शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.





मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती,
बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.

जी लेता है इन्सान गर्दिशी हज़ार पल,
एक पल भी हमको साँस ये लेने नहीं देती.

भूली हुई यादों के सहारे रहें गर हम,
ये जिंदगी राहत से गुजरने नहीं देती.

जीने के लिए चाहियें दो प्यार भरे दिल,
दीवार बनके ये उन्हें मिलने नहीं देती.

बैठे हैं इंतजार में वो मौत के अगर,
आगोश में लेती उन्हें बचने नहीं देती.

                      शालिनी कौशिक 

22 टिप्‍पणियां:

dipak kumar ने कहा…

maut bin bulaye aana pasand karti hai bulane se voh nah aati
bahut acchi post

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

गहरे जज़्बात और सही बात।
शुक्रिया !

S.N SHUKLA ने कहा…

Shalini ji
bahut sundar nazm,badhai

amrendra "amar" ने कहा…

भूली हुई यादों के सहारे रहें गर हम,
ये जिंदगी राहत से गुजरने नहीं देती.
shalini kaushik ji bahut hi gehari se likha hai aapne...sach me bahut sahi kaha hai aapne.bahut sunderta se dhala hai aapne apne jajbat ko.waah

रविकर ने कहा…

यार "रविकर"

लेखों में पुरस्कार जितने वाले
लोग इधर भी हाथ आजमाने लग पड़े हैं |

मैं तो अभी क्या बोलते हैं,
काफिया और न जाने क्या-क्या,
का नाम याद करने में ही लगा हूँ --
और ये शुद्ध लेखक लोग
गजल पर गजल छपे जा रहे हैं --
शायरों की खैर नहीं बाबा --

संजीव ने कहा…

भूली हुई यादों के सहारे रहें गर हम,
ये जिंदगी राहत से गुजरने नहीं देती.

कैद-ए-हयात का चित्रण.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती,
बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.

जी लेता है इन्सान गर्दिशी हज़ार पल,
एक पल भी हमको साँस ये लेने नहीं देती.

Bahut Badhiya....

vidhya ने कहा…

aap ka kavitha bahut aacha tha

शारदा अरोरा ने कहा…

मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती,
बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.
पहली दोनों पंक्तियाँ खूबसूरत ....

सदा ने कहा…

बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

एस.एम.मासूम ने कहा…

बेहतरीन पेशकश

शिखा कौशिक ने कहा…

बहुत सुन्दर व् सार्थक रचना प्रस्तुत की है आपने .आभार

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वाह।

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती,बनके ज़हर जो जिंदगी जीने नहीं देती.
जी लेता है इन्सान गर्दिशी हज़ार पल,एक पल भी हमको साँस ये लेने नहीं देती.

सुंदर कोमल और बेहद खूबसूरत

veerubhai ने कहा…

जीने के लिए चाहिए दो प्यार भरे दिल ,
दीवार बनके ये उन्हें मिलने नहीं देती .
बहुत खूब !
ये जुबां हमसे सी नहीं जाती ,
ज़िन्दगी है के जी नहीं जाती .

Vivek Jain ने कहा…

अतिसुंदर,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

अजय कुमार ने कहा…

सुंदर और यथार्थपरक गजल ,बधाई

Suman ने कहा…

hak pankti sunder lagi....

ali ने कहा…

नाउम्मीदियों पे बेहतर लिखा है आपने ! ये भी एक किस्म की मृत्यु ही हैं !

मनोज कुमार ने कहा…

जीने के लिए चाहियें दो प्यार भरे दिल,
दीवार बनके ये उन्हें मिलने नहीं देती.
वाह! वाह!!
बहुत अच्छी ग़ज़ल।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

ग़ज़ल का हर एक अशआर बहुत खूबसूरत है!

Pappu Parihar ने कहा…

दर्द को पी गया |
जिन्दगी को जी गया |
मौत को करीब से देखा |
तुझे को नसीब से देखा |

कानून पर कामुकता हावी

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