code, 1860 375. Rape.-- A man is said to commit" rape" who, except in the case hereinafter excepted, has sexual intercourse with a woman under circumstances falling under any of the six following descriptions:- First.- Against her will. Secondly.- Without her consent. Thirdly.- With her consent, when her consent has been obtained by putting her or any person in whom she is interested in fear of death or of hurt. Fourthly.- With her consent, when the man knows that h

हुए सहाय्य ये ही सबके आगे कदम बढ़ाने में .

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अर्पण करते स्व-जीवन शिक्षा की अलख जगाने में , रत रहते प्रतिपल-प्रतिदिन  शिक्षा की राह बनाने में . .......................................................................................... आओ मिलकर करें स्मरण नमन करें इनको मिलकर , जिनका जीवन हुआ सहायक हमको सफल बनाने में . ......................................................................................... जीवन-पथ पर आगे बढ़ना इनसे ही हमने सीखा , ये ही निभाएं मुख्य भूमिका हमको राह  दिखाने में    . ....................................................................................... खड़ी बुराई जब मुहं खोले हमको खाने को तत्पर , रक्षक बनकर आगे बढ़कर ये ही लगे बचाने में . ................................................................................... मात-पिता ये नहीं हैं होते मात-पिता से भी बढ़कर , गलत सही का भेद बताकर लगे हमें समझाने में . ................................................................................... पुष्प समान खिले जब शिष्य प्रफुल्लित मन हो इनका , करें अनुभव गर्व यहाँ ये