बुधवार, 28 नवंबर 2012

आत्महत्या -परिजनों की हत्या

आत्महत्या -परिजनों की हत्या 
  
Suicide : Image of guy cutting veins with a sharp dagger attempting suicide against black backgroundMurder : Blood covered knife, still dripping, in the hands of a murderer, with blood spatter on the brick wall.     आज आत्महत्या के आंकड़ों में दिन-प्रतिदिन वृद्धि हो रही है .कभी भविष्य को लेकर निराशा ,तो कभी पारिवारिक कलह ,कभी क़र्ज़ चुकाने में असफलता तो कभी कैरियर में इच्छित प्राप्त न होना ,कभी कुछ तो कभी कुछ कारण असंख्य युवक-युवतियों ,गृहस्थों ,किशोर किशोरियों को आत्म हत्या के लिए विवश कर रहे हैं और हाल ये है कि आत्महत्या ही उन्हें करने वालों को समस्या के एक मात्र हल के रूप में दिखाई दे रही है ,शायद उनकी सोच यही रहती है कि इस तरह वे अपनी परेशानियों से अपने परिजनों को मुक्ति दे रहे हैं किन्तु क्या कभी इस ओर कदम बढाने वालों ने सोचा है कि स्वयं आत्महत्या की ओर कदम बढ़ाकर  वे अपने परिजनों की हत्या ही कर रहे हैं ?
                 आत्महत्या एक कायरता कही जाती है किन्तु इसे करने वाले शायद अपने को बिलकुल बेचारा मानकर इसे अपनी बहादुरी के रूप में गले लगाते हैं .वे तो यदि उनकी सोच से देखा जाये तो स्वयं को अपनी परेशानियों से मुक्त तो करते ही हैं साथ ही अपने से जुडी अपने परेशानियों से अपने परिजनों को भी मुक्ति दे देते हैं क्योंकि मृत्यु के बाद उन्हें हमारे वेद-पुराणों के अनुसार क्या क्या भुगतना पड़ता है उसके बारे में न तो हम जानते हैं न जानना ही चाहते हैं और उनकी मृत्यु उनके परिजनों को क्या क्या भुगतने को विवश कर देती है इसे शायद ये कदम उठाने से पहले वे जानते हुए भी नहीं जानना चाहते किन्तु हम जानते हैं कि इस तरह की मृत्यु उनके परिजनों को क्या क्या भुगतने को विवश करती है .सबसे पहले तो समाज में एक दोषी की स्थिति उनकी हो जाती है आश्चर्य इसी बात का होता है कि जिनके साथ ऐसे में सहानुभूति होनी चाहिए उन्हें उनकी पीठ पीछे आलोचना का शिकार होना पड़ता है .कोई भी वास्तविक स्थिति को नहीं जानता और एक ढर्रे पर ही चलते हुए परिजनों को दोषी ठहरा  देता है ढर्रा मतलब ये कि यदि किसी युवक ने आत्महत्या की है तो उसका कोई प्रेमप्रसंग था और उसके परिजन उसका विरोध कर रहे होंगे ?यदि कोई किशोर मरता है तो उसे घर वालों ने डांट दिया इसलिए मर गया ,भले ही इन आत्महत्याओं के पीछे कुछ और वजह रही हो किन्तु आम तौर पर लोग पुँराने ढर्रे पर ही चलते हैं और परिजनों को अपराधी मान लेते  हैं और एक धारणा ही बना लेते हैं कि इनके परिवार के व्यक्ति ने ऐसा कृत्या किया और ये रोक न सके .परिजनों की ऐसी स्थिति को दृष्टि में रखते हुए डॉ.शिखा कौशिक ''नूतन''जी ने सही कहा है -
  ''अपनी ख़ुशी से ख़ुदकुशी करके वो मर गया ,
  दुनिया की नज़र में हमें बदनाम कर गया .''

और शायद दूसरों पर ऐसा दोषारोपण करने वाले उनकी विवशता को तभी समझ पाते हैं जब दुर्भाग्य से अनहोनी उनके लिए होनी बन जाती है .दूसरे बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं जो इसे -
       ''होई  है सोई जो राम रची राखा ''
कह स्वीकार कर लेते हैं और जिंदगी के साथ आगे बढ़ जाते हैं किन्तु अधिकांश जहाँ तक देखने में आया है बंद घडी की सुइयों की भांति ठिठक जाते हैं और अपने भूतकाल में खो जाते हैं .कहते हैं कि आत्महत्या करने वालों की सोचने समझने की शक्ति विलुप्त हो जाती है वैसे ही जैसे -
  ''विनाश काले विपरीत बुद्धि ''
और ऐसा लगता भी है क्योंकि यदि सोचने समझने की शक्ति उनमे रहती ,उन्हें अपने परिवार के लिए अपने महत्व का ,अपने अस्तित्व का अहसास होता तो वे कदापि ऐसा कदम नहीं उठाते ,वर्तमान के प्रति भय व् निराशावाद उन्हें ऐसे कुत्सित कृत्य की ओर धकेल देता है जिसके कारण वे स्वयं की मृत्यु द्वारा अपने परिजनों को जिन्दा लाश बनाकर इस दुष्ट संसार में जूझने  को छोड़ जाते हैं और समय के दुर्दांत गिद्ध उनके परिजनों का मांस नोचकर कैसे खाते हैं इस विषय में वे ये कदम उठाने से पहले सोच भी नही पाते हैं .शायद ऐसे में परिजनों की आत्मा यही कहती होगी -
''गर चाहते हो जिंदगी जिए हम ,
  पहले चलो इस राह पर तुम .''

              शालिनी कौशिक
                    [कौशल ]
 

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .

   
बात न ये दिल्लगी की ,न खलिश की है ,
जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .


न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें ,
फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया  की है .


पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के ,
रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .


नाते नहीं होते हैं कभी पहले बाद में ,
खोया इन्हें तो रोने में आँखें तबाह की हैं.


मौत के मुहं में समाती रोज़ दुनिया देखते ,
सोचते इस पर फ़तेह  हमने हासिल की है .


जिंदगी गले लगा कर मौत से भागें सभी ,
मौके -बेमौके ''शालिनी''ने भी कोशिश ये की है .
                       शालिनी कौशिक
                                 [कौशल ]




शनिवार, 24 नवंबर 2012

नारी के अकेलेपन से पुरुष का अकेलापन ज्यादा घातक

 Sexy_BRian pic
अकेलापन एक ज़हर के सामान होता है किन्तु इसे जितना गहरा ज़हर नारी के लिए कहा जाता है उतना गहरा पुरुष के लिए नहीं कहा जाता जबकि जिंदगी  का अकेलापन दोनों के लिए ही बराबर ज़हर का काम करता हैनारी  जहाँ तक घर के बाहर की बात है आज भी लगभग पुरुष वर्ग पर आश्रित है कोई भी लड़की यदि घर से बाहर जाएगी तो उसके साथ आम तौर पर कोई न कोई ज़रूर साथ होगा भले ही वह तीन-चार साल का लड़का ही हो इससे उसकी सुरक्षा की उसके घर के लोगों में और स्वयं भी मन में सुरक्षा की गारंटी होती है और इस तरह से यदि देखा जाये तो नारी के लिए पुरुषों के कारण भी अकेलापन घातक है क्योंकि पुरुष वर्ग नारी को स्वतंत्रता से रहते नहीं देख सकता और यह तो वह सहन ही नहीं कर सकता कि एक नारी पुरुष के सहारे के बगैर कैसे आराम से रह रही है इसलिए वह नारी के लिए अकेलेपन को एक डर का रूप दे देता  है और यदि पुरुषों के लिए अकेलेपन के ज़हर की हम बात करें तो ये नारी के अकेलेपन से ज्यादा खतरनाक है न केवल स्वयं उस पुरुष के लिए बल्कि सम्पूर्ण समाज के लिए क्योंकि ये तो सभी जानते हैं कि ''खाली दिमाग शैतान का घर होता है ''ऐसे में समाज में यदि अटल बिहारी जी ,अब्दुल कलाम जी जैसे अपवाद छोड़ दें तो कितने ही पुरुष कुसंगति से घिरे गलत कामों में लिप्त नज़र आते हैं .घर के लिए कहा जाता है कि ''नारी हीन घर भूतों का डेरा होता है ''तो ये गलत भी नहीं है क्योंकि घर को जिस साज संभल की सुरुचि की ज़रुरत होती है वह केवल नारी मन में ही पाई जाती है .पुरुषों  में अहंकार की भावना के चलते वे कभी अपनी परेशानी का उल्लेख करते नज़र नहीं आते किन्तु जब नारी का किसी की जिंदगी या घर में अभाव होता है तो उसकी जिंदगी या घर पर उसका प्रभाव साफ नज़र आता है नारी को यदि देखा जाये तो हमेशा  पुरुषों की सहयोगी  के रूप में ही नज़र आती  है उसे पुरुष की सफलता खलती नहीं बल्कि उसके चेहरे  पर अपने से सम्बंधित  पुरुष की सफलता एक नयी चमक ला देती है किन्तु पुरुष अपने से सम्बंधित नारी को जब स्वयं सफलता के शिखर पर चढ़ता देखता है तो उसके अहम् को चोट पहुँचती है और वह या तो उसके लिए कांटे बोने लगता है या स्वयं अवसाद में डूब जाता है.
     एक नारी फिर भी घर के बाहर के काम आराम से संपन्न कर सकती है यदि उसे पुरुष वर्ग के गलत रवैय्ये का कोई डर नहीं हो किन्तु एक पुरुष घर की साज संभाल  एक नारी की तरह कभी नहीं कर सकता क्योंकि ये गुण नारी को भगवान ने उसकी प्रकृति में ही दिया है .इसलिए पुरुष वर्ग को अपने अकेलेपन की ज्यादा चिंता करनी चाहिए न कि नारी के अकेलेपन की क्योंकि वह पुरुष वर्ग के अनुचित दखल न होने पर सुकून की साँस ले सकती है.
       शालिनी कौशिक
                [कौशल ]

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

माँ को कैसे दूं श्रद्धांजली ,

माँ तुझे सलाम


वो चेहरा जो
        शक्ति था मेरी ,
वो आवाज़ जो
      थी भरती ऊर्जा मुझमें ,
वो ऊँगली जो
     बढ़ी थी थाम आगे मैं ,

वो कदम जो
    साथ रहते थे हरदम,
वो आँखें जो
   दिखाती रोशनी मुझको ,
वो चेहरा
   ख़ुशी में मेरी हँसता था ,
वो चेहरा
   दुखों में मेरे रोता था ,
वो आवाज़
   सही बातें  ही बतलाती ,
वो आवाज़
   गलत करने पर धमकाती ,

वो ऊँगली
   बढाती कर्तव्य-पथ पर ,
वो ऊँगली
  भटकने से थी बचाती ,
वो कदम
   निष्कंटक राह बनाते ,
वो कदम
   साथ मेरे बढ़ते जाते ,
वो आँखें
   सदा थी नेह बरसाती ,
वो आँखें
   सदा हित ही मेरा चाहती ,
मेरे जीवन के हर पहलू
   संवारें जिसने बढ़ चढ़कर ,
चुनौती झेलने का गुर
     सिखाया उससे खुद लड़कर ,
संभलना जीवन में हरदम
     उन्होंने मुझको सिखलाया ,
सभी के काम तुम आना
    मदद कर खुद था दिखलाया ,

वो मेरे सुख थे जो सारे
   सभी से नाता गया है छूट ,
वो मेरी बगिया की माली
   जननी गयी हैं मुझसे रूठ ,
गुणों की खान माँ को मैं
    भला कैसे दूं श्रद्धांजली ,
ह्रदय की वेदना में बंध
    कलम आगे न अब चली .
           शालिनी कौशिक
                [कौशल ]

बुधवार, 21 नवंबर 2012

कसाब को फाँसी :अफसोसजनक भी सराहनीय भी

Kasab’s journey to the gallows


संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत सहित ३९ देशों ने मृत्युदंड समाप्त करने वाले प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया है और इसके ठीक एक दिन पश्चात् भारत ने अपने मंतव्य ''कानूनी मामलों के बारे में फैसला लेने का अधिकार ''के प्रति कटिबद्ध होने का सन्देश सम्पूर्ण विश्व को दे दिया है .अजमल आमिर कसाब को फाँसी दे भारत ने आतंकवाद के प्रति अपनी प्रतिरोधक शक्ति का परिचय दिया है और यह सही भी है क्योंकि सम्पूर्ण देशवासियों के लिए सुरक्षा का अहसास आतंकवाद का मुकाबला ऐसे मजबूत संकल्प द्वारा ही दिया जा सकता है अफ़सोस है तो केवल यही कि जहाँ सभ्यता निरंतर विकास की ओर बढ़ रही है वहीँ हमारी युवा शक्ति भटक रही है .
                       कसाब को हम पाकिस्तानी कहकर पृथक देश की युवा शक्ति नहीं कह सकते .भले ही डलहौजी की ''फूट डालो शासन करो'' की रणनीति का शिकार बन हमारे देश के दो टुकड़े हुए हों किन्तु भारत -पाक एक हैं ,एक ही पिता ''हिंदुस्तान '' की संतान ,जिनमे भले ही मतभेद हों किन्तु मनभेद कभी नहीं हो सकता .कसाब व् उस जैसे कितने ही युवा भटकी मानसिकता के परिचायक हैं .धार्मिक उन्माद में डूबे ये युवा दहशत गर्दी फैला रहे हैं क्यों नहीं समझते अपने धर्म के गूढ तत्व को ,जिसमे सभी से प्रेम करने की शिक्षा दी जाती है ,अन्याय अत्याचार भले ही स्वयं के साथ हो या किसी और के साथ उसका दृढ़ता से मुकाबला करने की शिक्षा दी जाती है न कि स्वयं दहशत फैला दूसरों के साथ अन्याय करने की ,और यही नहीं कि ये स्वयं भटक रहे हैं बल्कि इन्हें भटकाया जा रहा है और इनके माध्यम से अपने दिमागी फितूर को शांत करने वाले इनके आका बनकर बैठे लोग सुरक्षित शानो-शौकत की जिंदगी जी रहे हैं और फाँसी का शिकार मानसिक उलझन में डूबे हमारे ये युवा हो रहे हैं .
                अफ़सोस होता है युवा शक्ति के ऐसे इस्तेमाल और विनाश पर .हम बिलकुल नहीं चाहते युवा शक्ति का ऐसा अंत किन्तु तभी जब युवा अपनी शक्ति का प्रयोग सकारात्मक कार्यों में करें .फाँसी जैसी सजा ह्रदय विदारक है किन्तु जब युवा शक्ति यूँ भटक जाये और जिंदगी निगलने को दरिंदगी पर उतर आये तो भारत का यह कदम सही ही कहा जायेगा .इस तरह भटकी हुई युवा शक्ति के लिए मेरा तो बस यही सन्देश है-


''मुख्तलिफ  ख्यालात भले रखते हों मुल्क से बढ़कर न खुद  को समझें हम,
बेहतरी हो जिसमे अवाम की अपनी ऐसे क़दमों को बेहतर  समझें हम.

है ये चाहत तरक्की की राहें आप और हम मिलके पार करें ,
जो सुकूँ साथ मिलके चलने में इस हकीक़त को ज़रा समझें हम .

कभी हम एक साथ रहते थे ,रहते हैं आज जुदा थोड़े से ,
अपनी आपस की गलतफहमी को थोड़ी जज़्बाती  भूल  समझें हम .
                                   
देखकर आंगन में खड़ी दीवारें आयेंगें तोड़ने हमें दुश्मन ,
ऐसे दुश्मन की गहरी चालों को अपने हक में कभी न  समझें हम .

न कभी अपने हैं न अपने कभी हो सकते ,
पडोसी मुल्कों की फितरत को खुलके समझें हम .

कहे ये ''शालिनी'' मिल  बैठ मसले  सुलझा लें ,
अपने अपनों की मोहब्बत को अगर समझें हम .

         शालिनी कौशिक 
                  [ कौशल ]

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

ऐसे नहीं होगा अपराध का सफाया


१५ नवम्बर २०१२ उत्तर प्रदेश सरकार ने यहाँ की महिलाओं के लिए एक राहत भरे दिवस के रूप में स्थापित किया यहाँ वूमेन पावर हेल्पलाइन 1090 की शुरुआत कर. इस सेवा के सूत्रधार लखनऊ रेंज के पुलिस उप महानिरीक्षक नवनीत सिकेरा  का कहना है कि  वूमेन पावर लाइन उत्तर प्रदेश पुलिस की एक ऐसी सेवा है जिसका सिद्धांत एक राज्य एक नंबर है .महिलाओं के लिए यह सीधी सेवा है इसमें कोई पुरुष शिकायत दर्ज नहीं करा सकेगा और खास बात ये है कि शिकायत सुनने के लिए महिला पुलिस अधिकारी हैं .ये हेल्प लाइन महिलाओं को जहाँ तक अनुमान है अपराध से छुटकारा दिलाने में कुछ हद तक कामयाब अवश्य रहेगी किन्तु पूरी तरह से मददगर साबित होगी ये कल्पना तक असंभव है और इसका प्रमाण हमारे समाचार पत्र तो देते ही हैं हमारे आस पास की बहुत से घटनाएँ भी इसका पुख्ता साक्ष्य हमें दे जाती हैं 
 समाचार पत्र तो ऐसी घटनाओं से नित्य भरे हैं जिनमे महिलाओं को अपराध से रु-ब-रु होना पड़ता है .कानून व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने हेतु जो थाने प्रशासन द्वारा स्थापित किये जाते हैं उनमे महिलाओं के साथ किये गए दुर्व्यवहार की घटना के लिए यदि हम असंख्य घटनाओं को नज़रंदाज़ भी कर दें तो नित्य टाल-मटोल जो थानों में फरियादियों के साथ की जाती है उसे भुलाना संभव प्रतीत नहीं होता .

                      १६ नवम्बर को शामली में थाने में ही महिला अपने गले पर फांसी का फंदा लगाने के चिन्ह सहित पहुंची किन्तु रिपोर्ट नहीं लिखने के नाम वहां उसे निराश ही किया गया क्या ये केवल इसलिए कि वह फांसी के फंदे का निशान लेकर जीवित ही थाने पहुँच गयी ?क्या इस तरह रिपोर्ट नहीं लिखे जाने से प्रदेश अपराध मुक्त की श्रेणी में आ जायगा ?क्या इस तरह यहाँ की महिलाएं सुरक्षित महसूस कर सकेंगी.?जबकि अपराध किये जाते समय अपराधी को स्वयं पकड़ कर भी पुलिस में देने पर पुलिस दबंगों के प्रभाव में आकर उन्हें खुलेआम घूमने की छूट  देती है .कांधला [शामली] में एक महिला के यहाँ जो कि अकेली रहती है के यहाँ शाम के सात बजे एक चोर घुस आया और उसने टेलीविज़न देखते हुए उसपर लाठी से प्रहार किया जिसका उस महिला ने जमकर मुकाबला किया और उसे मोहल्ले के लोगों के साथ पुलिस के हवाले  कर दिया .अधिक चोट लगने पर वह अपने इलाज के लिए बाहर चली गयी और लौट कर जब आई तो देखती है कि पुलिस ने उसे छोड़ दिया है क्या यही है वह सुरक्षा जो प्रशासन महिलाओं को दे रहा है है और जब इतना सहस दिखने पर इतने खुलेआम ये जिम्मेदार पुलिस निभा रही है तो हेल्प लाइन के माध्यम पर कैसे भरोसा किया जा सकता है ?सरकार यदि महिलाओं  को वास्तव में सुरक्षा देना चाहती है तो पहले ज़मीनी स्तर पर अपने प्रशासनिक  अमले को दुरुस्त करे यूँ रिपोर्ट न लिखने और कुछ दबंगों के प्रभाव में आकर यदि पुलिस अपराध का सफाया करती रही तो एक दिन जनता का विश्वास इस व्यवस्था से उठ जायेगा और फिर वह दिन दूर नहीं जब लोग कानून हाथ में लेने आरम्भ कर देंगे और शायद वह स्थिति किसी के लिए भी शुभ नहीं होगी न सरकार के लिए और न ही जनता के लिए इसलिए समय रहते सरकार को इस तरह की घटनाओं से निबटने के लिए कुशल रणनीति बनानी ही होगी .
           शालिनी कौशिक
                 [कौशल ]



सोमवार, 19 नवंबर 2012

इंदिरा प्रियदर्शिनी :भारत का ध्रुवतारा

इंदिरा प्रियदर्शिनी :भारत का ध्रुवतारा 

जब ये शीर्षक मेरे मन में आया तो मन का एक कोना जो सम्पूर्ण विश्व में पुरुष सत्ता के अस्तित्व को महसूस करता है कह उठा कि यह उक्ति  तो किसी पुरुष विभूति को ही प्राप्त हो सकती है  किन्तु तभी आँखों के समक्ष प्रस्तुत हुआ वह व्यक्तित्व जिसने समस्त  विश्व में पुरुष वर्चस्व को अपनी दूरदर्शिता व् सूक्ष्म सूझ बूझ से चुनौती दे सिर झुकाने को विवश किया है .वंश बेल को बढ़ाने ,कुल का नाम रोशन करने आदि न जाने कितने ही अरमानों को पूरा करने के लिए पुत्र की ही कामना की जाती है किन्तु इंदिरा जी ऐसी पुत्री साबित हुई जिनसे न केवल एक परिवार बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र गौरवान्वित अनुभव करता है  और  इसी कारण मेरा मन उन्हें ध्रुवतारा की उपाधि से नवाज़ने का हो गया और मैंने इस पोस्ट का ये शीर्षक बना दिया क्योंकि जैसे संसार के आकाश पर ध्रुवतारा सदा चमकता रहेगा वैसे ही इंदिरा प्रियदर्शिनी  ऐसा  ध्रुवतारा थी जिनकी यशोगाथा से हमारा भारतीय आकाश सदैव दैदीप्यमान  रहेगा।
       १९ नवम्बर १९१७ को इलाहाबाद के आनंद भवन में जन्म लेने वाली इंदिरा जी के लिए श्रीमती सरोजनी नायडू जी ने एक तार भेजकर कहा था -''वह भारत की नई आत्मा है .''
       गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने उनकी शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् शांति निकेतन से विदाई के समय नेहरु जी को पत्र में लिखा था -''हमने भारी मन से इंदिरा को  विदा  किया है .वह इस स्थान की शोभा थी  .मैंने उसे निकट से देखा है  और आपने जिस प्रकार उसका लालन पालन किया है उसकी प्रशंसा किये बिना नहीं रहा जा सकता .''   सन १९६२ में चीन ने विश्वासघात करके भारत  पर आक्रमण किया था तब देश  के कर्णधारों की स्वर्णदान की पुकार पर वह प्रथम भारतीय महिला थी जिन्होंने अपने समस्त पैतृक  आभूषणों को देश की बलिवेदी पर चढ़ा दिया था इन आभूषणों में न जाने कितनी ही जीवन की मधुरिम स्मृतियाँ  जुडी हुई थी और इन्हें संजोये इंदिरा जी कभी कभी प्रसन्न हो उठती थी .पाकिस्तान युद्ध के समय भी वे सैनिकों के उत्साहवर्धन हेतु युद्ध के अंतिम मोर्चों तक निर्भीक होकर गयी .
आज देश अग्नि -५ के संरक्षण  में अपने को सुरक्षित महसूस कर रहा है इसकी नीव में भी इंदिरा जी की भूमिका को हम सच्चे भारतीय ही महसूस कर सकते हैं .भूतपूर्व राष्ट्रपति और भारत में मिसाइल कार्यक्रम  के जनक डॉ.ऐ.पी.जे अब्दुल कलाम बताते हैं -''१९८३ में केबिनेट ने ४०० करोड़ की लगत वाला एकीकृत मिसाइल कार्यक्रम स्वीकृत किया .इसके बाद १९८४ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी डी.आर.डी एल .लैब  हैदराबाद में आई .हम उन्हें प्रैजन्टेशन दे रहे थे.सामने विश्व का मैप टंगा था .इंदिरा जी ने बीच में प्रेजेंटेशन रोक दिया और कहा -''कलाम !पूरब की तरफ का यह स्थान देखो .उन्होंने एक जगह पर हाथ रखा ,यहाँ तक पहुँचने वाली मिसाइल कब बना सकते हैं ?"जिस स्थान पर उन्होंने हाथ रखा था वह भारतीय सीमा से ५००० किलोमीटर दूर था .
    इस तरह की इंदिरा जी की देश प्रेम से ओत-प्रोत घटनाओं से हमारा इतिहास भरा पड़ा है और हम आज देश की सरजमीं पर उनके प्रयत्नों से किये गए सुधारों को स्वयं अनुभव करते है,उनके खून की एक एक बूँद हमारे देश को नित नई ऊँचाइयों पर पहुंचा रही है और आगे भी पहुंचती रहेगी.
                  आज का ये दिन हमारे देश के लिए पूजनीय दिवस है और इस दिन हम सभी  इंदिरा जी को श्रृद्धा  पूर्वक  नमन करते है .
              शालिनी कौशिक
           [कौशल ]

रविवार, 18 नवंबर 2012

तो प्रस्तुत है शिखा कौशिक जी की प्रस्तुति : नादानों मैं हूँ ' भगत सिंह ' दिल में रख लेना याद मेरी ,

भारत और पाकिस्तान कभी एक थे और एक आम हिन्दुस्तानी के दिल में आज भी वे एक ही स्थान रखते हैं किन्तु सियासी गलियां और बुद्धिजीवी समाज के क्या कहने वह जब देखो इन्हें बाँटने में ही लगा रहता है .भगत सिंह  जिन्हें कम से कम हिंदुस्तान में किसी पहचान की आवश्यकता नहीं और जिनकी कद्रदान हिन्दुस्तानी अवाम  अंतिम सांसों तक रहेगी किन्तु पाकिस्तान की  सरकार शायद इस  शहादत  को नज़रंदाज़ करने में जुटी है और भुला  रही है इसकी महत्ता को जिसके कारण आज दोनों देशों की अवाम खुली हवा में साँस ले रही है .अभी 2 नवम्बर को मैंने डॉ शिखा कौशिक जी के ब्लॉग विचारों का चबूतरा पर जो प्रस्तुति इस  सम्बन्ध में देखी उससे मैं अन्दर तक भावविभोर हो गयी आप सभी के  अवलोकनार्थ उसे यहाँ प्रस्तुत कर रही  हूँ कृपया ध्यान दें और सरकार का ध्यान भी इस ओर दिलाएं ताकि सरकार पाकिस्तान सरकार से इस सम्बन्ध में सही कदम उठाने को कहे .
                                   शालिनी कौशिक 
 तो प्रस्तुत है शिखा कौशिक जी की  प्रस्तुति :

नादानों मैं हूँ ' भगत सिंह ' दिल में रख लेना याद मेरी ,

शुक्रवार, 2 नवम्बर 2012

नादानों मैं हूँ ' भगत सिंह ' दिल में रख लेना याद मेरी ,



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[पाकिस्तान के लाहौर में हाफिज सईद के नेतृत्व वाले जमात उद दावा और दूसरे कट्टरपंथी संगठनों के दबाव के आगे झुकते हुए लाहौर जिला प्रशासन ने अपने ही एक चौक शामदन चौक का नाम शहीद भगत सिंह के नाम पर रखने की योजना ठंडे बस्ते में डाल दी है । इससे शहीद के परिजन क्षुब्ध है। 

गुरुवार को होशियारपुर के कचहरी चौक पर स्थित अपने निवास पर शहीद भगत सिंह की भतीजी भूपिंदर कौर व नाती एडवोकेट सुखविंदर जीत सिंह संघा ने कहा कि शहीद किसी भी जाति व धर्म से ऊंचा स्थान रखते हैं, ऐसे में लाहौर के शामदन चौक जिसे सिटी सेंटर चौक के नाम से भी जाना जाता है, का नाम स्वयं लाहौर के जिला प्रशासन ने ही 31 अगस्त को शहीद-ए-आजम भगत सिंह रख, वहां पर उनकी मूर्ति व उनकी लिखी कविता को पत्थर पर उकेर कर लगाने की बात कह पूरे संसार में एक सदभावना के तौर पर मिसाल कायम की थी। अब कट्टरपंथियों के आगे जिस तरह लाहौर जिला प्रशासन व वहां की सरकार अपने वायदे से मुकर रही है, उससे शहीद के परिजनों को ठेस पहुंची है।

लाहौर के सौंदर्यीकरण के लिए बनाए गए समिति दिलकश लाहौर के सदस्य एजाज अनवर ने कहा कि चौक का नाम बदलने का फैसला कुछ समय के लिए टाल दिया गया है। भुपिंदर कौर व सुखविंदरजीत सिंह ने प्रधानमंत्री से अपील की कि वह इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चयोग से बात कर इस मामले का हल करें।]
इससे शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता  है .शहीद  -ए-आज़म  के नाम  पर  एक  चौराहे  के नाम रखने तक में पाकिस्तान  में आपत्ति  की जा  रही है .जिस युवक ने   देश की आज़ादी के खातिर प्राणों का उत्सर्ग करने तक में देर  नहीं की उसके  नाम पर एक चौराहे का नाम रखने तक में इतनी देर ....क्या  कहती  होगी  शहीद भगत  सिंह  की आत्मा ?यही  लिखने का प्रयास किया है -

आज़ादी  की खातिर हँसकर फाँसी को गले लगाया था ,
हिन्दुस्तानी  होने का बस अपना फ़र्ज़ निभाया था .

तब नहीं बँटा था मुल्क मेरा  भारत -पाकिस्तान में ,
थी दिल्ली की गलियां अपनी ; अपना लाहौर चौराहा था .

पंजाब-सिंध में फर्क कहाँ ?आज़ादी का था हमें जूनून ,
अंग्रेजी  अत्याचारों से कब पीछे कदम हटाया था ?

आज़ाद मुल्क हो हम सबका; क्या ढाका,दिल्ली,रावलपिंडी !
इस मुल्क के हिस्से होंगे तीन ,कब सोच के खून बहाया था !

नादानों मैं हूँ ' भगत सिंह ' दिल में रख लेना याद मेरी ,
'रंग दे बसंती ' जिसने अपना चोला कहकर रंगवाया था .

बांटी तुमने नदियाँ -ज़मीन  ,मुझको हरगिज़ न देना बाँट  ,
कुछ शर्म  करो खुद पर बन्दों ! बस इतना  कहने आया  था !!!

जय  हिन्द !
शिखा  कौशिक  'नूतन '


शनिवार, 17 नवंबर 2012

बचपन को हम कहाँ ले जा रहे हैं ?


बचपन को हम कहाँ ले जा रहे हैं ?

एक फ़िल्मी गाना इस ओर  हम सभी का ध्यान आकर्षित करने हेतु  पर्याप्त है -
''बच्चे मन के सच्चे सारे जग की आँख के तारे ,ये वो नन्हें फूल हैं जो भगवान  को लगते प्यारे ,''

लेकिन शायद हम ये नहीं मानते क्योंकि आज जो कुछ भी हम बच्चों को दे रहे हैं वह कहीं से भी ये साबित नहीं करता एक ओर सरकार बालश्रम रोकने हेतु प्रयत्नशील है तो दूसरी ओर हम बच्चों को चोरी छिपे इसमें झोंकने में जुटे हैं.आप स्वयं आये दिन देखते हैं कि बाज़ारों में दुकानों पर ईमानदारी के नाम पर बच्चों को ही नौकर लगाने में दुकानदार तरजीह देते हैं .सड़कों पर ठेलियां ठेलते ,कबाड़ का सामान खरीदने के लिए आवाज़ लगते बच्चे ही नज़र आते हैं .



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 बच्चे अपने योन शोषण की शिकायत नहीं कर सकते इस लिए बच्चों का योन शोषण तेज़ी से बढ़ रहा है .अभी हाल में ही स्कूल बस ड्राइवर द्वारा नॉएडा में एक बच्ची के साथ ऐसे घटना प्रकाश में आई है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो आये दिन समाचार पत्र इन घटनाओं से भरे पड़े हैं .  


Vice-Principal held for beating students

इसके  साथ ही एक और दुखद  पहलू है जो बच्चों  को लेकर हमारे असंवेदनशील होने का परिचायक है और वह है विद्या के मंदिरों में बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार और वह भी बच्चों के लिए भगवान् का दर्जा रखने वाले शिक्षकों द्वारा .कितने ही स्कूलों से बच्चों के साथ ऐसी घटनाएँ प्रकाश में  आती रहती हैं कि एक बार को तो ये प्रतीत होता है कि ये वास्तव में बच्चें हैं या कोई अपराधी जिनके साथ शिक्षक ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जिसे करने की इजाजत कानून अपराधियों के साथ भी नहीं देता .माँ बाप अपने बच्चों को विद्यालयों में पढने भेजते हैं किन्तु वहां इन मासूमों को  पीट कर क्या ये शिक्षक अपने कार्य के साथ न्याय कर रहे हैं .ज्यादा पिटाई बच्चों को ढीठ बनाती  है क्या वे यह नहीं जानते ?
 बचपन हमारे देश की अमूल्य निधि है और ये हम सभी का कर्तव्य है कि हम इसकी राहें  प्रशस्त करें न कि इसके लिए  आगे बढ़ने के रास्ते बंद .
                                          शालिनी कौशिक
                                               [कौशल ]

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

जरूरी है राजनीति के शर्मनाक दौर की हार

जरूरी है राजनीति के शर्मनाक दौर की हार 
   Bharatiya Janata Party  Nitin Gadkari not quitting, rules BJP top brass India Against Corruption Sonia Gandhi Indian National Congress
भारतीय राजनीति आज जिस दौर से गुज़र रही है उसे शर्मनाक ही कहना ज्यादा सही होगा .मेरे पूर्व आलेख ''अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे,मोदी की पत्नी क्या मुफ्त की ?"'को पढ़ किसी ने मुझे अंध कॉंग्रेसी मानसिकता का कहा तो किसी ने सभ्यता की हद में रहने को कहा .सबसे पहले तो  मैं ये कहूँगी कि मैं कॉंग्रेसी हूँ किन्तु इसकी अंध भक्त मुझे नहीं कहा जा सकता इस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गाँधी जी व् राहुल गाँधी जी को भले ही कोई कुछ भी कहे किन्तु एक बात तो उन दोनों की प्रशंसनीय है ही कि वे किसी भी राजनेता पर अभद्र व् व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं करते .जो कि इस वक़्त भारतीय राजनीति में आम है .जिस लेख को लेकर मुझे सभ्यता की परिधि में रहने को कहा गया वह आलेख केवल ''शठे शाठ्यं समाचरेत ''पर आधारित है .मोदी जी जब थरूर व् सुनंदा पर व्यक्तिगत आक्षेप करते हैं और अभद्रता से करते हैं तब कोई उन्हें इस सीमा की याद  क्यों नहीं दिलाता और जब उनके मामले में सब चुप रहते हैं तो मुझे कुछ कहने को कैसे आगे बढ़ जाते हैं ?वास्तव में जो जिस भाषा को समझता है उससे उसी भाषा में बात की जाती है .सभी जानते हैं कि ''बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद ."
                                  अब आते हैं भारतीय राजनीति के इस शर्मनाक दौर पर जिसमे जिसे देखो अभद्रता की हदे पार कर रहा है .राहुल गाँधी को 'बुद्धू'कहने वाले सुब्रहमनियम  स्वामी  को यदि राहुल भी उनकी भाषा में जवाब दें तो क्या उनकी शक्ल पर बारह नहीं बज जायेंगें . सुब्रहमनियम  स्वामी का ''खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे ''वाली स्थिति तो अब राहुल गाँधी  द्वारा अदालती कारवाई की  चेतावनी पर हो गयी है .राहुल गाँधी की चिट्ठी मिलने से इंकार करने वाले ये स्वामी अपने जाल में खुद फंसते नज़र आ रहे हैं .एक बुद्धिजीवी वकील होते हुए वे सड़क छाप नेता की तरह बोल रहे हैं .कहते हैं ''कि कोई चिट्ठी नहीं मिली और अगर मिलेगी तो कूड़ेदान में फैंक दूंगा .''भला क्यूं ?यदि वे सही हैं तो चुनौती स्वीकार करें और आरोपों को साबित करके दिखलायें .भला मुझे कॉंग्रेस के अंध भक्त कहने वाले मोदी व् स्वामी के चाटुकारों  को ये देखना चाहिए कि इस तरह की छिछोरी बातों  से वे खुद ही गाँधी परिवार को मजबूती दे रहे हैं .
                                                   
         ''नॅशनल हेराल्ड ''को ९० करोड़ देने की बात पर स्वामी चुनाव आयोग पहुँच कांग्रेस की  मान्यता रद्द करने की बात करते हैं .देखा जाये तो उनके लिहाज से कॉंग्रेस को मान्यता मिलनी ही नहीं चाहिए क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही यह समाचार पत्र कॉंग्रेस की  विचारधारा को प्रसारित कर रहा है .और ये तब जबकि यह समाचार पत्र कॉग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु  जी द्वारा स्थापित  किया गया है ,और देश में कई राजनीतिक दल हैं जो अपनी विचारधारा के प्रचार -प्रसार के लिए अपना समाचार पत्र  निकालते हैं और इससे किसी भी दल की मान्यता को कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और ये जो अज स्वामी की भूरी भूरी प्रशंसा में लगे हैं उनके कंधे पर रखकर बन्दूक चला रहे हैं और और उनके सिर पर रखकर राजनीति की रोटी सेंक रहे हैं उन्हें बहुत योग्य वकील कहते हैं .और ये तब जबकि यह समाचार पत्र कॉग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु  जी द्वारा स्थापित  किया गया है ,और देश में कई राजनीतिक दल हैं जो अपनी विचारधारा के प्रचार -प्रसार के लिए अपना समाचार पात्र निकालते हैं और इससे किसी भी दल की मान्यता को कोई प्रभाव नहीं पड़ता है .स्वामी आज जिस राजनीति की डोर पकड़ कर चल रहे हैं वह केवल कुत्सित मानसिकता की परिचायक है और न केवल स्वामी बल्कि आज के अधिकांश राजनेता उसी राह पर चल रहे हैं जिसमे केवल अस्वस्थ आलोचना की जाती है .अभी कल की ही तो बात है भाजपा अध्यक्ष गडकरी जी के बयाँ को लेकर सियासी हलकों में तूफ़ान सिर उठाये है .यह तो सर्वविदित है कि स्वामी विवेकानंद  की दाऊद  इब्राहीम से कोई तुलना नहीं की जा सकती किन्तु यहाँ उन्होंने दिमाग की दिशा की बात की है जो विवाद का नहीं प्रशंसा का विषय है .स्वामी विवेकानंद जहाँ एक ओर संसार के उत्कृष्ट प्रेरक व्यक्तित्व हैं वहीँ दाऊद इब्राहीम विश्व का निकृष्टतम त्याज्य व्यक्तित्व है .गडकरी जी के अनुसार यह केवल दिमाग को दिशा देने की बात है जो दिमाग सत्कार्यों में लगा वह विवेकानंद बन जाता है और जो दुष्कृत्यों में लगा वह दाऊद इब्राहीम बन जाता है .
                                 आज अन्य सभी दलों के नेताओं ने इस बयान पर बबाल खड़े कर रखे हैं .जबकि सभी कहते हैं कि अच्छे काम को तारीफ और बुरे काम को बुराई मिलनी चाहिए .क्या हमारे राजनीतिज्ञ इससे अनभिज्ञ हैं ?पंडित जवाहर लाल नेहरु जी ने लोकसभा  में पूर्व  प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को सुनकर उनकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी और कहा था -"कि ये लड़का राजनीति में बहुत आगे जायेगा ."क्या आज के राजनीतिज्ञ इस नीति को नहीं अपना सकते ?
    और यही बात आम जनता के लिए है सवाल केवल कॉंग्रेस ,भाजपा ,सपा ,बसपा आदि के प्रति झुकाव का नहीं है ,सवाल योग्यता को अंधेरों से बहर लेने का है ,सवाल ईमानदारी को  सिंहासन आरूढ़ करने का है ,सवाल भ्रष्टाचार को खत्म करनेका है . केजरीवाल कहते हैं कि कॉंग्रेस भ्रष्टाचार की जननी है ,कॉंग्रेस विपक्ष को ,भाजपा को दोषी ठहराती है वास्तविकता यह हैं कि भ्रष्टाचार  जनता की देन है जो अपने छोटे छोटे कामों को कराने के लिए और जल्दी करवाने के लिए किसी की कोई भी मांग मानने को तैयार हो जाती है .अगर हम सच में कुछ करना चाहते हैं और सत्ता में ईमानदार योग्य व् कुशल प्रशासक चाहते हैं तो हमें ''चाहे जैसे भी हो अपना काम होना चाहिए की नीति ''छोडनी होगी और अराजक ताकतों को मुहं तोड़ जवाब देना होगा .
                                 मोदी हों या मुख़्तार अब्बास नकवी ,दिग्विजय सिंह हों या जगदम्बिका पाल ऐसे नेताओं को अपनी राजनीति की लगाम कसनी होगी और व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप की राजनीति छोड़ नीति ,कार्यप्रणाली की आलोचना व् सुधार पर ध्यान केन्द्रित कर देश का भला करना होगा .
                     साथ ही एक बात और आज केजरीवाल के कार्य की भूरी भूरी प्रशंसा करने वालों को भी ये शपथ लेनी होगी कि आज जिस तरह वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने में उनको शीर्ष पर चढ़ा रहे हैं ठीक वैसे ही समय आने पर वे वोट देकर उनके हाथ मजबूत करेंगे  क्योंकि उनके हाथों की मजबूती केवल उनकी नहीं वरन लोकतंत्र की ,जनता की मजबूती होगी और हमारी राजनीति के शर्मनाक दौर की हार भी .
                              शालिनी कौशिक 
                                 [कौशल ]

शनिवार, 3 नवंबर 2012

क्या केजरीवाल का ये तरीका सही है ?


क्या केजरीवाल का ये तरीका सही है ?


अक्सर मन में विचार आता है कि क्या अरविन्द केजरीवाल द्वारा लगातार ढूंढ ढूंढकर भ्रष्ट नेताओं को निशाना बनाना व् आरोपों की झड़ी लगाने का तरीका सही है ?सभी जानते हैं कि राजनीति एक दलदल है और इसमें लगभग सभी नेता गहरे तक समाये हैं .भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए भारतीय राजनीतिज्ञों में से ढूंढकर जो वे आरोपों प्रत्यारोपों द्वारा अपना स्थान बनाना चाह रहे हैं क्या वह हमारे देश से भ्रष्टाचार को हटाने में कारगर साबित हो पायेगा ?सभी जानते हैं कि अधिकांश राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार में घिरे हैं ऐसे में जहाँ तक मेरा विचार है केजरीवाल ये सही नहीं कर रहे हैं .इस तरह वे अपने व्यक्तित्व को उबाऊ रूप दे रहे हैं धीरे धीरे इस तरह उनके भाषणों से लोगों  को ऊब महसूस होगी और वे हंसी का रूप ले लेंगे .आज अगर  वे सच्चे इरादे से भ्रष्टाचार रुपी बुराई से देश को निजात दिलाना चाहते हैं तो उन्हें अपने को साबित करना होगा वैसे वे स्वयं को अपनी सिविल सर्विस द्वारा भी साबित कर सकते थे .उदाहरण के लिए ''खेमका '' को ही देखिये जिनकी 20 साल की नौकरी में ४० तबादले हुए और आज भी वे कर्मठता व् ईमानदारी से कर्तव्य पथ पर डटे हुए हैं .ऐसे ही केजरीवाल के हाथ में भी ये शक्ति आई थी लेकिन चलिए उन्होंने  इसे त्याग कर राजनीति के पथ पर आगे बढ़ भ्रष्टाचार का मुकाबला करने को ज्यादा शक्तिशाली पथ ढंग माना और उसमे आगे बढ़ अपनी हिम्मत से राजनीतिज्ञों को नाकों चने चबाने को मजबूर किया .आज उन्हें जन समर्थन प्राप्त है और इसे वोट में तब्दील करना होगा और फिर  उन्हें  चुनाव जीतकर भ्रष्टाचार का जड़ से विनाश करने में पूर्ण सहयोग दे जनता को दिखाना होगा कि वे उनके सपनों से खेलने वाले नहीं बल्कि साकार करने वाले हैं .इसलिए आज उन्हें ये आरोप -प्रत्यारोप की आग उगलनी छोडनी होगी क्योंकि ये जो आज सबको काट कर फैंक  रही है कल उनकी अभिव्यक्ति के धार को ही काट कर रख देगी .क्या आप भी यही मानते हैं ?
                                शालिनी कौशिक 

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

अब आया न ऊंट पहाड़ के नीचे :क्या मोदी की पत्नी मुफ्त की


अब आया न ऊंट पहाड़ के नीचे ..

कमाल है  देश में कोई भी  मुद्दा  जिसमे  कांग्रेसी  फंसते  दिखाई  देते  हैं भाजपाइयों  का मुंह बड़ी तेज़ी से खुलता है और जब अपने नेता और वह  भी जिसे  बढ़ा  चढ़ा  कर  प्रधानमंत्री  पद  पर सजाने  की कोशिशें  जारी हैं पर आरोपों के थपेड़े पहुंचे आरम्भ होते हैं तब पहले कांग्रेसियों को वरीयता दे कहा जाता है की पहले आप  ..........सुनंदा पुष्कर जो की अब शशि थरूर जी की ब्याहता पत्नी हैं पर कटाक्ष करने के मामले में तो मुख़्तार अब्बास नकवी  एकदम बोल गए की लव गुरु थरूर को लव मिनिस्टर बनाओ: बीजेपी तब क्यों नहीं कहा की पहले कांग्रेसियों के द्वारा हमारे सामने स्थिति साफ की जाये तभी हम मुहं खोलेंगें अब उनके द्वारा स्थिति सफाई की अपेक्षा क्यों की जा रही है क्या उनकी पत्नी के बारे में अपने मुहं से फूल उगलने पर मोदी जी के द्वारा स्थिति साफ नहीं की जानी चाहिए थी .अब उनकी पत्नी के बारे में जानकारी जो की नवभारत टाइम्स पर प्रकाशित की gayi है पर एक नज़र डालें :-

क्या मोदी वाकई अविवाहित हैं: दिग्विजय


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यू ट्यूब से ली गई फोटो
शिमला।। हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का झंडा बुलंद करने शिमला पहुंचे दिग्विजय सिंह ने कहा है कि दूसरे की पत्नियों पर अपमानजनक टिप्पणियां करने वाले नरेंद्र मोदी अपनी पत्नी के बारे में क्यों चुप हैं? उन्होंने दावा किया कि मोदी शादीशुदा हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा, 'नरेंद्र मोदी की शादी यशोदा बेन से 1968 में हुई थी। यू-ट्यूब पर नरेंद्र मोदी की पत्नी का नाम और शादी के साक्ष्य मौजूद हैं।'

यहां देखें: यू ट्यूब का वह विडियो जिसमें यशोदा बेन नाम की महिला खुद को मोदी की पत्नी बताती हैं

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने नरेंद्र मोदी को सुनंदा पुष्कर पर दिए उनके बयान पर आड़े हाथों लिया। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिग्विजय ने कहा कि मोदी के बयान से महिलाओं का अपमान हुआ है। नरेंद्र मोदी ने हिमाचल प्रदेश में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा को 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड बताया था।

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी की पत्नी को लेकर लंबे समय से विवाद है। यह आरोप लगाया जाता है कि मोदी शादीशुदा हैं, मगर पत्नी के साथ नहीं रहते। कहा जाता है कि उनकी पत्नी एक टीचर हैं और गुजरात के एक गांव में अकेली रहती हैं। मोदी ने आधिकारिक तौर पर इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा है। गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान विरोधियों की तरफ से यह बात बार-बार उठाई जाती है, लेकिन मोदी इसका न तो खंडन करते हैं और न पुष्टि।

दिग्गी राजा ने मोदी से पूछा कि सभी सांसदों और विधायकों को चुने जाने के बाद अपना मेरिटल स्टेटस दिखाना होता है, लेकिन नरेंद्र मोदी का मेरिटल स्टेटस आज तक ब्लैंक है, भला क्यों?

मोदी के बयान पर शशि थरूर का भी खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि पत्नी हमेशा से अनमोल होती है और उसका प्यार भी। लेकिन यह वही जान सकता है जिसने कभी किसी से प्यार किया हो। दिग्विजय सिंह ने कहा कि मोदी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं और उनके बयान से महिलाओं का अपमान हुआ है।


बीजेपी ने भी टाला सवाल
50 करोड़ की गर्लफ्रेंड वाले बयान पर मोदी का साथ देने वाले बीजेपी नेताओं की कमी नहीं थी, मगर द्ग्विजय सिंह के इस आरोप के बाद कोई बीजेपी नेता मोदी का बचाव करता नहीं दिख रहा। मोदी की ही तरह बीजेपी भी इस आरोप की न तो पुष्टि कर रही है और न ही खंडन। गुरुवार को बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद का ध्यान खास तौर पर दिग्विजय सिंह के इस बयान की ओर खींचा गया। इसके बावजूद वह इस सवाल को टाल गए। उन्होंनवे कहा कि पहले कांग्रेस साफ करे कि दिग्विजय सिंह किस हैसियत से यह सवाल उठा रहे हैं। क्या उनका यह कॉमेंट पार्टी का कॉमेंट माना जाए? उन्होंने कहा कि जब तक कांग्रेस इस बारे में स्थिति साफ नहीं करती, हम इस पर कुछ नहीं बोलेंगे।
अपनी पत्नी को इस तरह उपेक्षित जीवन देने वाले मोदी किस हक़ से दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप कर रहे हैं .रविशंकर जी स्वयं पहले ये बताएं की किस हक़ से या हैसियत से मोदी जी द्वारा शशि थरूर  के जीवन साथी के बारे में ऐसी कुत्सित टिपण्णी वे कर रहे थे .और गडकरी जी आप भी जरा ध्यान दें अपने कल के वक्तव्य के बारे में जब आपने कहा था की मैं जाँच को तैयार वाड्रा भी करें जाँच का सामना अब अपने मोदी जी से कहिये की शशि जी की बीवी ५० करोड़ की है तो क्योंकि वे उसके खाते  में इतने रूपए रखते हैं फिर क्या उनकी बीवी मुफ्त की है जिसे वे गाँव में उपेक्षित रखते हैं मोदी जी के लिए ऐसे ही शब्द इस्तेमाल होंगे क्योंकि वे हर किसी की कीमत लगाते .  हैं जरा ये भी बताते चलें की प्रधानमंत्री पद की क्या कीमत लगायी है?
                         शालिनी कौशिक 
                                     [कौशल ]

शत शत नमन शंकर दयाल शर्मा जी को

विकिपीडिया से साभार   आज जन्मदिन है देश के  नौवें राष्ट्रपति  डाक्टर शंकर दयाल शर्मा जी का और वे सदैव मेरे लिए श्रद्धा के पात्र रहेंगे...