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जख्म देकर जाएँगी.

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उलझने हावी हैं दिल पर कब तलक ये जाएँगी, जिंदगी लेके रहेंगी या तहीदस्त जाएँगी. है अजब अंगेज़ हाल-ए-दिल हमारा क्या कहें, मीठी बातें उनकी हमको खाक ही कर जाएँगी. भोली सूरत चंचल आँखें खींचे हमको अपनी ओर , फसलें-ताबिस्ता में ये यकायक आग लगा जाएँगी. रवां-दवां रक्स इनका है इसी जद्दोजहद में , कैसे भी फ़ना करेंगी ले सुकून जाएँगी. सोच सोच में व्याकुल क्या करेगी ''शालिनी'' जाते जाते भी उसे ये जख्म देकर जाएँगी.                     शालिनी कौशिक http://shalinikaushik2.blogspot.com/

अपनी रूह होती .

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न मिलती गर जिंदगी हमें फारिग़  अपनी रूह होती, न पशेमानी कुछ न करने की न रंजीदा अपनी रूह होती . जिंदगी है इसलिए हमको मिलना  मिलकर बिछड़ना होता, ये न होती तो न रगबत कोई न तहीदस्त अपनी रूह होती. जिंदगी नाम फ़ना होने का न मय्यसर तुम्हे कुछ होगा, न ज़बूँ तुमको ही मिल पाती न खुश्क अपनी रूह होती. न होते मुबतला उजालों  में तुमको मेरे लिए मोहलत होती , तब न महदूद मेरी  उमरे-तवील तब न शाकी अपनी रूह होती. न समझो शादमां मुझको न   मसर्रत  हासिल ''शालिनी''को , बुझेगी शमा-ए-जिंदगी जिस रोज़ कर तफरीह अपनी रूह होती.                                      शालिनी कौशिक  http://shalinikaushik2.blogspot.com/   शब्द-अर्थ:-फारिग़-किसी काम से मुक्त होना, रन्जीदा-...

पर ये तन्हाई ही हमें जीना सिखाती है.

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ये जिंदगी तन्हाई को साथ लाती है,    हमें कुछ करने के काबिल बनाती  है. सच है मिलना जुलना बहुत ज़रूरी है,      पर ये तन्हाई ही हमें जीना  सिखाती है. यूँ तो तन्हाई भरे शबो-रोज़,           वीरान कर देते हैं जिंदगी. उमरे-रफ्ता में ये तन्हाई ही ,         अपने गिरेबाँ में झांकना सिखाती है. मौतबर शख्स हमें मिलता नहीं,      ये यकीं हर किसी पर होता नहीं. ये तन्हाई की ही सलाहियत है,      जो सीरत को संजीदगी सिखाती है.         शालिनी कौशिक  http://shalinikaushik2.blogspot.com/

कर जाता है....

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कर जाता है.... दिखाता मुख की सुन्दरता,टूट जाता इक  झटके में, वहम हम रखते हैं जितने खत्म उनको कर जाता है. है हमने जब भी ये चाहा,करें पूरे वादे अपने, दिखा कर अक्स हमको ये, दफ़न उनको कर जाता है. करें हम वादे कितने भी,नहीं पूरे होते ऐसे, दिखा कर असलियत हमको, जुबां ये बंद कर जाता है  कहें वो आगे बढ़ हमसे ,करो मिलने का तुम वादा, बांध हमको मजबूरी में, दगा उनको दे जाता है.                        शालिनी कौशिक  http://shalinikaushik2.blogspot.com -- 

बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.

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मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती, बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती. जी लेता है इन्सान गर्दिशी हज़ार पल, एक पल भी हमको साँस ये लेने नहीं देती. भूली हुई यादों के सहारे रहें गर हम, ये जिंदगी राहत से गुजरने नहीं देती. जीने के लिए चाहियें दो प्यार भरे दिल, दीवार बनके ये उन्हें मिलने नहीं देती. बैठे हैं इंतजार में वो मौत के अगर, आगोश में लेती उन्हें बचने नहीं देती.                       शालिनी कौशिक