गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

सोनिया-मुलायम :राजनीति के आदर्श



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''जो भरा नहीं है भावों से ,
      बहती जिसमे रसधार नहीं .
वह ह्रदय नहीं है पत्थर है ,
     जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं .''
   बचपन से राष्ट्रप्रेम की ये पंक्तियाँ पढ़ते हुए ह्रदय में राष्ट्र भावना सर्वोपरि रही किन्तु आज के दो समाचार इस भावना में थोड़ा सा हेर-फेर कर गए और वह हेर-फेर स्वदेश के स्थान पर इन पंक्तियों को कुछ यूँ ह्रदय में टंकित कर गया -
  '' वह ह्रदय नहीं है पत्थर है ,
        जिसमे बच्चे का प्यार नहीं .''
और किसी अन्य हेर-फेर के स्थान पर सभी ये समझ सकते हैं कि ये किसी गैर के बच्चे के लिए नहीं बल्कि अपने खुद के बच्चों के लिए प्यार की बात हो रही है .
       आज के दो समाचार एक तो सीधी तरह से माँ का बेटे के प्रति अनुराग दर्शित कर रहा है तो दूसरा समाचार घुमा-फिराकर बाप का बेटे के हिट को सर्वोपरि महत्व देता हुआ दिखा रहा है .
     अध्यक्ष बनाये  बगैर सोनिया ने खुद ही पार्टी से दूरी बना कर राहुल के हाथों में पार्टी की कमान सौंप दी और यह तब जबकि राहुल अब तक के राजनीतिक कैरियर में पार्टी के लिए अपनी कोई उपयोगिता साबित नहीं कर पाए हैं और काफी हद तक पार्टी की राह में बाधा ही दिखाई दिए हैं लेकिन पुत्र मोह इस देश में इस कदर माँ-बाप के दिलो-दिमाग पर हावी होता है कि वे हज़ार दुःख देने पर भी बेटे से कहते हैं -
  '' खुश रहो हर ख़ुशी है तुम्हारे लिए ,
            छोड़ दो आंसुओं को हमारे लिए .''
   और इसी का असर है कि सोनिया इटली निवासी होते हुए भी भारतीयता के रंग में रंग बेटे की ताजपोशी की राह आसान कर गयी .चलिए ये तो हुई माँ की बात जो भले ही कुछ भारत वासियों की नज़रों में विदेशी हों किन्तु माँ इस धरती पर कहीं की भी हो होती अपनी संतान की ही है पर राजनीति का आकाश तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है यहाँ तो बाप माँ से बढ़कर ही कदम उठा रहा है .
       हमारे माननीय नेता मुलायम सिंह जी जिनके सुपुत्र अखिलेश यादव ने वर्तमान चुनाव नेताजी के नाम से लड़ स्वयं गद्दी संभाल मुगलों में अपना नाम लिखा दिया जिसमे बेटा बाप को दरकिनार कर खुद आगे बढ़ जाता है और उनके नाम का पूरा फायदा उठा अखिलेश ने मुलायम की अब तक मुसलमानों के ह्रदय में बनायीं सारी जगह २०१३ के दंगों में उनके साथ घटी नाइंसाफी में गँवा दी और स्थिति ये बन गयी कि अबकी बार चुनावों में मुसलमान भी सपा से किनारा करते नज़र आने लगे ,ऐसे में मुलायम अपना पुत्र प्रेम दिखाने को प्रख्यात शायर  वसीम बरेलवी की इन पंक्तियों के अंदाज में सामने आये हैं -
  '' दिल में मंदिर सा माहौल बना देता है ,
    कोई एक शमा सी हर शाम जला देता है .
    जिंदगी दी है तो ये शर्त इबादत न लगा ,
   पेड़ का साया भला पेड़ को क्या देता है .''
     सपा से आज भी जो अधिकांश जो जुड़े हुए हैं वे दागी हैं . अखिलेश की स्वच्छ छवि बनी रहे और वे जनता को बाप -चाचा के सामने मजबूर दिखाई दें और सपा दबंगई से ये चुनाव भी जीत जाये इसलिए मुलायम ने ये जोरदार दांव चला है ''सारा इलज़ाम शिवपाल के माथे और अखिलेश की बल्ले-बल्ले .इनके पास जो उम्मीदवार बचे-खुचे हैं ,दागी हैं ,हार की शत-प्रतिशत सम्भावना में उन्हें ही वे टिकट देंगे और बाप बेटे की इस पार्टी में चाचा की भूमिका केवल बदनामी के लिए ही तय की गयी है वैसे भी शिवपाल का नाम राजनीति के मैदान में कोई महत्व तो रखता नहीं है इसलिए इन बातों को मद्देनज़र रखते हुए खुद ही विचारिये कि ''पेड़ का साया भला पेड़ को क्या देता है .''
     माँ-बाप का ये संतान मोह राजनीति के लिए आदर्श है क्योंकि कलियुग में केवल अहं ही रह गया है और राजनीति तो वह जगह है जिसके लिए 'सिकंदर 'हयात 'कह गए हैं -
''मुझे इज़्ज़त की परवाह है , न मैं जिल्लत से डरता हूँ ,
 अगर हो बात दौलत की तो हर हद से गुजरता हूँ .
 मैं नेता हूँ मुझे इस बात की है तरबियत हासिल
 मैं जिस थाली में खाता हूँ उसी में छेद करता हूँ .''
    ऐसे में संतान मोह के कारन राजनीति में उच्च आदर्श की स्थापना करने वाले सोनिया गाँधी व् मुलायम सिंह नमन के पात्र हैं जो कम से कम राजनीति में अपने से इतर किसी का ध्यान तो रख रहे हैं वर्ना वहां तो सभी जहर का कारोबार कर दूसरों के लिए मौत के द्वार खोलने का ही काम करते हैं .इसलिए अंत में एक बार इन शब्दों में पुनः इन दोनों महान आत्माओं को नमन -
   ''जहर सारे जहाँ का पी रहे हैं ,
    जनम से आजतक पापी रहे हैं .
  महापुरुषों नमन तुमको ह्रदय से
    तुम्हारा नाम लेकर जी रहे हैं .''

शालिनी कौशिक
      [कौशल ]

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

अब और न मरेंगे मोदी जी

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"कुछ लोगों को मनसब गूंगा बहरा कर देते हैं,
रोटी मंहगी करने वाले जहर को सस्ता कर देते हैं."
        गुलजार देहलवी की ये पंक्तियाँ हमें रूबरू करा रही हैं उन परिस्थितियों से जो हमारे मीडिया द्वारा बनाये गये, अच्छे दिनों की सोच लाये गये नई - नई जैकिट, कुर्ते व सूट से सजाये  हुए, तराशे हुए दिखावा पसंद जनता द्वारा सम्पूर्ण देशवासियों पर थोपे गये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की तानाशाही पसंद नीति व स्वयं को देश का सबसे काबिल प्रधानमंत्री साबित करने की जिद से उपजी हुई है और जिसका परिणाम यह है कि जनता नोटबंदी के 50 दिन पूरे होने पर भी लाइनों में खड़े होकर मर रही है या कैश न मिलने पर घरों में जहर खाकर मर रही है.
         काले धन - काले मन से देश बर्बाद कहने वाले मोदी शायद स्वयं को सफेद धन - सफेद मन वाला मानते हैं यह एक अच्छी बात भी है और रिकार्ड तथ्य भी कि 'चोर ने कभी भी खुद को चोर नहीं कहा'. आज राजनीति में मोदी जी ने जिस तालाब की खुदाई कराई है वह केवल और केवल कीचड़ से भरा हुआ था, ये औरों पर कीचड़ उछाल रहे हैं और सब इन पर किन्तु न इनका कोई नुकसान न उनका, बल्कि कीचड़ उछालने वालों को ये बाहर तक छोड़ने आते हैं और कहते हैं-"आते रहिये. "नुकसान केवल जनता का जो आज हर तरफ से निराशा के घेरे में है.
        आंखों में आंसू भर मोदी ने 50 दिन मांगे थे, आज वे भी पूरे हो गए और क्या हुआ सब जानते हैं. काले धन की आड़ में सभी की जिंदगी में उथल-पुथल मचाने वाले इस निर्णय ने सब्जी व्यापारियों का स्वाद बिगाड़ दिया है. शामली जिले के सब्जी की दुकान करने वाले हाजी इलियास कहते हैं - " जितनी सब्जी खरीदकर लाते हैं वह पूरी बिक नहीं पाती, कच्चा माल होने के कारण अगले दिन खराब हो जाता है जिससे काफी नुकसान हो रहा है. नोटबंदी का काफी असर व्यापार पर हुआ है, कैशलेस व्यापार करना मुश्किल है क्योंकि अनपढ़ व्यापारी उसे संभाल नहीं पायेगा."
     अनपढ़ व्यापारी ही क्या करेगा जब परिस्थितियों को पढे लिखे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ही नहीं समझ रहे. यूपी में राज करने की ख्वाहिश ने मोदी जी को बौरा दिया है. जो कभी दूसरों की आंखों के आंसू का मजाक उड़ाया करते थे आज स्वयं की आंखों में आंसू भर जनता को भावुक करना चाह रहे हैं उसी जनता को जिसके मन में उनके लिए फिलहाल यही भाव हैं -
"दिलों में जिनके लगती है वो आंखों से नहीं रोते,
 जो अपनों के नहीं होते किसी के भी नहीं होते,
  जो पराया दर्द अपने दर्द से ज्यादा समझते
  किसी के रास्ते में वो कभी कांटे नहीं बोते. "
       पर क्या फर्क पड़ता है सत्ता के नशे में चूर इन पर जो आज के हालात में अपने हाथों में आयी ताकत का ये सोचकर पुरजोर इस्तेमाल कर लेना चाहते हैं कि पता नहीं आगे ये मौका नसीब हो भी या नहीं. कैशलेस व्यवस्था और वह भी उस  देश में जहां लोगों को अभी साधारण पढाई भी ढंग से करनी नहीं आती. मोबाइल का, स्मार्टफोन का चलन बढ गया विश्व की एक बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था हो गई जहाँ इनका इस्तेमाल अत्यधिक है, इन्टरनेट का इस्तेमाल विश्व में चौथे - पांचवें स्थान पर है, यह साबित नहीं करता कि लोग डिजीटल रूप से शिक्षित हो गये हैं. न तो शिक्षा का यहां पूरा प्रसार है न संसाधनों का, देखा जाए तो अधिकांश मोबाइल व स्मार्टफोन उपयोगकर्ता केवल बात करने, गाने सुनने व वीडियो देखने के लिए ही इनका इस्तेमाल कर रहे हैं. मदनलाल आढती कहते हैं - "कैशलेस कारोबार कैसे करें, सभी ग्राहक भी तो नकदी देकर ही सामान खरीदते हैं, हमें भी किसानों को कैश ही भुगतान करना पड़ता है तो हम व्यापारियों से भी माल की कीमत कैश में ही लेते हैं."  अच्छे दिन की सोचकर जिस मोदी को लोगों ने वोट दी आज उसी सोच पर पछतावा करने को जनता विवश है. व्यापारी दीपावली पूजन में कमी मान रहे हैं और जनता अपने भाग्य में ,फलस्वरूप जगह जगह भंडारे, भगवान् की कथाएँ करायी जा रही हैं ऐसी स्थिति पर कवि दुष्यंत कुमार कहते हैं -
"पुख्ता होते ही मर गयी चीजें,
 बात कच्ची थी, बात सच्ची थी,
 घर बनाकर मैं बहुत पछताया
 इससे खाली जमीन अच्छी थी. "
    दो दिन में उत्तर प्रदेश चुनाव की तिथि की घोषणा हो जायेगी, हो सकता है सफेद धन वाले सफेद मन वाले मोदी जनता में अपना" इम्प्रेशन "ठीक करने को नोटों का जखीरा बैंकों में पहुंचवा दें, जनता को मौत की त्रासदी झेलने के बाद अब स्वर्ग में पहुंचवा दें, उन्हें उनका ही धन अपने एहसान तले दबाकर दिलवा दें, रिजर्व बैंक की नीति में फिर कोई नया परिवर्तन करवा दें किन्तु जनता दूध की जली है छाछ भी फूंक - फूंक कर पीयेगी. उसे तो अब बस यही कहना है कि 50 दिन कम नहीं होते अब और न मरेंगे मोदी जी, उसने तो सत्यपाल "सत्यम" जी के शब्दों में बस यही कहने की ठान ली है -
"अंजाम बदल जायेगा गर तुम आगाज बदल दो,
 जो दर्द नहीं सुनता ऐसा हर राज बदल दो. "
शालिनी कौशिक
   (कौशल) 

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

मान गए भाई -भाजपाई ही देशभक्त:भाजपाई ही रामभक्त

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 महफ़िल में मुझे गलियां देकर है बहुत खुश ,
  जिस शख्स पर मैंने कई एहसान किये हैं .''

   राहत ''इंदौरी '' का यह शेर राहत के दिल को भले ही दुनिया को दिखाने को  भले ही स्वान्तः सुखाय रचना के आधार पर राहत दे दे लेकिन ह्रदय की टीस को ,दिल की कसक को ज़ाहिर कर देता है हर एक उस मुसलमान की जो इस देश पर सब कुछ अपना कुर्बान करने के बाद भी उपेक्षितों की श्रेणी में बैठा है ,आतंकवादियों की कतार में खड़ा है .

         ये देश जो हमेशा से ''वसुधैव कुटुम्बकम '' की संज्ञा से विभूषित रहा ,जिसने हर मेहमान का आगे बढ़कर स्वागत किया , इस देश में आने वाली हर संस्कृति को आँगन की तुलसी का स्थान दे पूज्यनीय दर्जा दिया और खुद पर जरा सा एहसान करने वाले पर अपनी जान तक न्यौछावर करने से भी नहीं हिचका,आज उस देश में भाजपा जैसी पार्टी और इसके नेताओं जैसे क्रांतिवीर ही देशभक्ति व् रामभक्ति के मालिक हो गए हैं .पश्चिमी दिल्ली के भाजपा संसद प्रवेश वर्मा कहते हैं -'' भाजपा एक देशभक्त पार्टी है इसलिए मुसलमान कभी इसे वोट नहीं देते हैं .''

      देश में ऐसी देशभक्ति नहीं देखी जैसी भाजपाइयों की है और न ही ऐसी रामभक्ति जैसी भाजपा के अनुयायियों  की है आलम ये है कि भाजपाई स्वयं पर घमंड करने में इतने चूर हैं कि यदि कोई मोदी की इनके सामने बुराई कर दे और अभिवादन में यदि वह '' राम-राम'' या ''जय सिया राम '' कह दे तो उसे एकदम पलटकर कहते हैं '' ये शब्द तेरे मुंह से अच्छा नहीं लगता '' जैसे राम शब्द इनका पेटेंट हो गया हो या भगवान ने बस भाजपा वालों को या मोदी को चाहने वालों को ही राम शब्द के उच्चारण की इज़ाज़त दी हो .

         तात्पर्य बस इतना भर है कि इस वक़्त देश में भाजपा की सरकार है , भाजपा के मोदी की तूती बोल रही है प्रभाव उसका यह पड़ रहा है कि ''हर अच्छा काम इनका हर अच्छा नाम इनका '' देशभक्त भी यही ,राम भक्त भी यही ,भले ही न देश को जाने न राम को और ये हाल तब जब स्वतंत्रता संग्राम में भाजपा के किसी बड़े नेता का जेल तक जाने का कोई इतिहास नहीं और जिनका जेल जाने का इतिहास है भी ,उनका ऐसा कि पढ़कर शर्म आ जाये .

        भाजपा के पहले प्रधानमंत्री ,देश के एक भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के बारे में यह जानकारी उनका विकिपीडिया ही देता है .जहाँ लिखा है -

EARLY POLITICAL CAREER (1942–1975)[EDIT]

Vajpayee's first exposure to politics was in August 1942, when he and his elder brother Prem were arrested for 23 days during the Quit India movement, when he was released only after giving a written undertaking, expressly declaring not to participate in any of the anti-British struggle.[9]

प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी कहते हैं -

'' तुम्हारी राह में मिटटी के घर नहीं आते ,
   इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते .''

कितना सही कहा है और कितना दर्द छुपा है इन पंक्तियों में शायर की जिसे केवल वह समझ सकता है ,महसूस कर सकता है जो मिटटी के घर में रहा हो अर्थात उन परिस्थितयों से गुज़रा हो जिनसे एक देश प्रेमी होते हुए भी गद्दार की उपाधि से विभूषित मुसलमान जिसे हम चक दे इंडिया के कोच कबीर खान के दिल पर गुज़रते हुए देख सकते हैं .

  एक कौम जिसका इतिहास स्वतंत्रता संग्राम में बलिदानों से भरा पड़ा है उसे दहशत गर्दों की श्रेणी में खड़ा कर दिया गया है गद्दार बताया जा रहा है ,शर्म आनी चाहिए  हमें खुद पर जो कद्रदानों की श्रेणी से निकलकर एहसान फरामोशों की श्रेणी में लुढकते जा रहे हैं .देश का स्वतंत्रता संग्राम बलिदानों से भरा पड़ा है और उन बलिदानों में बहुत बड़ी संख्या में हमारे मुस्लिम भाई-बहनों के बलिदान भी हैं जिन्हें यदि हम नज़रअंदाज़ करते हैं तो हम एहसान फरामोश हैं .
    इतिहास के पन्नों में अनगिनत ऐसी हस्तियों के नाम दबे पड़े हैं जिन्हो ने भारतीय स्वतंत्रा आंदोलन में अपने जीवन का बहुमूल्य योगदान दिया जिनका ज़िक्र भूले से भी हमें सुनने को नहीं मिलता? जबकि अंग्रेजों के खिलाफ भारत के संघर्ष में मुस्लिम क्रांतिकारियों, कवियों और लेखकों का योगदान प्रलेखित है|
Bahadur shah zafar 1857 movement
बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे औरउर्दू भाषा के माने हुए शायर थे। उन्होंने 1857  का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई।पहली जंगे आजादी के महान स्वतंत्र सेनानी अल्लामा फजले हक खैराबादी ने दिल्ली की जामा मस्जिद से सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा दिया था ! इस फतवे के बाद आपने बहादुर शाह ज़फर के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला और अज़ीम जंगे आजादी लड़ी !
अँगरेज़ इतिहासकार लिखते हैं की इसके बाद हजारों उलेमाए किराम को फांसी ,सैकड़ों को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया था और बहुतसों को काला पानी की सजा दी गयी थी! अल्लामा फजले हक खैराबादी को रंगून में काला पानी में शहादत हासिल हुई !
यह स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध था जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने 1857 का सिपाही विद्रोह कहा।
silk letter movement (Reshmi Rumal)
   आजादी  के आंदोलन में विश्वप्रसिद्ध इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबंद का योगदान भी कम नहीं रहा। यहां से शुरू हुआ ‘तहरीक-ए-रेशमी रुमाल’ ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे। इसके तहत रुमाल पर गुप्त संदेश लिखकर इधर से उधर भेजे जाते थे, जिससे अंग्रेजी फौज को आंदोलन के तहत की जाने वाली गतिविधियों की खबर नहीं लग सके। तहरीक रेशमी रुमाल शुरू कर जंग-ए-आजादी में अहम भूमिका निभाई।
Deoband Ulema’s movement
दारुल उलूम देवबन्द की आधारशिला 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना क़ासिम नानौतवी द्वारा रखी गयी थी। वह समय भारत के इतिहास में राजनैतिक उथल-पुथल व तनाव का समय था, उस समय अंग्रेज़ों के विरूद्ध लड़े गये प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई.) की असफलता के बादल छंट भी न पाये थे और अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति दमनचक्र तेज़ कर दिया गया था, चारों ओर हा-हा-कार मची थी। अंग्रेजों ने अपनी संपूर्ण शक्ति से स्वतंत्रता आंदोलन (1857) को कुचल कर रख दिया था। अधिकांश आंदोलनकारी शहीद कर दिये गये थे, (देवबन्द जैसी छोटी बस्ती में 44 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था) और शेष को गिरफ्तार कर लिया गया था, ऐसे सुलगते माहौल में देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानियों पर निराशाओं के प्रहार होने लगे थे। चारो ओर खलबली मची हुई थी। एक प्रश्न चिन्ह सामने था कि किस प्रकार भारत के बिखरे हुए समुदायों को एकजुट किया जाये, किस प्रकार भारतीय संस्कृति और शिक्षा जो टूटती और बिखरती जा रही थी, की सुरक्षा की जाये। उस समय के नेतृत्व में यह अहसास जागा कि भारतीय जीर्ण व खंडित समाज उस समय तक विशाल एवं ज़ालिम ब्रिटिश साम्राज्य के मुक़ाबले नहीं टिक सकता, जब तक सभी वर्गों, धर्मों व समुदायों के लोगों को देश प्रेम और देश भक्त के जल में स्नान कराकर एक सूत्र में न पिरो दिया जाये। इस कार्य के लिए न केवल कुशल व देशभक्त नेतृत्व की आवश्यकता थी, बल्कि उन लोगों व संस्थाओं की आवश्यकता थी जो धर्म व जाति से उपर उठकर देश के लिए बलिदान कर सकें।
इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जिन महान स्वतंत्रता सेनानियों व संस्थानों ने धर्मनिरपेक्षता व देशभक्ति का पाठ पढ़ाया उनमें दारुल उलूम देवबन्द के कार्यों व सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता।
       शेखुल हिन्द की अंग्रेजों के विरूद्ध तहरीके-रेशमी रूमाल, मौलाना मदनी की सन 1936 से सन 1945 तक जेल यात्रा, मौलाना उजै़रगुल, हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद का मालटा जेल की पीड़ा झेलना, मौलाना सिंधी की सेवायें इस तथ्य का स्पष्ट प्रमाण हैं कि दारुल उलूम ने स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाई है। इस संस्था ने ऐसे अनमोल रत्न पैदा किये जिन्होंने अपनी मात्र भूमि को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा दिया। ए. डब्ल्यू मायर सियर पुलिस अधीक्षक (सीआई़डी राजनैतिक) पंजाब ने अपनी रिपोर्ट नं. 122 में लिखा था जो आज भी इंडिया आफिस लंदन में सुरक्षित है कि ”मौलाना महमूद हसन (शेखुल हिन्द) जिन्हें रेशमी रूमाल पर पत्र लिखे गये, सन 1915 ई. को हिजरत करके हिजाज़ चले गये थे, रेशमी ख़तूत की साजिश में जो मौलवी सम्मिलित हैं, वह लगभग सभी देवबन्द स्कूल से संबंधित हैं।
       उड़ीसा के गवर्नर श्री बिशम्भर नाथ पाण्डे ने एक लेख में लिखा है कि दारुल उलूम देवबन्द भारत के स्वतंत्रता संग्राम में केंद्र बिन्दु जैसा ही था, जिसकी शाखायें दिल्ली, दीनापुर, अमरोत, कराची, खेडा और चकवाल में स्थापित थी। भारत के बाहर उत्तर पशिमी सीमा पर छोटी सी स्वतंत्र रियासत ”यागि़स्तान“ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र था, यह आंदोलन केवल मुसलमानों का न था बल्कि पंजाब के सिक्खों व बंगाल की इंकलाबी पार्टी के सदस्यों को भी इसमें शामिल किया था।
     इसी प्रकार असंख्यक तथ्य ऐसे हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि दारुल उलूम देवबन्द स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात भी देश प्रेम का पाठ पढ़ता रहा है जैसे सन 1947 ई. में भारत को आज़ादी तो मिली, परन्तु साथ-साथ नफरतें आबादियों का स्थानांतरण व बंटवारा जैसे कटु अनुभव का समय भी आया, परन्तु दारुल उलूम की विचारधारा टस से मस न हुई। इसने डट कर इन सबका विरोध किया और इंडियन नेशनल कांग्रेस के संविधान में ही अपना विश्वास व्यक्त कर पाकिस्तान का विरोध किया तथा अपने देशप्रेम व धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण दिया। आज भी दारुल उलूम अपने देशप्रेम की विचार धारा के लिए संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है।
khudai khidmatgar movement
     लाल कुर्ती आन्दोलन भारत में पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ानद्वाराभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थन में खुदाई ख़िदमतगार के नाम से चलाया गया। विद्रोह के आरोप में उनकी पहली गिरफ्तारी 3 वर्ष के लिए हुई थी। उसके बाद उन्हें यातनाओं की झेलने की आदत सी पड़ गई। जेल से बाहर आकर उन्होंने पठानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने के लिए ‘ख़ुदाई ख़िदमतग़ार’ नामक संस्था की स्थापना की और अपने आन्दोलनों को और भी तेज़ कर दिया।
1937 में नये भारत सरकार अधिनियम के अन्तर्गत कराये गए चुनावों में लाल कुर्ती वालों के समर्थन से काँग्रेस पार्टी को बहुमत मिला और उसने गफ्फार खान के भाई खान साहब के नेतृत्व में मन्त्रिमण्डल बनाया जो बीच का थोड़ा अन्तराल छोड़कर 1947 में भारत विभाजन तक काम करता रहा। इसी वर्ष सीमान्त प्रान्त को भारत और पाकिस्तान में से एक में विलय का चुनाव करना पड़ा। उसने जनमत संग्रह के माध्यम से पाकिस्तान में विलय का विकल्प चुना। खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी के रूप में प्रसिद्ध) एक महान राष्ट्रवादी थे जिन्होंने अपने 95 वर्ष के जीवन में से 45 वर्ष केवल जेल में बिताया;
वर्ष 1905 के बंग-भंग विरोधी जनजागरण से स्वदेशी आन्दोलन को बहुत बल मिला। यह 1911 तक चला और गान्धीजी के भारत में पदार्पण के पूर्व सभी सफल अन्दोलनों में से एक था। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद  , अरविन्द घोष, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय स्वदेशी आन्दोलन के मुख्य उद्घोषक थे।आगे चलकर यही स्वदेशी आन्दोलन महात्मा गांधी के स्वतन्त्रता आन्दोलन का भी केन्द्र-बिन्दु बन गया। उन्होने इसे “स्वराज की आत्मा” कहा। इस आंदोलन का प्रचार सैय्यद हैदर रज़ा ने दिल्ली में किया।
विश्वयुद्ध के पश्चात् हुई कई अन्य घटनाओं ने भी हिन्दू-मुस्लिम राजनीतिक एकीकरण के लिये एक व्यापक पृष्ठभूमि तैयार की-
1 लखनऊ समझौता (1916)- इससे कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में सहयोग बढ़ा।
2 रौलेट एक्ट के विरुद्ध प्रदर्शन में समाज के अन्य वर्गों के साथ ही हिन्दू तथा मुसलमान भी एक-दूसरे के करीब आ गये।
3 मौलिक राष्ट्रवादी मुसलमान जैसे-  मौलाना अबुल कलाम आजाद,मौलाना उबैदुल्लाह सिन्धी, हकीम अजमल खान, हसरत मोहनी डा। सैयद महमूद, हुसैन अहमद मदनी, प्रोफेसर मौलवी बरकतुल्लाह, डॉ॰ जाकिर हुसैन, सैफुद्दीन किचलू, वक्कोम अब्दुल खदिर, डॉ॰ मंजूर अब्दुल वहाब, बहादुर शाह जफर, हकीम नुसरत हुसैन, खान अब्दुल गफ्फार खान, अब्दुल समद खान अचकजई, शाहनवाज कर्नल डॉ॰ एम॰ ए॰ अन्सरी, रफी अहमद किदवई, फखरुद्दीन अली अहमद, अंसार हर्वानी, तक शेरवानी, नवाब विक़रुल मुल्क, नवाब मोह्सिनुल मुल्क, मुस्त्सफा हुसैन, वीएम उबैदुल्लाह, एसआर रहीम, बदरुद्दीन तैयबजी , आदि उनमे प्रमुख नाम हैं.
शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश के अशफाक उल्ला खाँ वारसी भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। उन्होंने काकोरी काण्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। ब्रिटिश शासन ने उनके ऊपर अभियोग चलाया और 19 दिसम्बर सन् 1927 को उन्हें फैजाबाद जेल में फाँसी पर लटका कर मार दिया गया। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के सम्पूर्ण इतिहास में ‘बिस्मिल’ और ‘अशफाक’ की भूमिका निर्विवाद रूप से हिन्दू-मुस्लिम एकता का अनुपम आख्यान है।
  Provisional Government of Free India (Azad Hind)
     सन 1914 ई. में मौलाना उबैदुल्ला सिंधी ने अफ़गानिस्तान जाकर अंग्रेज़ों के विरूद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की सर्वप्रथम  स्वंतत्र सरकार स्थापित की जिसका राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप को बना गया। आज़ाद हिन्द फ़ौज सबसे पहले राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने 29 अक्टूबर 1915 को अफगानिस्तान में बनायी थी। मूलत: यह ‘आजाद हिन्द सरकार’ की सेना थी जो अंग्रेजों से लड़कर भारत को मुक्त कराने के लक्ष्य से ही बनायी गयी थी। किन्तु इस लेख में जिसे ‘आजाद हिन्द फौज’ कहा गया है उससे इस सेना का कोई सम्बन्ध नहीं है। हाँ, नाम और उद्देश्य दोनों के ही समान थे। रासबिहारी बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू किया था और उसे भी यही नाम दिया अर्थात् आज़ाद हिन्द फ़ौज। बाद में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आज़ाद हिन्द फौज़ का सर्वोच्च कमाण्डर नियुक्त करके उनके हाथों में इसकी कमान सौंप दी। इस फ़ौज में मुसलमानो की बड़ी तादाद थी , जिसमे कुछ नाम आबिद हसन , अमीर हमज़ा ,शाहनवाज़ खान , अब्बास अली , निज़ामुद्दीन खान ई हैं .(dandi March
Quit India Movement
    केरल के अब्दुल वक्कोम खदिर ने 1942 के ‘भारत छोड़ो’ में भाग लिया और 1942 में उन्हें फांसी की सजा दी गई थी, उमर सुभानी जो की बंबई की एक उद्योगपति करोड़पति थे, उन्होंने गांधी और कांग्रेस व्यय प्रदान किया था और अंततः स्वतंत्रता आंदोलन में अपने को कुर्बान कर दिया।
     मुसलमान महिलाओं में हजरत महल, अस्घरी बेगम, बाई अम्मा ने ब्रिटिश के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में योगदान दिया है.
     अफ़सोस आज हमें उन लोगों की कुर्बानी बिलकुल भी याद नहीं रही, याद रहा तो सिर्फ एक ही नाम जो मुस्लिम कटआउट की तरह जहाँ देखो वहीं दिखाई देता है ?
       जिसे देखकर हम ने भी यही समझ लिया कि मुसलमानो में सिर्फ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद  ही एक थे जिनका एकमात्र नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ है , मौलाना आजाद  भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता और हिन्दू मुस्लिम एकता की वकालत करने वाले थे….![ASSAM123.COM से साभार ]
      और रही बात राम नाम के उच्चारण की तो इस देश में गंगा -जमुनी तहज़ीब रही है .हिंदुओं व् मुसलमानों ने अपने अपने त्यौहार मिलजुल कर मनाये हैं .दीवाली की मिठाई व् ईद की सिवइयां हिंदुओं व् मुसलमानों के प्यार की प्रतीक रही हैं.
असत्य पर सत्य की विजय का त्योहार विजयदशमी पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है । ऐसे में देश के तमाम शहरों में रामलीला समितियों द्वारा रामलीला का मंचन होता  है। धर्म की नगरी काशी में अनादिकाल से होती चली आ रही रामनगर की रामलीला आज भी होती  है वहीं जिले के फुलवरिया गांव में गंगा  जमुनी तहज़ीब की मिसाल रामलीला आज से 50 साल पहले मरहूम नसीमुद्दीन ने गांव के लोगों को साथ मिलकर शुरू की थी। पेश है फुलवरिया गांव से इस अनोखी रामलीला पर टीम iamin की खास रिपोर्ट।
     ''अध्यात्म और धर्म की नगरी में इस वक्त दशहरे की धूम है। चारों तरफ रामलीला समितियां राम की लीला का मंचन करने में व्यस्त हैं। ऐसे ही एक रामलीला समिति है नवचेतना कला एवं विकास समिति जिसमें मुस्लिम भाई अपना योगदान शुरूआती दिनों से देते आ रहे हैं। इस संस्था के संस्थापक सदस्य डॉ. शिव कुमार गुप्त ने बताया, "इस रामलीला की शुरूआत सन 1952 में मुस्लिम समुदाय के मरहूम नसीमुद्दीन ने की थी। यहां लीला का मंचन हिन्दू-मुसलमान सभी मिलकर करते हैं। इस गांव की रामलीला की सबसे खास बात यह है की रामलीला के सभी पात्र और शृंगार करने वाले, व्यास मंडली, सजावट करने वाले सभी गांव के ही सदस्य हैं।"
    संस्था के सदस्य और पिछले दस सालों से राजा दशरथ के मंत्री सुमंत का किरदार निभाने वाले मोहम्मद बारी ने बताया, "असत्य पर सत्य की जीत का यह त्योहार हमारे देश में तहज़ीब की मिसाल पेश कर रहा है। आज दस साल हो गए रामलीला में इस किरदार को निभाते हुए, इससे मुझे सुख की प्राप्ति होती है। गांव के सभी समुदाय के सदस्य रामलीला के  आयोजन में मुख्य भूमिका निभाते हैं। इस लीला के सभी पात्र और
सहयोगी  गांव के ही हैं।"
हिन्दू-मुस्लिम भाई चारे की प्रतीक नवचेतना कला एवं विकास समिति पूरे देश को आपसी भाई चारे का संदेश दे रही है। जब शहर अन्याय प्रतिकार की आंच से खामोश सा है ऐसे में शहर से चंद कदमों की दूरी पर रामदशरथ वियोग पर हिन्दू-मुसलमान एक साथ नम आंखों से इस वियोग के मंचन के साथ उसे देख भी रहे हैं।
      पर नहीं दिखता है तो  उन्हें जो अपनी आँखों पर स्वयं के ही सर्वश्रेष्ठ होने का चश्मा लगाए हैं ,स्वयं के ही देशभक्त होने की धूनी रमाये हैं और अपने को ही रामभक्त कह भरमाये हुए हैं नहीं जानते ये भेद तो उनके प्रिय राम ने कभी नहीं किया जो कर वे भेदभाव की दीवार खड़ी कर रहे हैं उस सुगंध को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं जो इस देश के कोने कोने में फैली है और जिसे छिपाने की अनुमति न ये देश दे सकता है और न ही राम -
   ''कैंची से चिरागों की लौ काटने वालों ,
   सूरज की तपिश को रोक नहीं सकते ,
   तुम फूल को चुटकी से मसल सकते हो ,
   पर फूल की खुशबु समेट नहीं सकते .''


शालिनी कौशिक

  [कौशल ]

रविवार, 18 दिसंबर 2016

भाजपा देगी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच ?

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      भाजपा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच, सोचकर भी दिल इस पार्टी से किसी सकारात्मक रवैये की आशा नहीं रख पाता और अगर रखना भी चाहे तो ये पार्टी अपनी हरकतों से उस पर पानी फेर देती है। २३ जुलाई २०१५ को पार्टी के प्रमुख नेता देश के केंद्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड़ा जी कहते हैं -''कि केंद्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच चाहता है किन्तु यह खंडपीठ कहाँ हो यह उच्चस्तरीय विचार का विषय है। ''
       ऐसा नहीं है कि केवल वे ही इसमें ऐसे हैं जो खंडपीठ मामले को उलझाने के लिए इस आंदोलन में दरार डालने का काम कर रहे हों। अंग्रेजी शासन से पूरी तरह से प्रेरणा ग्रहण करने वाली भाजपा अपने हर शख्स में इस गुण का गहराई से समावेश रखती है। जबसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं ने यह नारा बुलंद किया है ''अभी नहीं तो कभी नहीं '' तबसे लार्ड कर्जन के पद चिन्हों पर चलने वाली यह पार्टी वेस्ट यूपी में ''फूट डालो राज करो '' की नीति ही अपनाकर काम चला रही है। सदानंद गौड़ा तो आगरा और मेरठ के बीच प्रभुत्व की लड़ाई के बीज बो गए और इनके वर्तमान यूपी में अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य इस आंदोलन की ही जड़ काटने पर आ गए उन्होंने इलाहाबाद के ही अधिवक्ताओं को प्रधानमंत्री से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच न बनायीं जाने की बात कहलवायी।
           वर्ष १९७९ से आजतक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वकीलों द्वारा  बेंच को लेकर तालाबंदी,कचहरी गेट पर  धरना ,इलाहाबाद बार का पुतला फूंकना  ,वकीलों से झड़पें ऐसी सुर्खियां समाचारपत्रों की १९७९ से बनती रही हैं और अभी आगे भी बनते रहने की सम्भावना स्वयं हमारी अच्छे दिन लाने वाली सरकार ने स्पष्ट कर दी थी क्योंकि केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के पत्र पर बेंच गठन के लिए बनी कमेटी को ही भंग कर दिया गया था .
    पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच हमेशा से राजनैतिक कुचक्र का शिकार बनती रही है और किसी भी दल की सरकार आ जाये इस मुद्दे पर अपने वोट बैंक को बनाये रखने के लिए इसे ठन्डे बस्ते में डालती रही है और इसका शिकार बनती रही है यहाँ की जनता ,जिसे या तो अपने मुक़दमे को लड़ने के लिए अपने सारे कामकाज छोड़कर अपने घर से इतनी दूर कई दिनों के लिए जाना पड़ता है या फिर अपना मुकदमा लड़ने के विचार ही छोड़ देना पड़ता है किन्तु वह पार्टी जो स्वयं को अच्छे दिन लाने वाली कहती है कहती है न गुंडाराज  न भ्रष्टाचार अबकी बार भाजपा सरकार ,किन्तु जो गुंडाराज भ्रष्टाचार रोकने हेतु सबसे ज़रूरी कदम है उसे लेकर ही उसका रुख अन्य दलों जैसा ही नज़र आता है और वह भी पूरब में बसे वकीलों से अपनी बिगाड़ना नहीं चाहती है  .
   वकील इस मुद्दे को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं और जनता इस बात से अभी तक या तो अनभिज्ञ है या कहें कि वह अपनी अनभिज्ञता  को छोड़ना ही नहीं चाहती जबकि यह हड़ताल उन्हें हर तरह से नुकसान पहुंचा रही है और वे रोज़ न्यायालयों के चक्कर काटते है और वापस आ जाते हैं वकीलों पर ही नाराज़ होकर ,वे समझना ही नहीं चाहते कि हड़ताल की पूरी जिम्मेदारी हमारी सरकारों की है जो समय रहते इस मुद्दे को निबटाना ही नहीं चाहते और पूर्व के वर्चस्व को पश्चिम पर बनाये रखना चाहते हैं .साथ ही एक बात और भी सामने आई है कि सरकार जनता को बेवकूफ बनाये रखने में ही अपनी सत्ता की सुरक्षा समझती है और नहीं देखती कि न केवल जनता के समय की पैसे की बर्बादी हो रही है बल्कि इतनी दूरी के उच्च न्यायालय से जनता धोखे की शिकार भी हो रही है क्योंकि पास के न्यायालय में बैठे अधिवक्ता अपने मुवक्किल के सामने होते हैं और उन्हें मुक़दमे के संबंध में अपनी प्रतिबद्धता अपने मुवक्किल को साबित करनी पड़ती है किन्तु यह सब उस पार्टी को भी नहीं दिखता जो अपनी सत्ता द्वारा जनता से अच्छे दिन लाने का वादा करती है .पश्चिम का सब कुछ उठाकर पूर्व को देने की यह महत्वाकांक्षा यह पार्टी भी रखती है .
      और फिर इस पार्टी से जितनी आशाएं जनता रखती है अगर गहराई से विचार किया जाये तो जिस मुद्दे को उठाकर यह पार्टी काफी दमदार रूप से सत्ता में दाखिल हुई थी उस मुद्दे का ही आज तक यह क्या कर पायी है ? राम मंदिर की नींव की ईंट  तक यह पार्टी नहीं रखवा पायी जबकि १९९२ में इसने अपने आंदोलन द्वारा उत्तर प्रदेश के कितने ही घरों को उजड़वा दिया था ,देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को पूरे विश्व में धक्का पहुंचवाया था ,जिन कल्याण सिंह ने इस काम में अपनी सरकार की ही बलि दे दी थी उन्हें अपनी पार्टी तक से बाहर का रास्ता दिखा दिया था ,फिर ऐसी पार्टी से उम्मीद पालकर किसी को भी क्या मिलने वाला है समझ में नहीं आता फिर भी वेस्ट यूपी के वकील अपने समय की बर्बादी कर रहे हैं और अपने काम के साथ अन्याय .
       राहुल गाँधी जिनकी पार्टी को विपक्ष के नेता का दर्जा तक नहीं मिला, को सदन में बोलने का मौका न मिले , बात समझ में आती  है किन्तु ये सोचना चाहिए जो पार्टी पूर्ण बहुमत लेकर सत्ता में आयी है उसके प्रधानमंत्री जी ही सदन में बोलने की ताकत नहीं जुटा पाते तो ये पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हाई कोर्ट बेंच जैसी भारीभरकम मांग  कैसे पूरी कर सकते हैं ,ये इनकी ताकत के बाहर की बात है .

शालिनी कौशिक
    [कौशल ]




मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

शाईस्तगी को भूल ये सत्ता मद में चूर हैं ,


तानेज़नी पुरजोर है सियासत  की  गलियों में यहाँ ,
ताना -रीरी कर रहे हैं  सियासतदां  बैठे यहाँ .
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इख़्तियार मिला इन्हें राज़ करें मुल्क पर ,
ये सदन में बैठकर कर रहे सियाहत ही यहाँ .
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तल्खियाँ इनके दिलों की तलफ्फुज में शामिल हो रही ,
तायफा बन गयी है देखो नेतागर्दी अब यहाँ .
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बना रसूम ये शबाहत रब की करने चल दिए ,
इज़्तिराब फैला रहे ये बदजुबानी से यहाँ .
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शाईस्तगी  को भूल ये सत्ता मद में चूर हैं ,
रफ्ता-रफ्ता नीलाम  हशमत मुल्क की करते यहाँ .
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जिम्मेवारी ताक पर रख फिरकेबंदी में खेलते ,
इनकी फितरती ख़लिश से ज़ाया फ़राखी यहाँ .
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देखकर ये रहनुमाई ताज्जुब करे ''शालिनी''
शास्त्री-गाँधी जी जैसे नेता थे कभी यहाँ .
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शब्दार्थ :-तानेजनी -व्यंग्य ,ताना रीरी -साधारण गाना ,नौसीखिए का गाना
तलफ्फुज -उच्चारण ,सियाहत -पर्यटन ,तायफा -नाचने गाने आदि का व्यवसाय करने वाले लोगों का संघटित दल ,रसूम -कानून ,शबाहत -अनुरूपता  ,इज़्तिराब-बैचनी  ,व्याकुलता   ,शाईस्तगी-शिष्ट  तथा सभ्य होना ,हशमत -गौरव  ,ज़ाया -नष्ट  ,फ़राखी -खुशहाली

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

मुस्लिम महिला की स्थिति मजाक

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 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तीन तलाक के मुद्दे पर तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा -''मुस्लिम महिलाओं से क्रूरता है तीन तलाक ''.आरम्भ से हम सुनते आये कि मुसलमानों में बस पति ने कहा ''तलाक-तलाक-तलाक'' और हो गया तलाक ,आज ये मुद्दा चर्चाओं में आया है जब कहर के तूफ़ान मुस्लिम महिलाओं पर बहुत बड़ी संख्या में ढा चुका ,पर यही सोचकर संतोष कर लेते हैं कि ''चलो कुफ्र टूटा ख़ुदा ख़ुदा करके ''.
      ''तीन तलाक '' मुस्लिम महिलाओं के लिए जीवन में एक नश्तर के समान है ,नाग के काटने के समान है जिसका काटा कभी पानी नहीं मांगता ,साइनाइड जहर के समान है जिसका क्या स्वाद है उसे खाने वाला व्यक्ति कागज पेन्सिल लेकर लिखने की इच्छा लेकर उसे चाहकर  भी नहीं लिख पाता,ऐसा विनाशकारी प्रभाव रखने वाला शब्द ''तीन तलाक'' मुस्लिम महिलाओं के जीवन की त्रासदी है .अच्छी खासी चलती शादी-शुदा ज़िन्दगी एक क्षण में तहस-नहस हो जाती है .पति का तलाक-तलाक-तलाक शब्द का उच्चारण पत्नी के सुखी खुशहाल जीवन का अंत कर जाता है और कहीं कोई हाथ मदद को नहीं आ पाता क्योंकि मुस्लिम शरीयत कानून पति को ये इज़ाज़त देता है .
       कानून का जो मजाक मुस्लिम शरीयत कानून में उड़ाया गया है ऐसा किसी भी अन्य धर्म में नज़र नहीं आता .बराबरी का अधिकार देने की बात कर मुस्लिम धर्म में महिलाओं को निम्नतम स्तर पर उतार दिया गया है .मुस्लिम महिलाओं को मिले हुए मेहर के अधिकार की चर्चा उनके पुरुषों की बराबरी के रूप में की जाती है फिर निकाह के समय '' क़ुबूल है '' भी महिलाओं की ताकत के रूप में वर्णित किया जाता है किन्तु यदि हम गहनता से इन दोनों पहलुओं का विश्लेषण करें तो ये दोनों ही इसे संविदा का रूप दे देते हैं .और मुस्लिम विधि के बड़े बड़े जानकार इस धर्म की विवाह संस्था को संविदा का ही नाम देते हैं .बेली के सार-संग्रह में विवाह की परिभाषा स्त्री-पुरुष के समागम को वैध बनाने और संतान उत्पन्न करने के प्रयोजन के लिए की गयी संविदा के रूप में की गयी है .[BAILLIE : डाइजेस्ट ,पेज ९४.]
       असहाब का कथन है -''विवाह स्त्री और पुरुष की ओर से पारस्परिक अनुमति पर आधारित स्थायी सम्बन्ध में अन्तर्निहित संविदा है .''
     कुछ लेखकों और विधिशास्त्रियों ने मुस्लिम विवाह को केवल सिविल संविदा बताया है और उनके अनुसार इसमें संविदा के सभी आवश्यक लक्षण मिलते हैं .उदाहरण के लिए -
 १- विवाह में संविदा की ही तरह एक पक्ष द्वारा प्रस्ताव [इज़ाब ]और दूसरे पक्ष द्वारा स्वीकृति [कबूल ]होना आवश्यक है .इसके अलावा शादी कभी भी स्वतंत्र सहमति के बिना नहीं हो सकती है और ऐसी सहमति प्रपीड़न ,कपट अथवा असम्यक प्रभाव द्वारा प्राप्त नहीं होनी चाहिए .
२-यदि कोई संविदा अवयस्क की ओर से उसका अभिभावक करता है तब अवयस्क को यह अधिकार होता है कि वयस्क होने के बाद उसे निरस्त कर सकता है ,ठीक उसी प्रकार मुस्लिम विधि में भी वयस्क होने पर शादी निरस्त हो सकती है यदि वह अवयस्क होने पर संरक्षक द्वारा की गयी थी .
३-यदि मुस्लिम विवाह के पक्षकार विवाह संस्कार के पश्चात् ऐसा अनुबंध करते हैं जो युक्तियुक्त और इस्लाम विधि की नीतियों के विरुद्ध न हो तब विधि द्वारा प्रवर्तनीय होता है .इसी प्रकार की स्थिति संविदा में होती है .
       महत्वपूर्ण वाद अब्दुल क़ादिर  बनाम सलीमन [१८४६]८ इला.१४९ में न्यायाधीश महमूद ने और न्यायाधीश मित्तर ने सबरून्निशा के वाद में मुस्लिम विवाह को संविदात्मक दायित्व के रूप में बल दिया है और मुस्लिम विवाह को विक्रय संविदा के समान बताया है .
       मुस्लिम विवाह की प्रकृति का वर्णन करते हुए न्यायाधीश महमूद ने कहा -
'' मुसलमान लोगों में शादी एक संस्कार नहीं है अपितु पूर्ण रूप से एक सिविल संविदा है यघपि सामान्य रूप में शादी संपन्न होते समय कुरान का सुपठंन  किया जाता है फिर भी मुस्लिम विधि में इस विशिष्ट अवसर के लिए विशिष्ट सेवा सम्बंधित कोई प्रावधान नहीं है .यह परिलक्षित होता है कि विभिन्न दशाओं में जिसके अन्तर्गत शादी संपन्न होती है अथवा शादी की संविदा की उपधारणा की जाती है वह एक सिविल संविदा है .सिविल संविदा होने के उपरांत लिखित रूप से संविदा हो आवश्यक नहीं है .एक पक्षकार द्वारा इस सम्बन्ध में घोषणा अथवा कथन और दूसरे पक्षकार द्वारा सहमति और स्वीकृति होनी चाहिए अथवा उसके प्राकृतिक या विधिक अभिभावक द्वारा सहमति दी जानी चाहिए .यह सहमति सक्षम और साक्षीगण के सम्मुख व्यक्त होनी चाहिए .इसके अलावा परिस्थितियों के अनुसार निश्चित प्रतिबन्ध भी आरोपित किये जा सकते हैं .''
    सिर्फ यही नहीं कि इसमें प्रस्ताव व् स्वीकृति ही संविदा का लक्षण है बल्कि इसमें मेहर के रूप में संविदा की ही तरह प्रतिफल भी दिया जाता है .मुस्लिम विधि में मेहर वह धन है अथवा वह संपत्ति है जो पति द्वारा पत्नी को शादी के प्रतिफल के रूप में दिया जाता है अथवा देने का वचन दिया जाता है ------मुस्लिम विधि में मेहर रोमन विधि के dinatio  propter  nuptias  के समरूप है जिसे अंग्रेजी विधि में वैवाहिक अनुबंध के नाम से जाना जाता है .
     मुस्लिम विवाह संपन्न होने के समय किसी प्रकार का धार्मिक अनुष्ठान विधितः आवश्यक नहीं है .विवाह के समय काज़ी  या मुल्ला की उपस्थिति भी आवश्यक नहीं है किन्तु ये विवाह वैध व् मान्य तभी  है जब कुछ आवश्यक शर्तों का पालन हो जाये .अन्य संविदाओं के समान विवाह भी प्रस्ताव [इज़ाब ] एवं स्वीकृति [कबूल ] से पूर्ण होता है .यह आवश्यक है कि विवाह का एक पक्षकार दूसरे पक्षकार से विवाह करने का प्रस्ताव करे .जब दूसरा पक्षकार प्रस्ताव की स्वीकृति दे देता है तभी विवाह पूर्ण होता है इस प्रकार यही निष्कर्ष सही दिखाई देता है -
''कि व्यावहारिक संस्था के रूप में विवाह की वही स्थिति है जो किसी अन्य संविदा की .''[अमीर अली ]
     मुस्लिम विवाह संविदा है ये तो इन विधिवेत्ताओं की रे से व् न्यायालयों के निर्णयों से स्पष्ट हो चुका है पर मजाक यहाँ ये है कि यहाँ बराबरी की बात कहकर भी बराबरी कहाँ दिखाई गयी है .मुस्लिम  विधि में जब निकाह के वक़्त प्रस्ताव व् स्वीकृति को महत्व दिया गया तो तलाक के समय केवल मर्द को ही तलाक कहने का अधिकार क्यों दिया गया .संविदा तो जब करने का अधिकार दोनों का है तो तोड़ने का अधिकार भी तो दोनों को ही मिलना चाहिए था लेकिन इनका तलाक के सम्बन्ध में कानून महिला व् पुरुष में भेद करता है और पुरुषों को अधिकार ज्यादा देता है और ये तीन तलाक जिस कानून के अन्तर्गत दिया जाता है वह है -तलाक -उल-बिद्दत -
" तलाक - उल - बिददत को तलाक - उल - बैन के नाम से भी जाना जाता है. यह तलाक का निंदित या पापमय रूप है. विधि की कठोरता से बचने के लिए तलाक की यह अनियमित रीति ओमेदिया लोगों ने हिज्रा की दूसरी शताब्दी में जारी की थी. शाफई और हनफी विधियां तलाक - उल - बिददत को मान्यता देती हैं यघपि वे उसे पापमय समझते हैं. शिया और मलिकी विधियां तलाक के इस रूप को मान्यता ही नहीं देती. तलाक की यह रीति नीचे लिखी बातों की अपेक्षा करती है -
1- एक ही तुहर के दौरान किये गये तीन उच्चारण, चाहे ये उच्चारण एक ही वाक्य में हों-"जैसे - मैं तुम्हें तीन बार तलाक देता हूं. " अथवा चाहे ये उच्चारण तीन वाक्यों में हों जैसे -" मैं तुम्हें तलाक देता हूं, मैं तुम्हें तलाक देता हूं, मैं तुम्हें तलाक देता हूं. "
2-एक ही तुहर के दौरान किया गया एक ही उच्चारण, जिससे रद्द न हो सकने वाला विवाह विच्छेद का आशय साफ प्रकट हो :जैसे" मैं तुम्हें रद्द न हो सकने वाला तलाक देता हूं."
  और अमान्य व् निंदित होते हुए भी ये तलाक आज ही नहीं बहुत पहले से मुस्लिम महिलाओं की ज़िन्दगी को तहस नहस कर रहा है .इलाहाबाद हाई कोर्ट इनके मामले को लेकर भले ही संवेदनशील दिखाई दे लेकिन हमारा इतिहास साक्षी रहा है कि अंग्रेजों ने भी इनके पर्सनल कानून में कभी कोई दखलंदाजी नहीं की और सुप्रीम कोर्ट में भी हमें नहीं लगता कि कोई दखलंदाजी इसमें की जाएगी और इसमें कोई फेरबदल हो पायेगा .कमल फारूकी जो इस वक़्त आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य हैं वे इसे अपना संवैधानिक अधिकार मानते हैं और कहते हैं -'' तीन तलाक का मसला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है .लिहाजा शीर्ष  अदालत ही अंतिम फैसला देगी .तीन तलाक का मसला सिर्फ मुस्लिमों तक सीमित नहीं है .यह उन सभी धर्मों  का सवाल है जिन्हें संविधान के मुताबिक अपनी आस्था और धर्म का पालन करने की गारंटी दी गयी है .''
   इसलिए नहीं लगता कि इस देश में मुस्लिम महिलाओं का उत्पीडन कभी रुक पायेगा क्योंकि यहाँ दूसरे के कानून में हस्तक्षेप  संविधान के मुताबिक ही गैरकानूनी है भले ही वह उसी धर्म की महिलाओं का जीवन नरक बना रहा हो .
शालिनी कौशिक 
    [कौशल  ]

संभल जा रे नारी ....

''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपन...